Saturday, 18 October 2014

नहीं नहीं Kavita 215

नहीं नहीं

क्या मेरा जीवन मेरे लिए था?
फिर मैंने इसे जिया क्यों नहीं?
नहीं नहीं
यह जीवन मेरे शरीर में था
पर मुझमें नहीं
मैं इसे जीती कैसे
न यह मुझमें था, न मैं इसमें थी.

क्या ये रिश्ते मेरे लिए थे?
फिर निभे क्यों नहीं?
नहीं नहीं
न ये रिश्ते मेरे लिए थे
न मैं इन रिश्तों के लिए थी.
इनमें से कोई भी मेरा नहीं था
न मैं किसी की थी.

क्या ये त्यौहार मुझे हँसाने आए थे?
फिर मैं हँसी क्यों नहीं?
नहीं नहीं
त्यौहार की अपनी एक उजास होती है
किसी के लिए कुछ नहीं
तो किसी के लिए ख़ास होती है
कोई मनाए, न मनाए।

क्या ये मौसम मुझे लुभाने आए थे?
फिर मैं इनमे रमी क्यों नहीं?
नहीं नहीं
मौसम क्रमबद्ध आते हैं
क्रमबद्ध जाते हैं
इंतज़ार नहीं करते
किसी के रमने का.

चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ हों
उन पर हरियाली लताएँ लटकी हों
बीच घाटी में मैं होऊँ
और तुम्हारी याद हो
क्योंकि तुम तो हो नहीं सकते।
नहीं नहीं, यह भी नहीं होगा
क्योंकि चाहने से कुछ नहीं होता।

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