Saturday, 25 October 2014

यादों के दीप जलाए रखना Kavita 217

यादों के दीप जलाए रखना

मैं ज़्यादा बोल रही हूँ
ज़ोर से बोल रही हूँ
बार-बार बोल रही हूँ.
शायद मेरा कोई शब्द
कोई ध्वनि 
तुम्हारे दिमाग में कहीं फँसा रह जाए
और मेरे चले जाने के बाद भी
तुम उस शब्द से याद करो मुझे।

मैं हँसती हूँ तो पहचानी जाती हूँ
मैं रोती हूँ तो पहचानी जाती हूँ
जोश से मिलूँ तो वह मैं
लड़ूँ-झगड़ूँ तो वह मैं
मुझमें बहुत कुछ ऐसा है
जो तुम चाहो तो तुम्हें याद आएगा
नहीं चाहोगे तब भी याद आएगा।

बरसों पहले तुमने एक दीप जलाया था
मेरे नाम का
हाय बुझा दिया
बरसों पहले मैंने एक दीप जलाया था
तुम्हारे नाम का
लो बुझा दिया।
इन दीपों का क्या
दीप तो होंगे यादों के
जो न तुम बुझा पाओगे
न मैं.

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