Saturday, 25 October 2014

मैं रहूँगी Kavita 218

मैं रहूँगी

धुँधला हो रहा है सब
अंगारे बुझ रहे हैं
दिल जल रहा है.
दिल के जलने से भी रोशनी होती है.

अँधेरे में भी दिखता है मुझे
ख़ामोशी को भी सुन लेती हूँ मैं
किसी का हाथ नहीं पकड़ा
फिर भी, देखो, चल रही हूँ मैं.

मैं सबसे आगे हूँ या पीछे हूँ?
नहीं जानती पर जहाँ भी हूँ
न कोई मेरे आगे है, न पीछे
न कोई इधर, न उधर.

शरीर घट रहा है, मैं बढ़ रही हूँ
उम्र बढ़ रही है, मैं घट रही हूँ.
मैं रहूँगी घटने के बाद भी
बढ़ने के बाद तो रहूँगी ही.

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