Sunday, 30 November 2014

8. एक भावचित्र : यात्रा

8. एक भावचित्र : यात्रा

क्यों लग रहा था कि यात्रा खत्म हो गई? नहीं, यात्रा अभी ख़त्म नहीं हुई, यात्रा अभी शेष है. जैसे नया सफर आज ही शुरू हुआ है. एक गंध भरी शाखा झूल रही है, जिस पर अपना बसेरा होगा। निर्गन्ध से निकल कर गंध भरी शाख पर. ज़िन्दगी जैसे मर कर फिर से जाग उठी है. जीना कैसे मुश्किल-मुश्किल हो रहा था? पर अब मरने का समय आएगा तो मरने को जी नहीं चाहेगा। कहाँ तो सम्बन्ध एक-एक कर भुरभुरा गए थे, कहाँ ये नए द्वार खुल रहे हैं. संबंधों के भुरभुराने के साथ क्यों लगता था कि यह दुनिया जीने के काबिल नहीं है, सब छोड़-छाड़ कर कहीं भाग जाएँ? सब तज देने का भाव लिए जो अंतर-आत्माएँ थीं, आज इधर-उधर मोह में डूब रही हैं. कहाँ जाकर छुप गया अतीत? मर गया तो उसका शव तक नज़र नहीं आ रहा. रोशनी की एक किरण के लिए जो तरसते थे, आज उनके आसपास उजाले ही उजाले हैं. मन की कमज़ोरियाँ मज़बूती में बदल रही हैं. चलो, एक नई यात्रा पर चलें। जीत प्रतीक्षा कर रही है.


Friday, 28 November 2014

एक थी सीता

एक थी सीता

समय-समय पर मेरी दुकान पर काम करने वाली लड़कियों में कई सच में बहुत समझदार, सलीकापसंद और सुचारूरूप से घर-गृहस्थी चलाने वाली थीं, लेकिन उनके माता-पिता की दयनीय पारिवारिक स्थिति, कमज़ोर आर्थिक बैकग्राउंड के कारण उनके विवाह ऐसी जगह हुए कि उन्हें उम्र भर खपना पड़ा.

उम्र भर तो खैर हम भी खप रहे हैं लेकिन अपनी इच्छा से किए गए काम और मजबूरी के किए गए काम के तनाव और तसल्ली में अंतर होता है.
सीता मेरे घर में सारा घरेलु काम करती है. कल मैं रसोई में गई तो उसे भिन्डी का ढेर काटते हुए देख कर मैंने कहा, 'यार, इतनी सारी भिन्डी क्यों काट रही हो?' वह तुरंत बोली, 'यार, भिन्डी आए कई दिन हो गए, फ्रिज में पड़े-पड़े खराब हो जाएगी।' मैं कुछ सोच पाती, कह पाती, इससे पहले ही वह बोली, 'सॉरी मैम, सॉरी।' 'सुधर जा, सीता,' मैंने कहा, साथ ही यह कहने वाली थी कि 'अपनी औकात में रह' कि तभी मुझे कुछ दिन पूर्व फेसबुक पर हुई 'औकात' शब्द की छीछालेदर याद आ गई.

लगभग एक साल पहले सीता (नकली नाम) मेरे बुटीक में नौकरी के लिए आई थी. मेरे यहाँ स्टाफ़ पूरा था. मुझे ज़रूरत नहीं थी. मैंने मना कर दिया। दो दिन बाद फिर आई, बोली, 'प्लीज़, मुझे नौकरी की बहुत ज़रूरत है.' कुछ उसके सितारे मुझसे टकराए। वह कहते हैं ना, कई लोगों को देखते ही लगता है कि वे हमसे जुड़ने लायक हैं, मैंने सोचा, मुझे बहुत इधर-उधर जाना पड़ता है, इसे अपने साथ ले जाया करूँगी। एक सहारा रहेगा। मैंने कहा, 'ठीक है, तुम्हारा काम सिर्फ मेरे साथ कार में घूमना होगा। समय सुबह दस बजे से शाम सात बजे तक. हर रविवार छुट्टी। तनख्वाह पाँच हज़ार, वह भी समझो, फ़ालतू खर्च करूँगी क्योंकि मुझे जरूरत नहीं है.' और उसकी नौकरी शुरू हो गई.
मैं दूसरे दिन उसे साथ लेकर चाँदनी चौक गई. बीच रास्ते में घबरा कर बोली, 'रोकिए, रोकिए, जल्दी।' मैंने कार रोकी, कार को अनलॉक किया। उसने अपनी तरफ का दरवाज़ा खोल कर बाहर सड़क पर औक औक उलटी कर दी. किसी तरह रुकते-रुकाते हम वापस नॉएडा पहुँचे।
अगले दिन फिर मैंने उसे कार में बैठने के लिए कहा, मुझे लाजपत नगर जाना था. वह बोली, 'मैम, क्यों ना हम बस में चलें? मुझे कार में उलटी आती है.' मुझे यह कहावत याद आई, नरक का कीड़ा नरक में खुश. मैंने कहा, 'सीता, मैंने ज़रूरत न होते हुए भी तुम्हें काम पर रखा. तुम्हें काम करना है तो अपनी कोई तो उपयोगिता सिद्ध करो.' बोली, 'मैम मैं आपके बुटीक में तुरपाई का काम कर सकती हूँ, साड़ी में फॉल लगा सकती हूँ.' 'पर उसके लिए तो लोग हैं,' मैंने कहा और उसे लेकर दुकान से घर आ गई. घर आकर मैंने उससे पूछा, 'चाय बनानी आती है?' उसने खुश हो कर चाय बनाई, ढाबा टाइप, कम पत्ती को कढ़ा-कढ़ा कर ज़्यादा दूध की. हमें लाइट चाय पीने की आदत थी, फिर भी अच्छी लगी. अगले दिन बोली, 'मैम, मैं आपके घर खाना बनाने का काम कर सकती हूँ.' हमारी खाना बनाने वाली उन्हीं दिनों गाँव गई थी. घर का अन्य पूरा काम करने के लिए एक काम वाली थी जो संयोग से उस दिन छुट्टी पर थी. सीता ने खाना बनाया, बेहद स्वाद। बरखा और बच्चों को भी वह पसंद आई क्योंकि वह गुड लुकिंग, अच्छे कपड़े, साफ़-सुथरी, बोलने में ठीक-ठाक थी. गाँव की है पर लगती नहीं, शान से कहती है, 'मैं दसवीं पास हूँ.'
फिर कुछ दिन बाद बोली, 'मैम, पाँच हज़ार में मेरा पूरा नहीं पड़ता। मैं आपके घर का सारा काम करूँ तो? आप दूसरी कामवाली को हटा कर उसकी तनख्वाह मुझे दे दें.' वैसे उसका पति ठीक-ठाक कमा लेता था, तीन बच्चे थे. सीता की उम्र इतनी अधिक नहीं थी, उसने बताया था, अट्ठाइस साल. सीता अच्छे घर की थी, अच्छे कपड़े पहनती थी, अपने हिसाब से सज कर रहती थी, दसवीं पास थी, और उसने गुरूर के साथ बताया था कि 'मैं ब्राह्मण हूँ, सीता शर्मा।' मैंने पूछा, 'तुम बर्तन माँजना, झाड़ू पोछा, कपड़े धोना, ये सब कैसे करोगी?' वह बोली, 'अपने घर में नहीं करती क्या? यह भी तो मेरे घर जैसा है. और फिर तनख्वाह भी तो बढ़ेगी।' मैंने दूसरी कामवाली से पूछा, उसे काम छोड़ने में कोई ऐतराज़ नहीं था. और सीता ने हमारा पूरा घर सँभाल लिया। हमारे घर में सब आलसी। कोई हिलना न चाहे। खाने की थालियाँ सब के पलँग पर पहुँचने लगीं। डायनिंग टेबल बच्चों की किताबों से भरी रहने लगी. घर का हर सदस्य सीधा उसी से कहने लगा, कब क्या चाहिए। वह सबके लिए तैयार। यहाँ तक कि हमारी अलमारियाँ, कबर्ड में कपड़े सलीके से रखने की ज़िम्मेदारी भी उसी की. भई, बहुत काबिल लड़की है. हम सबने एक सुर में कहा और चैन की साँस ली.

कुछ-कुछ दिन बाद याद दिलाती रहती थी, 'मैम, मैं ज़रूरत की वजह से नौकरी कर रही हूँ, मेरे घर का कभी कोई आ जाए तो कहना नहीं कि मैं यह काम कर रही हूँ, कहना कि मैं आपकी दुकान में नौकरी करती हूँ.' साथ ही यह कहना भी ज़रूरी समझती है, 'मैं दसवीं पास हूँ, मैम, मैं ब्राह्मण हूँ. मेरा पूरा नाम सीता शर्मा है.' मैं उसकी इस बात का जवाब देती, 'ठीक है, तुम ऊँची जात की हो, तुम ब्राह्मण हो. पर बार-बार यह बात क्यों बताती हो? हमारे साथ हमारे पलंग पर बैठती हो, कुर्सी पर बैठती हो, डाइनिंग टेबल पर खाना खाती हो. सबसे बड़ी बात यह कि हम सब अब तुम्हारे काम के मोहताज हैं.'
तीन महीने काम करने के बाद बोली, 'मैम, मेरी तनख्वाह कम है.'
मैंने पूछा, 'कितनी होनी चाहिए?'
'कम से कम पंद्रह हज़ार तो हो.'
'सपनों में मत जी लड़की, काम करेगी बर्तन माँजने का और तनख्वाह चाहिए दफ्तरों वाली? कहीं यह न हो कि ज़्यादा पाने की ख्वाहिश में जो मिल रहा है, वह भी छिन जाए? कहीं और इससे ज़्यादा तनख्वाह मिले तो चली जाना।'
बीच-बीच में नखरा दिखाएगी, 'बस, मैं छोड़ दूँगी।' मैं कहूँगी, 'देख, न तूने हमें छोड़ना, न हमने तुझे छोड़ना, इसलिए अपना बोलने का शौक यूँ न पूरा किया कर.'
लाड़ भी कम नहीं करती. मेरी माँ की तरह आकर मुझसे बोलेगी, 'चाय पड़ी-पड़ी ठंडी हो जाती है और आपको पीना ध्यान ही नहीं रहता। इस मरे कम्प्यूटर को फ़ेंक दूँगी एक दिन.'
एक दिन बोली, 'मैम, मैं यहाँ बहुत खुश हूँ.'
खुश क्यों न होगी बेटा, हमारे साथ हमारे बराबर सोफे पर बैठती है, मेज़ पर खाना खाती है, अकेला बाथरूम मिला हुआ है, नीचे वाले खन पर (मंज़िल पर) तेरा एकछत्र राज्य है, कोई कुछ कहने-पूछने वाला नहीं, मज़े कर. मैंने सोचा।
वह बोली, 'यहाँ आकर समझो, मुझे अपने आदमी से छुटकारा मिल गया.'
'वह कैसे?' मैंने पूछा।
'उसकी रात की ड्यूटी होती है, दिन में घर में रहता है. हर समय आदमी सामने रहे, मुझे अच्छा नहीं लगता.'
मैंने आगे कुछ नहीं कहा. हमें अपने काम से काम, क्या करना है किसी में घुस कर.
उसे सिरदर्द की अक्सर शिकायत रहती। माथे पर कपड़ा बाँध कर काम में लगी रहती। रोज़ हमसे सिरदर्द की गोली माँग कर खा लेती। मैं कहती, 'ऐसा कैसे चलेगा, सीता?' वह कहती, 'मैंने गाँव में डॉक्टरों को दिखाया पर ठीक ही नहीं होता। मैं अपने घर में भी ऐसे ही काम करती हूँ, आप मुझे इस वजह से हटा न देना।'
मैंने बॉबी से कहा, इसे किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा दो. बरखा ने डॉक्टर से अगले दिन मिलने का समय लिया। उसके घर जाने के बाद हमें याद आया कि पहले वाले डॉक्टरों के यदि कोई पर्चे हों तो कल आते हुए ले आए. मैंने उसे फ़ोन किया। पहले एक लड़के ने उठाया, बात के अंदाज़ से बड़ा उजड्ड लगा. उसे मेरी बात समझ नहीं आई. उसने फोन एक अन्य लड़के को दिया, वह पढ़ा-लिखा लगा, सभ्य तरीके से बोला, 'आपके यहाँ आने के लिए तैयार हो रही हैं.' मैंने उसे सन्देश दिया कि डॉक्टर के पर्चे, यदि कोई हों तो. ले आए.
उसके आने पर मैंने पूछा, 'यह जो पहले बोला, बड़ा उजड्ड सा था और दूसरा पढ़ा लिखा लगा, इनमे तेरा पति कौन सा है?'
'मैम, जो उजड्ड लगा, वह मेरा पति था. दूसरा पढ़ा-लिखा मेरा देवर था, जिसके बारे में मैंने आपको बताया था ना कि उसने पॉलिटेक्निक से इंजीनियरिंग की है, नौकरी ढूँढने के लिए आया हुआ है. देवरानी भी आई हुई है.'
'अच्छा, अच्छा……'
'मैम, देवर को मेरे काम के बारे में बताया तो नहीं? मैंने सबसे कहा हुआ है कि दुकान में नौकरी करती हूँ वरना सब मेरी खिल्ली उड़ाएँगे।
'नहीं।'
'मैम, मेरे नसीब में भगवान ने उजड्ड ही लिखा था. बोलेगा तो हबड़-हबड़, खाएगा तो चपड़-चपड़, चलेगा तो लपड़-लपड़.'
'कमाल है सीता, तू तो कविता करने लगी.'
'आपके साथ रह कर कविता भी सीख जाऊँगी।'
'पति के बारे में ऐसे नहीं कहते।'
'पति जैसा पति तो हो, मैम. आप ही बताओ, कैसे छुटकारा पाऊँ?'
'एक तो तू तीन बच्चे पैदा करके बैठी है. खैर, यह बता, क्या शराब में पैसा उड़ाता है?'
'नहीं, ऐसा कोई ऐब नहीं है उसमें।'
'क्या तुझे मारता-पीटता है?'
'अजी, हाथ तो लगा कर देखे।'
'क्या तुझे नौकरी करने से मना करता है?'
'नहीं, इससे तो वह खुश है कि घर में पैसे आ रहे हैं. बल्कि रात की ड्यूटी होने से अच्छा है कि दिन में बच्चों को देख लेता है.'
'तो तेरी समस्या क्या है? आराम से रहती रह.'
'मैम, मुझे उसका हबड़, चपड़, लपड़ नहीं पसंद आता.'
'ओह्हो सीता, तू हूर की परी है क्या? किसी राजा-महाराजा के खानदान में पैदा हुई है? तेरे इतने नखरे क्यों हैं?'
मैंने उसे डाँट के चुप कर दिया लेकिन जब भी मौका मिलता है, उसका पति-पुराण शुरू हो जाता है. वैसे हँसती बोलती रहती है, सिर का दर्द धीरे-धीरे ठीक हो रहा है, डॉक्टर के कहने से चश्मा लग गया है. और सबसे बड़ी बात, हम सब उसके भरोसे हैं. जिस दिन वह छुट्टी करती है, खाना बाज़ार से आता है. वह कहावत है ना, तू भी रानी, मैं भी रानी, कौन भरे कूए से पानी? कौन जाने, कभी पंद्रह हज़ार पर अड़ ही जाए तो मेरे पुत्र और पुत्रवधु ने यही कहना है, 'मम्मी, दे दो, रुपये तो हम फिर कमा लेंगे, पर ऐसी कामवाली दूसरी नहीं मिलेगी।' मेरे पुत्र का तो, खैर, यह स्लोगन है, 'कीमत काम का नहीं, कम्फर्ट की होती है.' काम करने वाले अगर चोरी भी करें (यह लड़की तो खैर ऐसी नहीं है), तो पुत्र का कहना होता है, 'थोड़ी बहुत चोरियाँ तो इनकी तनख्वाह में शामिल समझो। बर्दाश्त करो.'
जय हो मेरे घर के निकम्मों की.

7. एक भावचित्र : वर्जित फल

7. एक भावचित्र : वर्जित फल

मैंने वर्जित फल को चखा.

मैं बरसों से भूखी-प्यासी अन्जान रास्ते पर चली जा रही थी. रास्ते में उत्सव थे. उत्सव में नाच-गाने थे. नाच-गानों में हँसी-ठहाके थे. हँसी-ठहाकों में मनोरंजन था. मनोरंजन में दावतें थीं. दावतों में राज-भोग और मदमस्त करने वाले पेय थे. राज-भोग छत्तीस प्रकार के थे. छत्तीस के छत्तीस प्रकार मुझे बेस्वाद लगे. कोई भी पेय मेरे मन में मादकता नहीं भर सका. मैं भूखी की भूखी रही. प्यासी की प्यासी रही. मैं जंगलों में निकल गई. मैं जंगलों में रहने लगी  मैं थक कर निढाल हो गई. मेरा गोरा रंग खुले आसमान के नीचे उमड़ रही धूप में जल कर काला पड़ गया. सर्दी, गर्मी, बरसात के थपेड़ों ने मेरे शरीर को कुम्हला दिया। मैं मरने-मरने को हो गई. मैं मानों मर ही गई. मैं जीते जी लाश हो गई.

यह क्या? जंगल में एक और लाश पड़ी थी. अचानक मैंने महसूस किया, वह लाश सरकते-सरकते मुझ तक आ गई. मैं भी सरकते-सरकते उस लाश के पास गई. मंत्रबिद्ध-सा मेरा हाथ उस लाश के हाथ में था. ठंडा शिथिल हाथ. दोनों का. उस लाश ने मुझे अपना ह्रदय निकाल कर दिया। मैंने भी उसकी देखा-देखी अपना ह्रदय निकाल कर उसे दिया। उसने अपने ठंडे होंठ मेरे माथे पर रखे. मैंने भी अपने ठंडे होंठ उसके माथे पर रखे. और दोनों लाशें गर्म होने लगीं। दोनों लाशों में जान पड़ने लगी. दोनों लाशें ज़िंदा होने लगीं, दोनों लाशें ज़िंदा हो गईं. और एक खूबसूरत प्रेमी युगल में अवतरित हुईं।

उसने वर्जित फल मुझे खाने के लिए दिया। मैंने वर्जित फल को चखा. वह मेरा हो गया. मैं उसकी हो गई.

अब हमारे वारिस होंगे, अनेक वारिस, जो प्रेम की परंपरा को आगे बढ़ाएँगे, हमारे प्रेम की कहानी युगों तक गाएँगे।

ये जो सामने दीवार पर दो प्रतिबिम्ब दिख रहे हैं, एक उसका प्रतिबिम्ब है, एक मेरा प्रतिबिम्ब है.


Wednesday, 26 November 2014

6. एक भावचित्र : मित्रता

6. एक भावचित्र : मित्रता

मित्रता के लिए भी सक्षम, समर्थ और लायक होना पड़ता है.

मैं बहुत बुरी हूँ, फिर भी आप मुझसे मित्रता बनाए रखना चाहते हैं, मेरे मित्र बने रहना अफोर्ड करते हैं, इसमें मेरी कोई खासियत नहीं, खासियत आपकी है क्योंकि आप बुरों के साथ निभाने में सक्षम हैं.

मैं आपके लिए घातक हो सकती हूँ, यह जानते हुए भी आप मेरे मित्र बने रहना चाहते हैं, यानि आप घातक लोगों से अपना बचाव करने में समर्थ हैं.

मैं आपके लिए हर दृष्टिकोण से गलत हूँ, फिर भी आप मुझे सुधारना चाहते हैं, क्योंकि आप लोगों को अपने तरीकों में ढाल कर अपने साथ जोड़े रखने के इच्छुक हैं.

आप मुझे नाकाबिल समझते हैं, फिर भी मुझे छोड़ना नहीं चाहते, क्योंकि आप मानते हैं कि जो एक बार आपके कबीले में आ गया, वह ताउम्र आपकी कैद में रहेगा। आप चाहे उसका खून पिएँ, वह उसे भी अपना अहोभाग्य समझेगा।

तो मित्रता के लिए मैं नहीं, आप सक्षम हैं, समर्थ हैं, काबिल हैं.

हरेक के बस की नहीं है दोस्ती। प्रेम से मुश्किल होती है दोस्ती। दोस्ती में भी वफ़ा और ईमानदारी की ज़रूरत होती है. दोस्ती के लिए पहले लायक बनना पड़ता है. कोई नालायक क्या दोस्ती करेगा?


Tuesday, 25 November 2014

5. एक भावचित्र : आर्तनाद

5. एक भावचित्र : आर्तनाद

मन प्रश्नाकुल है. प्रश्न अनंत हैं, उत्तर एक नहीं। उत्तर ही प्रश्न की नियति है. प्रश्न निःशब्द हो जाता है उत्तर पाकर, अन्यथा रेंगता रहता है मानसिक शिराओं में, खोखला करता रहता है खुशियों को, दिन प्रति दिन.

वह मुझ तक आया छुप कर, अपने को छुपाता हुआ. मैं उस तक गई छुप कर, अपने को छुपाती हुई. वह राजा नहीं, रंक था, मेरे जीने का एक अलग ही ढंग था. मैंने उसकी बेचारगी को सर-माथे लिया, उसके हर दुःख को अपना बना कर जिया। वह सच नहीं, सपना था. साकार नहीं, निराकार था. वह सपना बन कर बहा मेरी शिराओं में. वह निराकार होकर पल-पल रहा मेरे साथ. कितनी अजीब बात.

न वह मुझसे प्यार करता है, न मुझे अपने से करने देता है. न वह मुझसे मिलना चाहता है, न मुझे अपने से मिलने देना चाहता है. न वह मुझसे कुछ कहना चाहता है, न मेरा कुछ सुनना चाहता है. न वह मुझसे कुछ लेना चाहता है, न मुझे कुछ देना चाहता है. फिर भी न वह मुझे छोड़ना चाहता है, न मुझे अपने को छोड़ने देना चाहता है. रखना चाहता है अपने साथ. कितनी अजीब बात? कहता है, 'मेरे कबीले में जो एक बार आ जाता है, मैं उसे कभी अपने से दूर नहीं जाने देता। तू मेरे कबीले में है, इसलिए रहेगी हमेशा मेरे साथ.' कितनी अजीब बात. यह साथ होना भी कोई साथ होना हुआ?

मैं उसे बुलाती हूँ, वह आता नहीं, आ ही नहीं सकता। मैं उससे कहती हूँ, 'आजा. सारी सलाखें तोड़ कर आजा. बस, एक बार आजा. मैं सूख कर लकड़ी हो गई हूँ, मेरी आँखों की रोशनी कम हो गई है, मेरे बाल झड़ गए हैं, मेरा शरीर मुरझा गया है, मेरे अंगों में काँटे उग आए हैं, मैं मैं नहीं रही, सूखा हुआ वृक्ष हो गई हूँ, जिसमे अब कोई फूल-पत्ता नहीं उगेगा।' पर उसे कुछ नहीं सुनाई देता। जैसे उसकी श्रवण शक्ति क्षीण हो गई हो, जैसे मौन उसकी धमनियों में जम गया हो, जैसे शब्दों से उसका बैर हो गया हो. उस तक मेरी कोई आवाज़ नहीं पहुँचती। चीख रहा है मेरा आर्तनाद। सच, कितनी अजीब बात.

उसकी नादानियों का मैं प्रायश्चित करूँगी। अब मैं कविता को कविता में नहीं, गद्य में लिखूँगी।
(मणिका मोहिनी) चित्र नायिका / शेफाली के सौजन्य से


स्मृति ईरानी

स्मृति ईरानी

कई लोग भाग्य को नहीं मानते। हर अप्रत्याशित होने वाले काम को संयोग की संज्ञा दे देते हैं. लेकिन भाग्य होता है, इसे अनेक व्यक्तियों के जीवन में देखा जा सकता है. मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के बारे में मैंने पहले लिखा था कि वे बहुत कम शिक्षा पाकर भी इतने उच्च पद पर पहुँची, यह उनके भाग्य का ही कमाल था. स्मृति ईरानी 'सास भी कभी बहु थी' धारावाहिक से प्रकाश में आईं, परदे पर उनका सकारात्मक चरित्र हमारे दिलों में उनकी प्रशंसनीय स्वच्छ छवि बना गया. अपनी अभिनय कला प्रदर्शन के दौरान उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया था कि जब वे टीनेजर (किशोरी) थीं, तब वे घर से भाग गई थीं (अब पता नहीं, वे इस बात को स्वीकार करेंगी या नहीं?). बहरहाल, उन्होंने अपने से बहुत बड़ी उम्र के, तलाकशुदा एक पारसी व्यक्ति से शादी की, जिसकी तलाक दी गई पत्नी से स्मृति के अच्छे सम्बन्ध रहे, यानि इससे ज़ाहिर होता है, स्मृति एक भले दिल की महिला हैं. (आज चाहे वे कहें कि मीडिया को उनके व्यक्तिगत जीवन में झाँकने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन अभिनय-अवधि के दौरान उन्होंने खुद अपने इस व्यक्तिगत जीवन में झंकवाया था). मेरा इरादा यहाँ उनके विपक्ष में कुछ कहने का नहीं है क्योंकि मैं हर उस शख्स को पसंद करती हूँ जिसके जीवन में अप्रत्याशित घटनाएँ घटती हैं, जो अपनी मेहनत से तो सफल होता ही है, भाग्य के चमत्कार से भी सफलता को प्राप्त करता है. स्मृति को उनके अभिनय के दौरान ही एक ज्योतिषी ने बताया था कि वे उच्च सरकारी पद को प्राप्त करेंगी। आज वे शनि की साढ़ेसाती को शांत करवाने के लिए हवन-पूजन करवा रही हैं. उन्हें उनके ज्योतिषी ने यह भी अवश्य बताया होगा कि शनि की साढ़ेसाती अपनी साढ़े सात साल की अवधि में परेशान ज़रूर करती है लेकिन अंत में अच्छा फल देकर जाती है. मुख्य बात जो मैं कहना चाहती हूँ, वह यह कि स्मृति को ज्योतिषी द्वारा यह बताया गया है कि वे एक दिन देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होंगी यानि राष्ट्रपति बनेंगी। मैं विश्वास करती हूँ, यदि उनके सितारों में यह लिखा है, तो अवश्य होगा और इसी को कहते हैं चमत्कार। आप कहाँ थे, और कहाँ पहुंचे। अगर ऐसा होता है तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी।


Monday, 24 November 2014

4. एक भावचित्र : मैं पापन

4. एक भावचित्र : मैं पापन

लकड़ी जल कोयला भई, कोयला जल भई राख
मैं पापन ऐसी जली, कोयला भई न राख.

एक औरत की यह नियति अग्रहणीय है, अस्वीकार्य है, जो हर वक़्त खुद को दोषी मान कर पश्चाताप की आग में जलती रहती है. खुद को मत कोसो, दोषी तुम नहीं, तुम्हारी यह सोच है, जिसमें तुम सदियों से दबी हुई हो. इस सोच से बाहर आओ, और देखो, पापी तुम नहीं, कोई और है.


3. एक भावचित्र : आत्मसखा

3. एक भावचित्र : आत्मसखा

पूरा जीवन हम सहस्रों लोगों से मिलते रहते हैं और हमें लगता रहता है कि वही लोग हमारा गंतव्य हैं. कि अचानक कोई ऐसे मिल जाता है कि हम चौंक जाते हैं कि अरे, हम तो आजतक जिन लोगों से मिलते रहे, वे तो हमारे लिए थे ही नहीं, हमारा असली आत्मसखा तो यह है. सच है, हमने पूरी उम्र उसी आत्मसखा की तलाश में गुज़ारी होती है लेकिन हमें पता भी नहीं चलता कि हम किसी की तलाश में हैं. हमें हमारा आत्मसखा मिलता ज़रूर है, देर-सवेर, चाहे उसका आना कुछ देर के लिए ही हो, पर वह आता ज़रूर है. वह किस कोने से आएगा, दबे पाँव, हमें पता नहीं चलता। आकर कितनी देर हमारे पास रुकेगा, हमें यह भी पता नहीं होता लेकिन उसके मिलने से हम जान जाते हैं कि यही तो है हमारा गंतव्य। उसका अल्प समय का साथ हममें सदियों का सुख भर जाता है. किसी के साथ हम पूरी उम्र रहते हैं, तब भी अधूरे रह सकते हैं. और किसी का थोड़े समय का साथ भी पूर्णता प्रदान कर देता है. सुख समय की लम्बाई के साथ नहीं मापा जाता, सुख समय के आधार पर नहीं मापा जा सकता, कि हम ज़्यादा से ज़्यादा किसी के साथ रहेंगे, तभी तृप्त होंगे। नहीं, हमें पल भर का साथ भी उम्र भर की तृप्ति प्रदान कर देता है कि उस पाने के बाद अन्य कुछ पाने की आकांक्षा नहीं रहती, अन्य कुछ पाने को शेष नहीं रहता। हमें लगता है, बस, बस, यही था. जो हमारे आदर्शवाद से मेल खाता था. यही था वह, जिसके साथ मिलने पर और मिल कर चले जाने पर अब किसी और से मिलन की चाह नहीं रही. यही तो था वह, जिसके लिए हमारे मन का खाली कोना सुरक्षित था. यही था, जो हमारे शून्य को भरने आया था. यही था, जिसके आने से हमारा तन-मन तरंगित हो कर नृत्य की विभिन्न मुद्राओं में परिभाषित होने लगा था. हमारे जीवन में उसका आना महत्वपूर्ण होता है, जाना नहीं। वह जाते हुए हमारा सर्वस्व लेकर जाता है तो आते हुए हमें सर्वस्व देने के लिए भी आता है.

ऐ मेरे आत्मसखा ! तुम्हारी स्मृतियाँ मेरे एकांत की अमूल्य निधि हैं. मेरा मन जंगल में मंगल है. मैंने तुम्हें खोकर जो खोया, उससे ज़्यादा तुम्हे पाकर पाया था. तुम मेरे जीवन में आए, मैं धन्य हुई.


Sunday, 23 November 2014

2. एक भावचित्र : मैं एक औरत हूँ

2. एक भावचित्र : मैं एक औरत हूँ

मैं एक औरत हूँ. मेरे विभिन्न रंग हैं. मैं अपने आप में पूर्ण हूँ. मैं अकेले जी सकती हूँ. पैसा, ऐशो-आराम का जीवन, यश, ये सब मैं खुद कमा सकती हूँ. मैं मुश्किलों को आसान कर सकती हूँ. मैं नव-निर्माण कर सकती हूँ. मैं क्या-क्या नहीं कर सकती? 

मैं एक औरत हूँ. मुझे कोई भय नहीं सताता। मुझे कोई पराजय नहीं रुलाती। मैं लोगों के दिलों को पढ़ सकती हूँ. मैं लोगों के दिलों पर राज कर सकती हूँ. मैं देश पर राज कर सकती हूँ. मैं क्या-क्या नहीं कर सकती? 

मैं एक औरत हूँ. मैं चाहूँ तो बंजर धरा पर उग जाऊँ। मैं चाहूँ तो आकाश में उड़ कर दिखाऊँ। मैं किसी भी अग्नि-परीक्षा में बिना जले रह सकती हूँ. मैं हर लांछन से बेदाग़ निकल सकती हूँ. मैं किसी भी असुर दृष्टि को भस्म कर सकती हूँ. मैं क्या-क्या नहीं कर सकती?

मैं एक औरत हूँ. मैं ग्रन्थ लिख सकती हूँ. मैं सत्य लिख सकती हूँ. मैं अच्छाई और बुराई का सच लिख सकती हूँ. मैं संयोग को सार्थक कर सकती हूँ. मैं वियोग को रचनात्मक कर सकती हूँ. मैं क्या-क्या नहीं कर सकती?

पर हे पुरुष, तुम्हारे प्यार के बिना मैं फिर भी अधूरी हूँ. मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस एक आलिंगन के सिवा, ताकि मैं तुम्हारी धड़कनों में खुद को सुन सकूँ और तुम मेरी धड़कनों में खुद को सुन सको. मैं एक आलिंगन की तड़प लिए मरना नहीं चाहती।


Thursday, 20 November 2014

1. एक भावचित्र : मेरा मरना। और पुनः मरना

1. एक भावचित्र : मेरा मरना। और पुनः मरना

मैं सन्यासी थी. मेरे सन्यास का अर्थ शब्दकोष में नहीं था. मेरा सन्यास दुनिया के भोग में था, दुनिया के त्याग में नहीं। मेरे आसपास लोग थे पर मैं लोगों में नहीं थी. मैं एक कमरे में बंद थी पंच तत्वों के साथ. पर पृथ्वी पर मेरे लिए एक शांत कोना नहीं था, आकाश में फहराने के लिए सपने मेरे पास नहीं थे, जल का आप्लावन मेरे नेत्रों में था, वायु गर्द उड़ा-उड़ा कर लाती और मेरे चारों ओर बिखेर देती, अग्नि भस्मातुर थी हर पल. मेरी इन्द्रियाँ संवेदनाशून्य थीं, मैं गूँगी-बहरी थी, मेरे स्वाद मर चुके थे, घ्राण-शक्ति सुप्त थी, मन स्पर्शित होना भूल गया था. मेरे सामने अनेक प्रकार के व्यंजन थे लेकिन मैं खा नहीं पाई. भूखे रहना मेरी नियति थी. मेरे सामने अनेक प्रलोभन थे लेकिन मन आकर्षित होना भूल चुका था. मेरे पास अनगिनत वस्त्र थे, सबका रंग केवल एक था, जोगिया। आभूषणों का आभूषण था, रुद्राक्ष। एक ही शब्द सुनती थी बार-बार, माँ. एक ही शब्द बोलती थी बार-बार, हाय. हाथ में हर वक़्त गरल, साँस हर वक़्त गले में अटकी। मैं जंगलों में, पहाड़ों में भाग जाना चाहती थी पर मेरे पाँवों में मोह की बेड़ियाँ थीं. बाहर उजाले थे, मन में अँधेरे। मैं नहीं थी वहाँ, जहाँ मैं थी. मैं वस्तुतः कहीं नहीं थी. जहाँ मैं दिखती थी, वहाँ मेरा शरीर दिखता था, मैं नहीं। जहाँ मैं होती थी, वहाँ मेरा शरीर होता था, मैं नहीं। मेरा जीवन भरा-पूरा था पर मैं खाली। मैं भीड़ में थी पर मेरे अंदर सन्नाटा था. मेरे चारों ओर मधुर संगीत था पर भीतर मर्सिया तैर रहा था. मैं दिनों को गिनती थी, दिन मुझे गिनते थे. दिनों की पहचान मेरे चेहरे पर उतरने लगी. मैं धीरे-धीरे खुद को मरता हुआ देख रही थी. मैं खुद अपने सामने मर रही थी. मेरा शव मेरे सामने पड़ा रहता और मैं मुक्ति की सुविधा की तलाश में इधर-उधर भटक रही होती।

कि तभी…… कि तभी…… मेरे हाथों ने अजीब सी छुवन महसूस की, मेरे कानों में कोई नई सी धुन गुनगुनाई, मेरा आसपास खुशबू से महक उठा, मेरे होंठ कुछ कहने के लिए फड़फड़ाने लगे, मेरी आँखों में सपने लहराने लगे. मेरी इन्द्रियों को जागृत होने का वरदान मिला। पृथ्वी ने मुझे अपने में समो लिया, आकाश ने मुझे अपनी बाहों में समेट लिया, जल पछाड़ें मार-मार कर मुझे भिगोने लगा, वायु में चन्दन और गुलाब की खुशबू, अग्नि चाहे तो पूरा जला ले मुझे और मैं उफ़ न करूँ। मैं पंचतत्व में विलीन होती चली गई. मैं सँवरने लगी, मेरा मौन टूटा, ब्रह्माण्ड में ज्यों विस्फोट हुआ, मेरे भाव कविताएँ बन कर बिखरने लगे, मेरे शब्द कहानियाँ बन कर टहलने लगे. मेरे अंग-अंग में चंचलता उग आई, मेरे रोम-रोम से प्रकाश की किरणें फूटने लगीं, मेरे मन के अँधेरे दूर होने लगे, मुझे साफ़ दिखने लगा, मेरी चाल मस्ताने लगी, मैं रंगबिरंगे कपडे सिलवाने लगी, गहने-दर-गहने गढ़वाने लगी. मैं अपने खोल से बाहर आई, दुनिया बहुत रंगीन थी, यह जग बहुत आकर्षक था. मैं जाग गई, मैं ज़िंदा हो गई, मेरा पुनर्जन्म हुआ. ओह ! मैं इतने साल मरी कैसे रही?

और फिर सब थम गया, सब ठहर गया, वहीँ का वहीँ, वैसे का वैसा, मैं वापस अपने खोल में, मैं वापस उसी खोह में, दूसरी मौत मरने के लिए, दूसरा सन्यास भोगने के लिए, पर एक झुरझुरी है उसकी छुवन की, जो जाती नहीं।

(मणिका मोहिनी) फोटो मा जीवन शेफाली के पेज 'नायिका' से साभार


पर मोह शेष था Kavita 223

पर मोह शेष था

काग़ज़ भर काग़ज़ लिखे
शब्दों के आडम्बर रचे
कथा दर कथा
और कथा, और कथा
लिखने के बाद भी
सब यूँ ही रिस रहा है भीतर।
लेखन दर्द को सहेजता है
और कण-कण बाँट देता है
उपहासास्पद होने के लिए.
आह !
कुछ ख़त्म नहीं होता
ख़त्म सिर्फ हम होते हैं
अहसास हमेशा ज़िंदा रहते हैं.
सब कुछ छूटने के बाद भी
सब कुछ हमारे बीच में ही रहता है.
मैं जीवन में थी
पर जीवन मुझमे नहीं था.
जीवन में जीवन ख़त्म हुआ था
पर मोह शेष था
मैं इस दुनिया में होकर भी
इस दुनिया में नहीं थी.
फिर कहूँगी, बार-बार कहूँगी
अपने मरण और पुनर्जन्म की कथा.
हर नए दर्द को सोख लेता है
उससे पहले वाला दर्द
अब दर्द नहीं होता है
दर्द ने हँसना जो सीख लिया है.

Wednesday, 19 November 2014

आज की प्रार्थना Kavita 222

आज की प्रार्थना

वाह प्रभु ! तेरी माया
कैसा-कैसा गुल खिलाया।

प्रकृति को सुन्दरता दी
इंसान अजीब बनाया।

कोई विश्वास नहीं उनका
काला मन, गोरी काया।

विषयों की भरमार दी
पर रूप सँवर नहीं पाया।

सच है तेरी व्याख्या
कहीं धूप, कहीं छाया।

Ma Jivan Shaifaly

Ma Jivan Shaifaly

आप यकीन करेंगे? कि जो व्यक्ति मेरे साये में आ जाता है उसका कभी बुरा नहीं होता। मैं मज़ाक में लोगों से कह देती हूँ, 'अब तुम मेरे Aura में हो, तुम्हारा कुछ बुरा नहीं होगा।' इसे मेरी गर्वोक्ति न समझें। मुझे मानो कोई वरदान प्राप्त है. मैं बड़े से बड़ा फैसला क्षण में कर लेती हूँ और मेरे फैसले हमेशा सही होते हैं. मैं चाहने से बहुत कुछ कर पाती हूँ. इसका अभिप्राय यह नहीं कि मेरा कभी कोई नुकसान नहीं हुआ या मुझे जीवन में कभी मात नहीं मिली। आखिर हूँ तो इंसान ही, बस भगवान की गुड बुक्स में हूँ. भगवान से कुछ कह दूँ और वह न करे, ऐसा हो ही नहीं सकता। जब मैं कोई निर्णय लेती हूँ तो एकदम सोचती हूँ, 'अब यह मैंने भगवान के कानों में डाल दिया है, मेरा यह काम हो जाएगा।' हाँ, जो व्यक्ति मेरे साथ धोखाधड़ी करता है, उसका कभी भला नहीं होता हालाँकि मैं उसे कभी बद्दुआ नहीं देती, क्योंकि बुरा सोच कर मैं पाप इकट्ठे नहीं करती, पर मुझे पता होता है कि फलाँ व्यक्ति ने मेरे साथ बुरा किया है, अब वह गया काम से, अब वह प्रभु के कहर से बच नहीं सकता। यकीन करना है तो कीजिए, नहीं करना, तो मत कीजिए।

Ma Jivan Shaifaly मेरा यकीन करेंगी, क्योंकि वे भी इसी तरह की आध्यात्मिक क्रान्ति के दौर से गुज़री हैं. उनके पेज 'नायिका' में इस बात के संकेत मिल जाएँगे। कई मित्रों से हमारी ह्रदय-तंत्री बिना देखे, बिना जाने मिल जाती है. मुझे पेज 'नायिका' पढ़ने के बाद लगा था, Oh, she is a deep thinker. And when I saw her pretty face on facebook, मोहे ना नारि नारि के रूपा को गलत ठहराते हुए a Godly vibration came to me. I've a strong feeling that whosoever we are meeting and feel close to, they are our last birth cannections. कुछ व्यक्तियों के साथ आपको आध्यात्मिक स्पर्श का अहसास होता है. मुझे शेफाली की ज़िन्दगी के बारे में कुछ नहीं पता. कभी ख़ास बात भी नहीं हुई. उनकी पोस्ट से ही उनके विचारों का पता चला. उनके पास कुछ जादू के अहसास हैं, मेरे पास चमत्कार के. यानि मैं जिसे चमत्कार कहती हूँ, वे उसे जादू कहती हैं.


Tuesday, 18 November 2014

एक पागल की कहानी

एक पागल की कहानी : जनहित में जारी
आधी हकीकत : आधा फ़साना

मैं काउंसलिंग करती हूँ और लोग मुझसे अपनी समस्याओं के निवारण हेतु संपर्क करते रहते हैं. (लेकिन मैं, जब तक बहुत ज़रूरी न हो, किसी से मिलना पसंद नहीं करती।) (And I charge too for my counselling. देखो जी, अब कोई मेरा दिमाग खाने से पहले मेरी फीस अग्रिम जमा करवाए।)

कुछ वर्ष पहले एक अकेली महिला, जो विधवा थी, एक बच्चे की माँ थी, पढ़ी-लिखी और उच्च नौकरी पर थी, पति बहुत पैसा छोड़ कर गया था, हाई स्टेटस था, ने मुझसे संपर्क किया कि मैं उसका दूसरा विवाह करवाने में उसकी मदद करूँ। असल में वह अपना वैवाहिक विज्ञापन मेरे ज़रिये देना चाहती थी. मैंने अपनी ईमेल आई डी के साथ उसका विज्ञापन दे दिया। बहुत प्रतिक्रियाएँ आईं. एक मेल अजीब था. बहुत गरिष्ठ अंग्रेजी में एक व्यक्ति ने लिखा था कुछ इस प्रकार।।।।।

"मैडम, मैं अपने एक मित्र की ओर से आपको लिख रहा हूँ. मेरा मित्र इंजिनियर है, अच्छी नौकरी में है, तलाकशुदा है, कोई ज़िम्मेदारी नहीं है, अमीर परिवार से है, बस एक बात यह है कि वह कुछ साल पहले पागलखाने में रहा है, वह पागल नहीं था, उसकी पत्नी के घरवालों ने उसे झूठा पागल साबित करके पागलखाने भिजवा दिया था। पागलखाने के प्रमाणपत्र के अनुसार वह मानसिक रूप से एकदम स्वस्थ है. मैं सिर्फ यह जानना चाहता हूँ कि क्या मेरे मित्र की परिस्थिति में उसके विवाह की सम्भावना हो सकती है? क्या आप अपने लिए उस पर विचार कर सकती हैं?"

मेरे नाम की आई डी होने के कारण वह मुझे ही संभावित कन्या समझ रहा था. खैर, इसकी तो कोई बात नहीं पर मुझे अजीब इस बात का लगा कि हिम्मत तो देखो इस पागल की, इतने आलीशान विवरण वाली महिला के लिए विवाह का प्रस्ताव रख रहा है. मैंने कोई उत्तर नहीं दिया। एक महीने बाद जब सारी मेल छानबीन के बाद रिजेक्ट हो गईं और मुझे थोड़ा समय मिला तो मैंने सोचा, इस आदमी को डाँटा जाए कि तेरी हिम्मत कैसे हुई लिखने की? मैंने उसे अंग्रेजी में लिखा।।।।।।

"महोदय, वह विज्ञापन मेरे लिए नहीं था, किसी परिचित के लिए था. आय'म अ सीनियर पर्सन। बहरहाल, मैं आपकी हिम्मत की दाद देती हूँ जो आप एक पागल का प्रस्ताव लेकर आए."

बन्दे ने तुरंत जवाब दिया, "मैडम, क्षमा चाहता हूँ. क्या आपकी कोई मैट्रीमोनियल एजेंसी है?"

मैंने लिखा, "महोदय, मैट्रीमोनियल एजेंसी होती तो आपसे पचास हज़ार रुपये लिए बिना बात नहीं करती, क्योंकि आपका केस बहुत बिगड़ा हुआ है."

उसने फिर से क्षमा माँगी और लिखा, "मैडम, बड़ी बहन होने के नाते आप मेरे मित्र की मदद करें। वह एक अच्छा, भलामानस, बुद्धिमान व्यक्ति है. बस किस्मत का मारा है."

लो जी, मैंने सोचा, मदद कर देते हैं.

धीरे-धीरे बातचीत में वह खुलता गया और एक दिन उसने यह रहस्योद्घाटन किया कि वह 'मित्र' नहीं, वही 'वह' है. उसने अपना छायाचित्र भेजा। आकर्षक व्यक्तित्व था. उम्र लगभग पैंतालीस वर्ष। उसने अपनी कहानी सुनाई कि वह इलाज के लिए एक पागलखाने में भर्ती हुआ था, सब उसके ससुरालियों का किया-धरा था. वह ठीक हो गया लेकिन उसके घर का कोई भी सदस्य उसे वापस घर ले जाना नहीं चाहता था और वह इस स्थिति में नहीं था कि अकेले कहीं मकान आदि खोज कर रह सके. उसकी खुशकिस्मती यह हुई कि शिक्षित होने के कारण उसे पागलखाने के कार्यालय में ही नौकरी दे दी गई (प्रशासन में कम्प्यूटर पर काम करता है), तथा वहीँ रहने के लिए एक कमरा मिल गया. उसकी इच्छा थी कि हर हाल में उसकी शादी हो, उसके बच्चे हों. एक आम आदमी की ख्वाहिश। मेरे पास उसकी बताई बातों को सच समझने के अलावा न कोई साधन था, न कोई ज़रूरत। उसने कंप्यूटर पर स्काइप में मुझसे बात करके मुझे खुद को दिखाया और अपना कार्यालय का कमरा दिखाया। बस.

मुझे उससे हमदर्दी हुई. मैं भी गज़ब हूँ. मुझे हर ऐसे-वैसे से, हर ऐरे-गैरे से हमदर्दी हो जाती है, सिवाए भिखमंगों के।

मैंने अपने परिचय की कई ऐसी महिलाओं को, जिन्हें जीवन साथी की तलाश थी, उसके बारे में बताया। सबने एक सुर में उसे रिजेक्ट कर दिया, साथ ही मुझे उलाहना भी दिया, "मणिका, हमीं रह गए थे क्या इस पागल के लिए?" या "मणिका जी, क्या यह पागल ही रह गया था हमारे लिए?"

उसने शादी डॉट कॉम में रजिस्टर कराया और मुझसे चाहा कि मैं उसकी मदद करूँ लेकिन मेरे बस का नहीं था. मैंने मना कर दिया। मैंने उसे समझाया, हर आदमी को सब कुछ नहीं मिलता, हर आदमी की शादी नहीं होती, इस दुनिया में बहुत लोग अकेले जीते हैं, अकेले मरते हैं. लेकिन उसका प्रयास जारी है.

मुझे उसकी बातों से अंदाज़ा हुआ है कि उसमें अभी भी पागलपन के कुछ तत्व हैं. मसलन, वह सिर्फ अपने बारे में बात करता है, दुनिया, समाज, इधर-उधर की कोई बात नहीं। उसके मन में हर वक़्त एक डर रहता है कि दूसरे उसे नुकसान पहुँचा सकते हैं. उसे पागलखाने के दूसरे पागलों से डर रहता है कि वे उसे मार सकते हैं क्योंकि पागलखाने ने उसे नौकरी दी. उसे लगता है कि वह इस दुनिया में एकमात्र बुद्धिमान व्यक्ति है और कोई बुद्धिमत्ता में उसके आगे टिक नहीं सकता। उसे यह भी अभिमान है कि वह एक अत्यन्त सुन्दर और आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक है और कोई भी लड़की उस पर आसानी से फ़िदा हो सकती है. उसे यह डर रहता है कि किसी को उसके अतीत में पागल होने का पता न चल जाए. वह सोचता है कि जिससे उसकी शादी तय हो जाए, उसे ही वह अपनी असलियत बताए (और चाहे न भी बताए). अपने डर के कारण वह अपने पासवर्ड हर हफ्ते बदलता है. उसे जीवन साथी के रूप में जो लड़की यानि महिला चाहिए, वह एकदम गोरी और खूबसूरत होनी चाहिए, जिसकी उम्र 25 से 39 वर्ष के बीच हो. वैवाहिक स्तर कोई भी हो, एक-दो बच्चा हो, गरीब हो, गाँव की हो, कोई बात नहीं। (गज़ब है, ऐसों-ऐसों के भी नखरे तो देखो।)

मैं खासकर महिलाओं के हित में बता रही हूँ कि उसने अपनी कई मेल आई डी बनाई हुई हैं और कई फेसबुक अकाउंट खोले हुए हैं, अलग-अलग नामों से (A, D, K, M, R से शुरू होने वाले नामों के बारे में तो मुझे पता है). वह सिर्फ और सिर्फ महिलाओं से बात करता है, नेट से खोजता है, बात करने की कोई न कोई वजह बना लेता है. फेसबुक पर किसी विशिष्ट के बारे में लिखेगा तो वह भी किसी विशिष्ट महिला के बारे में, चाहे वह राजनीति से जुडी हो या खेलों से या साहित्य से या धर्म से. वह दोस्ती करता है तो केवल 25 से 39 वर्ष के बीच की महिलाओं से, इस उम्मीद में कि शायद कोई पट जाए. वह शालीन तरीके से बात करता है. उसके बात करने से उसके अतीत का अंदाज़ा नहीं होता। ठीक है, जीवन जीने, घर बसाने का हक़ हरेक को है, लेकिन अलग-अलग नामों से आई डी बना कर झूठ से, छल से किसी को फँसाना सही नहीं।

हाँ जी, वह मुझसे डरता है कि उसके द्वारा सारे भेद खोल देने के बावजूद मैं उसके लिए कुछ नहीं कर पाई. पर मुझसे किसी को डरने की ज़रुरत नहीं क्योंकि मैं किसी का बुरा नहीं करती।

और हाँ, किसी महिला को उस जैसे व्यक्ति का संदेह हो तो वह अधिक जानकारी के लिए मुझसे संपर्क कर सकती है. सबका मंगल हो.

Monday, 17 November 2014

Noida Police - Sometimes good, sometimes bad.

Noida Police - Sometimes good, sometimes bad.

At present, I am living in Noida. I came across with a problem, like one unknown man was sending me unnecessary SMSs, vulgar and abusive too. I reported to the police here in writing but I dint get any positive response, though the SHO respectfully offered me Kaju and Tea. They got the telephone calls traced and found that only my phone no. was there as that bloody man was using that phone no. only for me. Police dint do anything more, rather samjhaao me not to attend to his calls. Sub Inspector told me, they are short of man power.

Listen one more experience. Few days back, my son and me were coming back home after a party. It was late in the night. My son was driving and was a little drunk. At Noida, police stopped our car, talked to him and said, 'Madam, your son is drunk and he is driving.'
I said, 'Ok. I'll drive now.'
He said, 'Drinking and driving is a crime, you know.'
I said, 'Yes, I know. But he had only beer.'
He said, 'That too is a liquor.'
I said, 'If you wish, you can arrest him but take it for sure, now I'll drive, he'll not.'
He said, 'Ok Madam, ठीक से गाड़ी चलाएँ।'
I said, 'Don't worry.'
And I drove car back to home. I was thinking, he would have asked for some money but he dint. Good police in Noida too. But they dont work upto the mark as they say, they are short of staff.

धन्य है दिल्ली पुलिस - 2

धन्य है दिल्ली पुलिस - 2 

बात अट्ठारह साल पुरानी है. मैंने अपना पहला मकान यानि डी डी ए फ़्लैट खरीदा था. फ़्लैट पावर ऑफ़ अटॉर्नी पर था. हमने सारी रकम दे दी थी, दो लाख शेष थे जो मकान के कागज़ात और चाबी मिलने के बाद देने थे. बेचने वाले ने पंद्रह-बीस दिन का समय माँगा था. लेकिन तीन महीने बीत गए, वे मकान से निकलने को तैयार ही नहीं। उनके बेटे ने अब यह कहना शुरू कर दिया था, 'पावर ऑफ़ अटॉर्नी कुछ नहीं होता, मालिक हम ही रहेंगे, जब मन होगा, देंगे, नहीं मन होगा तो नहीं देंगे। कर लो जो करना है.'

स्टैम्प पेपर पर यह खरीद-बेच लिखी गई थी लेकिन कागज़ कच्चे थे क्योंकि कोर्ट में पंजीकरण नहीं कराया गया था. बेचने वाले ने कहा था, जब डील फाइनल हो जाएगी यानि जब वे उस मकान को छोड़ कर हमें चाबी और मकान के कागज़ दे देंगे और हम उन्हें बाकी रुपये, तो कोर्ट में पंजीकरण करा लेंगे।

मैं परेशान। हर समय दिल घबराता कि सारी जमा-पूँजी हाथ से निकल गई, अब क्या करें? मैंने अंततः उस कॉलोनी की पुलिस चौकी में संपर्क किया। मैं बेटे के साथ वहाँ गई. वहाँ का इंचार्ज एक राजस्थानी राजपूत था (यह उसी ने बाद में बताया था. वह बहुत लम्बा था, छह फुट से ऊपर ही होगा।) मैं इतनी दुखी थी कि मेरे मुँह से कोई शब्द नहीं निकला और मैं लगातार रोती रही. बेटे ने उन्हें सारी बात बताई। पुलिस चौकी इंचार्ज बोले, 'यह केस कोर्ट का है, हमारा नहीं।'

मेरा रोना और तेज़ हो गया. मैंने रोते-रोते कहा, 'कोर्ट में जाएँगे तो सालों साल लगेंगे। पुलिस के नाम से ही लोग डरते हैं. आप उन्हें डरा दें.'

इंचार्ज कुछ सोचने लगे. मैंने आगे कहा, 'जब भी उनसे इस बाबत पूछने जाओ, उनका बेटा घर में नहीं घुसने देता, दरवाज़े से ही खदेड़ देता है. आज उसने मुझे लगभग धक्का ही दे दिया। कोई किसी महिला के साथ इस तरह हाथापाई कैसे कर सकता है? इस पर आप कोई कार्यवाई नहीं करेंगे?'

इंचार्ज बोले, 'अच्छा? उसने आपके साथ बदसलूकी की, इस बात पर उसकी रिपोर्ट लिखवाएँ.'

मैंने रिपोर्ट लिखवाई। फिर उन्होंने पास खड़े सिपाही से कहा, 'पकड़ के ला उसे और बंद कर दे।'

सिपाही उसे पकड़ के ले आया और पुलिस चौकी में पीछे की ओर बने एक कमरे में बंद कर दिया।

इंचार्ज बोले, 'अब आप निश्चिन्त होकर जाएँ। मैं देखता हूँ, क्या करना है?'

हम बाहर आ गए. वह सिपाही हमारे साथ बाहर आया और बोला, 'मैडम जी, कुछ नहीं होने वाला। आपके सामने उसे बंद किया है, बाद में उससे पैसा खाकर पिछले दरवाज़े से उसे निकाल देंगे।'

मुझे कुछ समझ नहीं आया. मैं अब भगवान भरोसे थी. जो होगा, देखा जाएगा। अगर किस्मत में पैसा जाना ही लिखा है, तो उसे कैसे रोक सकते हैं? पुत्र ने मेरे विचार मुझे ही सुनाए, 'मॉम, आप कहती हैं न, अगर किसी ने बुरा नहीं किया है तो उसका बुरा नहीं होगा। जब आपने आज तक किसी के पैसे नहीं मारे, तो आपके पैसे कैसे मरेंगे? सब ठीक हो जाएगा।'

हम घर लौट आए और पुत्र उसी रात विदेश रवाना हो गया.

उन दिनों मेरी एक सहेली थी, वकील थी, क्रिमिनल केसेज़ देखती थी, दिल्ली के हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करती थी, पटियाला हाउस में उसका चैंबर था. साहित्य में रूचि रखती थी इसलिए उसके चैंबर में हमारा जमघटा लगा रहता था. (आजकल शायद विदेश में है या मालूम नहीं, कहाँ है?) मैं बॉबी के अमेरिका जाने के बाद बिलकुल अकेली पड़ गई. मैंने अगले दिन ही सहेली को फ़ोन करके मकान की समस्या बताई। उसके पास बैठे उसके क्लाएंट ने उसकी बातचीत से मामला समझ लिया और उससे कुछ कहा, तभी वह मुझसे बोली, 'मणिका, मेरे क्लाएंट कह रहे हैं कि वे तुम्हारा मकान तुम्हें दिलवा सकते हैं.' मैंने क्लाइंट को अपने कार्यालय का पता दिया और अगले दिन मिलने के लिए बुलाया।

अगले दिन मेरे पी ए ने मुझे फोन पर बताया, 'मैडम, दो लोग मिलने आए हैं, उनमे से एक बहुत अग्ली-लुकिंग है, भयानक भी, क्या आपके पास भेज दूँ?'

मैंने कहा, 'हाँ, तुम साथ लेकर आओ.'

वे दोनों मेरे केबिन में आए. एक साधारण कद-काठी का था, दूसरा भीमकाय, एकदम काला, और उसके एक गाल पर उससे भी काला एक बहुत मोटा मस्सा था, छवि बिलकुल फ़िल्मी गुंडे जैसी। मैं भी डर गई. मैंने पी ए को चाय लाने के लिए कहा, साथ ही संकेत से समझाया कि केबिन के आसपास ही रहे. मैंने उनसे अपना परिचय देने के लिए कहा.

साधारण बोला, 'मैडम, हम प्रॉपर्टी डीलर हैं. प्रॉपर्टी के काम में बहुत लफड़ा है. जैसे आपका काम फँसा है, ऐसे ही औरों के काम भी फँस जाते हैं, तो हमें सारे इंतज़ाम रखने पड़ते हैं. हम आपको आपका मकान दिलवा सकते हैं और इसके लिए आपको उन्हें बाकी दो लाख भी नहीं देने पड़ेंगे।आपके वो पैसे बच जाएंगे।'

मैंने पूछा, 'आप मेरा यह काम करने का कितना रूपया मुझसे लेंगे?'

'बस, जो दो लाख आपने उन्हें देने हैं, वो उन्हें नहीं देने पड़ेंगे। वो आप हमें दे देना।'

'तो मेरे पैसे कहाँ बचे? खैर, यह बताएँ कि आप मकान कैसे खाली कराएँगे? क्या तरीका होगा?'

'मैडम, ऐसा है कि आप उस आदमी का नाम, घर का पता और कार का नंबर हमें बता दें. एक हफ्ते बाद मकान के कागज़ात और चाबी आपके हाथ में होगी।'

'लेकिन आप करेंगे क्या?' 

'वह आप हम पर छोड़ दें.'

'फिर भी, अपना तरीका तो बताएँ।'

'ऐसा है कि हम एक-दो दिन में कई बार उसकी गाडी को टक्कर मारेंगे। इससे उसे समझ में आ जाएगा कि उसे मकान आपको दे देना चाहिए।'

'और अगर उसे समझ में नहीं आया तो? अगर वह इस टक्कर में मर गया तो?'

'हम ऐसे टक्कर नहीं मारते जो कोई मर जाए. यह सिर्फ डराने के लिए होता है.'

'नहीं, नहीं, यह तरीका ठीक नहीं, कहीं मर जाए?'

अभी तक साधारण बोल रहा था. पहली बार भीमकाय ने अपना मुँह खोला, 'हाँ, ज़्यादा चालाकी बरते तो मर भी सकता है. हमारा एक साथी ऐसे ही एक हत्या के इलज़ाम में जेल में है, जिसका केस वकील साहिबा लड़ रही हैं.'

साधारण बोला, 'अरे नहीं मैडम जी, किसी को मारना हमारा मकसद नहीं होता, हम तो बस अपना काम बनाना चाहते हैं.'

मैं बहुत ङरी हुई थी. उस डर से उबरने के लिए मुझे अपनी वकील सखी का ही सहारा था. मैंने कहा, 'आगे बताओ।'

साधारण बोला, 'सारा तरीका यह है मैडम जी कि आप हमें जो दो लाख रुपये देंगी, उसमे से पचास हज़ार हम इस पुलिस चौकी को देंगे, हमारी आगे वाली कार्यवाई में आँख और मुँह बंद रखने के लिए. फिर हम आधी रात को एक ट्रक और आठ मज़दूर लेकर उसके घर जाएँगे, उससे मकान के कागज़ और चाबी लेंगे, बन्दूक की नोक पर देगा साला। उसका सारा सामान ट्रक में लदवाएँगे, घर के लोगों को ट्रक में बैठाएँगे और सुबह होने से पहले ट्रक वाला उन्हें एक दूर इलाके में छोड़ आएगा। उसके बाद वो जानें और उनका काम. अगले दिन चाबी आपके हाथ में होगी।'

'नहीं नहीं भाई, ऐसा नहीं करना। मुझे मकान न मिलना मंज़ूर है लेकिन ऐसे? कभी नहीं।'

'सोच लीजिए, हम तो आपकी मदद कर रहे हैं, वकील साहिबा जी के कहने से.'

'ठीक है, मैं सोच कर आपको बताती हूँ.'

'वकील साहिबा को बता दें, आप जब कहेंगी, हम आ जाएँगे।'

वे विदा हुए. मैं और ज़्यादा दहशत में. मैंने तुरंत सखी को फोन किया, 'यार, तुमने कैसे गुंडों को भेज दिया? और तुम ऐसे गुंडों के लिए काम करती हो, तुम्हारा वास्ता ऐसे लोगों से पड़ता है, तुम्हें डर नहीं लगता? तुम एक हत्यारे को बचाने के लिए केस लड़ रही हो? लानत है.'

'शांत हो जाओ, शांत हो जाओ,' वह बोली, 'यह मेरा प्रोफेशन है, मुझे डर नहीं लगता। जहाँ तक केस लड़ने की बात है, मुझे मालूम है, उसने ह्त्या की है, उसके केस में दम नहीं है, उसने हारना ही है, तो इसे इस नज़र से देखो कि मैंने उसे हराने की फीस ली है.'

मैंने रात को पुत्र को फ़ोन किया, 'तू वहाँ बैठा है, मैं यहाँ गुंडों के बीच फँसी हूँ.'

वह बोला, 'किसी दोस्त को फोन करता हूँ कि आपका ख्याल रखे. तब तक आप ऐसा करें कि नाना के घर चली जाएँ या मामा को अपने पास रहने के लिए बुला लें.'

मैं अगले दिन अकेली उसी पुलिस चौकी पर गई. मैंने उन्हें उन गुंडों की सारी कहानी सुनाई, तीव्र-तीखे अंदाज़ में. मेरा भाषण चालू और सब चुप. 'आप इस तरह पैसे लेकर गुंडागर्दी करवाते हैं? डूब मरिये आप लोग चुल्लू भर पानी में. किसी भद्र महिला की मदद नहीं कर सकते। बताइये, कितना पैसा चाहिए? कितने में बिकेंगे आप?'

इंचार्ज बोले, 'मैडम, आपने बहुत बड़ी तोहमत लगा दी. अगले हफ्ते आज ही के दिन इसी टाइम पर आकर मकान के कागज़ात और चाबी ले जाइए। यह इस राजपूत का वादा है.'

और मुझे मेरा मकान मिल गया, शेष रकम दो लाख मकान मालिक को देकर। बात यह है कि पुलिस के नाम की दहशत इतनी होती है कि पुलिस चाहे तो समाज में बहुत सुधार ला सकती है.

Sunday, 16 November 2014

धन्य है दिल्ली पुलिस - 1

धन्य है दिल्ली पुलिस - 1

कहते हैं, ये पुलिस वाले किसी के सगे नहीं होते, पर मेरे साथ तीन घटनाएँ ऐसी हुईं कि आज दिल्ली पुलिस की प्रशंसा करने का मन है. बात बीस साल पहले की है. मैं तब दिल्ली में रहती थी, इंद्रप्रस्थ एक्सटेंशन में. एक बार मेरा पुत्र रात को बारह बजे तक ऑफिस से घर नहीं लौटा। वैसे उसकी कम्प्यूटर की नौकरी उसे देर तक बाँधे रखती थी. मैंने उसके ऑफिस, इधर-उधर, कई जगह फ़ोन किए पर उसका कुछ पता नहीं चला. मैंने घबरा कर 100 पर फोन मिला दिया। उन्हें बेटे की गाडी का नंबर, लोकेशन बताई कि वे जल्दी उसे ढूँढें। वे उसे ढूँढ तो नहीं पाए लेकिन कई बार मुझे फोन करके उसके बारे में पूछते रह. आखिर वह आधा-पौने घंटे में लौट आया, बताया कि ऑफिस की दूसरी ब्रांच में बैठा था. तभी पुलिस का फिर फोन आ गया, उन्होंने उससे बात की, कहा कि 'बेटा, आने में देर हो तो माँ को फोन कर दिया करो.' मैं पुलिस के इतने कंसर्न से चकित थी और मुग्ध भी. मैं उन सज्जन का नाम भी नहीं पूछ पाई.

दूसरी घटना यूँ कि एक व्यक्ति ने मुझसे दस हज़ार रुपये लिए हुए थे, जो वह लौटाने में आनाकानी कर रहा था. उस समय दस हज़ार की कीमत काफी थी. यह बात भी काफी पुरानी है. उस समय भी मैं इंद्रप्रस्थ एक्सटेंशन में रहती थी. मेरे पास बस एक रात का वक़्त था, अगली सुबह मुझे वह स्थान छोड़ देना था. मैंने रात के बारह बजे त्रिलोकपुरी थाने में फोन किया। जो भी बोला, मैंने उसे स्थिति बयान की, उस व्यक्ति का फोन नंबर दिया, कहा कि पुलिस के एक फोन से वह डर जाएगा, आप बस उसे डरा दें. उसने कहा, आप फ़िक्र न करें, आपका काम हो जाएगा। थोड़ी देर में उस पुलिस का फोन आया कि सुबह आपके पैसे आपको मिल जाएँगे। मैंने पूछा, 'आपने उससे क्या कहा?' वह बोला, 'मैंने कहा, 'मैडम ने तेरी रिपोर्ट लिखाई है, सुबह त्रिलोकपुरी थाने में हाजिरी दे.' अगली सुबह पांच बजे मेरे घर की घंटी बजी, दस हज़ार रुपये मुझे थमा कर वह व्यक्ति बोला, 'थाने में रिपोर्ट लिखाने की क्या ज़रूरत थी? वैसे भी आज मैंने आपके रुपये आपको लौटाने ही थे. अब प्लीज़, वह रिपोर्ट वापस ले लें.' मुझे त्रिलोकपुरी थाने के इन सज्जन का नाम भी नहीं मालूम।

तीसरी घटना यूँ है कि हम नॉएडा शिफ्ट कर.चुके थे. घर के लिए मेड प्लेसमेंट कम्पनी के ज़रिये लेते थे. प्लेसमेंट कम्पनियाँ किस तरह लूटती हैं, जगजाहिर है. आर के पुरम के पास की एक कम्पनी ने घर आकर एक हज़ार रुपये अग्रिम लिए कि वह अगले दिन मेड भेज देंगे। पंद्रह दिन बीत गए, न फोन उठाएँ, न किसी और तरह संपर्क करें। मैंने गुस्से में आर के पुरम पुलिस स्टेशन फोन किया और फोन उठाने वाले सज्जन से सारी घटना बयान की. अगले दिन सुबह आठ बजे प्लेसमेंट कम्पनी का बंदा एक हज़ार रुपये लेकर हाज़िर। इन पुलिस सज्जन का नाम मैंने पूछा था, पर ठीक से याद नहीं।

अब देखिए, मुझसे बिना कुछ रिश्वत लिए, मुझसे मिले बिना पुलिस ने मेरा काम किया। धन्य है दिल्ली पुलिस।

Saturday, 15 November 2014

घरेलू महिला

घरेलू महिला

कुछ दिन पूर्व एक खालिस घरेलू महिला मुझसे अपनी समस्याओं के निवारण हेतु मिली। खालिस घरेलू महिला से मेरा तात्पर्य ऐसी महिला से है, जिसका घर से बाहर की दुनिया में कोई दखल नहीं है. उसने मुझे बताईं अपने पति की कुछ बातें (यानि दोषारोपण), ससुरालियों की कुछ बातें (यानि परनिन्दा), अपने बच्चों की कुछ बातें (यानि शिकायतें), अपने नौकरों और पड़ोसियों की कुछ बातें (यानि नुक्ताचीनी). घर-घर की कहानी थी, मेरी रुचि ऐसी बातों में नहीं थी. मैंने उससे कहा, 'क्या तुम्हारी कोई गलती नहीं?'

वह बोली, 'नहीं, आप ही बताएँ, मेरी गलती कहाँ है?'

मैंने कहा, 'तुम कुछ महीने तक समझो कि हर झगड़ा तुम्हारे कारण हुआ है और चुप रहो.'

वह बोली, 'अजी, ऐसा कैसे मैं समझ लूँ?'

मैंने कहा, 'अच्छा, यह समझ लो कि वे सारे मूर्ख हैं, सिर्फ तुम अक्लमंद हो. उन्हें मूर्ख समझ कर चुप रहो कि ये तो हैं ही मूर्ख, इन्हें तुम्हारी बात क्या समझ आएगी?'

वह बोली, 'हाँ, यह तो मैं समझती हूँ. पर वे मूर्ख के मूर्ख रहते हैं, मुझे नहीं समझते।'

मैंने कहा, 'उन्हें बुरा रहने दो, तुम अच्छे होने की ऐक्टिंग करो, दिखावा करो. अच्छी चाहे मत बनो, सिर्फ दिखावा करो.'

वह बोली, 'मैं तो अच्छी ही हूँ, दिखावा क्यों करूँ?'

मैंने कहा, 'इतने साल में भी तुम्हारी समस्या वहीँ की वहीँ है तो उसे सुलझाने का तरीका बदलो।'

वह बोली, 'मणिका जी, आपके बस का नहीं है मेरी समस्या का समाधान करना।'

मैं चुप हो गई, क्या कहती। वही आगे बोली, 'मैं अपनी आत्मकथा लिख रही हूँ. पूरी होने पर आपको दूँगी। आप उसमें आवश्यक संशोधन करके कहीं छपवा देना।'

मैंने हैरान होकर कहा, 'पर तुमनें तो कभी कुछ लिखा नहीं?'

वह बोली, 'फिर क्या हुआ? आप ही ने तो एक बार कहा था, सीखने की कोई उम्र नहीं होती। आपने यह भी बताया था कि कई लेखकों ने बड़ी उम्र में लिखना शुरू किया।'

'ठीक है पर तुम सीधे आत्मकथा लिखना चाहती हो और यह भी चाहती हो कि वह छपे. आत्मकथा 
महान लोगों की होती है.' मैंने कहा.

वह बोली, 'कमाल है. क्या आम लोगों के जीवन में कुछ ऐसा नहीं होता जो बताया जा सके? मेरे जीवन में बहुत कुछ ऐसा है, जो मैं लोगों को बताना चाहती हूँ. आपको उसे छपवाना ही होगा। फिल्म 'बाग़बान' में देखा था ना, अमिताभ बच्चन ने बूढ़े हो कर अपनी आत्मकथा लिखी, छपवाई और उससे कितना पैसा कमाया?'

मैंने कहा, 'आत्मकथा लेखन केवल जीवन में घटी घटनाओं का ब्यौरा देना मात्र नहीं है, जीवन जीने के बाद उस जीवन से आपके सामने कौन सा सत्य उजागर हुआ, यह बताना ज़रूरी है. आपने क्या सीखा, क्या खोया, क्या पाया, यह पाठक के सामने रखना ज़रूरी है. खैर, तुम पहले लिखो तो सही, बाद में देखेंगे।' कह कर मैंने उसे विदा किया।

जो दूसरे की बात समझना नहीं चाहता, वह दूसरों से सलाह-मशवरा ही क्यों करता है? असल में जो लोग अपनी समस्या किसी दूसरे के सम्मुख रखते हैं, वे दूसरे के मुँह से वही सुनना चाहते हैं, जो उन्हें पसंद हो। वे तब तक आपसे बहस करते रहेंगे, जब तक आप उनकी हाँ में हाँ नहीं मिलाएँगे

Thursday, 13 November 2014

Gazal 42

Gazal 42

याद तुम्हारी जब-जब आई, शाम सुहानी और हो गई.
शब्द तुम्हारे दौड़े आए, अजब रवानी और हो गई.

एक सिलसिलेवार कहानी टूट गई बातों-बातों में
ज्यों ज्यों चोट लगी इस दिल पर, मधुर निशानी और हो गई.

घमासान हर वक़्त छिड़ा है, हाँ और ना के बीच फँसी
पहले भी न मान था कोई, अब बेमानी और हो गई.

दुनियावी चीज़ें न भाएँ, दिल में नहीं दखल बुद्धि का
भीतर है घनघोर ज़लज़ला, बाहर ज्ञानी और हो गई.

छलछल कितना पानी है जो, ढल-ढल जाता है आँखों से
फिर भी निस-दिन सूख-सूख कर, यह मरजानी और हो गई.

दिन भर सोए, जगे रात भर, बोले तो किस से क्या बोले
पहले ही कुछ दीवानी थी, अब दीवानी और हो गई.

Tuesday, 11 November 2014

Gazal 41

Gazal 41

आए थे तुम ख़ुशी-ख़ुशी, अब ख़ुशी-ख़ुशी प्रस्थान करो.
मैं माँगू सुख-चैन तुम्हारा, तुम मेरा सम्मान करो.

अब कैसा संदेह साथी, अब कैसा है मन में द्वन्द
मन की आँखें खोलो तुम और सच का मत अपमान करो.

जिस दिन तुम मोह दोगे छोड़, जिस दिन तुमको होगा ज्ञान
उस दिन खुल जाएँगे दरवाज़े, इतना संज्ञान करो.

तुमने खुद बिखराए काँटे, अपनी राहों पर जब-तब
क्या चुनना है, क्या गुनना है, चतुराई से ध्यान करो.

जहाँ भी बैठे हो किस्मत से, वहीँ तुम्हें अब रहना है
अलग-अलग नामों को रख कर मत अपनी पहचान करो.

अब इससे भी बड़ी कौन सी और सजा तुम पाओगे?
अच्छे-अच्छे काम करो और पुण्य पर अभिमान करो.

Monday, 10 November 2014

मोहित और मोहिना की कहानी

मोहित और मोहिना की कहानी

प्राक्कथन

कहानी कितनी भी सच्ची लगे, पर वह सच और कल्पना का मिश्रण होती है.

यह कहानी एक उम्र-कैदी पुरुष और एक उम्रदराज़ महिला के बीच दोस्ती और प्रेम की अद्भुद कहानी है. यह कहानी पत्नी की हत्या के इलज़ाम में उम्रकैद भोग रहे पैंतीस वर्षीय मोहित और उससे बीसेक वर्ष बड़ी लेखिका मोहिना के मध्य मोहित के पैरोल के दौरान उपजी नज़दीकियों की कहानी है. यह तथाकथित प्रेम न किसी मंज़िल का मोहताज था, न भौतिक मिलन का. इसे यूँ ही शुरू होकर यूँ ही ख़त्म हो जाना था. मोहित कहा करता था, यह मिलन आत्मा का आत्मा से है, रूह का रूह से है.मोहित की ज़रूरतों और कुशाग्र बुद्धि ने जेल में बैठ कर इस प्रेम-कथा की संरचना की. मोहित के पास कलंक था तो मोहिना के पास प्रतिष्ठा। मोहित के पास यौवन था तो मोहिना के पास समृद्धि। मोहित के पास कुशाग्र बुद्धि थी तो मोहिना के पास भावुक ह्रदय। दोनों का वज़न बराबर था. मोहिना का समृद्ध होना, सुप्रसिद्ध होना तथा भावुक होना मोहित के लिए वरदान साबित हुआ  मोहित का कलंकित जीवन मोहिना के साये में आकर, मोहिना द्वारा इतना सम्मानित हुआ कि पवित्र हो गया.

क्या मोहित जेल में न होता तब भी मोहिना से प्रेम करने की बात कहता? क्या मोहिना की उम्र साठा सो पाठा के करीब न होती, तब भी वह एक कैदी से प्रेम करने की बात कहती? इस हाइपोथेटिकल सिचुएशन की कल्पना करने से कोई लाभ नहीं, यह होता तो क्या होता, वह होता तो क्या होता? सब सोच बेकार है. जो होना होता है, वही होता है. और जो होता है, वह किस्मत में लिखा होता है. यह मोहिना की सोच थी. आखिर भगवान तरह-तरह से बहाने जो ढूँढता है दिल तोड़ने के, दिल टूटने के बाद मोहिना की सोच बनी।

जिन लम्हों में ज़िन्दगी जी जाती है, उन लम्हों में कविताएँ लिखी जाती हैं, कहानी नहीं। कहानी उन लम्हों को जी चुकने के बाद लिखी जाती है. इसीलिए कविताओं में छल-छल बहते जीवन की रवानगी रहती है और कहानी में जीवन के अनुभवों से उपजा सत्य। तो इस कहानी का सत्य यह था कि होइ है वही जो राम रचि राखा। और द मॉरल ऑफ़ द स्टोरी इज़ कि मोहित के ऐसे हालातों में और मोहिना की ऐसी उम्र में जब यह सब घटित हो सकता है तो किसी के जीवन में कभी भी कुछ भी हो सकता है.

1.
ओ माय गॉड
होई है वही जो राम रचि राखा।

कभी-कभी जीवन में ऐसी घटनाएँ घटित हो जाती हैं, जिनकी आप कल्पना नहीं कर सकते। मोहित द्वारा हत्या हो जाने की तो कल्पना की जा सकती थी लेकिन मोहिना द्वारा प्रेम-प्रपंच में पड़ने की नहीं। होई है वही जो राम रचि राखा। बस, सब भगवान के हाथ में सौंप दो और खुद दूर खड़े अपना तमाशा देखो।

बात कई वर्ष पूर्व की है. मोहिना कैंसर से जूझ रही थी. परिवार में कई ज़िन्दगियाँ कैंसर की बलि चढ़ चुकी थीं, एक जानकार का इसके इलाज में मकान बिक गया था लेकिन जीवन बच नहीं सका था. इसलिए तब कैंसर का केवल एक ही अर्थ समझ में आ रहा था.… मौत.  मोहिना जैसी स्वस्थ व्यक्ति को, जिसे कभी बुखार तक नहीं हुआ था, अचानक कैंसर जैसी दुर्दम्य बीमारी ने जकड लिया था. यह किन पापों का फल था, मोहिना को नहीं पता. हम अपने हर दुःख और ख़ुशी में सबसे पहले अपने पाप और पुण्य ढूँढते हैं. अच्छा है, किसी अन्य को दोष नहीं देते। कैंसर का होना पाप लग रहा था तो लगभग दस महीने बाद डॉक्टरों के मुताबिक़ पूर्ण ठीक हो जाने की घोषणा किसी पुण्य का प्रतिफल लग रही थी. अस्पताली इलाज से विदा लेते समय डॉक्टर की बात बड़ी मज़ेदार और चिन्तामुक्त करने वाली थी. डॉक्टर ने कहा था, "अब आप बिलकुल ठीक हैं. देखिए, मौत तो सबको आनी है, लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि आपकी मौत कैंसर से नहीं होगी।" इससे सुखकर बात और क्या हो सकती थी कि मुझे दोबारा इस कष्ट का सामना नहीं करना पड़ेगा, मोहिना ने सोचा था। लेकिन भाग्य के भण्डार में कष्टों की कमी थोड़े ही है? शारीरिक नहीं तो मानसिक सही।

उसके पुत्र ने माँ की लम्बी बीमारी के बाद घर में हवन रखा था, हवन के बाद सगे-सम्बन्धियों और नज़दीकी मित्रों को दोपहर के खाने पर बुलाया था. घर के साथ का खाली प्लॉट शामियाने से सजा था और खाना बनाने के लिए केटरिंग सर्विस की मदद ली गई थी. मरते-मरते बचो तो सगों की दुआओं में ज़िद ज़्यादा होती है. इस मामले में वह खुशनसीब थी कि उसे पसंद करने वालों की कमी नहीं थी. हालाँकि किसी से लेना-देना कुछ नहीं। "बस आप ज़िंदा रहें, लम्बी उम्र पाएँ" यही शब्द वह हर आने वाले से सुन रही थी. लगभग सौ लोग होंगे, सब आए थे, फूलों के गुच्छे और उपहार लेकर, उसे लम्बी उम्र की दुआ देने।

खाना समाप्त होते-होते उसका ध्यान गया था कि जिन-जिन को बुलाया था, वे सब आए थे, केवल दिवाकर परिवार अनुपस्थित था. वह हैरान थी, आखिर वे लोग क्यों नहीं आए? कितने तो अच्छे सम्बन्ध थे उनके साथ. दिवाकर जी उसे अपनी छोटी बहन मानते थे. यदि अपने दुःख-सुख बाँटना गहरी मित्रता की श्रेणी में आता हो तो उनकी मित्रता गहरी ही कही जाएगी। सब लोगों के विदा हो जाने पर उसने उन्हें फोन पर संपर्क करना चाहा, पूछना चाहती थी कि आखिर वे लोग क्यों नहीं आए? लेकिन उन्होंने फोन उठाया नहीं। शायद फोन खराब होगा, उसने सोचा था और फिर व्यस्तता इतनी बढ़ी कि यह बात दिमाग से निकल गई थी.

मोहिना एक व्यवसायी महिला थी लेकिन व्यक्तिगत जीवन में वह अपने एकांत के साथ जी रही थी. किसी से भी मिलना-जुलना 'न' के बराबर था. बस फोन द्वारा ही आवश्यक संपर्क सूत्र जुड़े हुए थे. सारे सुखों के बीच में होते हुए भी वह हर मोहमाया से दूर थी. वह इसे संन्यास कहा करती थी कि जब आपके पास दुनियादार होने की सारी सहूलियतें मौजूद हों, फिर भी आप दुनियादारी से विमुख हों. व्यवसाय करने के पीछे उसका तर्क होता कि जीना है तो जीने के लिए, समय काटने के लिए, कहीं तो अपने को व्यस्त रखना होगा। चार शोरूम में फैला हुआ उसका व्यवसाय उसकी बीमारी के दौरान चौपट हो गया था. अब नए सिरे से बिखरे हुए तंतु समेटने थे.

उस हवन के कुछ दिन बाद दिवाकर जी का फोन आया था, उन्होंने मिलने के लिए बुलाया था, अत्यावश्यक काम कह कर. मिलना ही था. समय तय करके वह उनके घर गई थी, उनकी पत्नी यानि शीला भाभी और उनके बात करने में कुछ अजीब सा ठंडापन था. "क्या हुआ? सब ठीक तो है?" उन्हें जैसे मोहिना के प्रश्न का इंतज़ार था और फिर सारी घटना खुलती चली गई थी.

मोहित का फितूरीपन और उसकी लड़खड़ाती हुई नई-नई गृहस्थी के बारे में उसके पिता दिवाकर जी और माँ शीला भाभी से फ़ोन पर उड़ती सी जानकारी मिलती रहती थी, यही कि उसकी अपनी पत्नी से नहीं बनती, रोज़ के झगड़े, तलाक तक पहुँची नौबत, दहेज़ माँगने के इल्ज़ाम, मारपीट, गाली-गलौज, हाथापाई, यानि वह सब कुछ जिसे मूर्खता कहा जा सके. मोहिना सुन-सुन कर हैरान होती थी कि आखिर दो पढ़े-लिखे व्यक्ति अपनी समस्या का हल क्यों नहीं ढूँढ पाते? और फिर वह अनहोनी घट गई थी, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। आखिर ऐसी कल्पना करता भी कौन है? मोहित न पेशेवर मुजरिम था, न उसकी पृष्ठभूमि आपराधिक थी। दिवाकर भाई बता रहे थे, "बस क्षणिक क्रोध ने यह काण्ड कर दिया। मोहित और उसकी पत्नी के बीच बहस होते-होते इतनी बढ़ी कि भयंकर लड़ाई का रूप ले लिया और क्रोध में अंधे हुए मोहित ने पत्नी का गला दबा दिया। जब तक उसे अहसास हुया कि उसने कुछ गलत कर दिया है, तब तक पत्नी मर चुकी थी  हमारा पढ़ा-लिखा बेटा मिनटों में एक कातिल में बदल चुका था."

मोहिना को कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था। वह चुप रही लेकिन उसके मन में खलबली मची थी। नहीं, इस काण्ड को क्षणिक क्रोध का परिणाम नहीं कहा जा सकता। आखिर उस क्रोध का एक इतिहास था। मोहित की अपनी पत्नी के साथ रोज़मर्रा की लड़ाइयाँ थी। क्यों नहीं उसने समझदारी से अलग होने का फैसला किया? मोहित के अपराध की गंभीरता को क्षणिक आवेश का नाम देकर कम नहीं किया जा सकता। लेकिन यह बात वह उन टूटे हुए माँ-पिता के सामने कह कर उनका मनोबल और नहीं तोडना चाहती थी. दिवाकर जी ने उसे बताया कि मोहित जेल से कुछ दिन की छुट्टी पर आने वाला है, वह चाहे तो उससे मिल ले.

उसने मोहित को लगभग दस साल से नहीं देखा था. वह उसके विवाह में भी शामिल नहीं हो पाई थी. वह तब कई सालों से विदेश में थी। और अब…… क्या मिले किसी से? उसका मन ही नहीं होता था. अपने मन के अँधेरों से लड़ते-लड़ते अब वह चिर विराम की मनःस्थिति में थी. "पता तो चल गया उसके बारे में. सब कुछ जान तो लिया, उससे मिल कर मैं उसे कौन सा सुकून दे पाऊँगी? उससे मिलो तो फिर वही बातें, वही रोने-धोने। मुझे किसी भी झंझट वाले व्यक्ति से नहीं मिलना," वह सोच रही थी, तभी दिवाकर भाई की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, "आप राइटर हैं, आपने दुनिया देखी है. वह बहुत टूटा हुआ है, उसे जीने के सारे रास्ते बंद नज़र आ रहे हैं, शायद आपसे बात करके…… वैसे वह किसी से मिलता नहीं, दुनिया का सामना करने की अब उसमें हिम्मत नहीं। चाहे उससे गलत हुआ, फिर भी बेटा है वह हमारा, उसे तड़पता हुआ कैसे देख सकते हैं? आप उसके लिए दुआ करें।"

"भाईसाहब, आपको मालूम है, मेरा किसी से भी मिलने को मन ही नहीं होता। फिर भी मैं उससे बात करूँगी। आप उसे मेरा मेल आईडी दे दें और उससे कहें कि मुझे लिखे, कुछ भी, जो भी उसके मन में हो. इससे उसके मन को राहत मिलेगी।" कह कर मोहिना ने विदा ली थी. आते हुए उसके दिल पर बोझ था और आँखों में आँसू। वह दूसरों के दुःख से इतनी द्रवित क्यों हो जाती है? आखिर भाईसाहब की समस्या का क्या हल है? कई समस्याएँ ऐसी होती हैं जिनके हल इंसानों के पास नहीं होते, उसने सोचा और उनके घर से निकल पड़ी.

2.
कैन यू प्लीज़ बी माय फ्रेंड
दर्शन दो घनश्याम श्याम मोरी अँखियाँ प्यासी रे

एक दिन मोहिना को किसी धन्नू सिंह का सन्देश मिला। लिखा था, "मैंने आपकी फेसबुक प्रोफाइल देखी, क्वाइट इंट्रेस्टिंग, ओह, यू आर अ राइटर। आय'म अ न्यू कमर इन दिस फ़ील्ड, कैन यू प्लीज़ बी माय फ्रेंड एंड गाइड मी?" साथ ही मित्रता अनुरोध भी भेजा था।
यह 'धन्नू सिंह' भी भला कोई नाम हुआ? लेकिन उसकी भाषा संभ्रांत थी और संजीदगी से भरी. मोहिना उसकी भाषा के साथ उसके नाम का तादात्मय नहीं बैठा पाई. हो सकता है, इन महाशय का नाम यह न हो. अपनी पहचान छुपाना चाहता हो. उसने उसकी प्रोफ़ाइल खोल कर देखी जो एकदम खाली थी, न कोई पोस्ट, न कोई परिचय, शायद उसी दिन बनाई गई थी। पता नहीं, कौन मनचला है? मोहिना ऐसे संदेशों का कोई उत्तर नहीं देती।

कुछ देर बाद फिर मैसेज आया, "मैडम, मैंने आज ही फेसबुक अकाउंट बनाया है, पहली शुरुआत आपसे कर रहा हूँ। मेरा परिचय बस इतना है कि मैं एक सॉफ्टवेयर इंजिनियर हूँ, साहित्य में रुचि रखता हूँ, विदेश में रहता हूँ, एक महीने के लिए भारत आया हूँ, दिल्ली अपने माता-पिता के पास। आप मुझे अपना फेसबुक मित्र स्वीकार करेंगी तो कृतज्ञ होऊँगा।"

अब सॉफ्टवेयर इंजिनियर होना और विदेश में होना…… जैसे किसी ने मोहिना की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. उसका बेटा भी सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और विदेश में था, जिसकी उन्नति की कीमत मोहिना ने अकेले रो-रो कर बिताए दिन-रातों से चुकाई थी. इसे मित्र बनाना तो पक्का समझो। मोहिना ने सोचा। फिर यह तो हिन्दी भी अच्छी जानता है. कोई भरोसा नहीं, विदेश में जाकर नाम बिगड़ गया हो. छोडो मुझे क्या? शायद मुझे कन्या कुमारी समझ रहा है और अपने को तीसमारखाँ। बड़ा अँग्रेज़ है ना जो एक महीने के लिए भारत आया है तो यहाँ भी कोई लड़की चाहिए। चल, देखती हूँ तुझे, मोहिना ने सोचा और उसका मित्रता अनुरोध स्वीकार कर लिया।
उसके बाद उन दोनों की बातों का सिलसिला शुरू हुआ. मोहिना वैसे गप्पें मारने के लिए अपना वक़्त बर्बाद करना पसंद नहीं करती। उसे गप्पों का शौक भी नहीं। न उसके पास वक़्त था, न बातें करने में रुचि, न किसी व्यक्ति में रुचि। लेकिन धन्नू सिंह नाम का यह तथाकथित विदेशी-भारतीय कोई ना कोई ऐसा सवाल रख देता, जिसका उत्तर देना मोहिना ज़रूरी समझती। मसलन…… 

"क्या आप किसी प्रकाशक का नाम-पता मुझे बता सकती हैं?"

मोहिना का नपा-तुला उत्तर, "नेट पर सर्च करें।"

"किन्हीं अंग्रेज़ी लेखकों से मिलना चाहता हूँ. आपको किसी का नाम-पता ज़रूर मालूम होगा।"

"नेट पर सर्च करें," मोहिना का वही नपा-तुला उत्तर।

"और क्या करती हैं आप? आपके क्या-क्या शौक हैं?"

"कुछ ख़ास नहीं। पढ़ना-लिखना बस. बेहतर हो, आप बाहर पोस्ट पर रहें।"

धन्नू सिंह ने इतने सन्देश भेजे कि खीजने के बावजूद मोहिना उसके मैसेज का इंतज़ार करने लगी. वह भी पक्का, काफी घिसे हुए रिकॉर्ड की तरह था, जो मोहिना द्वारा अरुचि ज़ाहिर किए जाने पर भी सन्देश पर सन्देश दिए जा रहा था.

"मोहिना जी, आपके बारे में कुछ और जान सकता हूँ? यानि आपके परिवार के बारे में?"

"जी नहीं। क्या मैंने आपसे आपके परिवार के बारे में पूछा?"

"आप पूछ भी लें तो मेरे पास कुछ ख़ास नहीं है बताने को. बस जी रहा हूँ क्योंकि मर नहीं सकता।"

कुछ तो आकर्षण था उसके लिखने में.

"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मैं जब भी सुबह उठूँ, मुझे अपने मैसेज बॉक्स में आपकी पोएम नज़र आए?"

ओये, सीधा नहीं लिख सकता क्या कि रोज़ एक पोएम लिख दिया करो? जब भी लिखेगा, उल्टा ही लिखेगा, अपने ख़ास अंदाज़ में. ठीक है, इसमें कुछ बुराई तो है नहीं, चल भेज दे, मोहिना, किसी को तेरी कविता से सुकून मिलता है तो भेजने में क्या बुराई है? और मोहिना ने रोज़ अपनी पोएम उसे भेजनी शुरू कर दी.

"आपकी कविताओं में बहुत दर्द है. मुझे कविता लिखनी नहीं आती, हाँ, आपकी कविताओं को सुधार कर यानि बिगाड़ कर इनका दर्द कम कर सकता हूँ," उसने लिखा तो मोहिना को लगा, कोई उसके कानों में गुनगुना रहा है, "मैं सँवारूँगा तुझे, सारे गम दे दे मुझे।

और वह मोहिना की कविताओं को तोड़-मरोड़ कर नए ढंग से पेश करने लगा. "ये मेरे कविता-कॉकरोच हैं, आपको कैसे लगे?"

"बढ़िया लगे. आप इसी तरह सुबह-सुबह गर्मागर्म कॉकरोच परोसते रहें, नाश्ते की तरह."

"ओफ्फो, क्या टेस्ट है आपका? औक औक…… "

एक सुबह मोहिना कविता भेजनी भूल गई. तुरंत मैसेज आया, "योर पोएम वॉज़ ऐज़ पंक्चुअल ऐज़ द सन राइज़। व्हॉट हैपन्ड टुडे?"
यार, यह तो गद्य में कविता लिखता है. हम होते तो सीधा पूछ लेते, आज कविता क्यों नहीं भेजी? पर यह लिखता है, तुम्हारी कविता का मिलना उतना ही तय था, जैसे सूरज का उगना। यह लड़का गज़ब है, यार.

एक दिन उसने एक गंभीर प्रश्न पूछा, "क्या आप बता सकती हैं कि फ़िज़िकल कंफाइनमेंट और मेन्टल कंफाइनमेंट में विच वन इज़ वर्स? यानि शारीरिक बद्धता और मानसिक बद्धता में बदतर कौन सा है?"

मोहिना ने अपनी शारीरिक बीमारी के दौरान बहुत कष्ट भोगा था. महीनों बिस्तर पर पड़े-पड़े वह ऊब गई थी. किराये की एक नर्स दिन भर और एक नर्स रात भर उसकी देखभाल के लिए नियुक्त थी. उसे लगता, वह किसी कैदखाने में बंद है, जहाँ उसे जीवित रखने के लिए समय पर दवाई और खाना दे दिया जाता है. बाकी दूसरे नियमित कर्म करवा दिए जाते हैं. ज़िंदा रहना क्या इतना ज़रूरी है? इससे तो बेहतर मौत होती, वह बिस्तर पर लेटे-लेटे सोचा करती। उसी अनुभव के आधार पर उसने जवाब लिख दिया, "फ़िज़िकल कंफाइनमेंट।"

उत्तर आया, "नहीं मैडम, असली यानि बदतर कंफाइनमेंट है, मेन्टल कंफाइनमेंट। शारीरिक रूप से कहीं कैद होने पर भी आदमी मानसिक उड़ानें भर सकता है, सपने देख सकता है, सपनों में जी सकता है, कल्पनाओं में महल खड़े कर सकता है, यानि जो कुछ उसके पास नहीं है, वह सब कुछ पा सकता है."

"पर वह पाकर करेगा ही क्या, जब वह उसका उपभोग ही नहीं कर सकेगा?" मोहिना ने लिखा।

"नो मैडम, सॉरी, यू आर टॉकिंग अबाउट मैटीरियलिस्टिक प्लैज़र, व्हाइल आय एम टॉकिंग अबाउट स्पिरिचुअल हैप्पीनेस, स्पिरिचुअल सैटिस्फैक्शन। आप भौतिक सुख की बात को महत्व दे रही हैं, जबकि भौतिकता में सुख है ही नहीं। असली सुख और संतोष आध्यात्मिकता में है. इस सांसारिकता से ऊपर उठ कर ही मेरी बात समझी जा सकती है."

ओह, यह धन्नू जी तो बड़े ज्ञानी महात्मा निकले। क्या उम्र होगी इसकी? पूछना असभ्यता होगी।मोहिना ने उसकी उम्र जानने के लिए उसका प्रोफाइल खोला, लेकिन उम्र का कोई उल्लेख नहीं। मोहिना ने ही कौन सा अपनी उम्र का उल्लेख किया है? छोडो, क्या करना?

अगला सन्देश आया, "लेकिन यदि आप किन्हीं मानसिक जकड़नों में बँधे हुए हैं, किसी मानसिक ग्रंथि से पीड़ित हैं, किसी की मानसिक गुलामी में हैं, कुछ मानसिक उलझनें आपसे सुलझ नहीं रहीं और आप मानसिक विकृति के कगार पर खड़े हैं, सोचिए, तब आप किस भौतिक सुख का आनंद ले पाएँगे?"

"बात तो सही है धन्नू सिंह, लेकिन सामंजस्य ज़रूरी है."

"जी, लेकिन यहाँ बात बेहतर या बदतर होने की थी, सामंजस्य की नहीं।"

"क्या बात है, क्या बात है धन्नू सिंह जी, लेकिन क्या आपका नाम सचमुच धन्नू सिंह है? हो ही नहीं सकता।"

"क्यों नहीं हो सकता?"

"क्योंकि धन्नू सिंह किसी नेपाली नौकर का नाम लगता है. धन्नू सिंह सॉफ्वेयर इंजीनियर नहीं हो सकता। और आप जैसा ज्ञानी?"

"यह तो कोई लॉजिक यानि तर्क नहीं हुआ कि धन्नू सिंह नाम का व्यक्ति पढ़ा-लिखा नहीं हो सकता। मैं हूँ ना?"

"हर बात तर्क से नहीं समझी जा सकती, मेरा दिल कहता है कि आप वह नहीं हैं जो आप खुद को दिखा रहे हैं."

"दिल की बातें क्या सच होती हैं? क्या हमारा दिल कभी गलत नहीं होता?"

कहीं कुछ तो गड़बड़ है, कुछ तो है जो मोहिना की छठीं इन्द्रिय को स्वीकार नहीं। सामने आओ धन्नू सिंह, सही बताओ, तुम कौन हो?

"अगर मैं कहूँ कि मेरा दिल आपको पसंद करने लगा है, तो क्या वह सही होगा?" उसका अगला सन्देश था, जिसका उत्तर देने की मोहिना ने ज़रूरत नहीं समझी।

मोहिना परेशान रहने लगी. इसे अनफ्रेंड कर दूँ? मैसेज तो फिर भी कर सकता है. ब्लॉक कर दूँ? छोड़ो, इतनी परेशान क्यों हो? गन्दी बातें तो कर नहीं रहा. पसंद ही किया है ना, पसंद तो तुम्हें ना जाने कितने लोग करते हैं, तुम्हारी लेखनी के कारण, तुम्हारी सकारात्मक सोच के कारण, तुम्हारी भलमनसाहत के कारण। तुम एक भद्र महिला हो मोहिना, सौम्य, गरिमाशाली, अब तुम उम्र के उस कगार पर हो कि तुम्हे सब आदर और स्नेह दें, तुम्हारे साथ अभद्र तो कोई हो ही नहीं सकता। मोहिना का बस चले तो अपनी प्रशंसा में विशेषणों के ढेर लगाती चली जाए.

अगला पूरा दिन कोई सन्देश नहीं। मोहिना बार-बार फेसबुक खोलती और मैसेज न पाकर निराश हो उठती। इस धन्नू सिंह ने उसका दिमाग परेशान कर रखा था. और अब तो वह यह भी कह गया कि वह उसे पसंद करता है. ओह्हो तो इसमें इतना परेशान होने वाली क्या बात है? पसंद ही करता है ना, नफरत तो नहीं। कोई नफरत करे तो परेशान हो, मोहिना खुद को समझाती। पता नहीं, उसकी उम्र क्या है? मोहिना की उम्र ऐसी नहीं कि वह इन लटकों-झटकों में पड़े. उस दिन आध्यात्मिकता की बात कर रहा था, शायद कोई बड़ी उम्र का आदमी हो? यार, तुझे उसकी उम्र से क्या लेना-देना? छोड़ परे, मार गोली। मोहिना ने गोली मार दी और उस किस्से को परे छोड़ दिया।

एक दिन बाद धन्नू सिंह फिर हाज़िर थे, "कैसी हैं? कहीं काम में फँस गया था, इसलिए कल बात नहीं कर सका."

"कोई बात नहीं।"

"योर धन्नू इज़ नॉट रनिंग अवे."

क्या बात है, बात करने का क्या अंदाज़ है, जैसे धन्नू 'शोले' की धन्नो घोड़ी हो. मोहिना को मन ही मन हँसी आ गई.

"आपकी कविताओं ने मेरे मन को बाँध लिया है. कोई भी आपकी कविताएँ पढ़ेगा ना, आपसे प्रेम करने लगेगा।"

मोहिना क्या जवाब दे? उससे तो आज तक किसी ने ऐसा नहीं कहा. क्या सचमुच यह मेरी कविताओं का इतना दीवाना है? मोहिना, तेरी शक करने की बुरी आदत है, जो वह कह रहा है, उस पर यकीन कर. उसने फिर खुद को समझाया।

"मोहिना, क्या मैं आपको सिर्फ मोहिना कहूँ? योर नेम इज़ सो ब्यूटीफुल लाइक योर पोएम्स।"

अब कह ही दिया तो पूछना क्या? यह ज़रूर कोई मेरा हमउम्र ही होगा। "नो प्रॉब्लम।" मोहिना ने लिखा।

"मोहिना, आय हैव फ़ॉलन इन लव विद यू."

"क्या बकवास कर रहे हैं? ना जान, ना पहचान…… पाँव तले की ज़मीन इतनी कच्ची थी क्या, जो एकदम फ़ॉल हो गए?"

मोहिना ने यह लिख कर उसे तुरंत ब्लॉक कर दिया। कैसे-कैसे गधे आ जाते हैं समय बर्बाद करने। चल, अच्छा है, इस पर पोस्ट लिखूँगी। एक पोस्ट का मसाला तो दे ही गया.

रात को नौ बजे मोहिना का फोन बजा. उसने देखा, मोहित की मम्मी शीला भाभी का नंबर था, "हाँ शीला भाभी, कैसी हैं?"

"मैं बोल रहा हूँ?" यह मैं कौन? दिवाकर भाई की आवाज़ तो नहीं लग रही. "मैं, वही जो तुमसे मैसेज में बात करता था."

"धन्नू सिंह? इस नंबर से?"

"नहीं, मोहित।"

"मोहित? मैं तुम्हारे बारे में जान कर सन्न रह गई थी. क्या तुम पैरोल पर आए हुए हो? और यह क्या बदतमीज़ी थी, मैसेज वाली? दिवाकर भाई से तुम्हारी शिकायत करूँ? तुम्हारे पापा सुनेंगे कि उनकी मुँहबोली बहन के साथ उनके बेटे ने ऐसा मज़ाक किया है तो तुम्हारी खैर नहीं।"

"अपने कान पकड़ कर माफ़ी माँगता हूँ, लेकिन मैं कैदी और गुनहगार की तरह किसी के सामने नहीं आना चाहता। मैंने सोचा, अब पापा ने कहा है तो आपसे मिलना ज़रूरी है इसलिए पहले अपनी बुद्धिमत्ता का कुछ असर आप पर जमा दूँ ताकि आप मुझे गुनहगार न समझें और सोचें कि मुझ जैसा व्यक्ति ऐसा कभी नहीं कर सकता।"

जो भी है पर वह मैसेज में मुझसे बातें करने का तरीका कुछ ठीक नहीं था. मोहिना ने सोचा, कहा यह, "मिलती हूँ तुमसे, घर आती हूँ जल्दी किसी दिन."

"और हाँ, मोहिना, मैंने मैसेज में जो भी लिखा था, वह मज़ाक नहीं था, सच था. तुम्हारे शब्दों में कुछ अलग सी कशिश है. आय कुडन्ट हेल्प इट."

"गुड नाइट," कह कर मोहिना ने फोन बंद कर दिया। कुछ तो गड़बड़ है मोहित के दिमाग में.

मोहिना के परेशान रहने के लिए बहुत बड़ी वजह बन कर आया था मोहित।

3.
लेट्स सेलेब्रेट लाइफ़
ऐ खुदा ! रहम कर, एक और ज़िन्दगी दे दे
उसने माँगा है मुझे अपनी दुआओं में आज.

वह मेरे घर आया था पहली बार अपने पहले पैरोल पर.

"वाह ! यार, यू लिव इन अ मैन्शन। तुम तो महल में रहती हो. और अकेली?"

"अकेली हूँ पर अकेलापन नहीं है," मोहिना ने कहा. हालाँकि वह कहना चाहती थी, "तुमसे दोस्ती के बाद अकेलापन महसूस होने लगा है, मोहित।"

"लेकिन मेरा महल तुम्हारे महल से बहुत बड़ा है," उसका संकेत जेल से था, "क्या हॉल जैसे बड़े कमरे, कमरों के सामने फैला हुआ लॉन, लॉन से जुड़ा खेल का मैदान, रसोई का साइज़ तो पूछो ही मत और उसके बाहर किचन गार्डन। अपने बाग़ में उगी सब्ज़ियाँ खाते हैं हम. तुम्हारी डायनिंग टेबल…… ना, ना, छोटी है. हमारी डायनिंग टेबल....… ये यहाँ से वहाँ तक. रोज़ बुफे लंच एंड डिनर।"

पता नहीं सकारात्मक होने की कोशिश में वह ऐसी बातें करता था या हीन भावना से ग्रस्त होकर? जो भी हो, वह हर समय हँसता रहता था।

"अब ज़रा अपने महल के बाथरूम और टॉयलेट का गुणगान भी कर दो," मोहिना ने कहा।

"वो, मुझे विश्वास है, तेरे घर के ज़्यादा अच्छे होंगे।"

मोहिना उसके सामने वाले सोफे पर बैठ गई तो मोहित बोला, "अच्छा, तो अब तू इतनी दूर बैठेगी मुझसे?"

मोहिना उसके पास जा बैठी। "बताओ क्या लोगे? ठंडा या गरम…… "

"जल्दी क्या है? अभी आया हूँ, कुछ देर बैठने तो दे, ले लेंगे……  यह बता, तुझे हर बात की इतना जल्दी क्यों रहती है? पैदा होने की भी जल्दी थी. देर से पैदा नहीं हो सकती थी?"

अब इस बात का कोई क्या जवाब दे? मोहिना चुप. सोच रही है, यह अकसर मुझे 'तू' कह कर ही बुलाता है, जबकि कोई भी मेरे नाम के आगे 'जी' लगाना नहीं भूलता। हालाँकि उसे उसका 'तू' बुलाना अच्छा लगने लगा था, फिर भी उसने पूछ ही लिया, "मोहित, मैं तुमसे इतनी बड़ी हूँ और तुम मुझे 'तू' कह कर बुलाते हो?"

"तो? 'तू' कहने से तू मुझे मुझसे छोटी लगती है..... सुन सुन, तुझे छोटा करने का मैंने एक तरीका सोचा है."

"तुम्हारे छोटा करने से क्या मैं छोटी हो जाऊँगी? कम ऑन मोहित।"

"सुन तो. मैं आज से तेरी जन्मतिथि बदल रहा हूँ. आज से तेरी जन्मतिथि है 29 फरवरी। यानि हर चार साल में तू तीन साल छोटी हो जाएगी।"

"इस हिसाब से तो मैं एक दिन शून्य हो जाऊँगी?"

"नहीं, इसका मतलब यह है कि तू अब मुझसे हमेशा तीन साल छोटी रहेगी।"

"हाहाहा। क्या हिसाब है? जो भी हो, तुम मुझे 'तू' ही कहा करो, अच्छा लगता है. मुझे भी लगता है कि तुम मुझसे बड़े हो. हालाँकि मुझे तुम्हारे छोटे होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।"

"एक वजह और है. मुझे लगा, तू मुझसे इतनी बड़ी है, इतनी ज़्यादा पढ़ी लिखी है, अगर मैं तुझे 'तू' नहीं कहूँगा तो तू बस में नहीं आने वाली।"

"ओह्हो तो यह बात है. मुझे बस में करके तुम्हें क्या करना था?"

"यार, प्यार करता हूँ तुझसे, समझा कर."

वह प्यार की बात कर रहा था पर मेरा मन बुझ सा गया था। उसकी साँसों में मेरी उम्र का अहसास घुल रहा है वह पहले मुझे समान धरातल पर लाएगा, ख्यालों में ही सही, मोहिना ने उदास मन से सोचा। वह भी तो देखो उससे मिलने के बाद बच्ची हो गई थी. उम्र की भी लाज-शर्म नहीं रही थी उसे. कभी-कभी उसे लगता था, उसकी सिर्फ उम्र बढ़ी है. वैसे वह अभी-अभी युवा हुए बच्चों जैसी भावुक है. लगता है, उसके भीतर कोई छोटी लड़की छुपी बैठी थी, चुपचाप सोई हुई. मोहित ने आकर उसे जगा दिया। लेकिन प्यार में बहकने के दिन कमउम्र लोगों के नसीब में लिखे होते हैं, उम्रदराज लोगों को यह शोभा नहीं देता।

"तू तो ज़रा भी बड़ी नहीं है. यह तो बस तेरी उम्र कुछ आगे खिसक गई," मोहित कह रहा था. कहीं उसने उसके मन की बात तो नहीं जान ली थी? पता नहीं, क्या चक्कर है, इधर मैं सोचती हूँ, उधर मोहित को पता चल जाता है, मोहिना ने सोचा था.

"चिंता न कर, जन्मों तक मिलेंगे हम, जनम जनम, हर जनम.....  सुन, इस जन्म में मैं तुझसे पहले मरूँगा ताकि अगले जन्म में तुझसे पहले पैदा हो सकूँ और फिर हम मिलेंगे सही उम्र में."

ओह क्या इतना पसंद करता है मुझे? अच्छा है, वह जन्म-जन्मान्तर में विश्वास रखता है, कम से कम आस तो बँधी रहती है. पर उसकी बातों से मैं उदास क्यों हुई जा रही हूँ? क्यों मुझे लग रहा है कि मेरी उम्र के कारण वह मुझे नकार रहा है? नकारे। वह कौन सा दूध का धुला है. होता तो क्या मुझसे प्रेम निवेदन करता? मोहिना ने सोचा। कहा यह, "क्या बात है, आज तो बिना पिए ही नशे में हो?"

वह समझ रही थी, उम्र की खाई को आसानी से पाटना कोई मामूली बात नहीं। उसे इस बात से कोई शिकायत नहीं बल्कि आश्चर्य इस बात से था कि आखिर मोहित ने उसकी उम्र को स्वीकारा ही कैसे? वह उससे उम्र के इतने बड़े फासले पर खड़ी थी कि कुछ ऐसा-वैसा सोच ही नहीं सकती थी. मोहित उससे छोटा ज़रूर था पर कोई बच्चा नहीं. शादी, शादी की टूटन, कोर्ट-कचहरी, जेल, क्या-क्या देख चुका था. मोहित ने खुद कई बार मोहिना से कहा था, "मोहिना, तुम्हें ज़िन्दगी का वह अनुभव नहीं, जो मुझे है. मैंने तुमसे ज़्यादा दुनिया देखी है. उम्र के साल बढ़ जाने से क्या होता है?"

जेल में रह कर वह शायद कुछ पागल सा भी हो गया हो, शायद बेऐतबारापन कि मोहिना मिल गई, फिर शायद कोई मिले या न मिले। मोहिना ने कई बार सोचा था कि कोई भी लड़का इतना मूर्ख नहीं होता कि अपने से इतनी बड़ी उम्र की औरत से प्यार करे. यदि कोई ऐसा करता है तो इसके पीछे उसका कोई स्वार्थ अवश्य होगा। सिर्फ प्यार स्वार्थ नहीं होता। मोहित की वजह तो साफ़ नज़र आ रही थी. जो भी हो, ये जीवन-तंतु इतने सरल नहीं, जिन्हें आसानी से सुलझाया जा सके.

"कहाँ खो गई?" मोहित का हाथ उसके कंधे पर था, "मोहिना, मेरे लिए दुआ करती है ना? अच्छा बता, क्या माँगती है दुआ में?"

मोहिना ने सँभल कर कहा, "मैं भगवान से कहती हूँ कि जो मोहित के मन में है, जो मोहित चाहता है, वह सब पूरा हो जाए."

"भगवान ने तेरी सुन ली ना तो सच मान, तू यंग हो जाएगी।" मोहित की इस बात से उसे खुश होना चाहिए था लेकिन वह दुखी हो गई. क्या उसकी उम्र को लेकर मोहित इतना त्रस्त है? ज़ाहिर है, होगा। उसे कुछ ऐसा भरोसा था मोहित पर कि वह एक शरीफ इंसान है, भौतिक वस्तुओं यानि शरीर-वरीर में उसकी कोई रुचि नहीं, वह उससे कुछ लेने नहीं आया था. तो क्या वह बस उसका दिल चुराने आया था? क्योंकि बाद में उसे दिल को ही तो चीर कर रखना था. उसका निशाना सिर्फ मोहिना का दिल था, बाकी सब कुछ तो माध्यम भर था उस दिल तक पहुँचने का. लिसेन माय यंगेस्ट लवर, किसी के दिल के साथ खिलवाड़ करने और उसे तोड़ने की सजा पाने के लिए जेल नहीं जाना पड़ता क्योंकि यह एक अपराध नहीं होता, यह पाप होता है जिसकी सजा अदालत नहीं, खुदा सुनाता है. यह दिल का मामला है, मेरे दिल के दुश्मन, दिल की लाशों का हिसाब वह ऊपर वाला रखता है.

मोहित ने उसके यंग हो जाने की दुआ माँगी थी और वह परेशान हो उठी थी. उसने कब चाहा था कि कोई आए और उसके साथ प्यार का नाटक करे.

"बीच-बीच में कहाँ खो जाती है? मुझे लेकर परेशान है? कुछ मत सोच. जैसे ज़िन्दगी चल रही है, चलने दे. लाइफ़ इज़ ब्यूटिफुल विद यू. इससे खूबसूरत ज़िन्दगी की मैं कल्पना नहीं कर सकता था." मोहित को कैसे पता चल जाती है मेरे दिल की बात? मोहिना ने सोचा। मोहित आगे कह रहा था, "उम्र के बारे में मत सोचा कर. उम्र का सवाल ही व्यर्थ है. यह दो व्यक्तियों की आपसी समझ, सुविधा और सक्षमता पर निर्भर करता है कि वे कैसा सम्बन्ध बनाएँ. जब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता तो तुझे क्या? मस्त रहा कर."

मोहिना का मूड ठीक होते देर नहीं लगी. "नहीं मोहित, परेशान नहीं हूँ. बस तुममें कई रिश्ते गडमड हैं."

"जैसे?"

"जैसे पुत्र का, तुम मुझसे इतने छोटे जो हो."

"और?"

"पिता का, जब रेस्टोरेंट में तुम मुझे अपने साथ बियर नहीं पीने देते।"

"और?"

"भाई का, जब उस दिन तुमने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे सड़क पार कराई थी."

"और?"

"सखा का, जब उस दिन तुमने मेरे फेवरेट पीले रंग की कमीज पहनी हुई थी और मैंने भी पीले रंग का सूट पहना था."

"और?"

"पति का, जब तुम खुद को राम कहते हो और मुझे सीता कह कर भी मेरी ओर खूँखार नज़रों से देखते हो."

"और?"

"प्रेमी का, जैसे तुम रोज़ मुझे अपनी बाहों में बाँधे रखते हो. सहयोगी का…… 

"बस बस, बहुत हो गए. इतने कहाँ सँभाल पाऊँगा?"

"तुम सिर्फ प्रेमी का ही रिश्ता सही से निभा लो, मैं उसी में खुश हूँ."

"वो तो निभाना ही पड़ेगा, तू गले जो पड़ी है," कह कर मोहित ने मोहिना की बाहें अपने गले में डाल ली थीं.

मोहिना ने फोन करके खाने का ऑर्डर कर दिया।

"नो नो नो, ऐसे नहीं चलेगा मोहिना जी, सीधे खाना खिला कर विदा करने का इरादा है क्या? लेट्स सेलेब्रेट लाइफ."

उस दिन दोनों ने बियर साथ बैठ कर पी थी. सीडी प्लेयर पर मेहँदी हसन लगाया था, 'मोहब्बत करने वाले कम न होंगे, तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे।'

"तुम भी गाओ ना. कितना अच्छा गाती हो." मोहिना को लगा, मोहित के मुँह से जैसे फूल झरे.

मोहिना ने बियर के हलके-फुल्के खुमार में बार-बार मोहित के गले में बाहें डाली थीं और खुद भी गाया था, "सच कहती हूँ, तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे लेकिन मेरी महफ़िल में तुम हमेशा होंगे, मोहब्बत करने वाले तुम ही होंगे।"

जैसे वह प्रेम नहीं, पूजा हो, दो आत्माओं का मिलन हो, जैसे दो भटकती हुई रूहें प्रलाप कर रही हों, आज सजन मोहे अंग लगा लो, जनम सफल हो जाए.

काश ! मोहब्बतें सच हुआ करतीं। या इतनी खूबसूरत न हुआ करतीं।

4.
डोंट लीव मी अलोन
आज जाने की ज़िद न करो.
यूँ ही पहलु में बैठे रहो. आज जाने की ज़िद न करो.

वह उसका पहली बार का आना और पहली बार का जाना। वह एक महीने बाद वापस जा रहा था, अपने घर, जेल, नहीं, नहीं, धर्मशाला। सुबह से वह कई बार कह चुका था कि अब वही उसका घर है. यहाँ तो वह मेहमान की तरह आया था.

वे सुबह से साथ थे और अब रात के दस बज रहे थे. कभी इस रेस्टोरेंट, कभी उस रेस्टोरेंट।

"अब क्या हमारी उम्र है इस तरह भटकने की?" मोहिना ने कहा था.

"आज तुमसे अलग होने का मन नहीं है. कल सुबह चला जाऊँगा। फिर एक साल से पहले नहीं आने वाला।"

"नहीं मोहित, तुम जल्दी छूट जाओगे। तुम बेगुनाह हो, यह साबित होकर रहेगा।"

मोहित ने उम्मीद भरी नज़रों से मोहिना की ओर देखा था.

जितने दिन वह यहाँ रहा, मोहिना को ज़ोरदार शब्दों में कसमें खा-खा कर यकीन दिलाता रहा था कि उसने कोई गुनाह नहीं किया है, वह तो अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता था. उसके कहने के बाद से उसके मम्मी-पापा दिवाकर भाई और शीला भाभी भी कहने लगे थे, "हमें क्या पता, क्या हुआ था. हम तो अलग रहते थे." हालाँकि शुरू में उन्होंने ही मोहिना को बताया था कि एक पल के क्रोध में यह काण्ड हो गया. उन्होंने यह भी बताया था कि "हमने मोहित से बहुत कहा कि अपना गुनाह कबूल कर ले, सज़ा कम होगी, लेकिन उसने गुनाह कबूल नहीं किया।" मोहिना को लगा था, कहीं कुछ तो गड़बड़ है, शायद मोहित ही सच कह रहा है. उसने मोहित को संदेह का लाभ दिया था, नहीं, नहीं, मोहित ऐसा नहीं कर सकता, इतना पढ़ा-लिखा लड़का, इतना अच्छा परिवार, पृष्ठभूमि में सब शिक्षित और उच्च पदाधिकारी, चल-अचल संपत्ति से संपन्न। नहीं, नहीं, मोहित ऐसा कर ही नहीं सकता। इस एक महीने के मिलने में उसे कभी गुस्सा नहीं आया, एकदम शान्त स्वभाव, धार्मिक विचारों वाला, अच्छे-बुरे का ख्याल हो जिसे, सही-गलत की पहचान रखने वाला। नहीं, नहीं, मोहित ऐसा नहीं कर सकता। वह एक संस्कारी लड़का है आजकल के लड़कों की तरह आधुनिक दिखने के चक्कर में नहीं रहता। देखो ना, रेस्टोबार में उसने अपने लिए बियर मँगाई और मेरे लिए लाइम सोडा। मोहिना मन ही मन मोहित को निर्दोष साबित किए जा रही थी.

"क्यों मोहित, मेरे लिए बियर क्यों नहीं? मैं यहाँ बियर क्यों नहीं ले सकती?" मोहिना ने पूछा।

"हमारे घर की औरतें शराब नहीं पीतीं, " मोहित ने अधिकारपूर्वक कहा था.

"यह बियर शराब कहाँ से हो गई? खुद कहते हो, बियर शराब नहीं होती। और यार, मैं तुम्हारे घर की औरत कैसे हो गई?"

"मुझे नहीं मालूम, बस, तुम नहीं पिओगी।"

"मैं कौन सी इतनी पियक्कड़ हूँ. कभी कभार पार्टी में बस."

"वह भी नहीं।"

"तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे तुम मेरे…… "

"जो भी समझ लो."

"तुम तो बड़े दकियानूसी हो."

"जो भी हूँ, जैसा भी हूँ…… "

कार मोहित के घर के बाहर पहुँच चुकी थी. मोहिना ने कहा, "अब उतरो। मुझे अपने घर पहुँचते बारह बजेंगे। तुम भी बस…… रात-रात भर सड़कों पर आवारागर्दी करवाते हो."

"मेरे ही साथ हो ना, किसी गैर के साथ तो नहीं…… आज मत जाओ ना "

"टाइम देखो, क्या हो रहा है?"

"टाइमलेसनेस में जीने का एक अपना ही मज़ा है."

मोहित की आवाज़ थोड़ी अलग सी लगी तो मोहिना ने उसकी ओर देखा। यह क्या? मोहित की आँखों में आँसू? "मोहित..... ?" मोहिना का इतना कहना था कि मोहित मोहिना से लिपट कर रो पड़ा. धार-धार गिरते आँसू, हिचकियों पर हिचकियाँ, रोते हुए बस एक ही बात, "आज मत जाओ ना. डोंट लीव मी अलोन."

क्या यह मोहित ही था, मज़बूत दिखने वाला, आशावादी बातें करने वाला, मेरे एक बहुत उदास क्षण में मुझे समझाने वाला कि "मोहिना, देखो, पानी हमेशा नीचे की ओर बहता है लेकिन मिलता है जाकर एक विशाल समुद्र में. हर ढलान गिरावट नहीं होती, एक नई ज़मीन की तलाश होती है. कोई भी कमज़ोर क्षण वस्तुतः कमज़ोर नहीं होता, वह हमें एक मज़बूती की ओर ले जाता है." वही मोहित आज यूँ टूटा हुआ, बिखरा हुआ क्यों है? क्या मुझसे अलग होना ही इसकी असली वजह है? क्या वास्तव में मोहित मुझसे इतना ही प्यार करता है कि मेरा बिछोह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा? क्या वास्तव में यह फ़िल्मी गीत हम पर चरितार्थ हो रहा है कि न उम्र की सीमा हो, न जन्मों का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन? मोहिना सोच रही थी.

"मोहित, अपने को सम्भालो।"

"तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगी?"

"कैसे भूल पाऊँगी? मैं तुमसे धर्मशाला में मिलने आया करूँगी।"

"नहीं, वहाँ आने का कोई फायदा नहीं. मैंने मम्मी-पापा को भी मना किया हुआ है. तुम आओगी भी तो मैं जँगले के इस तरफ, तुम जँगले के उस तरफ. दोनों तरफ भीड़ का सैलाब. न कुछ सुनाई दे, न ठीक से दिखाई दे. बस तुम मुझे भूलना नहीं। तुम्हारे सिवा मेरा कौन है? तुम जलते हुए सहरा में पानी की बूँद की तरह मिली हो तो खो न जाना।"

मोहित के शब्दों में कुछ ऐसा था, जो मोहिना को उन दोनों के मोह से दूर, कहीं बहुत दूर ले गया, जहाँ पहुँच कर मोहिना को लगा कि मोहित उसके लिए नहीं, बल्कि अपने लिए ही रो रहा है. मोहित के अपने दिल के ज़ख्म उसके आँसुओं में फूट-फूट कर बह रहे हैं. मोहित कितना अकेला है? उसे औरत नहीं, एक साथी चाहिए। उसे कोई वासनात्मक लगाव नहीं, बल्कि एक ह्रदय का जुड़ाव चाहिए, उसे मिलन नहीं, एक अहसास चाहिए कि इस भरी दुनिया में, जब वह लांछना और दुत्कार के दौर से गुज़र रहा है तो कोई तो है उसका अपना, जो उसे समझता है, जो उसके लिए दुआ करता है, फिर वह चाहे स्त्री हो या पुरुष, कोई मोहिना हो या कोई मोहन, बस कोई हो, जो उसका हो, उसका हमदर्द हो. और यह हमदर्द उसे मोहिना में मिला था.

"देखो अगर तुम यूँ ही रोते रहे तो मैं भी रो पडूँगी " मोहिना ने मोहित के आँसू पोंछे तो किसी करिश्मे की तरह मोहित के होंठ मोहिना के होठों से जा टकराए। विदाई का वह गहरा चुम्बन जितना उन दोनों को जोड़ने के लिए ज़रूरी था, उतना ही उस समय अलग होने के लिए ज़रूरी। उनका अंतिम क्षण का यह मिलन जैसे आनंद से नहीं, तकलीफ़ से भरा था, वे अंत में एक-दूसरे को बाय तक न कह सके. मोहित चुपचाप कार से उतर गया और मोहिना ने अपने घर की ओर रुख किया। वह सहमी हुई थी. फिर भी उसका मन हुआ, चिल्ला चिल्ला कर कहे, मोहित तुम धर्मशाला मत जाओ ना. मोहित उसके भीतर गहरे तक उतर गया था. हे प्रभु, मुझे घर ठीक से पहुँचा देना।

5.
अवर्स इज़ अ स्ट्रेंज  स्टोरी
एक दीवाने ने मुझे दीवाना किया।
मुझे मेरी ही ज़िन्दगी से बेगाना किया।

मोहिना अभी मोहित से मिल कर लौटी थी. वह कल सुबह चला जाएगा। पहली बार आकर वह एक महीने बाद पहली बार जा रहा था। कल ही यह बात तय हो चुकी थी कि सुबह वह अकेला जाएगा, कोई उसके साथ उसे छोड़ने नहीं जाएगा। विदाई के समय जो भाव-विगलित वातावरण बन जाता है, वह उसे पसंद नहीं। पसंद इसलिए नहीं कि किसी के दुखी होने से वह रुक तो सकता नहीं अपितु होता यह है कि वह अपने लिए तो दुखी होता ही है, दूसरों के दुःख से भी दुखी हो जाता है. दूसरे कौन? दूसरों में पहले सिर्फ उसके माता-पिता थे, अब मोहिना भी जुड़ गई.

"मेरे जीवन में सिर्फ तीन लोग मायने रखते हैं, मम्मी, पापा और तुम." उसने कल कार में रोते-रोते कहा था. मोहिना का मन भारी था. थकावट भी हद से ज़्यादा महसूस हो रही थी. वह बिस्तर पर जा लेटी लेकिन नींद उसकी आँखों में नहीं थी. तभी फोन ट्रिंग से बजा. उसने देखा मोहित का एसएमएस था, "सो गईं?"

"नहीं। क्या तुम सो गए?" उसे लिखते ही लगा, उसने मूर्खतापूर्ण प्रश्न किया है।

"नहीं। मैं तुझे फोन करता हूँ." और पल भर न लगा कि फोन की घंटी बज उठी.

"मैं जल्दी लौट कर आऊँगा। बस अगले महीने बेल मिल जाएगी, उसके बाद एक महीने के अंदर-अंदर सभी आरोपों से मुक्त हो जाऊँगा।"

मोहिना ने ये किस्से न कभी देखे थे, न सुने थे. उसने पूछा, "अभी तो तुम्हें निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है, क्या इतनी जल्दी छूट जाओगे?"

"हाँ. असल में यह वकील बेकार था, उसने ठीक से केस नहीं लड़ा. शायद दूसरी पार्टी से पैसा खा लिया हो."

"बस, तुम छूट जाओ. मैं भगवान से प्रार्थना करूँगी।"

"सुन, आने के बाद मुझे काम की कोई चिन्ता नहीं है. मेरे पास हुनर है, मैं अपना काम करूँगा, मुझे किसी की नौकरी नहीं करनी।"

"हाँ, तुम मेरे उस मॉल वाले ऑफिस में अपना ऑफिस खोल लेना। वह कब से खाली पड़ा है, शायद इसीलिए कि तुमनें उसमें अपना काम करना है. और मोहित, मेरा बिज़नेस भी तो अल्टीमेटली तुम्हीं ने सम्भालना है. तुम अपना काम छोडो, बस मेरा बिज़नेस करना। जमा-जमाया बिज़नेस है."

मोहिना को लगा, हम सपनों की बातें कर रहे हैं. या सपनों में जी रहे हैं?

"लेकिन डिअर, वह मेरी लाइन नहीं है. खैर, वह बाद में देखेंगे। मैं आने के बाद मम्मी-पापा के साथ नहीं रहूँगा, अलग मकान लूँगा, तू मेरे साथ रहेगी।"

मोहिना को लगा, हम मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे हैं.

"वाह जी, मैं अपना घर छोड़ कर तुम्हारे साथ क्यों रहूँगी? नहीं, नहीं, तुम अपने घर में रहोगे, मैं अपने घर में."

मोहिना को लगा, हम बच्चे हैं, जो घर-घर खेल रहे हैं.

"डार्लिंग, आय लव यू सो मच दैट आय कैन वन मैरी यू."

कहीं जेल में रह कर उसका दिमाग हिल तो नहीं गया?

"शटअप मोहित, डोंट टॉक नॉनसेंस।"

"कभी हँस भी लिया कर."

"तो यह चुटकुला सुनाया था तुमने?"

"तू इसे चुटकुला समझ ले. अच्छा यह बता, तू दहेज़ में कार तो लाएगी ना?"

अब उसे हँसी आ गई, "शर्म करो, दहेज़ के कारण तुम जेल गए हो और तुम फिर दहेज़ माँग रहे हो? लेकिन चिन्ता न करो, तुम शादी करने की हिम्मत रखो, सिर्फ कार नहीं, फ़्लैट भी लाऊँगी।"

"वाह, वाह, जीती रह कन्या, तेरा कल्याण हो."

"मोहित, तुम कभी-कभी इतनी ऊटपटाँग बातें करते हो कि मुझे सच में लगता है कि तुम्हारा दिमाग हिल गया है. तुम्हारे लिए तो यह डायलॉगबाज़ी है, पर सोचो, क्या मैं पत्थर की बनी हूँ जो मुझ पर कोई असर नहीं होगा?"

"चल, अब सो जा. सुबह जाते हुए आऊँगा, बाय कहने।"

अब किसने सोना और कैसा सोना? रात जागते हुए बीती।

6.
योर टीयर्स आर टिअरिंग मी ऑफ़
उनसे मिल कर हमें रोना था बहुत रोना था
तंगिए वक़्ते मुलाकात ने रोने न दिया।

सुबह आठ बजे घर की घंटी बजी. ज़ाहिर है, मोहित आया था. बाहर उसकी टैक्सी खड़ी थी, वह गेट पर था. मोहिना ने गेट पर लगा ताला खोला। वह भीतर आया. मोहिना को कुछ न सूझा। वह मंत्रमुग्ध सी उसके गले से जा लगी. मोहित ने उसे कस कर अपनी बाहों में थाम लिया। मोहिना ने बहुत रोकने की कोशिश की लेकिन उसके आँसू न रुके। कल वह रो रहा था, आज यह रो रही थी. धार-धार आँसू, हिचकियों पर हिचकियाँ, "मोहित, तुम मत जाओ ना," आवाज़ दिल में घुट कर रह गई थी. पर जैसे हर बार की तरह मोहित ने सुन ली थी. "तुम इतना रोओगी तो मैं कैसे जा पाऊँगा?"

मोहिना के आँसू और ज़ोर से निकल पड़े. वह और कस कर मोहित से लिपट गई. उसके कानों में बज रहा था, न उम्र की सीमा हो, न जन्मों का हो बंधन, जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन, होठों से छू कर तुम, मेरा गीत अमर कर दो. बन जाओ मीत मेरे, मेरी प्रीत अमर कर दो. वक़्त वहीँ थम गया था. काश ! वे दोनों मूर्ति बन कर वहीँ यूँ ही खड़े-खड़े जम जाते।

"मेरे बारे में सोचो, मैं वहाँ कैसे रहूँगा? कैसे रहता होऊँगा? मेरे पास वहाँ कुछ नहीं है, वही चोर, लुटेरे, डाकू, खूनी, फिर भी मैं वहाँ हँसता रहता हूँ. तुम्हारे पास यहाँ सब कुछ है. मत रोओ मोहिना, योर टीयर्स आर टीअरिंग मी ऑफ़. तुम्हारे रोने से भी मैं रुक तो नहीं पाऊँगा। जाने के बाद और दुखी रहूँगा। जब तक तुम रोती रहोगी, जाऊँगा भी कैसे? तुम्हारे रोने से मेरा और तुम्हारा नसीब तो नहीं बदल जाएगा? चुप हो जाओ, मोहिना."

आप कहते थे कि रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया। 

मोहिना चुप हो गई. उसने अपने आँसू पोंछ लिए. लेकिन वे दोनों वैसे ही खड़े रहे, निश्चल, निस्पंद। कुछ क्षण बाद मोहिना के कानों में मोहित की फुसफुसाती आवाज़ पड़ी, "सीते, अब तुम्हारे राम के बनवास जाने का समय हो गया. उन्हें हँस कर विदा करो."

मोहिना मोहित से अलग हुई और उसकी ओर देख कर मुस्कुरा दी. मोहित बोला, "सीते, प्रार्थना करो कि तुम्हारा राम युद्ध में विजयी हो कर शीघ्र वापस लौटे."

मोहिना ने मोहित के माथे को चूमा, उसके सिर पर हाथ रखा, हँस कर बोली, "विजयी भवः." और उसके घर से निकलते ही अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर ढेर हो गई.

7.
वाओ मोमेंट ऑफ़ माय लाइफ़ 
अँखियाँ हरि दरसन की प्यासी
देख्यौ चाहति कमलनैन कौ¸ निसि-दिन रहति उदासी।

मोहित का यह बचपना था, बेवकूफ़ी थी या बदतमीज़ी थी या सरासर पागलपन? समझना मेरे लिए मुश्किल था, पागल सिर्फ वही नहीं होते जो पत्थर ,मारते हैं. पागल वे भी होते हैं जो फ़ालतू का प्यार करते हैं. पत्थर मारना एक जुनून है, इसी तरह प्यार करना भी एक जुनून है. पत्थर मारना एक क्रिया है, उसी तरह प्यार करना भी एक क्रिया है. मोहिना सोच रही थी. उसे जो समझ में आया, वह यह कि मोहित जिस जंजाल से गुज़रा था, जिस जंगल में रहते हुए उसे मौसमों की मार के साथ-साथ किस्मत की मार भी सहनी पड़ी थी, उन हालात में वह झूठ तो बोल ही नहीं सकता। जो भावनाएँ उसने प्रदर्शित कीं, वे सच ही होंगी। उसके शब्दों में वह जादू था, कि मोहिना उसकी ओर खिंचती चली गई. क्या लिखा था उसने, पहली बार मोहिना से मिलने के बाद? "मोहिना, तुम में ऐसी कशिश है कि अब मैं हमेशा नींद में रहूँगा, आँखें खुलने के बाद भी.… दिस इज़ द वाओ मोमेंट ऑफ़ माय लाइफ़।"

क्या करे? मोहिना क्या करे?

मोहिना के जीवन में यह एक अचम्भा ही था कि उसकी उस उम्र में कोई प्रेम का प्रदर्शन करे, जो उम्र, कहते हैं, दुनियादारी से मुक्त होने की होती है.

मोहिना कर्म में विश्वास रखती थी. उसका अपने कामकाज में व्यस्त रहना प्रायः लोगों को आश्चर्य में डाल देता था, आखिर क्या ज़रूरत है उसे अपने को खपाने की? पैसे के लिए काम किए बिना भी उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी-खासी थी. पर, उसे लगता, खाली दिमाग, शैतान का घर, इसलिए खुद को व्यस्त रखे रहती थी. अब मोहित ने उसे अपने ख्यालों में ऐसा व्यस्त किया था कि वह अपने सारे कामकाज भूल गई. जो कुछ उसके साथ हो रहा था, उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि क्यों हो रहा है. मोहित नहीं था पर मोहित का एक-एक शब्द उसे बदहवास करने के लिए पर्याप्त था. उसे 'कल' की कोई खबर नहीं थी कि मोहित उसे मिलेगा भी या नहीं? मोहित जेल से छूटेगा भी या नहीं? बस, वह अपने मन में संतुष्ट होना चाहती थी कि जो कुछ हुआ, क्या वह सच था? सही था? क्या सचमुच मोहित उससे प्यार करता है? क्या सचमुच मोहिना उससे प्यार करती है? यह इतनी बेचैनी क्यों है? आखिर इस प्यार का हश्र क्या होगा? आखिर इस प्यार की मंज़िल क्या है? पहली बार, जीवन में पहली बार वह इतनी उलझी हुई महसूस कर रही है. उसे किसी से बात करनी होगी। किस से? कौन है उसका इस दुनिया में जिस के आगे वह अपने दिल का यह राज़ खोले? सब उसे दोषी ठहराएँगे। सब उसे पागल कहेंगे। सच में वह पागल जैसी ही हो गई है. मोहित मज़े से जेल में बैठा फिजिकल कंफाइनमेंट के मज़े ले रहा है, वह यहाँ खुले आसमान के नीचे आज़ाद मेन्टल कंफाइनमेंट का दंश झेल रही है.
उसे कुछ न सूझा, उसने अपनी एक बहुत पुरानी सहेली का फोन खडका दिया। बरसों पहले वे दोनों अपने सुख-दुःख बाँटा करती थीं. सालों बाद एक दूसरे की आवाज़ सुनी, सहेली हैरान, "सब ठीक तो है? तू तो गायब ही हो गई, हम सबसे सन्यास ले लिया। बढ़िया किया जो आज फोन किया।"

"बहुत परेशान हूँ, मेरी उलझन तू ही सुलझा सकती है."

"क्या हुआ? क्या बेटे-बहु से कोई झगड़ा?"

"अरे नहीं, वे मुझसे नहीं झगड़ते। वैसे भी वे तो अमेरिका में बैठे हैं, मैं यहाँ अकेली हूँ," और मोहिना ने सारी कहानी ज्यों की त्यों उसे सुना दी.

"अरी पागल, तो इसमें इतना परेशान होने वाली क्या बात है? वह खुद चल कर तेरे दरवाज़े पर आया है, उसकी बातों से वह मुझे सच्चा ही लग रहा है……"

"लेकिन उम्र का इतना अंतराल……?"

"प्रेम दिल से होता है, उम्र से नहीं।"

"लेकिन……"

"लेकिन-वेकिन छोड़. क्या तू उसे ढूँढने गई थी कि कौन सा मोहित कहाँ बैठा है? वह खुद चल कर आया तेरे पास, और कहाँ से आया, यह भी तो सोच. उसे सहारे की ज़रूरत है. तूने भी सारा जीवन अकेले गुज़ारा, तुम दोनों अकेले हो, बोथ ऑफ़ यू आर नीडी, तुम दोनों को एक-दूसरे के साथ की जरूरत है, अब उम्र के इस पड़ाव पर किसी ने तेरे मन का दरवाज़ा खटखटाया है तो इसे भगवान का प्रसाद समझ कर स्वीकार कर, पगली।"

सहेली से बात करके मोहिना के मन की बेचैनी और बढ़ गई. यह उसने क्या कह दिया? भगवान का प्रसाद? आखिर मोहिना क्यों पक्का करना चाहती है कि उसका और मोहित का लगाव सही है या नहीं? वह अब कभी मिले, न मिले। हो सकता है, वे दोनों कभी सारी उम्र न मिलें, तो? नहीं नहीं, वह ऐसा सोच कर ही घबरा उठी. उस घबराहट में उसे कुछ न सूझा। उसने कार उठाई और मोहित के घर पहुँच गई, यानि मोहित के मम्मी-पापा दिवाकर भाई और शीला भाभी से मिलने। मोहित की अनुपस्थिति में वह पहले भी कई बार उनसे मिलने जा चुकी थी. उसे वहाँ जा कर एक शान्ति सी मिलती, जैसे वह मोहित के घर में हो, मोहित से ही मिल रही हो.

"आइए, आइए," शीला भाभी ने दरवाज़ा खोला, "आने से पहले फोन कर देतीं तो हम आपके लिए बढ़िया सा खाना बना कर रखते। बस, हम लंच करने ही जा रहे थे, अब जो भी रूखा-सूखा है, वही……"

"अरे, लंच का टाइम हो गया, मुझे पता ही नहीं," मोहिना को खेद हुआ कि वह बिना बताए गलत समय पर क्यों पहुंची? उसने झूठ बोल दिया, "आप खाइए, मैं खा कर आई हूँ."

"नहीं जी, ऐसा कैसे होगा? आपको हमारा साथ तो देना ही पड़ेगा," दिवाकर जी ने कहा.

खाना समाप्त कर वे ड्रॉइंग रूम में आ बैठे। दिवाकर भाई के पास एक ही कथा, मोहित मोहित। वह भी तो यही सुनने आई थी, उसके पास आजकल कौन सा दूसरा विषय है? वह पूछ बैठी, "क्या हम मोहित से मिलने धर्मशाला चलें?"

"हर वक़्त नहीं जा सकते, मिलने का दिन और समय तय होता है. मोहिना जी, वहाँ जाने का कोई फायदा नहीं, भीड़ इतनी कि बस एक झलक देखने को मिलती है, शोरगुल इतना कि कुछ सुनाई नहीं पड़ता। मोहित भी मना करता है, हम शुरू में बहुत धक्के खा चुके," दिवाकर जी के कहते-कहते मोहिना की आँखों से आँसू बह निकले। शीला भाभी ने उसे गले से लगाया, "अरे आप रो क्यों रही हैं?"

मोहिना क्या बोले? वह और ज़ोर से रो उठी. उसके आँसू बंद ही न हों.

"बताइए तो सही, क्या हुआ?" शीला भाभी ने फिर पूछा, "क्या मोहित की कोई बात है?"

उन्हें कैसे लगा कि मोहित की कोई बात होगी? क्या उन्हें पता है, मेरे और मोहित के बीच की बात? मोहिना ने सोचा, कहा यह, "मोहित से मिलने का मन है. मोहित की याद आ रही है."

शीला भाभी ने उसे और कस कर अपने गले से लगा लिया। दिवाकर भाई बोले, "हम उसके लिए बहुत रोए हैं. अब हमारे आँसू सूख गए."

"मोहित ने कुछ कहा था क्या?" शीला भाभी ने पूछा।

"हाँ, उसने कहा था, ही लव्ज़ मी." मोहिना ने रोते-रोते कहा, पता नहीं, कह कर ठीक किया या गलत किया, वह समझ नहीं पाई. पगला सी गई थी मोहित के प्रेम में.

"वह ऐसा ही पागल है, कुछ भी बोलता है," मोहित की मम्मी कह रही थीं, "आपका स्टेटस तो वही है, जो हमारा है, यानि आप माँ हैं, मोहित की उम्र का आपका पुत्र रजत है, आप उसकी बात को दिल से न लगाएँ, मुझे लगता है, उसका दिमाग सही ठिकाने नहीं है."

"मोहित झूठ नहीं बोलता, उसने सच ही कहा होगा," उसके पापा बोले, "मोहिना जी, यदि आपके और मोहित के बीच कोई मधुर सम्बन्ध है तो मैं इससे बहुत खुश हूँ."

मोहिना के आँसू थम गए. दिवाकर भाई चुन-चुन कर वे उदाहरण बताने लगे, जहाँ स्त्री-पुरुष के मध्य उम्र के गहन अन्तराल के बावजूद प्रेम सम्बन्ध हुए और निभे। मोहिना खुश होने पर भी यह सोचे बिना न रह सकी कि दिवाकर भाई कितने बुद्धिमान हैं, बेटा जेल में है, इसीलिए उसका उसकी माँ की उम्र की औरत के साथ लगाव स्वीकार कर लिया। बेटा जैसे खुश रहना चाहता है, रहे.

मोहिना शांत मन से अपने घर लौट आई. उसे तसल्ली थी, उसकी सहेली ने तो ओके किया ही, दिवाकर भाई ने भी उसके और मोहित के मधुर सम्बन्ध पर मुहर लगा दी.

लेकिन यह क्या? घर आकर वह फिर बेचैन हो उठी. यह बेचैनी मोहित के वियोग से उपज रही थी. वह क्यों इतनी पागल हो गई थी? आगे कुछ होने वाला नहीं था. मोहित का जेल से छूटना निश्चित नहीं था. उनका भविष्य में मिलना निश्चित नहीं था. फिर भी वह यह क्यों निश्चित करना चाहती थी कि उसके और मोहित के मध्य जो प्रेम है, वह सही है, उचित है? शायद वह खुद इसे सही नहीं मान रही थी, लेकिन उसे मोहित बहुत अच्छा लगा था, इसीलिए अपनों से पुष्टि करवाना चाहती थी कि जो है, सही है.

मोहिना ने घर पहुँचते ही इसी घबराहट में पुत्र रजत को मेल लिख दिया, "माय सन, आय'म इन लव विद अ बॉय ऑफ़ योर एज. ही ऑल्सो लव्ज़ मी." बस इतना ही.

कुछ घंटे बाद अमेरिका से फोन आया. फोन पर रजत नहीं, उसकी पत्नी यानि मोहिना की पुत्रवधु रति थी. "हाय मम्मी, आय'म सो हैप्पी टू नो अबाउट यू."

मूर्ख कहीं का, उसने बेटे को मन में गाली दी, हर बात बीवी से बता कर रहेगा, बीवी का गुलाम, माँ की ऐसी बातें भी कोई बीवी से बताता है? उधर से फोन पर रति की आवाज़ आ रही थी, "मम्मी, रजत आपको बाद में फोन करेंगे। रजत ने बताया, मुझे बहुत ख़ुशी हुई."

"लेकिन रति, इस उम्र में……"

"मम्मी, किसी भी उम्र में कुछ भी हो सकता है, डोंट वरी, आय'म विद यू.…, इन्जॉय योरसेल्फ, दिस इज़ द वाओ मोमेंट ऑफ़ योर लाइफ़।"

"पर रजत……"

"मैंने कहा ना, ये आपसे बात करेंगे। ये क्यों कुछ कहेंगे? आपकी अपनी लाइफ है. वैसे भी मम्मी, ये गैर-रोमैंटिक हैं, रोमैन्स इन्हें समझ में नहीं आता," मेरे पुत्र की पत्नी मेरे पुत्र के बारे में अपनी सास को यह बता रही थी, मोहिना ने सोचा। रति आगे कह रही थी, "आप बिलकुल परवाह न करें। मैं आपके साथ हूँ."
फोन बंद हो गया था. मोहिना को लगा, जैसे सारी कायनात उसे और मोहित को मिलवाने के लिए कटिबद्ध है. उसके जीवन में पाओलो कोएलो का अल्केमिस्ट घट रहा था. जब भगवान किसी को किसी से मिलवाना चाहता है, तो सारी स्थितियाँ एक के बाद एक यूँ ही घटती रहती हैं. सारे संयोग यूँ ही बनते रहते हैं. उसके जीवन में अल्केमिस्ट हो रहा था. उसके जीवन में अल्केमिस्ट घट रहा था. वह खुद अल्केमिस्ट हो गई थी.
बस अब रजत के फोन का .इंतज़ार था.

8.
लव इज़ ब्लाइंड
कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को

'ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा' का गाना 'सैनोरिटा, किधर है तू……' मोहिना ने अपने मोबाइल के इनकमिंग कॉल्स में लगा लिया था, मोहित ने उसे 'सैनोरिटा' बुलाया था. एक बार नहीं, कई बार वह उसे 'सैनोरिटा' कह कर बुलाता था. बड़ी उम्र की स्त्रियों के लिए सम्मानजनक सम्बोधन है, 'सैनोरिटा'. मोहिना ने हँस कर कहा था, "सीधा ओल्डी ही कह लो न."

"शट अप. खबरदार जो खुद को ऐसी गाली दी तो. मैं तो किसी के भी लिए ऐसा शब्द सोच ही नहीं सकता। और फिर तुम्हारे लिए? तौबा तौबा।"

"और जो तुम हर बार कहते हो - मेरे बेचारे बूढ़े माँ बाप - "

"'बेचारे बूढ़े' कहता हूँ, 'बुड्ढे' नहीं।"

"वाह, क्या दलील है ! तुम भी गज़ब हो मोहित…… "

फोन पर यही गीत बज रहा था. रात ज़्यादा नहीं हुई थी, सिर्फ दस बजने वाले थे, मोहिना बिजली बंद करके सोने के लिए बिस्तर पर जा चुकी थी. उसने मोबाइल उठाया। देखा, फोन की स्क्रीन पर पुत्र रजत का चित्र था. यहाँ रात होती है तो अमेरिका में दिन. वहाँ पिछली दोपहर के लगभग बारह बजे होंगे। उसने फोन उठा लिया, हरे तीर पर क्लिक किया और बोली, "हेलो बेटा, कैसे हो?"

"आर यू ओके मॉम?"

"हाँ, मुझे क्या हुआ?"

"मैं फर्स्ट अवेलेबल फ्लाइट से आपका टिकट बुक कर रहा हूँ. आप यहाँ आकर हमारे साथ रहेंगी।"

"क्यों राजे? मैं नहीं आ सकती। तुम्हें मालूम तो है, यहाँ कितने काम फैले हुए हैं? उन्हें कौन सँभालेगा?"

"तो मैं आ रहा हूँ."

"लेकिन हुआ क्या है? तू इतनी हड़बड़ी में क्यों है?"

"मॉम, यू आर फीलिंग लोनली। इट्स माय फॉल्ट। मैंने आपको अकेला छोड़ दिया। आय'म फीलिंग गिल्टी।"

"नो राजे, इट्स नॉट लाइक दैट. आय'म नॉट फीलिंग लोनली। और फिर, तुमने मुझे अकेला कहाँ छोड़ा? यह तो यहाँ के जंजालों को देख कर मैं ही नहीं गई तुम लोगों के साथ."

"बाय द वे, हू इज़ दैट ब्लडी यंग बॉय?"

"ओह तो यह बात है? जल रहा है?"

"मैं क्यों जलूँगा? आप भी जानती हैं, आपके बेटे की जगह तो कोई ले ही नहीं सकता।"

"वह मोहित है. कुछ याद आया?"

"मो हि त……वह दिवाकर अंकल का बेटा?"

"हाँ……"

"दैट ब्लडी मर्डरर? बावला हुआ है क्या?"

"राजे, उसने मर्डर नहीं किया, वह बेक़सूर है. गलती से फँस गया है. पर तुम्हें कैसे मालूम इस काण्ड के बारे में?"

"कितना तो हंगामा हुआ था अखबारों में, न्यूज़ चैनल्स पर."

"तुमने मुझे नहीं बताया?"

"क्या बताता? हमारे घर खुद मुसीबत आई हुई थी. आप कैंसर में थीं. मेरी उस समय की मानसिक हालत का अंदाज़ा लगाएँ।"

"ओह हाँ…… "

"मॉम, अपनी वाइफ़ का मर्डर उसने ही किया था, रात के वक़्त। हिम्मत देखो, मर्डर करने के बाद रात भर अपनी मरी हुई बीवी के पास लेटा रहा. अरे, दूसरे कमरे में ही लेट जाता, सो जाता। सुबह उठ कर शातिर दिमाग ने बाजार जाकर सूटकेस खरीदा, उसमें बीवी की लाश डाली, दिन भर उस लाश वाले सूटकेस को गाडी की डिक्की में डाल कर पूरे शहर में घूमता रहा कि कहाँ ठिकाने लगाए। इस बीच पट्ठे ने ऑफिस में जाकर मीटिंग भी अटेंड कर ली, और जब लाश को ठिकाने लगाने का कोई ठिकाना नहीं सूझा तो अंत में अपने घर के पिछवाड़े ही वह सूटकेस फ़ेंक दिया, इस ख़ुशफ़हमी में कि पुलिस सोचेगी, वह खुद अपने ही घर के पिछवाड़े सूटकेस क्यों फेंकता? इसलिए वह तो हत्यारा हो ही नहीं सकता। खुद को बड़ा अक्लमंद समझता है वह."

"हाँ, मैंने पढ़ा यह सब नेट पर."

"फिर भी मॉम…… ?"

"आय गेव हिम बेनेफिट ऑफ़ डाउट। मैंने उसे संदेह का लाभ दिया था."

"पर क्यों मॉम?"

"क्योंकि वह दिवाकर जी का बेटा है और तेरी उम्र का है."

"वॉट अ सिली लॉजिक ! उसे घर में मत घुसाना। कहीं आपका ही गला दबा दे. जिसने एक खून किया, वह दूसरा भी कर सकता है."

"घर में घुसा लिया बेटा, दो बार आया है यहाँ, पैरोल पर आया हुआ था, तब. ही इज़ क्वाइट जेंटल एंड डीसेंट।"

"जो वह नज़र आता है, वह वैसा है नहीं। ही इज़ अ टोटल फ़्लर्ट। ही इज़ अ लायर। एंड ही इज़ ऑल्सो साइकोपैथ। वह एक नंबर का झूठा, बदमाश और  मेन्टल है. आपका दिल तो निश्चित टूटने ही वाला है. क्या मैं जानता नहीं आपके दिल को? यू आर अ सेंटीमेंटल फ़ूल, मॉम."

"तुम्हें उसके बारे में इतना कैसे पता है?"

"मैं क्या बोलूँ मॉम? मैं उसे कब से जानता हूँ. क्या आप भूल गईं, मैं और वह एक हो स्कूल में पढ़ते थे. इंजीनियरिंग भी हम दोनों ने साथ-साथ की, चाहे अलग कॉलेज से. आप बस इतना समझ लीजिए, मोहित इज़ नॉट द राइट चॉइस फॉर यू."

मोहिना जैसे कुछ समझना ही नहीं चाहती थी. उसकी आँखों पर मोह का यह कैसा पर्दा था? उसने रजत से पूछा, "क्या उम्र के कारण?"

"नो मॉम, मैं दकियानूसी नहीं कि उम्र को महत्व दूँ या आपके दिल को न समझूँ। पर याद है, आपने मुझे क्या शिक्षा दी थी? "बेटा, उम्र से पहले कोई काम मत करना।" और आपने मॉम, यह प्रेम उम्र के बाद किया....... ओके, डोंट बी सैड. जस्ट जोकिंग।"

"अब मैं क्या कहूँ?"

"कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। आपका बेटा आपको अच्छी तरह समझता है। लेकिन कुछ तो सोचो। जस्ट सी हिज़ स्टेटस। आप कहाँ, वह कहाँ? वह आपके पैरों की धूल बराबर नहीं है. दिल लगाओगे तो किसी हैसियत वाले से हो लगाओगे ना? आप मुझे कहा करती थीं."

"वह बहुत पढ़ा-लिखा है, तेरी तरह सॉफ्टवेअर इंजिनियर है। बहुत ऊँची नौकरी पर था……"

"था. पर आज उसका स्टेटस क्या है? आज की तारीख में वह एक हत्यारा है."

"ना ना, उसके लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग मत कर."

"सुना था, लव इज़ ब्लाइंड, आज देख रहा हूँ. खैर, बस इतना कहना चाहता हूँ कि गुण्डे-मवालियों से डर कर रहिए। कहीं कुछ गड़बड़ हो गया तो हमारी ज़िन्दगी तो तबाह हो जाएगी।"

"डोंट वरी माय सन, आय'ल टेक केयर।"

"बचपन में जो बातें आप मुझे समझाती थीं, वे आज मुझे आपको समझानी पड़ रही हैं."

"नॉट टू वरी."

"अगर मैंने उसकी माँ को ऐसे लारे दिए होते ना, तो उसने अपनी माँ के खून के साथ मेरा भी खून कर दिया होता।"

"नाओ यू आर टॉकिंग रबिश, रजत, टॉक सेंसिबल। कुछ बुद्धि का इस्तेमाल कर बेटा, कैसे बोल रहा है?"

"मैं जल्द से जल्द इण्डिया आ रहा हूँ. अब बंद करता हूँ. अपना ख्याल रखें।" और फोन बंद हो गया.

रजत के फोन ने मोहिना का दिमाग हिला कर रख दिया। वह खुद को कोसने लगी, आखिर ऐसा हुआ क्या है, मूर्ख मोहिना? आखिर मोहित कौन सा यहाँ आने वाला है, आया भी तो साल में एक बार, क्यों इतना हंगामा कर दिया, मूर्ख मोहिना? प्यार-व्यार होता क्या है? सब बकवास होता है. जैसे कुछ अलभ्य प्राप्त हुआ हो, वह भी इस उम्र में, इसलिए उछली जा रही है, मूर्ख मोहिना।

चाहे उसने रजत को ज़ाहिर नहीं होने दिया लेकिन मन में वह कहीं डर भी गई थी. क्या सचमुच मोहित वैसा है, जैसा रजत ने बताया? ड्रामेबाज़ तो है, चालें भी बहुत आती हैं उसे, बातें बनाने में उस्ताद भी है. झूठ-सच वही जाने, मोहिना का तो मन मोहा है मोहित की बातों ने. लेकिन यदि हत्या उसी ने की है तो डरने वाली बात तो है ही. एक बार जो अच्छा-बुरा किसी के हाथों से हो जाता है, वह अनुभव बन जाता है। और अनुभव कभी भी दोहराया जा सकता है। रजत ने सही कहा है। सतर्क तो रहना ही चाहिए।

किसी ने सच कहा है या मोहिना ने कहीं पढ़ा है या उसने ही यह कहावत गढ़ी है कि लड़कियाँ इस धरती पर सबसे मूर्ख प्राणी होती हैं. वे बहुत ही दिलफेंक लड़कों की तरफ़ आकर्षित होती हैं, वे प्यार के लिए उन लड़कों की तरफ भागती हैं जो प्यार के कतई काबिल नहीं होते, दोज़ हू आर नॉट वर्थ लविंग।

रजत राजे, तूने सब मटियामेट कर दिया।

9.
आय'म इन्नोसेंट
ऊधो मन नाहिं दस बीस
एक हुतो सो गयो श्याम संग.....

मोहित एक महीना बाहर रह कर फिर अन्दर यानि अपनी धर्मशाला में लौट गया था. मोहिना जैसे नींद से जागी थी. नहीं, नहीं, मैंने अपने लिए नहीं, उसके लिए उसे प्यार किया था. उसे ज़रूरत थी किसी सहारे की. वह बहुत टूटा हुआ था. पगलाया सा रहता था. मेरे सिवा कौन था उसका? देखो ना, कितना बोलता था? सामान्य आदमी तो इतना नहीं बोलता। मैं तो अपने एकांत में संतुष्ट थी. अपने आप में पूर्ण थी। मुझे किसी की ज़रूरत नहीं थी. मुझे अगर किसी पुरुष की ज़रूरत होती तो क्या मैं किसी ऐसे व्यक्ति को चुनती जिससे एक बार मिलने के बाद दूसरी बार मिलने की उम्मीद ही न हो? मैं अकेली थी ही नहीं। मुझे अकेलेपन का कोई अहसास ही नहीं था, जो मैं किसी को ढूँढती। क्या मैं उसे ढूँढने गई थी? मोहिना रोज़ खुद से यही बातें करती। उसे नियति का खेल समझ नहीं आ रहा था. मोहित की अनुपस्थिति उसे और उलझा रही थी. वह अनुपस्थित होकर भी हर घड़ी हर जगह उपस्थित था.

क्या मोहित कुछ अजीब नहीं था? मोहिना खुद से पूछती। क्या सचमुच मोहिना में कुछ ऐसा था, जिसने मोहित को आकर्षित किया? क्या मोहिना की समृद्धि? क्या मोहिना का पैसा? लेकिन उसने तो ऐसा कुछ माँगा ही नहीं। फिर? फिर? मोहिना परेशान। इतनी परेशान कि उसका मन हो वह भी जेल में जाकर रह ले मोहित के साथ. उसके दिल का चैन उड़ गया था और रातों की नींद। अब उसे सोने के लिए नींद की गोली की ज़रूरत पड़ने लगी थी.

दिन बीतते गए. मोहिना के आगे मोहित एक ऐसा प्रश्न बन कर रह गया, जो बहुत उलझा हुआ था. जिसे रात-दिन सुलझाते जाओ, फिर भी कोई न कोई गाँठ लगी रह जाए. मोहिना को अब ज़िन्दगी का एक ही मकसद नज़र आता, मोहित को समझना, मोहित को जानना।

इससे पहले मोहिना ने कभी उम्र कैदी नहीं देखा था, न सुना था. केवल कहानियों और फिल्मों में ही ये जेल, अपराध, अपराधी, कैद, उम्र-कैद जैसे शब्द सुने थे. यदि दिवाकर जी से उसकी मित्रता न रही होती तो वह मोहित को भी नहीं जानती यानि किसी कैदी को नहीं जानती। बल्कि दिवाकर जी जैसे सभ्य सुसंस्कृत परिवार का पुत्र होने के कारण ही मोहित मोहिना के नज़दीक आ सका. उस परिवार से नज़दीकी ही उस की मोहित के प्रति हमदर्दी होने का कारण बनी। अन्यथा उसे ऐसे लोग असामाजिक तत्वों से जुड़े हुए लगते बल्कि कुछ लगते ही नहीं थे क्योंकि उसने इनके बारे में कभी सुना ही नहीं था, न कभी सोचा था। पर मोहित तो कैदी लगता ही नहीं। सुशील, सभ्य, संभ्रात, समझदार। लेकिन कुछ तो गड़बड़ थी उसमें। कुछ तो उसमें था ऐसा जो उसे दूसरों से अलग करता था। इतनी मिठास, इतनी चंचलता, इतना चौकन्नापन, इतनी लिहाजदारी? क्या वह शुरु से ऐसा था? यदि 'हाँ' तो उससे यह काण्ड हुआ ही कैसे? उसे इतना गुस्सा आया ही कैसे कि वह अपने को सम्भाल न सका और डगमगा गया? मोहिना सोच-सोच कर परेशान। मोहित ने मिलने के पहले दिन ही उसके सम्मुख प्रेम-प्रदर्शन किया, उसे यही गड़बड़ लग रहा था। क्या वह कुछ घबराया हुआ था कि जो सामने है, उसे ले लो, कहीं यह भी छिन न जाए? मोहित क्या था, क्या है, क्यों है, यह जानना बहुत ज़रूरी है। और वह यह जान कर रहेगी। उसे यह शोध करना ही होगा। मोहित उसकी नस-नस में जो समाया है।

मोहित के व्यक्तित्व और चरित्र को समझने के लिए मोहिना ने वकीलों से पत्नी-हत्या से सम्बंधित मामलों की जानकारी हासिल करनी शुरू की, पुलिस अधिकारियों से अहाने-बहाने मिली, यहाँ तक कि ज्योतिषियों से मिलना भी उसकी लगभग रोज़ की दिनचर्या में शामिल हो गया। वह पैसे पर पैसे खर्च करती जा रही थी और मोहित के बारे में जानकारी जुटाने के भ्रम में जी रही थी। उसकी ज़िन्दगी में कितना अजीब हुआ था कि कोई कहाँ से चल कर आया था, उसे सिर्फ यह बताने कि वह उससे प्रेम करता है? उसे यह बताने कि वह उसका पिछले जन्म का साथी है? कमाल है ना उम्र के आखिरी पड़ाव पर कोई आया उससे यह कहने कि वह सारी उम्र उसका होकर रहेगा? यह तो गज़ब हो गया. उसके पास अब उम्र ही कितनी बची है? बल्कि जब वह अब से आधी उम्र की थी तब से ही मृत्यु का इंतज़ार कर रही है. तब से ही उसे लग रहा है कि बस अब वह ख़त्म हो चुकी है. तो यह कौन था जो उसे याद दिलाने आया था कि नहीं, अभी वह ख़त्म नहीं हुई है, अभी तो उसे शुरू होना है, फिर से, मोहित के लिए? क्या उसके जीवन का यह आखिरी सुख था जो भोगने से बचा रह गया था? या आखिरी दुःख जो उसे छलने के लिए सुख की शक्ल में आया था?

अपने शोध के ज़रिये उसने जो निष्कर्ष निकाले वे इस प्रकार थे....... ऐसे लोग जिनकी पृष्ठभूमि में अपराध नहीं होता, जब गलती से कोई अपराध कर बैठते हैं, वह भी हत्या जैसा जघन्यतम अपराध तो चाहे वे दुनिया से छुपाएँ कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है, वे इन्नोसेंट हैं, लेकिन उन्हें अपने बारे में सचाई पता होती है कि यह उन्होंने किया है इसलिए वे एक अपराध-बोध से पीड़ित रहते हैं, आत्म-ग्लानि के बोझ तले दबे रहते हैं. उन्हें लगता है, चूँकि सब उनकी सचाई को जानते हैं इसलिए वे सबसे छुप कर रहते हैं. एकाध को छोड़ कर बहुत खुल कर हरेक के सामने नहीं आ पाते. वे अपने आपको ज़रूरत से ज़्यादा शरीफ और भलामानस दिखाने के लिए सतर्क एवं सजग रहते हैं ताकि कोई भी उनमें कुछ गलत या बुरा अंश होने की आशंका न कर सके. यदि वे शिक्षित हैं तो उनका ज्ञान उनकी बातों में लिखने-पढ़ने में सामने आएगा ही लेकिन अपराध-बोध के कारण और जेल में रहने के कारण वे विक्षिप्त से हो जाते हैं. रिश्तों के प्रति उनके मन में सम्मान नहीं रहता। वे रिश्तों को सम्भालना नहीं जानते क्योंकि उनके सामने केवल एक मुद्दा होता है कि अपना बचाव कैसे किया जाए. उन्हें अपने सिवा किसी अन्य बात से कोई मतलब नहीं होता। वे अपने मतलब को सिद्ध करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. वे देखने में ठीक-ठाक लगते हैं. सुन्दर और शालीन हों तो आकर्षित भी करते हैं लेकिन भीतर से अत्यधिक टूटे हुए होते हैं. उन्हें धीरे-धीरे इस बात का भान होने लगता है कि सगे-सम्बन्धी उन्हें एक-एक कर छोड़ रहे हैं. उनके संगी-साथी और उनका समाज केवल जेल और उसके भीतर कैदियों तक सिमित हो कर रह जाता है. उनके सामने उनका कोई भविष्य नहीं होता। जेल में रहते-रहते उन्हें यकीन होने लगता है कि उनका शेष जीवन जेल की दीवारों के भीतर ही घुट-घुट कर ख़त्म होने वाला है. इस यकीन के चलते उन्हें बाहरी दुनिया अपनी शत्रु लगने लगती है. वे धीरे-धीरे बाहरी समाज में रहने के योग्य नहीं रहते। ऐसे कैदियों को पैरोल पर छोड़ना खतरे से खाली नहीं होता। उनकी काउन्सलिंग अत्यधिक आवश्यक है. ज़्यादातर मामलों में उनका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है. वे पागलपन की कगार तक पहुँच जाते हैं. कभी-कभी पूरे पागल भी हो जाते हैं.

हे भगवान ! तो कोई पागल आया और मुझे अपनी बाहों में भर कर प्रेम की इतनी सारी बातें कर गया? और मैंने यकीन भी कर लिया? मैं कौन सा किसी पागल से कम थी. मोहिना ने घबरा कर नींद की गोली खाई और नींद के इंतज़ार में बिस्तर पर जा लेटी।

10.
व्हाट अ नॉनसेंस

कैदियों के हि में

मोहिना ने जेल में सज़ायाफ्ता लोगों पर कुछ जानकारियाँ हासिल की हैं, जिसके कारण उसके मन में अनेक प्रश्न उपजे हैं.

1. जेलों में कैदियों के चरित्र को ऊँचा उठाने के लिए, उनमें अपने गुनाह को स्वीकार करने जैसा प्रायश्चित पैदा करने के लिए तथा सज़ा की अवधि पूरी होने पर बाहर की दुनिया में आकर एक अच्छे नागरिक बनने का प्रण लेने के लिए कुछ शिक्षाप्रद कक्षाएँ चलाने की आवश्यकता है. क्या सरकार की तरफ से यह आदेश देश की समस्त जेलों को भेजा जा सकता है कि वे इस दिशा में सार्थक कदम उठाएँ? किरण बेदी ने ज़रूर कुछ सार्थक कार्य किया है लेकिन पता नहीं, इस दिशा में कुछ किया है या नहीं?

2. जेलों में पुस्तकालय शायद होते ही होंगे, तो उनमें अंग्रेजी और हिन्दी, दोनों भाषाओँ में सद्साहित्य की आपूर्ति होनी चाहिए। कैदियों को पुस्तकें पढ़ने के लिए जागृत करना चाहिए। पुस्तकें पढ़ने के लिए उनका समय निश्चित हो. उनमें आत्मज्ञान जगाना, गुनाह का अहसास एवं प्रायश्चित की भावना जगाना बेहद ज़रूरी है, अन्यथा वे दोबारा या बार-बार गुनाह को अंजाम दे सकते हैं.

3. जेल के अंदर बैठ कर भी अपराधी हर तरह के अपराध करते हैं. पैसों से कोई भी चीज़ खरीदी जा सकती है. जेलों के छोटे-मोटे कर्मचारी ही खरीद लिए जाते हैं जो कैदियों के लिए मादक पदार्थ तक उपलब्ध करवाते हैं. इस गन्दगी से कैसे बचा जाए?

4. जेल में कैदियों से ही काम कराए जाते हैं, जो जिस लायक होता है. पढ़े-लिखे कैदी कंप्यूटर पर काम करते हैं, इस तरह वे अपने व्यक्तिगत हित के लिए भी सारी दुनिया से संपर्क साधे रखते हैं, जिस पर कोई अंकुश लगाना संभव नहीं है. फिर भी क्या इस पर अंकुश लगाया जा सकता है? या लगाया जाना चाहिए?

5. क्यों न जेलों में ऐसा प्रावधान हो कि अपराधी के पकडे जाने के शुरू में उसे बेशक प्रताड़ित किया जाए लेकिन बाद में कैदियों को रोज़मर्रा की आवश्यक सुख-सुविधाएँ दे कर हमेशा के लिए वहीँ रहने दिया जाए? कई साल वहाँ रहते-रहते वे वहाँ के जीवन के अभ्यस्त भी हो जाते हैं और धीरे-धीरे इस समाज के लिए अयोग्य हो जाते हैं. सालों बाद जब वे वापस इस समाज में लौटते हैं तो उन्हें वह आदर-सम्मान नहीं मिलता, जिसकी आवश्यकता और इच्छा एक आम नागरिक को होती है. इसलिए उनका हमेशा के लिए वहाँ रहना ऐसा ही होगा जैसे किसी दूसरे शहर में रहना। और इसमें कोई बुराई नहीं है. क्षमा करें यदि किसी को यह आखिरी बात पसंद न आई हो तो. मेरे कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि यदि जेलों में मानवीय व्यवहार हो और तमाम सुख सुविधाएँ हों तो आदमी  ज़िन्दगी आराम से काट सकता है, इस प्रकार उसे बाहरी दुनिया में आकर लोगों की घृणा का सामना भी नहीं करना पड़ेगा और बाहरी दुनिया के लोग भी एक अपराधी के साए से दूर रह सकेंगे। क्योंकि यह दाग धुलता नहीं है. लेकिन उनके पुनर्वास के प्रबंध पुख्ता हों.

ये सब बातें मोहित से कहूँ तो उसका जवाब तुरंत आएगा, "व्हाट अ नॉनसेंस।"

11.
वी आर टुगेदर इन दिस जर्नी
लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल.

किसी अनजान व्यक्ति ने मोहिना के घर की कॉल बेल बजाई। उसने अपना परिचय दिए बिना उसके हाथ में एक मोटा लिफ़ाफ़ा पकड़ाया और अपनी बाइक पर छूमंतर हो गया. वह गेट बंद करके भीतर आई और 'किसने भेजा है' की जिज्ञासा में लिफ़ाफ़ा खोला। वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि वह पत्र मोहित ने भेजा होगा, जेल से. बिना किसी सम्बोधन के, बिना पत्र-शैली के, जैसे निबंध हो, वैसा ही था वह चौंसठ पन्नों की कॉपी के पूरे चौंसठ पन्नों में लिखा हुआ, हाँ, मैं पत्र ही कहूँगी उसे. मोहिना ने सोचा और पढ़ना शुरू किया।

"किसी के हाथ यह खत भेज रहा हूँ, मत पूछना, किसके हाथ?"

(पूछूँगी भी कैसे? तुम सामने तो हो नहीं। और वह बंदा, लिफ़ाफ़ा देते ही गायब हो गया. मोहिना ने मन में कहा.)

वह अचानक डर गई, पता नहीं किस खूनी, चोर, लुटेरे को उसने मेरे घर का पता देकर भेजा? कोई पैरोल पर आया होगा। हे प्रभु, मेरी रक्षा करना। रोज़ वह प्रभु से उसकी रक्षा करने के लिए कहती थी, आज उसे अपनी रक्षा का भी ख्याल आया. भगवान का नाम लेकर आगे पढ़ने लगी.…

"तुमसे मिलने के बाद यहाँ जीना कितना आसान हो गया है, मोहिना।"

(और मेरा यहाँ मुश्किल। तुम्हारी आवाज़ें मुझे चारों ओर से घेरे हुए हैं, तुम्हारे यहाँ न होते हुए भी मैं तुम्हें देख पाती हूँ, सुन पाती हूँ. तुम इतना बोले, इतना बोले, कि मुझे याद ही नहीं, तुम क्या बोले? बस एक अहसास है कि तुम में जैसे बरसों से कुछ जमा हुआ था, जो मेरे सामने बूँद-बूँद पिघल कर झर रहा था. वह मैं नहीं थी, जिससे तुम कुछ कहना चाहते थे, वह तुम ही थे, जो अपने भीतर का ज्वालामुखी मेरे सामने उड़ेल कर खुद को हल्का कर रहे थे. मुझसे पहले तुम्हें इस तरह किसी ने शायद नहीं सुना, मोहित? तुमने कह-कह कर खुद को खाली किया और मुझे भर दिया। और मैं भरी-भरी होने के अहसास से जैसे हलकी हो कर हवा में उड़ने लगी थी. तुम, पता नहीं, क्या सोच रहे थे? मैं, पता नहीं, क्या सोच रही थी?)

"वैसे तो मैंने खुद को यहाँ के जीवन का अभ्यस्त बना लिया था,  यहाँ तक कि हर चीज़ को देखने का नजरिया ही बदल लिया था. मैंने अपने को इन अर्थों में ढाल लिया था कि दुःख यहाँ हैं तो..... लेकिन दुःख कहाँ नहीं हैं? क्या बाहर लोग दुखी नहीं हैं?"

(ओह मोहित, तुम्हारी यह सकारातमक सोच .... खुश रहो. ईश्वर तुम्हें दुःख-तकलीफों में भी जीने की शक्ति दे. तुम्हें मुश्किलों से निकलने के रास्ते सुझाए।)

"क्या दुःख केवल फ़िज़िकल कनफाइनमेंट है? या मेन्टल कनफाइनमेंट? क्या शारीरिक रूप से बंदी होना ही दुःख का कारण है? या हमारी मानसिक जकडनें हमारे दुःख का कारण हैं? कभी-कभी बहुत असमंजस में पड़ जाता हूँ कि लोग फ़िज़िकल कनफाइनमेंट को इतना बड़ा कनफाइनमेंट क्यों समझते हैं? जबकि मेरे हिसाब से मानसिक विकलांगता कहीं बड़ी वजह है, आदमी के दुखी होने की. तुम ही बताओ, मोहिना, हम अंदर बंद हैं तो क्या हुआ? क्या सिर्फ हम ही दुखी हैं? बाहर भी तो लोग दुखी हैं."

(भोले बच्चे, तुम्हारे शारीरिक रूप से बंदी होने में दुःख के साथ अन्य नकारात्मक बातें भी जुडी हुई हैं, जिनका वहाँ बैठे लोगों को सामना करना पड़ता है. शर्म, लांछन, घृणा, दुत्कार, फटकार। तुम इन सब से कैसे इंकार कर सकते हो?)

"बल्कि यहाँ आकर लोग बाकी सब मुसीबतों से छूट जाते हैं, केवल एक ही चिंता रह जाती है कि खुद को यहाँ से बाहर कैसे निकाला जाए?"

(यह कितनी बड़ी चिंता है? इसके आगे सब चिंताएँ छोटी हैं, मोहित।)

"पैसा कमाने के लिए भागदौड़, मित्रों-सम्बन्धियों के आगे अपने को बढ़िया सिद्ध करने की ख्वाहिश, नौकरी में पाँव जमाने के लिए प्रभावकारी तरीके अपनाना, कितने-कितने झंझट हैं बाहर के जीवन में? यहाँ ऐसा कोई झंझट नहीं, बस ज़िंदा रहने के लिए दो रोटी चाहिए, न कपड़ों का होश, न सजने-सँवरने का जोश."

(कमाल की सोच है …. सिम्पल लिविंग ऐंड हाई थिंकिंग।)

"जानती हो, मैं बाहर नौकरी की भागदौड़ में लगा रहा, रात को देर से ऑफिस से घर आना, सुबह जल्दी निकल जाना। उस भौतिक जगत में स्वयं को दूसरों से ऊँचा उठाने की, आगे बढ़ाने की, तरक्की पर तरक्की करते जाने की होड़ में लगा रहा. इस सारी आपाधापी में, आज मुझे लगता है, कितना कुछ छूट गया था मुझसे?"

(क्या मोहित. तुम भी .... आगे बढ़ने की होड़ में लगना गलत बात है क्या? और क्या छूट गया तुमसे ऐसा, जो तुम्हें, तुम्हारे शब्दों में, धर्मशाला में जा कर मिला?)

"यहाँ आ कर मैंने खुले आसमान को देखा, चहचहाती हुई चिड़ियों को देखा, खुले मैदान में लहलहाते अनेक प्रकार के पेड़-पौधों को देखा, अपने चारों ओर बिखरी हुई प्रकृति को देखा, सरसराती हुई ठंड और बिलबिलाती हुई गर्मी को महसूस किया, बारिश में ज़मीन के सोंधेपन को महसूस किया, यह महसूस किया कि तेज़ बरसात में बूँदें कैसी छर्रे जैसी लगती हैं? आकाश में उड़ते हुए पंछी कितने सुन्दर लगते हैं? तीन फुट चौड़े सीमेंट के बने 'पलंग' पर बिना हिले-डुले रात गुज़ार देने की आदत पड़ जाए तो उस पर भी चैन की नींद आ जाती है. यह सब मैं आज़ाद रहते हुए कहाँ महसूस कर पाया था? सब कुछ कितना अद्भुद है यहाँ। और इस अनोखी यात्रा में तुम मेरे साथ हो मोहिना, वी आर टुगेदर इन दिस जर्नी।"

(ओह, तुम्हारा ह्रदय तो एक कवि का ह्रदय है, मोहित, यह मैंने अब, तुम्हारे इन शब्दों से जाना।)

"जब से तुम मिली हो, मेरे लिए यह यात्रा आसान हो गई है. आय'म नॉट सफ़रिंग, आय'म एक्सपीरिएन्सिंग, मैं दुःख को झेल नहीं रहा, भोग नहीं रहा, बल्कि उसे अनुभव कर रहा हूँ, उससे कुछ सीख रहा हूँ. और इस सब में तुम मेरी प्रेरणा हो, मोहिना।"

(अब मैं क्या कहूँ, मोहित? बस तुम्हारे इस स्नेह से अभिभूत हो उठी हूँ.)

"मैं बाहर अपने को ख़ास आदमी समझे बैठा था. मुझे पता ही नहीं था, आम आदमी क्या होता है? यहाँ आ कर मैंने आम आदमी की पीड़ा को महसूस किया, उसकी छोटी-छोटी ज़रूरतों को समझा, यह सब मैं वहाँ कहाँ महसूस कर पाया था? यहाँ ज़्यादातर बेचारे प-लिख नहीं पाते। उनके लिए एक अर्ज़ी लिख देना उनका खुदा बन जाने के समान है. यहाँ आ कर मुझे लगा, भगवान ने मुझे ख़ास आदमी बनने के लिए नहीं बनाया बल्कि आम आदमी के लिए बनाया है, इसीलिए तो मुझे यहाँ भेजा ताकि मैं आम आदमी के लिए कुछ कर सकूँ, उसके कुछ काम आ सकूँ।"

(तुम्हारी सोच को सलाम, मोहित।)

"तुम्हें मैंने बताया था ना कि मैंने यहाँ बंदियों की पढ़ाई के बंदोबस्त किए हैं. ओपन स्कूल और अन्य संस्थाओं से उनकी पढ़ाई और परीक्षा का प्रबंध किया है. याद है ना, इस काम के लिए मैं तुम्हारे साथ फलाँ डायरेक्टर से मिला भी था?"

(हाँ, याद है. और यह भी याद है कि वह डायरेक्टर तुम्हें भी कहीं का डायरेक्टर ही समझ रहा था. तुम लगते ही इतने ठां हो.)

"मोहिना, यह काम इतना आसान नहीं था. अथॉरिटी से स्वीकृत करवाना फिर भी आसान था, बंदियों को पढ़ने के लिए राजी करना अत्यंत कठिन।"

(और यह कठिन काम तुमने कर दिखाया, मोहित, तुम योग्य तो हो.)

"यहाँ आ कर मुझे लगा, मैं कहीं ज़्यादा समर्थ हूँ बाकी बंदियों की बनिस्बत।"

(हाँ, वहाँ कैदी को बंदी कहते हैं, तुमने बताया था.)

"सब की सामाजिक स्थिति एक जैसी है यानि हम सब बंदी हैं लेकिन अधिकतर बेचारे पैरोल पर नहीं जा पाते। पैरोल के लिए भागदौड़ करने वाले रिश्तेदार और पैसा उनके पास नहीं है. तुम नहीं जानती होंगी कि इस चारदीवारी में दाखिल होते ही सब सगे-सम्बन्धी धीरे-धीरे नाता तोड़ लेते हैं. बस, फिर हम सब आपस में ही एक-दूसरे के सगे होते हैं. और यह सगापन बाहर के सगेपन से कहीं बढ़ कर होता है क्योंकि किसी की आपस में ओहदे को लेकर कोई होड़ नहीं है, किसी को दूसरे से ज़्यादा अमीर दिखने की चाह नहीं है, कोई दूसरे को खदेड़ कर आगे नहीं निकलना चाहता, निकल ही नहीं सकता, सबका नंबर अपने-अपने हिसाब से आना है. कबिरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर. न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर."

(तुम वहीँ के हो गए हो, मोहित, तुम वहाँ की हर बात में कोई न कोई सार्थकता ढूँढ लेते हो. अच्छा है, वरना वहाँ जीओगे कैसे? चीज़ों को अपनाना तो कोई तुमसे सीखे। फिर आखिर तुम फँस कैसे गए?)

"मैं फँस गया, मोहिना, क्योंकि उस वक़्त तुम नहीं थीं मेरे साथ."

(मेरा सोचा हुआ तुम तक कैसे पहुँच गया, मोहित? जो मैं यहाँ सोच रही हूँ, वही तुम वहाँ सोच रहे हो. याद है, जब तुम यहाँ थे, हम दोनों के मुँह से एक ही बात निकल जाया करती थी?)

"यदि तुम उस वक़्त मुझे मिली होतीं तो क्या वैसा कोई हादसा मेरे जीवन में घटित हुआ होता? तुम्हारे मार्गदर्शन में कैसे कुछ गलत हो सकता था? तुम मुझे जीने की सही दिशा न बतातीं क्या? उफ़ ! तुम पहले क्यों नहीं मिलीं, मोहिना? मेरे जीवन की दिशा ही कुछ और होती तब."

(थैंक्स मोहित, मुझे अपने जीवन में इतना मान-सम्मान देने के लिए.)

"चलो छोड़ो पुरानी बातें। नई सुनो। जानती हो, यहाँ सब एक हैं, हर धर्म, हर जाति के लोग. हमारे देश का जो स्लोगन है, विभिन्नता में एकता, वह सही मायनों में यहाँ नज़र आता है. दीवार के इस पार आते ही हम सब भूल गए कि हमारा धर्म क्या है, जाति क्या है, भाषा क्या है, त्यौहार क्या हैं. हम सब ईद भी उसी धूमधाम से मनाते हैं, जिस धूमधाम से दिवाली। कमाल है न, मोहिना, यहाँ आते ही हम हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सब से हट कर सिर्फ इंसान रह गए."

(क्या बात है, क्या बात है मोहित, इतनी प्यारी बातें तो तुम्हें मेरे पास बैठ कर करनी चाहिए थीं, ताकि तुम्हारी बातों से उपजी ख़ुशी तुम मेरे चेहरे पर देख सकते।)

"मैंने तुम्हें बताया ही था कि यहाँ रह कर मैंने एम बी ए की पढ़ाई की है, परीक्षा में बाहर वालों से बेहतर नंबर पाए हैं. सोचो, यहाँ रह कर आदमी अपना खुद का कितना विकास कर सकता है. उसके पास वक़्त ही वक़्त है, अपना व्यक्तित्व सँवारने-निखारने के लिए. जो कुछ नहीं बनना चाहते, बाहर रह कर भी नहीं बनते और जो कुछ बनना चाहते हैं, इन विपरीत परिस्थितियों में रह कर भी बन जाते हैं. यहाँ हर चीज़ उपलब्ध है, तुम नाम लो, चीज़ हाज़िर। बढ़िया से बढ़िया, महँगी से महँगी किताबें उपलब्ध हैं, इनडोर-आउटडोर सारे गेम्स उपलब्ध हैं."

(तुम भी गज़ब हो मोहित, जेल की इतनी तारीफें? जेल आखिर जेल होती है, यदि वहाँ सब कुछ इतना ही बढ़िया है तो फिर लोग वहाँ जाने के नाम पर रोते क्यों हैं? कहीं तुम इसलिए तो ये सब नहीं लिख रहे कि हम वहाँ के तुम्हारे दुखों को जान कर दुखी न हों?)

"तुम यहाँ के खाने को लेकर परेशान थीं. तुम्हें तब भी बताया था, अब भी बता रहा हूँ, हम अच्छा खाना खाते हैं. सब बंदियों के काम बँटे हुए हैं. हम पढ़े-लिखे बंदी यहाँ ऑफिस में काम करते हैं, बिना पढ़े-लिखे सबके लिए खाना बनाते हैं तथा दूसरे साफ़-सफाई के काम करते हैं. जब बंदी ही खाना बनाते हैं तो हम सब की पसंद का ही बनाते हैं. हाँ, यहाँ भावनाओं को उत्तेजित करने वाले भोज्य-पदार्थ उपलब्ध नहीं हैं. सादा और पौष्टिक भोजन। काम ही काम और कसरत। इसीलिए देखा ना, कितना फिट रहता हूँ, अपनी उम्र से दस वर्ष कम ही लगता हूँ."

(देखा, देखा, खूब देखा।)

"कितनी मस्ती की ज़िन्दगी है यहाँ, मुफ्त का घर, घर क्या महल, बड़े-बड़े दालानों और बागीचों वाला, मुफ्त का बिजली पानी, मुफ्त के कपड़े, बीमार पड़ो तो मुफ्त का इलाज, न डॉक्टर की फ़ीस की चिंता, न अस्पताल के खर्च की. यार, हमें तो अपनी चिंता करनी ही नहीं, हमारी चिंता करती है सरकार।"

(क्या बात है, मोहित, यह तुम ही सोच सकते हो. तुमने जेल की ऐसी रंगीन तस्वीर पेश की है कि क्यों न हम सब वहीँ आकर रह लें? सारे झंझटों से मुक्त हो जाएँगे।)

"मैं जानता हूँ, तुम्हें ये सब बातें अच्छी लग रही होंगी, इसीलिए पैरोल के बाद जिस दिन से यहाँ आया हूँ, उसी दिन से थोड़ा-थोड़ा करके रोज़ लिख रहा हूँ. तुम मेरे करीब हो, बहुत करीब, मैं चाहता हूँ, तुम मेरी यहाँ की लाइफ के बारे में सब कुछ जानो, ताकि मैं भी तुम्हें तुम्हारे करीब लगूँ।"

(मेरा होना-मात्र तुम्हारी इतनी बड़ी ख़ुशी का सबब बना, मोहित? मुझे अपने पर ही गर्व हो रहा है.)

"अभी और भी लिखूँगा, रोज़ लिखूँगा, और जिस दिन कोई ऐसा संयोग बनेगा कि तुम्हें यह भेज सकूँ, भेज दूँगा। तुम भी लिखना और अपने पास ही रखना, किसी को भेज सका तो भेज कर मँगा लूँगा।"

(नहीं, नहीं, किसी को यहाँ मत भेजना, मोहित, मुझे तुम्हारे संगी-साथियों से नहीं मिलना। मुझे डर लगता है.)

"वह कौन सा गाना है.… तुमने कोई फिल्म देखी थी और मुझे वह गाना सुनाया था, हाँ, याद आया, 'तुम्ही दिन चढ़े, तुम्ही दिन ढले, तुम्ही हो बंधु, सखा तुम्ही।' 'तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो' की यह पैरोडी आजकल मेरे जीवन का सच बन गई है. हर वक़्त तुम, बस तुम ही तुम."

(तेरे जैसा यार कहाँ, कहाँ ऐसा याराना। जेल में रह कर भी तुम कितने अलग हो?)

"याद है, तुमने मुझसे कहा था, कि मैंने तुम्हे हिप्नोटाइज़ किया हुआ है, मैं तुम्हें हर जगह नज़र आता हूँ?"

(हाँ, याद है. फिर तुमने पूछा था, अगर तुम मुझे हिप्नोटाइज़ करोगी तो क्या करोगी?)

"तुमने कहा था, तुम मुझे हिप्नोटाइज़ करोगी तो मुझसे कहोगी, मोहित, अपनी आँखें बंद करो और मुझे देखो।"

(और क्या कहती, मोहित, मैं तुम्हें तुम्हारे से बड़ी भी लगती थी, लगती थी क्या, हूँ,  और तुम मुझसे ऐसी बातें भी करते थे? तो मैं और क्या कहती? मुझे लगता था, तुम मुझे कभी न देखो, सिर्फ मुझे शब्द दो और मुझसे शब्द लो. हमारी दोस्ती, हमारा प्यार सिर्फ शब्दों में हो, शब्दों में ज़िंदा रहे, वरना मेरे पास क्या था तुम्हें देने को? और तुम्हारे पास भी क्या था मुझे देने के लिए? इस मामले में हम दोनों कृपण थे. निर्धन थे. हम दोनों के पास तो बस दिल की बादशाहत थी.)

"तो मोहिना, नाओ आय हैव क्लोज़्ड माय आइज़ ऐंड आय'म सीइंग यू, मेरी आँखें बंद हैं, मोहिना, पर मैं तुम्हें देख रहा हूँ, यू आर सो ब्यूटीफुल, सो इंटेलिजेंट, सो टैलेंटेड, ऐंड यू आर माइन। तुम इतनी सुन्दर हो, तुम्हारा ह्रदय इतना सुन्दर है, और तुम सिर्फ और सिर्फ मेरी हो, मेरी दोस्त हो, यू आर अ डार्लिंग, मोहिना।"

(चुप मोहित, मैं और नहीं पढ़ रही. बस, बंद करो अपना यह प्रलाप। मैं क्या पत्थर की बनी हूँ जिस पर कोई असर नहीं होगा?)

मोहिना ने तभी गौर किया कि पत्र तो पूरा हो चुका था.

इतने लम्बे पत्र को दोबारा पढ़ने के लिए वह फिर से पहले पन्ने पर थी।

12.
हाई-प्रोफाइल केस
आओगे जब तुम साजना, अँगना फूल खिलेंगे
बरसेगा सावन झूम-झूम के, दो दिल ऐसे मिलेंगे।

सुबह के लगभग दस बजे थे. मोहिना का मोबाइल फोन बजा, उसने हेलो किया तो उधर से सुनाई पड़ा, "मैं बोल रहा हूँ."

"मैं कौन?"

'यार, अब मुझे भी नहीं पहचानोगी?"

"मोहित?"

"और नहीं तो क्या रोहित? गज़ब है यार, मुझे एक साल में ही भूल गईं?"

"मैं सोच भी नहीं सकती थी कि तुम मुझे फोन करोगे। क्या धर्मशाला से बोल रहे हो? पर फोन करने की इजाज़त कैसे मिल गई?"

"नहीं मैडम, मैं बाहर हूँ, आज़ाद हूँ, तुमसे बस तीस किलोमीटर दूर हूँ. छुट्टी पर आया हूँ. किसी राह चलते से फोन माँग कर कर रहा हूँ, ज़्यादा बात नहीं कर सकता, तुम मुझे कहीं रास्ते में लेने आ रही हो या सीधा तुम्हारे घर पहुँचूँ?"

"मैं आ रही हूँ. तुम मुझे कनॉट प्लेस में रीगल सिनेमा के सामने मिलो।"

मोहिना को ध्यान था, वह पैरोल पर आने वाला था. वह ही तो गई थी उसके मम्मी-पापा को लेकर कोर्ट, उन्हें बॉन्ड भरना था, एफ डी जमा करनी थी, और भी आदि आदि काम थे. उसके आने से पहले की सारी औपचारिकताएँ पूरी हो गई थीं  बस अब आने की तारीख तय होनी थी. और लो, वह आ गया था.

मोहिना ग्यारह बजे कनॉट प्लेस पहुँच गई. बारह बज गए. एक बज गया. दो बज गए. तीन बजने वाले थे. हद हो गई. इतना इंतज़ार? वह डर भी रही थी, कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया? कहीं पैदल तो नहीं आ रहा? पता नहीं, उसके पास बस के लिए भी पैसे होंगे या नहीं? अब क्या करूँ? तभी देखा, कैदी महोदय अपनी राष्ट्रीय वेशभूषा में टहलते हुए चले आ रहे हैं. ड्रेस पर बस नंबर की कमी थी.

"मैडम, टैक्सी से आ रहा हूँ. इतने सालों में मैं तो यही भूल गया था कि कनॉट प्लेस में रीगल किधर है. टैक्सी वाले को कनॉट प्लेस बोला और जनपथ पर उतर गया. वहाँ से पैदल मार्च…. चलो, निकलो गाड़ी से बाहर, मुझे चलाने दो."

"कमाल है, चार घंटे इंतज़ार करवाया। मैं अब जाने ही लगी थी."

"मुझे पता था, नहीं जाओगी। …. एक सिपाही अपने घर ले गया था, धर्मशाला के नज़दीक ही रहता है, कहने लगा, सर जी, चाय पीकर जाओ. तुम्हें पता नहीं है, वहाँ सब मेरी कितनी इज़्ज़त करते हैं."

पर हो तो काजल की कोठरी में ही ना? मोहिना कहने वाली थी, लेकिन कहा यह, "कमाल है, मैं यहाँ चार घंटे से खड़ी हूँ, तुम्हारी नज़रों में समय की पाबंदी कोई मायने नहीं रखती? तुम लोगों के घर जा कर मेहमाननवाज़ी करवा रहे हो?"

"समझा करो, मुझे पैसों की भी ज़रुरत थी, मेरे पास पैसे कहाँ थे? आखिर तुमसे मिलने आ रहा था, उससे दो हज़ार रुपये माँग कर लाया हूँ कि तुम्हारे पास टैक्सी करके जल्दी से जल्दी आ सकूँ और तुम्हें कम से कम किसी अच्छे ढाबे में खाना खिला सकूँ। तीन सौ पचास रुपये टैक्सी में लग गए, ये लो, बाकी तुम रख लो, मैं फ़कीर आदमी, मुझे क्या चाहिए?"

"रखो अपने पास, मुझे भीख में से भीख नहीं चाहिए।"

"खैर छोडो, बताओ, कहाँ खाना खिला रही हो?"

"कहीं नहीं, तुम्हारी इस यूनिफॉर्म में मैं तुम्हारे साथ कहीं नहीं जाने वाली।"

"लो जी, क्या खराबी है इस यूनिफॉर्म में? चिट्टा-बुर्राक कुर्ता-पायजामा है." कहते हुए उसने एक किनारे गाड़ी रोकी, गाड़ी में बैठे-बैठे कुर्ता उतार दिया। नीचे वही टीशर्ट पहनी हुई थी, जो मोहिना ने पिछली बार उसे गिफ्ट दी थी. "अब तो ठीक है? तुम्हारी पसंद के कपड़े पहने हैं."

"नहीं, नीचे पायजामा और सड़ी हुई चप्पल, मुझे तुम्हारे साथ कहीं नहीं जाना, मुझे भूख नहीं है, तुम्हें खाना है तो सड़क से कुछ खरीद कर पैटीज़, बर्गर वगैरा यहीं कार में खा लो."

"छोड़ो, खाने की किसे परवाह है? लेकिन यह ऊपरी दिखावे पर ध्यान मत दिया करो. कपड़े अच्छे हों, बंदा सूटेड-बूटेड हो, क्या रखा है इन सब बातों में?"

"जानती हूँ, इन सब बातों में कुछ नहीं रखा पर मुझे इतना भी महान नहीं दिखना कि एक फटेहाल कैदी के साथ किसी ढाबे में बैठ कर खाना खाऊँ। मुझे बंदा सूटेड-बूटेड ही चाहिए, कुर्ते, पायजामे, चप्पल में तो बिलकुल नहीं, समझे? हर जगह कैदियों की तरह उठ कर चल देते हो.… "

"बन्दे की असलियत पहचानो, मोहतरमा, उसके विचारों की कद्र करो, उसकी बुद्धिमता को देखो, इस बाहरी चमक-धमक में क्या रखा है?"

"फिर भी मोहित, कहीं अच्छी जगह खाना खाने क्या चप्पल में चले जाएँगे?"

"होटल वाला निकाल देगा क्या? छोडो, तुम नहीं समझोगी। इतने साल से चप्पल पहन रहा हूँ, जूतों की आदत ख़त्म हो गई है. शुक्र करो, तुम्हारे सामने शर्ट पहने हुए हूँ, वहाँ सारा दिन बनियान में गुज़रता है. सब मस्त-मलंग रहते हैं."

"खैर …. तुम पिछले साल कह रहे थे, बस दो महीने बाद तुम बेल पर छूट जाओगे, उसके एक महीने बाद इस इलज़ाम से भी छूट जाओगे, तुम्हें क्लीन चिट मिल जाएगी लेकिन …. "

"सोचा तो यही था, पर ….  अब नया वकील करूँगा?"

"यह वकील बढ़िया है, क्रिमिनल केसेज़ में नामी वकील है, बहुत वरिष्ठ है, तुम्हारे पापा ने इसकी फ़ीस भी इसे अग्रिम दी हुई है, वापस थोड़े ही करेगा, .… "

"फ़ीस को गोली मारो। छूट गया तो न जाने कितनी ऐसी फीसें कमा लूँगा। मैंने तुम्हें बताया नहीं था, पिछली बार जब मैं वकील से मिला था तो कह रहा था, मोहित, शुक्र करो, तुम्हें उम्र कैद हुई, तुम्हें फाँसी भी हो सकती थी. जो वकील अपने मुवक्किल से ऐसी बात कहे, उसका हौसला तोड़े, मुझे उससे अपना केस नहीं करवाना।"

"अरे? पर इसमें वकील से नाराज़ होने जैसी तो कोई बात नहीं है? मैं नहीं सोचती, इस बात के लिए तुम्हें अपना वकील बदलना चाहिए। डॉक्टर मरीज़ को बताता है कि ऑपरेशन में तुम मर भी सकते हो तो क्या उस डॉक्टर से ऑपरेशन न करवाएँ?"

"तुम नहीं समझोगी। मैंने एक नया वकील पता किया है, उसने किसी का केस लड़ा और वह जीत गया. तुम्हें उस वकील से मिलना है और फ़ीस की बात करनी है और सारा मामला पक्का करके आना है. लेडी वकील है. मुझे मालूम है, तुम इंटेलिजेंट हो, ठीक से सब बात सँभाल लोगी. मैं इस मामले में पापा को नहीं डालना चाहता, बहुत जल्दी घबरा जाते हैं. मम्मी-पापा की उम्र अब यह सब भागादौड़ी करने की नहीं है."

"मोहित, मैं भी तुम्हारे मम्मी-पापा की उम्र के आसपास ही होऊँगी। मुझ पर भी कुछ तरस खाओ."

"नो, नो, दैट वे यू आर क्वाइट यंग."

"ठीक है. उसके बारे में कुछ बताओ।"

"उसका नाम श्वेता शर्मा है, बाकी तुम नेट से ढूँढ लेना। उसका फेसबुक अकाउंट भी है. उसे फेसबुक फ्रेंड बना लेना।"

अचानक मोहिना ने देखा, वे किसी अजनबी रास्ते पर थे. "मोहित, हम कहाँ जा रहे हैं? पता भी है, यह कौन सा रास्ता है?"

"डरो मत, तुम्हें कहीं भगा के नहीं ले जाऊँगा। लॉन्ग ड्राइव के मज़े लो."

"मोहित, कुछ पता है, क्या बज रहा है? छह बजने को हैं."

"अब तो कुछ खिला दो. भूख से मर रहा हूँ."

कुछ देर के बाद कार नॉएडा के जी आई पी मॉल के पार्किंग लॉट में थी. वे उसी रेस्टोरेंट के उसी कोने में जा बैठे, जहाँ पिछले साल बैठे थे. आर्डर हमेशा की तरह वही था, एक फिश टिक्का, एक चिकन टिक्का, एक लाइमसोडा और किंगफ़िशर।

"तो तुम्हें श्वेता शर्मा से मिलना है, कल ही." उसने कहा.

"ज़रूर।"

उस दिन उन्होंने जल्दी विदा ले ली थी क्योंकि वह सुबह का धर्मशाला से निकला हुआ था और साल भर बाद अपने घर आ रहा था.

13.
आय डू, आय डू, आय डू
ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें
यह ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें।

मोहित ने घर बुलाया था. उससे कुछ और ज़रूरी बातें जान कर उसकी नई वकील से मिलने जाना था. रात भर में मोहिना ने श्वेता शर्मा की प्रोफाइल नेट पर देख ली थी. क्रिमिनल केस ज़रूर करती थी लेकिन अभी उसे बहुत सालों का अनुभव नहीं था. कुछ सालों से प्रैक्टिस कर रही थी. मोहिना को यह इतना गंभीर केस एक नई वकील को सौंपने की तुक नज़र नहीं आई तो मोहित ने कहा, "समझो, एक महिला वकील यह केस लड़ेगी तो जज पर असर पड़ेगा कि महिला के खिलाफ लड़ाई में महिला ही साथ दे रही है. सोचो, एक महिला की हत्या का मुकदमा है और महिला वकील पुरुष आरोपी की पैरवी करेगी, उसे निर्दोष सिद्ध करने के लिए बहस करेगी, इसका जज पर असर तो होगा ही ना?"

उसे मोहित की सोच तनिक भी तार्किक नहीं लगी. वकील का अनुभव और विषय पर उसकी पकड़, पहुँच और प्रौढ़ता देखोगे या उसका महिला होना? उसके मम्मी पापा, दिवाकर भाई और शीला भाभी भी मोहिना की इस राय से सहमत थे कि केस पहले वाले वकील के हाथ में ही रहे लेकिन वह किसी की मानने वाला नहीं था. दिवाकर जी ने पहले भी बताया था कि यह शुरू से ज़िद्दी है, किसी की नहीं सुनता, अपने मन की करता है. उसके मम्मी-पापा और मोहिना ने एक सुर में कहा, "हमें क्या? जैसा तुम चाहो, हम  करेंगे।" उनकी मंशा उसे खुश करने की भी रहती थी कि थोड़े दिन के लिए आया है, वैसे ही दुखी है, उसे और दुखी क्यों किया जाए?
वैसे भी उसने यह शिकायत कई बार की थी कि "तुम और मम्मी-पापा मिले हुए हो." यह इस रूप में सही था कि उसकी अनुपस्थिति में मोहिना दिवाकर दंपत्ति से जब भी मिलती, उनका यह मलाल हमेशा ज़ाहिर होता था कि अगर वह हमारी सुनता तो ऐसा न होता, अगर वह हमारा कहना मानता तो ऐसा न होता। ऐसा होता तो वैसा होता, वैसा होता तो कैसा होता, ये सब कल्पना की बातें हैं, होता वही है, जो होना होता है. फिर भी उसकी यह शिकायत वाजिब थी क्योंकि एक बार मोहिना ने न जाने किसी जोश में या उसकी भलाई के ख्याल से उन्हें यह बताया था कि मोहित बहुत ज़्यादा बियर पीता है, आप उसे रोकिए। इस बात पर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ था, "अच्छा? वह शराब पीता है?" और उसके पिता ने मोहिना के सामने ही, शायद उसे खुश करने के ख्याल से, उससे कहा था, "आज घर में बियर लेकर आओ, हम बाप-बेटे साथ बैठ कर पीएँगे।" अब वह इतना नादान तो था नहीं, जो यह न समझता कि उन तक यह बात किसने पहुँचाई? बाद में उसने मोहिना की अच्छी खबर ली थी. "तुम्हें इतनी अकल नहीं है, अपने ब्यॉय फ्रेंड की बात उसके पैरेंट्स को बताती हो? मेरे घर पैरेंट्स-टीचर मीटिंग करने आती हो?"

मोहिना ने पूछा, "मोहित, सिर्फ बेल का केस डालने के लिए वकील कितनी फीस लेगी? शायद पचास हज़ार? तो हम आधे एडवांस देने के लिए बात करें ना?"

"हाँ, तुम पच्चीस-तीस हज़ार साथ ले जाना। और मुझे वहाँ से फोन करती रहना।"

वकील से मिलने के लिए वे चारों ही गए, मोहिना, मोहित और उसके मम्मी-पापा। तय यह हुआ कि मोहित बाहर रहेगा और वे तीनो वकील के ऑफिस में जाकर उससे मिलेंगे। तय किए हुए समय पर वे श्वेता शर्मा के कार्यालय पहुँच गए.

पूरा दिन उसे केस समझाने में लग गया. फीस पूछी तो वह बोली, "डेढ़ लाख." वे दंग रह गए. मोहिना ने फटाफट मोहित को फोन पर सन्देश दिया कि "बंधुवर, यह महारानी तो डेढ़ लाख माँग रही है, बेल की अर्ज़ी लगाने के लिए." उसका मैसेज तुरंत आया, "तुम बोलो हम दो देंगे, और अगर एक सुनवाई में ही बेल मिल गई तो तीन देंगें।"

मोहिना ने मैसेज उसके पापा को दिखाया। वह फुसफुसाए, "यह तो पागल हो गया. फीस कम करने के लिए कहने की बजाय दुगनी देने को कह रहा है." मोहिना ने मोहित को मैसेज देकर एक बार फिर सोचने के लिए कहा. उसका विचित्र मैसेज आया, "मोहिना, डू यू लव मी ना? डू यू वॉन्ट मी टू कम आउट? उसे तीन के लिए 'हाँ' बोलो।" और मोहिना ने श्वेता शर्मा को तीन के लिए 'हाँ' बोल दिया कि एक लाख अग्रिम, बेल की अर्ज़ी डालने के लिए, और बाकी के दो लाख बेल ग्रांट हो जाने पर. "ठीक है, हम कल आकर आपको अग्रिम राशि दे जाएँगे। तब तक आप ये फाइलें देख लें, आपके पास छोड़े जा रहे हैं," मोहित के पिता ने कहा और वे उठ खड़े हुए.

बाहर आए तो मोहित बोला, "एडवांस अभी क्यों नहीं देकर आए?" उसके पापा बोले, "बेटा, एक बार और सोच लो."

"सोचना क्या है पापा, जब जान सूली पर लटकी हो तो पैसे क्या चीज़ हैं? मैं कहता हूँ, बस कोई मुझे वहाँ से निकाल ले, उसके बदले में कुछ भी ले ले."

वे उसकी बेचैनी को समझ रहे थे लेकिन करते क्या? नियति को उसके पक्ष में मोड़ना किसी के वश में नहीं था. सबके दिमाग में उथल-पुथल मची थी. वे घर आ गए. उसके मम्मी-पापा आराम करने अपने कमरे में चले गए तो मोहिना ने उससे कहा, "यह क्या बकवास लिखा था तुमने?"

"क्या लिखा था?"

"यही, डू यू लव मी?"

"येस, आय लव यू."

"मैं नहीं पूछ रही, यह तुमने क्यों लिखा था?"

"तुम पूछ लो ना."

"ओके, बताओ, डू यू लव मी?"

वह घुटनों पर बैठ गया, दोनों हाथ ऊपर उठाए और बोला, "लाइक इन चर्च, आय सिट ऑन माय नीज़ ऐंड से, येस, आय डू, आय डू, आय डू."

मोहिना ने उसका हाथ पकड़ कर उसे उठाते हुए कहा, "उठो ड्रामेबाज़, काफी अच्छा नाटक कर लेते हो."

अपना हाथ छुड़ा कर वह तुरंत कमरे से बाहर गया, कुछ पल बाद जब आया तो उसके हाथ में एक जलती हुई मोमबत्ती थी. उसने मोमबत्ती मेज़ पर चिपकाई और उसकी लौ पर अपनी दाहिनी हथेली रख कर बोला, "मैं इस आग की कसम खाकर कहता हूँ, आय लव यू, आय लव यू, आय लव यू।"

मोहिना ने तुरंत उसका हाथ लौ से हटा कर होठों से लगा लिया। उसे लगा, वह क्या करती? वह जैसे उसकी नियति में लिखा था.

लेकिन तीन का वादा करने के बावजूद वह केस हार गया, उसे बेल नहीं मिली।

14.
सी द कनेक्शन
आओ हुज़ूर तुमको सितारों में ले चलूँ
दिल झूम जाए ऐसी बहारों में ले चलूँ।

पिछले वर्ष मोहित के जाने के बाद मोहिना ने नेट पर मोहित का नाम सर्च किया था तो मोहित की न्यूज़ नज़र आई, वीडिओ क्लिपिंग के साथ. वह पढ़ कर दहशत में भर गई थी. इस उम्र तक आते-आते वह अनगिनत लोगों से मिली थी लेकिन उसके परिचय के दायरे में दूर-दूर तक ऐसा कोई किस्सा यानि हादसा सुनने, देखने में नहीं आया था. मरने-मारने की नौबत आए ही क्यों? आपस में नहीं बने तो अलग हो जाओ, तलाक ले लो लेकिन रिश्ते सड़क पर आ जाएँ, कोर्ट-कचहरी में फँसें, इंसान को सलाखों के पीछे ले जाएँ …. तौबा तौबा।मोहिना ने मोहित को बेनेफिट ऑफ़ डाउट यानि संदेह का लाभ दिया था वर्ना तो सवाल ही नहीं उठता था कि उसे गुनहगार समझते हुए वह उससे बात भी कर पाती। बल्कि वह उसे बहुत भोला, बहुत नादान ही लगा था. यहाँ तक कि कई बार वह इतने बचपने से बात करता था कि उसे लगता, इसका दिमाग हल्का सा हिला हुआ तो नहीं है? वह कई बार यह भी सोचती कि बिना-हिले-दिमाग का व्यक्ति क्या मुझ जैसी अपने से बड़ी महिला से दोस्ती करता, उससे भी आगे बढ़ कर प्रेम निवेदन? एक दिन मचल-मचल कर ज़िद करने लगा, "आय वांट माय रिट्ज़ प्रैम, आय वांट माय रिट्ज़ प्रैम" वह एकाएक समझी नहीं थी. वह बार-बार यही कहता रहा और मोहिना कहती रही, "क्या पागलों की तरह बोलते जा रहे हो, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा." वह दो दिन बाद समझी थी कि ओह्हो, उसकी कार रिट्ज़ थी, इसलिए वह उसे रिट्ज़ प्रैम कह रहा था. उस दिन उसने यूँ ही यह सोचा था कि यदि वह झूठ ही गुनाह कबूल कर लेता तो कमज़ोर दिमाग होने के कारण छूट सकता था. लेकिन कौन कहेगा उसे कमज़ोर दिमाग? उसका सिर्फ चलता हुआ नहीं, बल्कि भागता-दौड़ता हुआ दिमाग था, और आत्म-विश्वास इतना कि 'मुझसे ज़्यादा अक्लमंद कोई नहीं।'

मोहिना ने उसे नेट पर देखी ख़बरों के बारे में बताया तो बोला, "यह उस साल का हाई-प्रोफाइल केस था, मैं एक एम एन सी में मैनेजर, वह भारत सरकार में राजपत्रित अधिकारी, मीडिया की तो मौज हो गई थी. मीडिया ने जम कर उछाला था. महीनों मीडिया के पास यही काम रहा कि इस पर चर्चा-कुचर्चा करते रहो."

मोहिना के मस्तिष्क में यह बात घूम रही थी कि यदि यह केस इतना ही हाई-प्रोफाइल था और घटना-वर्ष में अखबारों में इसकी घनघोर चर्चा हुई थी तो यह उसकी नज़र से क्यों नहीं गुज़रा था? मोहित के परिवार से वर्षों पुरानी जान-पहचान थी, उन्होंने भी उसे घटना के कई महीने बाद ही बताया था कि ऐसा हादसा हो गया.

"न जाने क्यों, मेरी नज़रों से वह खबर नहीं गुज़री, मुझे कुछ याद नहीं…. " उसने मोहित से कहा.

"तुम भूल रही हो, जिस साल मेरे साथ यह हादसा हुआ, उस साल तुम कैंसर से जूझ रही थीं."

"ओह हाँ."

"और जिस साल मुझे कन्विक्ट घोषित किया गया, उस साल तुम्हारा ऑपरेशन हुआ था और तुम मरते-मरते बची थीं. साल क्या तारीख भी एक थी मेरे कन्विक्शन और तुम्हारे ऑपरेशन की."

"हाँ."

"जस्ट सी द कनेक्शन, मोहिना, हमारी किस्मत वहीँ से जुड़नी शुरू हो गई थी."

"सच में क्या?" मोहिना ने हँस कर कहा था.

"और जिस साल तुम्हारी पहली किताब छपी थी, उस साल मैं पैदा हुआ था. जस्ट सी द कनेक्शन।"

बहुत बार मोहित की बातें उसे बचकानी लगतीं पर उनमें रस तो था।

"ओह, यानि इस अकेली के अकेलेपन को दूर करने के लिए आप महापुरुष ने अवतार ले लिया था?"

"जस्ट सी द कनेक्शन, मोहिना, हमारा पिछले जन्म का कोई ना कोई सम्बन्ध तो ज़रूर है. पिछले जन्म में तुम मेरी कुछ तो ज़रूर रही होंगी।"

वह रस मोहिना के भीतर उतर रहा था।

"तुम्हारे मम्मी-पापा भी यही कह रहे थे, "मोहिना जी, आपके साथ तो कोई पूर्व जन्म का सम्बन्ध ही लगता है, वरना कौन होता है यूँ किसी का, जैसे आप हमारी हैं." और पता है, क्या कह रहे थे? कह रहे थे, "मोहिना जी, आप के मिलने के बाद मोहित बोलने लगा है, वरना वह तो एकदम अपने में गुम हो गया था, जैसे हँसना-बोलना ही भूल गया था, आपका यह बहुत बड़ा अहसान है हम पर."

यह सच था कि मोहित उस हादसे के बाद गुमसुम हो गया था. शुरू-शुरू में वह उससे भी ज़्यादा नहीं बोलता था, लेकिन फिर धीरे-धीरे खुला तो ऐसा खुला कि ज़ोर-ज़ोर से हँसी-ठहाके, बेसुरी आवाज़ में गाने, बेतुकी तुकबन्दियाँ, बेसिरपैर की बातें, यानि जो कुछ था, सब शोरगुल से भरा हुआ. एक बार जब उसने उसके माता-पिता को बताया कि मोहित बहुत बोलता है, सिर खा जाता है, तो उन्हें घोर आश्चर्य हुआ था. "नहीं, यह तो बोलता ही नहीं, उस हादसे के बाद से एकदम खामोश अपने कमरे में बंद रहता है. जो दे दो, वह खा लेता है, सब्ज़ी चाहे फीकी हो, नमक नहीं माँगेगा। उससे कुछ कहो, कुछ पूछो, कोई जवाब नहीं, कोई शिकायत नहीं। चलिए बढ़िया है, आपकी संगत में उसकी कुछ ग्रन्थियाँ खुली हैं, आपने उसके लिए डॉक्टर का काम किया है."

मोहिना को शब्दों की ताकत का मालूम था लेकिन इतना नहीं मालूम था कि शब्द जब अहसास बन कर ह्रदय में उतर जाते हैं तो आदमी बिना मिले, बिना एक-दूसरे को देखे, बिना एक-दूसरे से बोले दिनों, महीनों, साल उस अहसास में डूब कर गुज़ार सकता है. मोहित के शब्द धीरे-धीरे मोहिना के भीतर घुल रहे थे. मोहिना का होना मात्र मोहित को मौत से निकाल कर थोड़ा सा ज़िन्दा कर गया था. यह प्रेम शब्दों का प्रेम था. यह प्रेम अनोखा प्रेम था जिसमें न उम्र आड़े आ रही, न उम्र से उपजे सवाल।

उन दोनों की पहली मुलाक़ात में ही मोहिना ने उससे कहा था "मोहित, तुम मुझे यह कह कर बहका रहे हो कि तुम मुझसे प्रेम करते हो." मोहिना को लग रहा था, वह सचमुच बहक रही है. "मैं तुमसे उम्र में इतनी बड़ी…"

मोहित ने मोहिना से कहा था कि वह मरा हुआ था एक मौत नहीं अनेक मौतें। "तुम सिर्फ उम्र में बड़ी हो लेकिन मैं तो मरा हुआ हूँ. तुम्हें क्या पता मैं अंदर से कितना टूटा हुआ हूँ, कितना कटा-फटा हूँ. मैं ख़त्म हो चुका हूँ. और फिर मुझे तुम्हारी उम्र से क्या लेना है? मुझे तुम्हारा शरीर नहीं चाहिए। मुझे तुमसे जिस्मानी प्यार नहीं। मुझे तुम्हारी कुशाग्र बुद्धि और सहज सरल मन ने आकर्षित किया है. तुम देखने और छूने के लिए नहीं हो, तुम सिर्फ़ महसूस करने के लिए हो. ऐंड आय फ़ील फ़ॉर यू." कह कर मोहित ने मोहिना को गले से लगा लिया था.

"क्या पूर्व जन्म कुछ होता है, मोहित?" मोहिना ने पहली मुलाकात के ख्याल से वापस लौट कर पूछा था.

"पता नहीं, पर यूँ हमारा मिलना.... और यूँ हमारी दोस्ती हो जाना, कुछ तो वजह है ना, वरना भगवान हमें क्यों मिलाता? मेरा मन खिंचा चला जाता है तुम्हारी ओर. मुझे लगता है, पिछले जन्म में तुम मेरी सीता थीं और मैं तुम्हारा राम."

हाय राम. यह तुमने क्या कह दिया? मोहिना के भीतर जैसे धक से कुछ हुआ. उसे अनायास कई वर्ष पूर्व की एक बात याद आ गई. तब वे एक-दूसरे को इस तरह नहीं जानते थे, जिस तरह अब जानते हैं.

15.
वी मेट इन द लास्ट बर्थ
सौ बार जनम लेंगे, सौ बार फ़ना होंगे
ऐ जाने वफ़ा फिर भी, हम तुम न जुदा होंगे.

मोहित ने इतनी बार पिछले जन्म की बात की कि मोहिना सच में सोचने लगी कि उनका पिछले जन्म का कोई न कोई सम्बन्ध ज़रूर है. तभी उसे कुछ अद्भुत याद आया..... 

मोहिना का ज्योतिष विद्या में अटूट विश्वास था. उसने बहुत वर्ष पूर्व ज्योतिष शास्त्र पर अनेक पुस्तकें पढ़ी थीं और एक तरह से जन्मपत्री पढ़ना सीख भी गई थी. वह ग्रह-नक्षत्रों की गणना कर लेती थी और नौसिखियों की भाँति मित्रों, परिचितों को उनका भविष्य भी बता दिया करती थी. लेकिन फिर दूसरी व्यस्तताएँ बढ़ती गईं और ज्योतिष का ज्ञान घटता गया लेकिन शौक बरकरार रहा. शौक इस तरह कि जहाँ उसे कोई ज्ञानी व्यक्ति नज़र आता, वह पूछे बिना नहीं रहती। उसे अच्छा लगता, अपने बारे में जानना यानि अपने भविष्य के बारे में जानना। यहाँ तक कि एक बार एक सिद्ध ज्योतिषी का विज्ञापन देख कर यूँ ही जिज्ञासावश वह अपने पूर्व जन्म के बारे में जानने के लिए चली गई. एक धारावाहिक 'राज़ पिछले जन्म का' टीवी के किसी चैनल पर आता था. लोग बड़ी उत्सुकता से देखते थे. वह भी. जब वह अपने पिछले जन्म का राज़ जानने के लिए गई तो उसे बताया गया पिछला जन्म असल में एकदम पिछला नहीं होता, बल्कि अनेक पिछले जन्मों में से कोई एक जन्म के बारे में पता चलेगा। उस ज्योतिषी के अनुसार उसे सुला कर उसके मुँह से पिछले जन्म का राज़ नहीं उगलवाना था, जैसा कि टीवी धारावाहिक में दिखाया जा रहा था, बल्कि यह तरीका दूसरा था. ज्योतिषी महोदय कोई पत्रा निकालेंगे जो उसके पिछले किसी जन्म से सम्बंधित होगा। वह तैयार हो गई, उन्हें मोटी रकम पकड़ाई और, जैसा कि उन्होंने कहा था, दो दिन बाद उनसे मिलने के लिए पहुँच गई. उस समय तक न वह मोहित से मिली थी, न ही उसके बारे, उसके हादसे के बारे में कुछ जानती थी.

उसके पूर्व जन्म के विषय में जो बताया गया, वह एक सामान्य कहानी की तरह था, जिसका कोई प्रभाव उसके इस जीवन में नहीं था. बस यूँ ही खेल की तरह था, उसे पैसे खर्च करने थे और एक कहानी सुननी थी. विश्वास करना चाहो, करो, न करना चाहो, न करो.

उसके पूर्व जन्म की कुछ कहानी इस प्रकार थी.

उसका जन्म मध्य प्रदेश के एक अत्यन्त धनी परिवार में हुआ था. वह अपने माता-पिता की एकलौती संतान थी. उसके पिता उस जन्म में भी वही थे, जो इस जन्म में थे. अन्य कोई पूर्व जन्म का रिश्ता या व्यक्ति इस जन्म में नहीं था.

उसके तब के पिता के पास अतुल्य दौलत थी. उसके पिता राजसी प्रवृत्ति के थे. उसके उन पिता का यह स्वभाव इस जन्म के पिता से मिलता था. इस जन्म में भी पिता राजसी ठाठबाट से रहते थे.

उसके अत्यधिक अमीर होने के कारण बहुत से लड़के उससे विवाह करना चाहते थे  उन सब की दृष्टि उसके पिता के पैसे पर थी. लेकिन उसने अपनी पसंद के एक लड़के से प्रेम-विवाह किया, जिस कारण उसके पिता ने उससे नाराज़ हो कर उसे अपनी जायदाद से बेदखल कर दिया।

उसके पति ने चाहे उससे प्रेम-विवाह किया था लेकिन था वह भी पैसे का लालची। जब उसने देखा कि उसके पिता ने उसे अपनी जायदाद से बेदखल कर दिया है, तो उसने उससे वहाँ से पैसा मँगवाने की बहुत कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली। अंततः उसने उसका यानि मोहिना के पिछले जन्म में मोहिना के पति ने मोहिना का खून कर दिया।

उस युग में इतने कोर्ट-कचहरी, उम्रकैद-फाँसी जैसी चीज़ें नहीं थीं. इसलिए इससे आगे की कोई कथा नहीं थी.
उस समय मोहिना ने अपने पूर्व जन्म की यह कहानी सुनी। बस सुनी और वहीँ छोड़ दी.

अब मोहित से मिलने के बाद जब इतनी बार मोहित और उसके पिताश्री ने पिछले जन्म का राग छेड़ा, तो मोहिना को अचानक यह कहानी याद आ गई. उसने इसके सूत्र कुछ यूँ जोड़े, पिछले किसी जन्म में मेरे पति ने मेरी हत्या की थी, इस जन्म में मोहित ने अपनी पत्नी की हत्या की. पिछले जन्म में मेरे हत्यारे पति को कोई सजा नहीं हुई थी, इस जन्म में मोहित पत्नी की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास भोग रहा है. तो क्या मोहित मेरा पिछले जन्म का पति है? तो अब हत्या करने वाला साक्षात मिल गया. मैं अपने उस जन्म के हत्यारे को इस जन्म में सजा मिलते हुए देखूँ, क्या इसीलिए भगवान ने मुझे मोहित से मिलवाया है? अन्यथा ये प्रेम प्रसंग शुरू ही क्यों हुआ होता? सब क्यों एक सुर में गाते मुझे और मोहित को मिलवाने के लिए? रजत? रजत की बात दूसरी है, वह पुत्र है, उसका बुरा मानना बनता है. मोहिना सोच-सोच कर परेशान। यही वजह है जो हम मिले, मोहित ज़रूर पिछले जन्म में मेरा पति था इसीलिए ऐसी बातें करता है. चाहे ऐसी बातें करते हुए विक्षिप्त सा लगता है, पर करता तो है. पिछले जन्म में मेरी मेरे पति द्वारा हत्या ही क्यों बताई थी उस ज्योतिषी ने? बताई भी थी तो एक समान हालात वाली कहानी इस जीवन में क्यों घटी? घटी भी थी तो मेरी मुलाकात उस व्यक्ति से क्यों हुई? मुलाकात हुई भी थी तो उसने मुझसे प्रेम की बातें क्यों कीं? प्रेम की बातें की भी तो ये बातें सच-सी क्यों नहीं लग रहीं? क्यों कई बार लगता है कि मोहित अपने कामों के लिए मुझसे रिश्ता बना रहा है? सच भी हों तो इन बातों की सार्थकता क्या है?

रजत सुने तो माँ को फिर से सेंटीमेंटल फूल कह दे. कोई भरोसा नहीं कि और आगे बढ़ कर मूर्ख की उपाधि भी दे दे. आज के युग में कौन ऐसे पिछले जन्म के जंजाल में पड़ता है? लेकिन मोहित ने बार-बार पिछले जन्म का हवाला देकर मोहिना को एक बिना पढ़ी-लिखी मूर्ख औरत की श्रेणी में पहुँचा दिया था, जो मोहित के प्रेम में बावली होने के बावजूद कभी-कभी यह सोच कर खुश हो जाया करती थी कि बच्चू, तूने मुझे पिछले जन्म में मारा था, अब देखूँगी तुंझे सजा मिलते हुए.

यह भी भला कोई बात हुई, क़त्ल करने के इल्ज़ाम थे, फिर भी हम जन्म-दर-जन्म मिल रहे थे? और क्या सोचे मोहिना? मूर्ख होने के लिए कोई उम्र तय नहीं होती। आप किसी भी उम्र में मूर्ख हो सकते हैं. उसे लग रहा था, आज फिर उसे नींद की गोली की ज़रुरत पड़ेगी।

16.
ब्लडी सत्यभाषी
जयों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया

मोहिना के मन में काफ़ी दिनों से एक बात कुलबुला रही थी. समझ नहीं पा रही, उसे मोहित के साथ कैसे बाँटे? किसी ने किसी के बारे में एक सच्ची घटना बताई थी, जिसने मोहिना को आतंकित तो किया ही था, साथ ही भाग्य पर यह विश्वास करने के लिए भी विवश किया था कि चमत्कार होते हैं, कइयों के जीवन में चमत्कार होते हैं. जब किसी की रक्षा होनी होती है तो ऐसे होती है. इस कहानी ने मोहिना के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया। यदि वह यह कथा मोहित को बताए तो उसे कितना दुःख होगा? उसे अपने भाग्य पर कितना अफ़सोस होगा कि उस जैसी परिस्थितियों से गुज़रे एक व्यक्ति की रक्षा के लिए कैसा संयोग बना. संक्षेप में यह कहानी सिर्फ इतनी थी कि……

उन्होंने पत्नी के अवैध संबंध के कारण पत्नी की चुन्नी से गला घोट कर हत्या की, अपने चार वर्ष के बेटे के सामने। पुलिस के आगे एवं कोर्ट में इस बात से इंकार किया। उनके अनुसार उनके वकील ने उन्हें समझाया था, 'जब तक केस डिसाइड नहीं हो जाता, तुम मंदिर में भगवान से भी कुछ नहीं कहोगे।' छह महीने जेल में रहे. पोस्ट मॉर्टम की रिपोर्ट में डॉक्टर्स द्वारा इसे स्वाभाविक मौत बताया गया, जिसका उन्हें खुद नहीं मालूम कि ऐसा कैसे हुआ? जेल से बाहर आने के बाद छह वर्ष तक मुकदमा चला जिसमे वे निर्दोष करार दे कर बरी कर दिए गए. वे एक सरकारी नौकरी में थे, जिसमे जेल की छह माह की अवधि में सस्पेंड रहे और बाद में रीइंस्टेट कर लिए गए. बाद में उन्होंने अनेक अड़चनों के बाद अखबारी विज्ञापन के ज़रिये दूसरा विवाह किया। हर जगह सच बता कर ही अपने रिश्ते के लिए बात की. आज वे एक सुखी गृहस्थ हैं और एक और बेटे के पिता। आज उनका पहला पुत्र लगभग 18-20 वर्ष का होगा, शायद इंजीनियरिंग जैसा कुछ पढ़ रहा है

उन्होंने कोर्ट के सिवा कहीं झूठ नहीं बोला। 
मोहिना जैसी अनजान तक के सम्मुख अपना सच कबूला। वे गुनाह-मुक्त ठहराए गए, फिर से पत्नी और घर का सुख मिला, सरकारी नौकरी बरकरार रही. लेकिन जिस चीज़ से वे आज वंचित हैं, वह है लोगों की मित्रता, अपनापन, प्यार, विश्वास। आज उनके नए-पुराने कोई मित्र नहीं हैं, सब उनसे डरते और दूर रहते हैं, कार्यालय में भी.

मोहिना का मन हुआ कि वह चमत्कारों पर विश्वास करे। यह बात दूसरी है कि इस कहानी के सच्चे नायक के सच बोलने की सराहना करने के बाजजूद वह खुद ही नहीं समझ पाई कि उनके उस कृत्य की सराहना कैसे करे जिसके लिए उन्हें कोई मलाल नहीं है. उनके अनुसार, 'नहीं कोई अपराधबोध नहीं, कोई पछतावा नहीं। जरा सा भी नहीं।'

उनका कहना था, 'किसी की क्या प्रतिक्रिया रहती है, इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि लोग अपनी जगह बैठ कर सोचते हैं. जाहिर है, कुछ लोग इन्सानियत जताते हुए गुजर जाने वाले के प्रति सहानुभूति जतायेंगे । हमारी जगह आकर सोचने की जहमत शायद नहीं उठायेंगे। मुझे उस दिन फर्क पड़ेगा जब कोई मेरे हालात से गुज़रा हुआ व्यक्ति यह कहेगा कि यह आपने गलत किया।'
मोहिना को लगा था कि उनकी ज़र्रानवाज़ी थी कि उन्होंने मोहिना से कहा, 'दीदी, आप संशय में न रहें। मुझे यकीन है आप पर और आप यकीन करें मुझ पर। आप बेफिक्र होकर कहानी लिखें। पूरी सृजनात्मक स्वतंत्रता लें। जरूरी बदलाव भी करें। अब कथानक आपका है। अब यह कहानी आपकी हुई, आप इसे जिस मर्ज़ी दृष्टिकोण से लिखें। पाठक इसके बारे में जो मर्ज़ी सोचें, मुझे फर्क नहीं पड़ता।'

मोहिना ने मोहित को यह घटना सुनाई तो उसकी प्रतिक्रिया विचित्र थी, "ब्लडी सत्यभाषी। अरे अगर इतना ही सत्यभाषी था तो कोर्ट में बोलता ना सच. बड़ा आया सत्य का पुजारी।"

धन्य हो मोहित तुम, मोहिना ने सोचा था. मोहित से एक सहृदय व्यक्ति जैसी प्रतिक्रिया पाना कठिन था.

17.
आय'म वेल क्वालिफाइड
काजल की कोठरी में कैसो ही सयानो जाय
एक लीक काजल की लागि है पे लागि है.

हर गुनाह करने वाला सोचता है कि उसने इतनी सफाई और चालाकी से इस काण्ड को अंजाम दिया है कि वह कभी पकड़ा ही नहीं जा सकता। नहीं, नहीं, ये वे सोंचते हैं जो पेशेवर गुनहगार होते हैं, जो योजनाबद्ध तरीके से गुनाह करते हैं. लेकिन जिनके हाथों से क्रोध या किसी अन्य जुनून में गुनाह हो जाता है, वे गुनाह के बाद सोचते हैं कि कैसे, किस तरीके से इसे छुपाया जाए. कई ऐसे भले भी होते हैं जो खुद पुलिस में जाकर आत्मसमर्पण कर देते हैं, अपना गुनाह कबूल कर लेते हैं, यह सोच कर कि जो होगा, देखा जाएगा। जब गुनाह किया है तो सजा भी भुगत लेंगे। लेकिन ज़्यादातर गुनहगारों में गुनाह को कबूल करने की नैतिकता नहीं होती। वे सोचते हैं, हमारे मना करने से पुलिस मान जाएगी और हम बच जाएँगे। सच वे तब बोलते हैं, जब पुलिस उन्हें रिमांड पर लेती है.

रिमांड का अर्थ आधिकारिक रूप से तो मुजरिम की पिटाई करना नहीं होता बल्कि सख्ती से पूछताछ करना होता है, लेकिन व्यवहारिक अर्थों में रिमांड का अर्थ पुलिस द्वारा की गई पिटाई ही होता है. पिटाई के बिना ज़्यादातर मुजरिम सच नहीं उगलते, पिटाई का डर उनसे सच उगलवाने में कारगर होता है. लेकिन पुलिस के सामने उगला हुआ सच बाद में मुजरिम द्वारा नकार दिया जाता है, यह कह कर कि पुलिस ने दबाव देकर हमसे ऐसा कहलवाया है.

मोहित के साथ भी ऐसा ही हुआ था. उसने पुलिस रिमांड में अपनी पत्नी की हत्या करने की बात कबूली लेकिन कोर्ट में मुकर गया था. शायद उसने सच में हत्या नहीं की हो, पुलिस की पिटाई के डर से ही कबूल किया हो. जो भी हो, जब एक बार मुजरिम का ठप्पा लग गया तो लग गया. और उस पर सजा उम्र कैद की. कोई चाहे इस ठप्पे को गलत साबित करके इलज़ाम से बरी भी हो जाए लेकिन उसकी फोटो ताउम्र एक कैदी की तरह जेलखाने में रहती है, उसका, जिसे कहते हैं ना कच्चा चिट्ठा, ताउम्र पुलिस रिकॉर्ड में रहता है. यह मोहित ने ही मोहिना को बताया था. मोहिना ने सोचा था, कैसे-कैसे मुजरिमों के बीच मोहित रहता होगा, दिमाग का बहकाना अवश्यम्भावी है.

मोहित ने बताया था, सारे कैदी सालों-साल किसी औरत को देखे बिना रहते हैं, औरत के दर्शन को तरस जाते हैं, इसलिए पुलिस की गाड़ी में कोर्ट ले जाते समय रास्ते में कोई लड़की या औरत दिख जाए तो सीटियों और आवाज़कशी की बौछार शुरू हो जाती है. ओह तो यह कारण था मोहित के मोहिना की ओर आकर्षित होने का? लम्बे अरसे तक उसने भी कोई औरत नहीं देखी थी, इसलिए पहली औरत देखी तो महाराज उसी पर लुट गए? मोहिना ने सोचा तो उसे मोहित के प्रति घिन सी महसूस हुई. अनपढ़ कैदियों को औरत को लुभाने के वे अवसर नहीं मिलते ना जो मोहित को मिले।

उसने मोहित से कहा था कि जेलों में कैदियों के चरित्र को ऊँचा उठाने के लिए, उनमें अपने गुनाह को स्वीकार करने जैसा प्रायश्चित पैदा करने के लिए तथा सज़ा की अवधि पूरी होने पर बाहर की दुनिया में आकर एक अच्छे नागरिक बनने का प्रण लेने के लिए कुछ शिक्षाप्रद कक्षाएँ चलाने की अत्यंत आवश्यकता है. उनमें आत्मज्ञान जगाना, गुनाह का अहसास एवं प्रायश्चित की भावना जगाना बेहद ज़रूरी है, अन्यथा वे दोबारा या बार-बार गुनाह को अंजाम दे सकते हैं. मोहित ने इस बात को ऐसे परे फेंका था जैसे यह फ़िज़ूल की बात हो. उसका कहना था कि वह क्या, उसका जेलर भी बहुत खुले दिमाग का है, वह ऐसी दकियानूसी बातों में विश्वास नहीं करता। मोहिना को हैरानी हुई थी, कैदियों को ज्ञान की बातें सिखाना दकियानूसी होना है? और फिर, जेलर महोदय को अपने व्यक्तिगत गलत विचार जेल व्यवस्था पर थोपने की क्या जरूरत है? काश ! मोहिना के पास ऐसे अधिकार होते कि वह ऐसे जेलर का तबादला करा सकती। उसे जेल में नहीं, किसी पुलिस स्टेशन में भेजती। मोहिना भी क्या-क्या बेतुकी बातें सोचती है.

जेल के भीतर बैठ कर भी अपराधी हर तरह के अपराध करते हैं. पैसों से कोई भी चीज़ खरीदी जा सकती है. जेलों के छोटे-मोटे कर्मचारी ही खरीद लिए जाते हैं जो कैदियों के लिए मादक पदार्थ तक उपलब्ध करवाते हैं. इस गन्दगी से कैसे बचा जाए? मोहिना ने मोहित से पूछा था तो उसका उत्तर था, "यार, तुम हम जैसों को जीने मत दो. एक तो किस्मत ने मारा, दूसरे तुम मार दो."

"गज़ब है मोहित, तुम्हारी सोच गज़ब है, और आज मैं यह गज़ब तारीफ़ के लिए नहीं कह रही. कम से कम सही और गलत का भेद तो समझो। अच्छाई और बुराई में फर्क करना तो सीखो।"

"बस बस, अपना यह ज्ञान अपने पास रखो."

"क्या तुम्हारी जेल में सद्साहित्य उपलब्ध है?" मोहिना ने एक बार यूँ ही पूछ लिया था.

"सद्साहित्य मतलब? क्या हनुमान चालीसा? रामायण-गीता? मैडम, हमारी जेल में क्या नहीं है? पर पढ़ना किसे आता है वहाँ?"

"तुम्हें आता है."

"तुम्हारा मतलब, मैं ऐसी किताबें पढ़ूँगा?"

"तुम महापुरुषों की जीवनियाँ पढ़ो. दर्शन शास्त्र और नीति शास्त्र पर अच्छी किताबें पढ़ सकते हो."

"मैडम, मैं काफी पढ़ा-लिखा हूँ, आय'म वेल क्वालिफाइड। मुझे इन चीज़ों की जरूरत नहीं है. फिर मैंने यहाँ मुजरिमों की जीवनियाँ पढ़-पढ़ कर खासा ज्ञान इकट्ठा कर लिया है. अपने ये उपदेश किसी और को दो. मैं आपके मशवरों के लिए उपयुक्त सुपात्र नहीं हूँ."

"कैसे बोल रहे हो? मैडम मैडम क्यों कह रहे हो? मैं तुम्हारे भले के लिए कह रही हूँ वरना मुझे क्या?"

"अरेरेरे, नाराज़ हो गईं? सच कहूँ मोहिना, तुम्हें मेरी योग्यता का अंदाज़ा ही नहीं है. तुम अपने मोहित की बुद्धि को बहुत कम आंकती हो. मैं वो हूँ जो स्याह को सफ़ेद कर दूँ और सफ़ेद को स्याह। समझीं कुछ?"

उस दिन मोहिना को मोहित से डर लगा था.

"वहाँ रह कर ऐसी-ऐसी कलाएँ सीख गया हूँ कि आदमी को गायब कर दूँ और किसी को सुराग न मिले," मोहित कह रहा था, "एक राज़ की बात बताऊँ? अभी तक मुझे उम्मीद है कि मैं जल्दी ही जेल से छूट जाऊँगा। लेकिन अगर मैं नहीं छूटा, यानि जिस दिन मुझे यकीन हो जाएगा कि मेरी रिहाई असंभव है, उस दिन मैं सरकार को असली गुंडा बन कर दिखा दूँगा। मोहिना, मेरे अंदर आग भर गई है. मैं योग्य हूँ, पढ़ा-लिखा हूँ, बाहर आकर अपनी योग्यता सिद्ध कर सकता हूँ, लाखों कमा सकता हूँ, मैं कुछ भी कर सकता हूँ, फिर सरकार ने मुझे अंदर बंद क्यों किया हुआ है? ठीक है, मुझसे गलती हुई लेकिन मेरी योग्यता देख कर क्या मुझे माफ़ नहीं किया जा सकता?"

"ऐसे तो मोहित, हर योग्य व्यक्ति गुनाह करे और बिना सजा काटे छूट जाए?"

"यार, सजा काट तो ली, और क्या किसी की जान लोगे? सात साल हो गए हैं वहाँ सड़ते हुए, कुछ तो रहम करो. और मोहिना, तुम तो ऐसे मत सोचो, तुम तो मेरा साथ दो."

मोहिना और डर गई थी पर उसने आगे कुछ नहीं कहा. उसने सिर्फ यह सोचा कि क्यों ना उम्र-कैदियों को पैरोल पर छोड़ने की व्यवस्था बंद हो जाए? जब हर साल उन्हें चौदह दिन के लिए, सिर्फ चौदह दिन के लिए ही सही, छुट्टी पर अपने घर आना है तो उम्र-कैद का मतलब ही क्या रह जाता है? जब ये चौदह दिन के लिए आते हैं तो इन्हें अपने घर में न कोई काम होता है, न इनका कोई मित्र आदि होता है जिससे ये बतिया सकें। अपने गुनहगार होने का अहसास भी इन्हें सबसे मुँह छुपा कर कमरे में बंद रहने को विवश करता है. इनका आना वैसे ही होता है जैसे कोई छात्र छुट्टियों में हॉस्टल से घर आता है, जिसके पास दिल बहलाने के लिए कुछ नहीं होता। फिर इनका फितूरी दिमाग कोई भी गुल खिला सकता है. इनके मन में विश्वास रहता है कि ये कुछ भी कर लें, गलत ही चाहे, इनका कोई क्या बिगाड़ सकता है? दूसरा भी गुनाह करेंगे तो भी जेल ही मिलेगी ना? तो ये तो वैसे भी जेल में ही हैं. ये तो पहले ही सजा के चरम पर हैं.

मोहिना ने और आगे की भी सोची, वह यह कि कई साल जेल में रहते-रहते ये जेल के जीवन के अभ्यस्त हो जाते हैं और धीरे-धीरे इस समाज के लिए अयोग्य हो जाते हैं. सालों बाद जब ये वापस इस समाज में लौटते हैं तो इन्हें वह आदर-सम्मान नहीं मिलता, जिसकी आवश्यकता और इच्छा एक आम नागरिक को होती है. इसलिए इनका हमेशा के लिए जेल में रहना ऐसा ही होगा जैसे किसी दूसरे शहर में रहना। और इसमें कोई बुराई भी नहीं है. उम्र-कैद काट रहे अपराधियों का यदि पुनर्वास भी करना है तो इन्हें जेल में रख कर ही किया जाए. यदि जेलों में मानवीय व्यवहार हो और तमाम सुख सुविधाएँ हों तो आदमी  ज़िन्दगी आराम से काट सकता है, इस प्रकार उसे बाहरी दुनिया में आकर लोगों की घृणा का सामना भी नहीं करना पड़ेगा और बाहरी दुनिया के लोग भी एक अपराधी के साए से दूर रह सकेंगे। क्योंकि यह दाग धुलता नहीं है.

मोहिना ने ऐसा क्यों सोचा, उसे खुद नहीं पता. बस वह उस दिन मोहित के बोलने के अंदाज़ से बेहद डर गई थी. उसने मोहित में एक खूनी के दर्शन कर लिए थे. उसने जो मोहित को संदेह का लाभ दिया था, वह छिन्न-भिन्न हो गया था.

18.
द लास्ट हग
मोहब्बत करने वाले कम न होंगे
तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे।

"वकीलों के दिमाग नहीं होता। इनसे पाला पड़े तो इन्हें बस काम-चलाऊ समझो। और जज .... इनके मूड का कोई भरोसा नहीं, घर से लड़ कर आएँगे और किसी को भी कैद सुना देंगे। सारे निर्णय इनके मूड पर निर्भर करते हैं. और पत्रकार यानि जर्नलिस्ट? उनकी तो पूछो ही नहीं, गधे होते हैं, अखबार में कुछ भी अंट-शंट लिखते रहते हैं. बस, इनकी लिखी कहानी लोगों को पसंद आए, इससे ज़्यादा बड़ा इनका मकसद नहीं होता। और ये ऊँची पोस्टों पर बैठे लोग? सी ई ओ ? घमंडी होते हैं, किसी के काम नहीं आते, होंगे कहीं के सी ई ओ, डायरेक्टर, हमें क्या? और तुम बाहर बैठे लोग .… शुद्ध हो न बड़े? तुम सब क्रिमिनल हो. बस बाहर हो, क्या इसीलिए शुद्ध हो? क्या बाहर अशुद्ध लोग नहीं होते? अरे, एक दीवार का अंतर है, हम दीवार के उस तरफ, तुम इस तरफ. और तुम लेखक? खबरदार जो कुछ अनाप-शनाप लिखा तो. प्रेम कविताएँ लिखती रहो, उसमें तुम माहिर हो, बाकी जीवन का तुम्हें क्या पता? अरे, किसी भी लेखक को क्या पता? जीवन क्या होता है, यह कोई हमसे पूछे।"

वह ठां ठां गोलियाँ दाग रहा था, मोहिना छलनी हुई जा रही थी. एक दीवार का अंतर ....? अरे, तुम्हें दीवार के उस पार भेजा ही क्यों गया, इस पर गौर करो. वह सारी दुनिया से नाराज़ था. दुनिया की प्रतिनिधि के रूप में मोहिना उसके सम्मुख बैठी थी. आज उसके क्रोध को झेलना ही होगा, क्योंकि मोहिना इस दुनिया की है. यह दुनिया, जिसके लिए वह कहा करता था, मिल भी जाए तो क्या है?

यह दूसरा लाइमसोडा मोहिना के सामने रखा था. बूँद-बूँद सिप करते हुए मोहिना को उसे उस आखिरी घड़ी तक रखना था, जब तक वे उस रेस्टोरेंट से बाहर न आ जाएँ। आखिर कितने लाइमसोडा पीऊँगी मैं? उसकी बातें तो कभी ख़त्म नहीं होंगी। मोहिना सोच रही थी.

"और हाँ मोहिना, तुमने अपना ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया या नहीं?"

"यह ड्राइविंग लाइसेंस बीच में कहाँ से आ गया?"

"नहीं नहीं, पहले बताओ, बनवाया या नहीं? जबसे खोया है, बिना लाइसेंस के कार चला रही हो. तुम बताओ, तुम क्रिमिनल हो या नहीं?"

"बनवा लिया, पर तुम तो हद कर रहे हो मोहित. ड्राइविंग लाइसेंस न होना अपराध नहीं, गलती है, जिसकी सजा जेल नहीं, जुरमाना है."

"है तो क्राइम ही ना? यहाँ कितने लोग हैं जो खुलेआम क्राइम कर रहे हैं, पर बाहर हैं, इसीलिए शरीफ माने जाते हैं. हम अंदर कितनी भी शराफत से रह रहे हों, बदमाश माने जाते हैं."

मोहिना के मन में अनेकों तर्क उभर रहे थे लेकिन उसके उस भयंकर मूड को देखते हुए कुछ कहने का साहस नहीं हो रहा था. वही बोले जा रहा था, निष्बाधित। वह एकमुश्त नौ-दस घंटे बिना रुके लगातार आराम से बोल सकता था. जहाँ यह मोहिना के लिए घोर आश्चर्य का विषय था, वहीँ आकर्षण का भी. कमाल का स्टेमिना था उसमें।

"जानती हो, फलाँ बेचारा अंदर क्यों आया? एक लड़की को अगवा करने के इलज़ाम में. वह उस लड़की से प्रेम करता था. अब प्रेम करना कोई गुनाह है क्या? उस लड़की का भला ही कर रहा था, लड़की पढ़ना चाहती थी, उसके माता-पिता पढ़ाई के सख्त खिलाफ थे, वह बेचारा तो उसे पढ़ा रहा था, उसे कॉलेज में भर्ती कराया, देश का भला ही कर रहा था, एक इंसान को शिक्षित बना रहा था, बस जी, पकड़ लिया उसे और दीवार के उस तरफ डाल दिया।"

क्या बात है, क्या जस्टिफिकेशन है, क्या दलील है. पर यह मोहिना से बोला न गया.

"और जानती हो, उसके पकडे जाने के बाद उस लड़की ने क्या किया? उसके खिलाफ बयान दिया, अपने घरवालों के साथ हो गई. लड़कियाँ सिंसीयर होती ही नहीं हैं."

"चलो छोड़ो, अपने बारे में बताओ, और क्या-क्या अच्छे काम किए अपने साथियों के लिए, जेल में?"

"मैंने तुमसे कितनी बार कहा है, 'जेल' शब्द से मुझे घिन आती है, मत कहा करो, 'धर्मशाला' कहो. मैं धर्मशाला में हूँ जिसे आम मूर्ख लोग जेल कहते है."

"ठीक है मोहित, वहाँ की अपनी बातें बताओ।"

"मेरी बात छोड़ो, मैं तो वहाँ अच्छे काम कर ही रहा हूँ पर यह सरकार क्या कर रही है? हम जैसे अपने विषय के विशेषज्ञों को अंदर बंद करके अपना ही नुक्सान कर रही है. सोचो, हम बाहर रह कर देश के कितने काम आ सकते हैं?"

"सही कह रहे हो."

"पिछली बार उसके बारे में बताया था ना? वही जिसकी पत्नी ने आत्महत्या की थी, और फँस वह गया था, दहेज़ के नाम पर, आत्महत्या के लिए उकसाने के जुर्म में?"

"हाँ, हाँ, याद है. क्या हुआ उसे?"

"बेचारा सड़ रहा है वहीँ। तुम ही बताओ, इस दुनिया में कितने लोग दुखी रहते हैं, हर आदमी तो आत्महत्या नहीं करता? कोई एकाध आत्महत्या करता है, मतलब, जो दुःख सहन नहीं कर पाया, तो दोष तो उसी में हुआ ना?"

गज़ब है, यह सोच नकारात्मक है, पर उससे कहे कौन? मोहिना चुप, वह अकेला वाचाल। सच पूछो तो वह ज़्यादातर एकालाप करता है, संवाद उसके बस का नहीं। वह दूसरों की क्यों सुने? अपनी सुनाएगा। चलो, सुन लेते हैं उसे. पूरा वर्ष वह भी तो अपने भीतर यह लावा जमा करके रखता है. उसे एक अच्छा श्रोता चाहिए, वह मोहिना है ना.

"क्या तुम दुखी नहीं रहीं? क्या तुम्हें जीवन में दुःख नहीं मिले? तुमने कभी सोची आत्महत्या करने की? नहीं ना? हो सकता है, सोचा हो, पर की तो नहीं? हर आदमी आत्महत्या नहीं करता, आदमी डरपोक होता है, भीतर से मज़बूत भी हो सकता है, मरने की इच्छा नहीं भी हो सकती। जो भी हो, कारण तो खुद में ही होता है, बेचारा पति कहाँ से ज़िम्मेदार हो गया?"

"यह सोच नकारात्मक है, मोहित .... "

"नहीं मैडम, यही सोच सही है."

वह और भी किस्से सुनाता रहा और मोहिना खामोश सुनती रही. उससे बहस करके कौन मुसीबत मोल ले? बहस में वह हारने वाला तो है नहीं। उसके पास हर बात का जवाब है. वह हर साल पैरोल पर आता है तो पिछले साल से ज़्यादा तेज़-तर्रार होता है. पता नहीं, मोहिना को क्यों अपना मित्र समझता है जबकि वह दिल से उसकी अनेक बातों से सहमत नहीं होती। एक-दूसरे की बात से सहमति मित्रता की पहली शर्त है. मोहिना को लगता है, वह इतने साल वहाँ रह कर भी कुछ नहीं सीखा। उसकी हर सोच नकारात्मक होती है. इस बार आया है तो अपराध-पर-अपराध को सपोर्ट किए जा रहा है.

वे एक रेस्टोबार के कोने में बैठे थे. वह चार बियर पी चूका था और पाँचवीं का आर्डर किया था. मोहिना दूसरे लाइमसोडा पर टिकी हुई थी. उनके सामने रखी प्लेटें खाली हुईं तो मोहित ने वेटर को दोबारा फिश टिक्का और चिकन टिक्का लाने का आदेश दिया। खाना क्या खाएँगे, जब ये सब इतना अटरम-पटरम खा लेंगे तो? वैसे भी खाने का तो बस बहाना था, मकसद तो बातें करना था.

मोहिना को याद आया, उन दोनों का पहली बार का वह बाहर का खाना। असल में खाना तो याद नहीं, हाँ छोड़ना ज़रूर याद है. "यह ठंडा हो गया, दूसरा ले आओ. यह भी ठंडा …. छोडो, दूसरा लाओ." अजी, जब हम बातों में लगे रहेंगे और खाना मेज़ पर यूँ ही पड़ा रहेगा तो क्या ठंडा नहीं होगा? लम्बा-चौड़ा बिल पे करके बाहर निकले तो मोहिना ने कहा था, "क्या मोहित, जितना खाया नहीं, उतना फेंका।"

उसके पास जवाब हाज़िर था, "पहली डेट पर जाओ तो लड़की को इम्प्रेस करने के लिए इतना छोड़ना पड़ता है."

"ओए, कौन लड़की? पागल तो नहीं हुआ? और सुन, बिल भी मैं पे करूँ और इम्प्रेस भी मैं होऊँ?"

"चिंता न कर, कुड़िये, सब मेरे नाम पर लिखती जा. जब बाहर आऊँगा तो कमा कर सारा लौटा दूँगा।"

उसके पास बातें बहुत होती थीं और गज़ब की होती थीं. पर आज सिस्टम के प्रति कुछ ज़्यादा ही गुस्से में था और कुछ उदास भी. कुछ पल रुक कर ठहरी हुई आवाज़ में बोला, "मोहिना, मेरे दिमाग में केवल एक ही बात है. मैं वहाँ से छूटना चाहता हूँ.... मुझे वहाँ से बाहर निकाल लो."

"कैसे? मैं तुम्हें कैसे बाहर निकाल सकती हूँ?"

"तुम सब कुछ कर सकती हो. अपने भगवान को मनाओ यार, वह तुम्हारी सुनता है," वह कह रहा था. तभी उसे जैसे अचानक कुछ याद आया हो, तपाक से बोला, "तुमने बताया था ना, मेरा जज तुम्हारा परिचित है?"

जब उसने अपने जज का नाम बताया था पी. आर. शर्मा, तो मोहिना के मस्तिष्क में एक धुँधली सी छाया उभरी थी. दिमाग पर बहुत ज़ोर डालने पर उसे याद आया था कि वह शायद इस नाम के जज को जानती है. हाँ, इस सुनवाई में भी उसका जज यही होने वाला था. मोहिना ने उससे कहा, "हाँ, आय नो हिम. पर मैं केवल उनसे एक बार मिली हूँ, सालों पहले। वी हैड ड्रिंक्स टुगेदर."

वह जैसे उछल पड़ा, 'यार, तुम तो धाँसू निकलीं। जल्दी बताओ, क्या हुआ था?"

"बरसों पुरानी बात है. वंस अपॉन अ टाइम, व्हेन आय वॉज़ यंग.… "

"यार, क्यों भाव खा रही हो? अब मैं यह कहने वाला नहीं कि यू आर स्टिल यंग. सच बोलता हूँ. यू आर गेटिंग ओल्ड।"

"सत्यवादी, तुम्हारा सत्यानाश हो."

उनके बीच में यह समझ अच्छी थी कि जो चाहे तुम बोल दो, हम बुरा नहीं मानेंगे, जो चाहे हम बोल दें, तुम बुरा नहीं मानोगे। हम तुम्हारी किसी बात को गलत नहीं समझेंगे, तुम हमारी किसी बात को गलत नहीं समझोगे।

"अच्छा, अब गालियाँ बाद में सुनाना, पहले पूरी बात जल्दी बताओ।"

"पहले थोड़ा मक्खन लगाओ।"

"यह सच है, उम्र के हिसाब से जो गरिमा होनी चाहिए, वह तुम में नहीं है."

"यह मक्खन है? यह तुम मुझ पर कीचड़ उछाल रहे हो."

"पूरा तो सुनो यार. दिल से, कसम से, तुम्हारी बातों से कोई तुम्हारी उम्र का अंदाज़ा नहीं सकता। तुम उम्र-चोर हो. इस उम्र में भी इतनी ज़िंदादिली? मैं तो फ़िदा हूँ तुम पर."

"मुझ पर? फ़िदा? तुम?"

"नहीं, नहीं, तुम पर फ़िदा हो के मरना है मुझे? एक तो पहले ही मरा हुआ हूँ. मेरा मतलब, फ़िदा हूँ तुम्हारी इस बात पर कि तुम मुझसे बीस से ज़्यादा साल बड़ी हो कर भी मुझसे ज़्यादा यंग हो. तुम्हारी उम्र नहीं, तुम्हारा यूथ तुम्हारी रग-रग में समाया हुआ है. रेयर कॉम्बिनेशन।"

"ओहोहो, मेरा बच्चा, इतना काफी है. अब सुनो। मेरी एक सहेली का ब्वॉय फ्रेंड हमें उनसे मिलवाने ले गया था कि आओ, तुम्हें एक जज से मिलवाते हैं. मैंने और मेरी सहेली ने भी मज़ाक में कह दिया था, जरूर। कभी हमने किसी का खून-वून कर दिया, कहीं फँस-फँसा गए तो काम आएगा। लो देखो, अब तुम्हारे ही लिए काम आएगा। मुँह की निकली बात सच हो गई."

"आगे?"

"बस हम उनके घर गए. उन जज साहब की बीवी भी थी पर उसने ड्रिंक नहीं ली. हमने जम कर पी."

"कहानियाँ न सुनाओ, मतलब की बात बताओ, उनसे क्या बातें हुई थी?'

"ठहरो भी, बोलने तो दो.…  क्या बातें हुईं, इतना तो याद नहीं, हाँ, बाहर गाड़ी तक वे पति-पत्नी हमें छोड़ने आए थे तो मैंने लड़खड़ाती ज़ुबान में कहा था, "आपने अपने नाम का फुल फॉर्म नहीं बताया, पी. आर. यानि प्यारे मोहन जी?" मेरी सहेली तपाक से बोली थी, "मोहिना है ना, तो आपको मोहन बना के रहेगी, वह भी 'प्यारे'। पी हुई है न." सबने एक ठहाका लगाया था. यार, समझा करो, वे मस्ती के दिन थे. तब प्यारे मोहन जी ने कहा था, "यू आर ग्रेट मोहिना, हम आपको और आपकी कविताओं को याद रखेंगे।" शायद मैंने कोई कविता या शेरो शायरी सुनाई होगी. बस इतनी सी बात.हुई थी."

"ग्रेट। जानेमन, यह इतनी सी बात नहीं है, इट्स अ बिग थिंग। बस 'प्यारे मोहन' से तुम उन्हें जरूर याद आ जाओगी। अब अपने काम पर लग जाओ. नेट से उनका फोन नंबर ढूँढो और फोन मिलाओ। तुम्हारे होम वर्क का टाइम शुरू होता है अब."

मोहिना ने उसे 'हाँ' तो कह दिया, लेकिन वह ठहरी आदर्शवादी, वह कोई सिफारिशी चिट्ठी लेकर कहीं नहीं जाने वाली थी। वह अपने कामों में भी नियति पर भरोसा करती थी. ज़बरदस्ती नियति को अपने पक्ष में मोड़ने के टोटके वह नहीं करती। बोये पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से खाये, वह इस तरह की कहावतों में जीती थी. पर तुम चिंता मत करो मोहित, निश्चय ही मैं भगवान को मनाऊँगी। तुम्हारे जैसा प्रतिभावान, बुद्धिमान बाहर आ कर इस देश का हित ही करेगा, मोहिना ने मन ही मन सोचा.

"चलो, अब जल्दी करो," मोहिना ने कहा तो वह गिलास की ओर संकेत करके बोला, "ठहरो भी, क्या इसे बीच में छोड़ दूँ?"

"नहीं, पर जल्दी करो."

वे रेस्टोरेंट से बाहर आ कर कार में बैठ गए. हमेशा की तरह मोहिना की कार का स्टीयरिंग व्हील मोहित ने सँभाला। उसने चाहे आठ बीअर पी हों, कार चलाने में एक्सपर्ट है. मोहिना ने मज़ाक में कहा, "बाहर आ कर तुम्हें नौकरी की चिन्ता करने की ज़रुरत नहीं, मेरे यहाँ तुम्हारी ड्राइवर की नौकरी पक्की।"

"ऐसा क्या? तुम्हारे यहाँ नौकरी तो मैं मुफ्त में कर लूँगा। बस, बियर पिला दिया करना।"

"डन, लेकिन अब हम तभी मिलेंगे जब तुम छूट जाओगे। बहुत टेंशन रहती है."

"तो आज यह अंतिम मुलाकात है? देखेंगे, यह बात कितनी निभती है? रोज़ ही ख़त्म करने का कहती रहती हो."

"हाँ. आज यह मुलाकात अंतिम है. अब और मिलने का समय भी कहाँ होगा? अभी तुम्हें वकील से मिलना है,. और भी न जाने क्या-क्या काम हैं. चौदह दिन आखिर होते ही कितने हैं."

"ठीक है, अब छूटने पर ही मिलूँगा। पर मिलूँगा जरूर, चाहे कभी भी छूटूँ।"

"मुझे घर छोड़ दो और कार तुम ले जाओ. मैं तुम्हारे लौट जाने के बाद तुम्हारे घर से ले लूँगी।"

"ओके.....  "

रात का घनघोर अँधेरा था. सड़कें सुनसान। कार लहराती हुई चली जा रही थी. कुछ देर की चुप्पी के बाद वह बोला था, "मोहिना, कैन आय हग यू? द लास्ट हग? द फेयरवेल हग?" वह कुछ कहती, इससे पहले ही मोहित की बाज़ू उसके कंधे पर थी और मोहिना के होंठ उसके माथे पर. "जीते रहो. तुम्हारी लम्बी उम्र हो" मोहिना ने कहा तो वह बोला था, "मैं लम्बी उम्र लेकर क्या करूँगा? तब तक तुम तो मर जाओगी, मुझसे इतनी बड़ी जो हो.… मज़ाक कर रहा हूँ यार."

"बेटा, तुम अद्भुद हो."

"थैंक्स अम्मी जान."

"फ़िक्र न करो, तुम्हारे छूटने तक ज़िन्दा रहूँगी," मोहिना ने कहा और अपने घर के आगे कार से उतर गई. वह भी उतरा, सभ्यता के नाते, उसे विदा कहने के लिए. मोहिना ने देखा, वह लड़खड़ा रहा था. उसकी आँखें चढ़ी हुई थीं. उसे फ़िक्र हुआ कि शायद वह गाड़ी चला नहीं पाएगा। उसने कहा, "मोहित, क्या तुम ठीक हो? आज रात यहीं रुक जाओ, कल सुबह चले जाना।" मोहित बोला, "नहीं, घर पर मम्मी-पापा इंतज़ार कर रहे होंगे।थोड़ा सुरूर है इसलिए ज़्यादा सँभल कर गाडी चलाऊँगा। नॉट टू वरी. घर पहुँच कर फोन कर दूँगा।" और वह चला गया.

आधी रात को मोहिना का फ़ोन खड़का। उसने सोचा, वही होगा, शायद बताने के लिए फोन किया हो कि घर पहुँच गया है. उसे भी चैन नहीं पड़ता था. यहाँ होता है तो मिनट-मिनट पर फ़ोन करता है. लेकिन यह क्या? कोई अंजाना नंबर फ़्लैश कर रहा था. और ....  और …. बहुत शोरगुल में आवाज़ें, पुलिस स्टेशन, ऐक्सिडेंट, अस्पताल, बस शब्दों के यही टुकड़े सुनाई पड़े …. मोहिना ने उन्हें उसके पिता का फोन नंबर दिया। कुछ देर बाद उसकी मम्मी का फोन, दुःख, क्रोध और हताशा की भरभराई आवाज़, "इतनी रात हो गई थी तो अपने घर उसे नहीं रोक सकती थीं? मैंने कहा था, उसे मत पीने दो, पीकर कार मत चलाने दो... तुमने मेरी नहीं सुनी… "

पर .... पर …. वह तो अच्छा ड्राइवर था..... ? और मैंने उसे कब कहा था कि पीकर कार चलाओ? मैं उसे रोकने वाली भी कौन थी? मोहिना परेशान।

मोहिना सुन्न पड़ गई थी. क्या सचमुच .... सचमुच …. यह हमारी आखिरी मुलाक़ात थी? एंड दैट वॉज़ द लास्ट हग? कौन था वह मेरा, जिसके पीछे मेरा मन भागा-भागा फिरता था? जिससे ढेर सारी बातें करने के लिए मैं पूरा साल उन चौदह दिनों का इंतज़ार करती थी. जिसके लिए मैं सब कुछ करने के लिए तैयार रहती थी, बिना किसी प्रतिदान के? दोस्ती की यह मिसाल .... मोहिना का मस्तिष्क शून्य होता जा रहा था. वह क्यों दोस्त की तरह आया था और दुश्मन की तरह चला गया था?

क्या यह सच था कि वह सचमुच में वहाँ से छूट गया था, जहाँ से छूटना चाहता था? जेल से? नहीं, नहीं, धर्मशाला से?

(Words 23962, Pages 59) 1-18 Chapter (10.11.14)