Monday, 17 November 2014

धन्य है दिल्ली पुलिस - 2

धन्य है दिल्ली पुलिस - 2 

बात अट्ठारह साल पुरानी है. मैंने अपना पहला मकान यानि डी डी ए फ़्लैट खरीदा था. फ़्लैट पावर ऑफ़ अटॉर्नी पर था. हमने सारी रकम दे दी थी, दो लाख शेष थे जो मकान के कागज़ात और चाबी मिलने के बाद देने थे. बेचने वाले ने पंद्रह-बीस दिन का समय माँगा था. लेकिन तीन महीने बीत गए, वे मकान से निकलने को तैयार ही नहीं। उनके बेटे ने अब यह कहना शुरू कर दिया था, 'पावर ऑफ़ अटॉर्नी कुछ नहीं होता, मालिक हम ही रहेंगे, जब मन होगा, देंगे, नहीं मन होगा तो नहीं देंगे। कर लो जो करना है.'

स्टैम्प पेपर पर यह खरीद-बेच लिखी गई थी लेकिन कागज़ कच्चे थे क्योंकि कोर्ट में पंजीकरण नहीं कराया गया था. बेचने वाले ने कहा था, जब डील फाइनल हो जाएगी यानि जब वे उस मकान को छोड़ कर हमें चाबी और मकान के कागज़ दे देंगे और हम उन्हें बाकी रुपये, तो कोर्ट में पंजीकरण करा लेंगे।

मैं परेशान। हर समय दिल घबराता कि सारी जमा-पूँजी हाथ से निकल गई, अब क्या करें? मैंने अंततः उस कॉलोनी की पुलिस चौकी में संपर्क किया। मैं बेटे के साथ वहाँ गई. वहाँ का इंचार्ज एक राजस्थानी राजपूत था (यह उसी ने बाद में बताया था. वह बहुत लम्बा था, छह फुट से ऊपर ही होगा।) मैं इतनी दुखी थी कि मेरे मुँह से कोई शब्द नहीं निकला और मैं लगातार रोती रही. बेटे ने उन्हें सारी बात बताई। पुलिस चौकी इंचार्ज बोले, 'यह केस कोर्ट का है, हमारा नहीं।'

मेरा रोना और तेज़ हो गया. मैंने रोते-रोते कहा, 'कोर्ट में जाएँगे तो सालों साल लगेंगे। पुलिस के नाम से ही लोग डरते हैं. आप उन्हें डरा दें.'

इंचार्ज कुछ सोचने लगे. मैंने आगे कहा, 'जब भी उनसे इस बाबत पूछने जाओ, उनका बेटा घर में नहीं घुसने देता, दरवाज़े से ही खदेड़ देता है. आज उसने मुझे लगभग धक्का ही दे दिया। कोई किसी महिला के साथ इस तरह हाथापाई कैसे कर सकता है? इस पर आप कोई कार्यवाई नहीं करेंगे?'

इंचार्ज बोले, 'अच्छा? उसने आपके साथ बदसलूकी की, इस बात पर उसकी रिपोर्ट लिखवाएँ.'

मैंने रिपोर्ट लिखवाई। फिर उन्होंने पास खड़े सिपाही से कहा, 'पकड़ के ला उसे और बंद कर दे।'

सिपाही उसे पकड़ के ले आया और पुलिस चौकी में पीछे की ओर बने एक कमरे में बंद कर दिया।

इंचार्ज बोले, 'अब आप निश्चिन्त होकर जाएँ। मैं देखता हूँ, क्या करना है?'

हम बाहर आ गए. वह सिपाही हमारे साथ बाहर आया और बोला, 'मैडम जी, कुछ नहीं होने वाला। आपके सामने उसे बंद किया है, बाद में उससे पैसा खाकर पिछले दरवाज़े से उसे निकाल देंगे।'

मुझे कुछ समझ नहीं आया. मैं अब भगवान भरोसे थी. जो होगा, देखा जाएगा। अगर किस्मत में पैसा जाना ही लिखा है, तो उसे कैसे रोक सकते हैं? पुत्र ने मेरे विचार मुझे ही सुनाए, 'मॉम, आप कहती हैं न, अगर किसी ने बुरा नहीं किया है तो उसका बुरा नहीं होगा। जब आपने आज तक किसी के पैसे नहीं मारे, तो आपके पैसे कैसे मरेंगे? सब ठीक हो जाएगा।'

हम घर लौट आए और पुत्र उसी रात विदेश रवाना हो गया.

उन दिनों मेरी एक सहेली थी, वकील थी, क्रिमिनल केसेज़ देखती थी, दिल्ली के हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करती थी, पटियाला हाउस में उसका चैंबर था. साहित्य में रूचि रखती थी इसलिए उसके चैंबर में हमारा जमघटा लगा रहता था. (आजकल शायद विदेश में है या मालूम नहीं, कहाँ है?) मैं बॉबी के अमेरिका जाने के बाद बिलकुल अकेली पड़ गई. मैंने अगले दिन ही सहेली को फ़ोन करके मकान की समस्या बताई। उसके पास बैठे उसके क्लाएंट ने उसकी बातचीत से मामला समझ लिया और उससे कुछ कहा, तभी वह मुझसे बोली, 'मणिका, मेरे क्लाएंट कह रहे हैं कि वे तुम्हारा मकान तुम्हें दिलवा सकते हैं.' मैंने क्लाइंट को अपने कार्यालय का पता दिया और अगले दिन मिलने के लिए बुलाया।

अगले दिन मेरे पी ए ने मुझे फोन पर बताया, 'मैडम, दो लोग मिलने आए हैं, उनमे से एक बहुत अग्ली-लुकिंग है, भयानक भी, क्या आपके पास भेज दूँ?'

मैंने कहा, 'हाँ, तुम साथ लेकर आओ.'

वे दोनों मेरे केबिन में आए. एक साधारण कद-काठी का था, दूसरा भीमकाय, एकदम काला, और उसके एक गाल पर उससे भी काला एक बहुत मोटा मस्सा था, छवि बिलकुल फ़िल्मी गुंडे जैसी। मैं भी डर गई. मैंने पी ए को चाय लाने के लिए कहा, साथ ही संकेत से समझाया कि केबिन के आसपास ही रहे. मैंने उनसे अपना परिचय देने के लिए कहा.

साधारण बोला, 'मैडम, हम प्रॉपर्टी डीलर हैं. प्रॉपर्टी के काम में बहुत लफड़ा है. जैसे आपका काम फँसा है, ऐसे ही औरों के काम भी फँस जाते हैं, तो हमें सारे इंतज़ाम रखने पड़ते हैं. हम आपको आपका मकान दिलवा सकते हैं और इसके लिए आपको उन्हें बाकी दो लाख भी नहीं देने पड़ेंगे।आपके वो पैसे बच जाएंगे।'

मैंने पूछा, 'आप मेरा यह काम करने का कितना रूपया मुझसे लेंगे?'

'बस, जो दो लाख आपने उन्हें देने हैं, वो उन्हें नहीं देने पड़ेंगे। वो आप हमें दे देना।'

'तो मेरे पैसे कहाँ बचे? खैर, यह बताएँ कि आप मकान कैसे खाली कराएँगे? क्या तरीका होगा?'

'मैडम, ऐसा है कि आप उस आदमी का नाम, घर का पता और कार का नंबर हमें बता दें. एक हफ्ते बाद मकान के कागज़ात और चाबी आपके हाथ में होगी।'

'लेकिन आप करेंगे क्या?' 

'वह आप हम पर छोड़ दें.'

'फिर भी, अपना तरीका तो बताएँ।'

'ऐसा है कि हम एक-दो दिन में कई बार उसकी गाडी को टक्कर मारेंगे। इससे उसे समझ में आ जाएगा कि उसे मकान आपको दे देना चाहिए।'

'और अगर उसे समझ में नहीं आया तो? अगर वह इस टक्कर में मर गया तो?'

'हम ऐसे टक्कर नहीं मारते जो कोई मर जाए. यह सिर्फ डराने के लिए होता है.'

'नहीं, नहीं, यह तरीका ठीक नहीं, कहीं मर जाए?'

अभी तक साधारण बोल रहा था. पहली बार भीमकाय ने अपना मुँह खोला, 'हाँ, ज़्यादा चालाकी बरते तो मर भी सकता है. हमारा एक साथी ऐसे ही एक हत्या के इलज़ाम में जेल में है, जिसका केस वकील साहिबा लड़ रही हैं.'

साधारण बोला, 'अरे नहीं मैडम जी, किसी को मारना हमारा मकसद नहीं होता, हम तो बस अपना काम बनाना चाहते हैं.'

मैं बहुत ङरी हुई थी. उस डर से उबरने के लिए मुझे अपनी वकील सखी का ही सहारा था. मैंने कहा, 'आगे बताओ।'

साधारण बोला, 'सारा तरीका यह है मैडम जी कि आप हमें जो दो लाख रुपये देंगी, उसमे से पचास हज़ार हम इस पुलिस चौकी को देंगे, हमारी आगे वाली कार्यवाई में आँख और मुँह बंद रखने के लिए. फिर हम आधी रात को एक ट्रक और आठ मज़दूर लेकर उसके घर जाएँगे, उससे मकान के कागज़ और चाबी लेंगे, बन्दूक की नोक पर देगा साला। उसका सारा सामान ट्रक में लदवाएँगे, घर के लोगों को ट्रक में बैठाएँगे और सुबह होने से पहले ट्रक वाला उन्हें एक दूर इलाके में छोड़ आएगा। उसके बाद वो जानें और उनका काम. अगले दिन चाबी आपके हाथ में होगी।'

'नहीं नहीं भाई, ऐसा नहीं करना। मुझे मकान न मिलना मंज़ूर है लेकिन ऐसे? कभी नहीं।'

'सोच लीजिए, हम तो आपकी मदद कर रहे हैं, वकील साहिबा जी के कहने से.'

'ठीक है, मैं सोच कर आपको बताती हूँ.'

'वकील साहिबा को बता दें, आप जब कहेंगी, हम आ जाएँगे।'

वे विदा हुए. मैं और ज़्यादा दहशत में. मैंने तुरंत सखी को फोन किया, 'यार, तुमने कैसे गुंडों को भेज दिया? और तुम ऐसे गुंडों के लिए काम करती हो, तुम्हारा वास्ता ऐसे लोगों से पड़ता है, तुम्हें डर नहीं लगता? तुम एक हत्यारे को बचाने के लिए केस लड़ रही हो? लानत है.'

'शांत हो जाओ, शांत हो जाओ,' वह बोली, 'यह मेरा प्रोफेशन है, मुझे डर नहीं लगता। जहाँ तक केस लड़ने की बात है, मुझे मालूम है, उसने ह्त्या की है, उसके केस में दम नहीं है, उसने हारना ही है, तो इसे इस नज़र से देखो कि मैंने उसे हराने की फीस ली है.'

मैंने रात को पुत्र को फ़ोन किया, 'तू वहाँ बैठा है, मैं यहाँ गुंडों के बीच फँसी हूँ.'

वह बोला, 'किसी दोस्त को फोन करता हूँ कि आपका ख्याल रखे. तब तक आप ऐसा करें कि नाना के घर चली जाएँ या मामा को अपने पास रहने के लिए बुला लें.'

मैं अगले दिन अकेली उसी पुलिस चौकी पर गई. मैंने उन्हें उन गुंडों की सारी कहानी सुनाई, तीव्र-तीखे अंदाज़ में. मेरा भाषण चालू और सब चुप. 'आप इस तरह पैसे लेकर गुंडागर्दी करवाते हैं? डूब मरिये आप लोग चुल्लू भर पानी में. किसी भद्र महिला की मदद नहीं कर सकते। बताइये, कितना पैसा चाहिए? कितने में बिकेंगे आप?'

इंचार्ज बोले, 'मैडम, आपने बहुत बड़ी तोहमत लगा दी. अगले हफ्ते आज ही के दिन इसी टाइम पर आकर मकान के कागज़ात और चाबी ले जाइए। यह इस राजपूत का वादा है.'

और मुझे मेरा मकान मिल गया, शेष रकम दो लाख मकान मालिक को देकर। बात यह है कि पुलिस के नाम की दहशत इतनी होती है कि पुलिस चाहे तो समाज में बहुत सुधार ला सकती है.

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