Friday, 28 November 2014

7. एक भावचित्र : वर्जित फल

7. एक भावचित्र : वर्जित फल

मैंने वर्जित फल को चखा.

मैं बरसों से भूखी-प्यासी अन्जान रास्ते पर चली जा रही थी. रास्ते में उत्सव थे. उत्सव में नाच-गाने थे. नाच-गानों में हँसी-ठहाके थे. हँसी-ठहाकों में मनोरंजन था. मनोरंजन में दावतें थीं. दावतों में राज-भोग और मदमस्त करने वाले पेय थे. राज-भोग छत्तीस प्रकार के थे. छत्तीस के छत्तीस प्रकार मुझे बेस्वाद लगे. कोई भी पेय मेरे मन में मादकता नहीं भर सका. मैं भूखी की भूखी रही. प्यासी की प्यासी रही. मैं जंगलों में निकल गई. मैं जंगलों में रहने लगी  मैं थक कर निढाल हो गई. मेरा गोरा रंग खुले आसमान के नीचे उमड़ रही धूप में जल कर काला पड़ गया. सर्दी, गर्मी, बरसात के थपेड़ों ने मेरे शरीर को कुम्हला दिया। मैं मरने-मरने को हो गई. मैं मानों मर ही गई. मैं जीते जी लाश हो गई.

यह क्या? जंगल में एक और लाश पड़ी थी. अचानक मैंने महसूस किया, वह लाश सरकते-सरकते मुझ तक आ गई. मैं भी सरकते-सरकते उस लाश के पास गई. मंत्रबिद्ध-सा मेरा हाथ उस लाश के हाथ में था. ठंडा शिथिल हाथ. दोनों का. उस लाश ने मुझे अपना ह्रदय निकाल कर दिया। मैंने भी उसकी देखा-देखी अपना ह्रदय निकाल कर उसे दिया। उसने अपने ठंडे होंठ मेरे माथे पर रखे. मैंने भी अपने ठंडे होंठ उसके माथे पर रखे. और दोनों लाशें गर्म होने लगीं। दोनों लाशों में जान पड़ने लगी. दोनों लाशें ज़िंदा होने लगीं, दोनों लाशें ज़िंदा हो गईं. और एक खूबसूरत प्रेमी युगल में अवतरित हुईं।

उसने वर्जित फल मुझे खाने के लिए दिया। मैंने वर्जित फल को चखा. वह मेरा हो गया. मैं उसकी हो गई.

अब हमारे वारिस होंगे, अनेक वारिस, जो प्रेम की परंपरा को आगे बढ़ाएँगे, हमारे प्रेम की कहानी युगों तक गाएँगे।

ये जो सामने दीवार पर दो प्रतिबिम्ब दिख रहे हैं, एक उसका प्रतिबिम्ब है, एक मेरा प्रतिबिम्ब है.


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