Sunday, 30 November 2014

8. एक भावचित्र : यात्रा

8. एक भावचित्र : यात्रा

क्यों लग रहा था कि यात्रा खत्म हो गई? नहीं, यात्रा अभी ख़त्म नहीं हुई, यात्रा अभी शेष है. जैसे नया सफर आज ही शुरू हुआ है. एक गंध भरी शाखा झूल रही है, जिस पर अपना बसेरा होगा। निर्गन्ध से निकल कर गंध भरी शाख पर. ज़िन्दगी जैसे मर कर फिर से जाग उठी है. जीना कैसे मुश्किल-मुश्किल हो रहा था? पर अब मरने का समय आएगा तो मरने को जी नहीं चाहेगा। कहाँ तो सम्बन्ध एक-एक कर भुरभुरा गए थे, कहाँ ये नए द्वार खुल रहे हैं. संबंधों के भुरभुराने के साथ क्यों लगता था कि यह दुनिया जीने के काबिल नहीं है, सब छोड़-छाड़ कर कहीं भाग जाएँ? सब तज देने का भाव लिए जो अंतर-आत्माएँ थीं, आज इधर-उधर मोह में डूब रही हैं. कहाँ जाकर छुप गया अतीत? मर गया तो उसका शव तक नज़र नहीं आ रहा. रोशनी की एक किरण के लिए जो तरसते थे, आज उनके आसपास उजाले ही उजाले हैं. मन की कमज़ोरियाँ मज़बूती में बदल रही हैं. चलो, एक नई यात्रा पर चलें। जीत प्रतीक्षा कर रही है.


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