Saturday, 15 November 2014

घरेलू महिला

घरेलू महिला

कुछ दिन पूर्व एक खालिस घरेलू महिला मुझसे अपनी समस्याओं के निवारण हेतु मिली। खालिस घरेलू महिला से मेरा तात्पर्य ऐसी महिला से है, जिसका घर से बाहर की दुनिया में कोई दखल नहीं है. उसने मुझे बताईं अपने पति की कुछ बातें (यानि दोषारोपण), ससुरालियों की कुछ बातें (यानि परनिन्दा), अपने बच्चों की कुछ बातें (यानि शिकायतें), अपने नौकरों और पड़ोसियों की कुछ बातें (यानि नुक्ताचीनी). घर-घर की कहानी थी, मेरी रुचि ऐसी बातों में नहीं थी. मैंने उससे कहा, 'क्या तुम्हारी कोई गलती नहीं?'

वह बोली, 'नहीं, आप ही बताएँ, मेरी गलती कहाँ है?'

मैंने कहा, 'तुम कुछ महीने तक समझो कि हर झगड़ा तुम्हारे कारण हुआ है और चुप रहो.'

वह बोली, 'अजी, ऐसा कैसे मैं समझ लूँ?'

मैंने कहा, 'अच्छा, यह समझ लो कि वे सारे मूर्ख हैं, सिर्फ तुम अक्लमंद हो. उन्हें मूर्ख समझ कर चुप रहो कि ये तो हैं ही मूर्ख, इन्हें तुम्हारी बात क्या समझ आएगी?'

वह बोली, 'हाँ, यह तो मैं समझती हूँ. पर वे मूर्ख के मूर्ख रहते हैं, मुझे नहीं समझते।'

मैंने कहा, 'उन्हें बुरा रहने दो, तुम अच्छे होने की ऐक्टिंग करो, दिखावा करो. अच्छी चाहे मत बनो, सिर्फ दिखावा करो.'

वह बोली, 'मैं तो अच्छी ही हूँ, दिखावा क्यों करूँ?'

मैंने कहा, 'इतने साल में भी तुम्हारी समस्या वहीँ की वहीँ है तो उसे सुलझाने का तरीका बदलो।'

वह बोली, 'मणिका जी, आपके बस का नहीं है मेरी समस्या का समाधान करना।'

मैं चुप हो गई, क्या कहती। वही आगे बोली, 'मैं अपनी आत्मकथा लिख रही हूँ. पूरी होने पर आपको दूँगी। आप उसमें आवश्यक संशोधन करके कहीं छपवा देना।'

मैंने हैरान होकर कहा, 'पर तुमनें तो कभी कुछ लिखा नहीं?'

वह बोली, 'फिर क्या हुआ? आप ही ने तो एक बार कहा था, सीखने की कोई उम्र नहीं होती। आपने यह भी बताया था कि कई लेखकों ने बड़ी उम्र में लिखना शुरू किया।'

'ठीक है पर तुम सीधे आत्मकथा लिखना चाहती हो और यह भी चाहती हो कि वह छपे. आत्मकथा 
महान लोगों की होती है.' मैंने कहा.

वह बोली, 'कमाल है. क्या आम लोगों के जीवन में कुछ ऐसा नहीं होता जो बताया जा सके? मेरे जीवन में बहुत कुछ ऐसा है, जो मैं लोगों को बताना चाहती हूँ. आपको उसे छपवाना ही होगा। फिल्म 'बाग़बान' में देखा था ना, अमिताभ बच्चन ने बूढ़े हो कर अपनी आत्मकथा लिखी, छपवाई और उससे कितना पैसा कमाया?'

मैंने कहा, 'आत्मकथा लेखन केवल जीवन में घटी घटनाओं का ब्यौरा देना मात्र नहीं है, जीवन जीने के बाद उस जीवन से आपके सामने कौन सा सत्य उजागर हुआ, यह बताना ज़रूरी है. आपने क्या सीखा, क्या खोया, क्या पाया, यह पाठक के सामने रखना ज़रूरी है. खैर, तुम पहले लिखो तो सही, बाद में देखेंगे।' कह कर मैंने उसे विदा किया।

जो दूसरे की बात समझना नहीं चाहता, वह दूसरों से सलाह-मशवरा ही क्यों करता है? असल में जो लोग अपनी समस्या किसी दूसरे के सम्मुख रखते हैं, वे दूसरे के मुँह से वही सुनना चाहते हैं, जो उन्हें पसंद हो। वे तब तक आपसे बहस करते रहेंगे, जब तक आप उनकी हाँ में हाँ नहीं मिलाएँगे

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