Sunday, 16 November 2014

धन्य है दिल्ली पुलिस - 1

धन्य है दिल्ली पुलिस - 1

कहते हैं, ये पुलिस वाले किसी के सगे नहीं होते, पर मेरे साथ तीन घटनाएँ ऐसी हुईं कि आज दिल्ली पुलिस की प्रशंसा करने का मन है. बात बीस साल पहले की है. मैं तब दिल्ली में रहती थी, इंद्रप्रस्थ एक्सटेंशन में. एक बार मेरा पुत्र रात को बारह बजे तक ऑफिस से घर नहीं लौटा। वैसे उसकी कम्प्यूटर की नौकरी उसे देर तक बाँधे रखती थी. मैंने उसके ऑफिस, इधर-उधर, कई जगह फ़ोन किए पर उसका कुछ पता नहीं चला. मैंने घबरा कर 100 पर फोन मिला दिया। उन्हें बेटे की गाडी का नंबर, लोकेशन बताई कि वे जल्दी उसे ढूँढें। वे उसे ढूँढ तो नहीं पाए लेकिन कई बार मुझे फोन करके उसके बारे में पूछते रह. आखिर वह आधा-पौने घंटे में लौट आया, बताया कि ऑफिस की दूसरी ब्रांच में बैठा था. तभी पुलिस का फिर फोन आ गया, उन्होंने उससे बात की, कहा कि 'बेटा, आने में देर हो तो माँ को फोन कर दिया करो.' मैं पुलिस के इतने कंसर्न से चकित थी और मुग्ध भी. मैं उन सज्जन का नाम भी नहीं पूछ पाई.

दूसरी घटना यूँ कि एक व्यक्ति ने मुझसे दस हज़ार रुपये लिए हुए थे, जो वह लौटाने में आनाकानी कर रहा था. उस समय दस हज़ार की कीमत काफी थी. यह बात भी काफी पुरानी है. उस समय भी मैं इंद्रप्रस्थ एक्सटेंशन में रहती थी. मेरे पास बस एक रात का वक़्त था, अगली सुबह मुझे वह स्थान छोड़ देना था. मैंने रात के बारह बजे त्रिलोकपुरी थाने में फोन किया। जो भी बोला, मैंने उसे स्थिति बयान की, उस व्यक्ति का फोन नंबर दिया, कहा कि पुलिस के एक फोन से वह डर जाएगा, आप बस उसे डरा दें. उसने कहा, आप फ़िक्र न करें, आपका काम हो जाएगा। थोड़ी देर में उस पुलिस का फोन आया कि सुबह आपके पैसे आपको मिल जाएँगे। मैंने पूछा, 'आपने उससे क्या कहा?' वह बोला, 'मैंने कहा, 'मैडम ने तेरी रिपोर्ट लिखाई है, सुबह त्रिलोकपुरी थाने में हाजिरी दे.' अगली सुबह पांच बजे मेरे घर की घंटी बजी, दस हज़ार रुपये मुझे थमा कर वह व्यक्ति बोला, 'थाने में रिपोर्ट लिखाने की क्या ज़रूरत थी? वैसे भी आज मैंने आपके रुपये आपको लौटाने ही थे. अब प्लीज़, वह रिपोर्ट वापस ले लें.' मुझे त्रिलोकपुरी थाने के इन सज्जन का नाम भी नहीं मालूम।

तीसरी घटना यूँ है कि हम नॉएडा शिफ्ट कर.चुके थे. घर के लिए मेड प्लेसमेंट कम्पनी के ज़रिये लेते थे. प्लेसमेंट कम्पनियाँ किस तरह लूटती हैं, जगजाहिर है. आर के पुरम के पास की एक कम्पनी ने घर आकर एक हज़ार रुपये अग्रिम लिए कि वह अगले दिन मेड भेज देंगे। पंद्रह दिन बीत गए, न फोन उठाएँ, न किसी और तरह संपर्क करें। मैंने गुस्से में आर के पुरम पुलिस स्टेशन फोन किया और फोन उठाने वाले सज्जन से सारी घटना बयान की. अगले दिन सुबह आठ बजे प्लेसमेंट कम्पनी का बंदा एक हज़ार रुपये लेकर हाज़िर। इन पुलिस सज्जन का नाम मैंने पूछा था, पर ठीक से याद नहीं।

अब देखिए, मुझसे बिना कुछ रिश्वत लिए, मुझसे मिले बिना पुलिस ने मेरा काम किया। धन्य है दिल्ली पुलिस।

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