Monday, 24 November 2014

4. एक भावचित्र : मैं पापन

4. एक भावचित्र : मैं पापन

लकड़ी जल कोयला भई, कोयला जल भई राख
मैं पापन ऐसी जली, कोयला भई न राख.

एक औरत की यह नियति अग्रहणीय है, अस्वीकार्य है, जो हर वक़्त खुद को दोषी मान कर पश्चाताप की आग में जलती रहती है. खुद को मत कोसो, दोषी तुम नहीं, तुम्हारी यह सोच है, जिसमें तुम सदियों से दबी हुई हो. इस सोच से बाहर आओ, और देखो, पापी तुम नहीं, कोई और है.


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