Thursday, 20 November 2014

पर मोह शेष था Kavita 223

पर मोह शेष था

काग़ज़ भर काग़ज़ लिखे
शब्दों के आडम्बर रचे
कथा दर कथा
और कथा, और कथा
लिखने के बाद भी
सब यूँ ही रिस रहा है भीतर।
लेखन दर्द को सहेजता है
और कण-कण बाँट देता है
उपहासास्पद होने के लिए.
आह !
कुछ ख़त्म नहीं होता
ख़त्म सिर्फ हम होते हैं
अहसास हमेशा ज़िंदा रहते हैं.
सब कुछ छूटने के बाद भी
सब कुछ हमारे बीच में ही रहता है.
मैं जीवन में थी
पर जीवन मुझमे नहीं था.
जीवन में जीवन ख़त्म हुआ था
पर मोह शेष था
मैं इस दुनिया में होकर भी
इस दुनिया में नहीं थी.
फिर कहूँगी, बार-बार कहूँगी
अपने मरण और पुनर्जन्म की कथा.
हर नए दर्द को सोख लेता है
उससे पहले वाला दर्द
अब दर्द नहीं होता है
दर्द ने हँसना जो सीख लिया है.

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