Sunday, 23 November 2014

2. एक भावचित्र : मैं एक औरत हूँ

2. एक भावचित्र : मैं एक औरत हूँ

मैं एक औरत हूँ. मेरे विभिन्न रंग हैं. मैं अपने आप में पूर्ण हूँ. मैं अकेले जी सकती हूँ. पैसा, ऐशो-आराम का जीवन, यश, ये सब मैं खुद कमा सकती हूँ. मैं मुश्किलों को आसान कर सकती हूँ. मैं नव-निर्माण कर सकती हूँ. मैं क्या-क्या नहीं कर सकती? 

मैं एक औरत हूँ. मुझे कोई भय नहीं सताता। मुझे कोई पराजय नहीं रुलाती। मैं लोगों के दिलों को पढ़ सकती हूँ. मैं लोगों के दिलों पर राज कर सकती हूँ. मैं देश पर राज कर सकती हूँ. मैं क्या-क्या नहीं कर सकती? 

मैं एक औरत हूँ. मैं चाहूँ तो बंजर धरा पर उग जाऊँ। मैं चाहूँ तो आकाश में उड़ कर दिखाऊँ। मैं किसी भी अग्नि-परीक्षा में बिना जले रह सकती हूँ. मैं हर लांछन से बेदाग़ निकल सकती हूँ. मैं किसी भी असुर दृष्टि को भस्म कर सकती हूँ. मैं क्या-क्या नहीं कर सकती?

मैं एक औरत हूँ. मैं ग्रन्थ लिख सकती हूँ. मैं सत्य लिख सकती हूँ. मैं अच्छाई और बुराई का सच लिख सकती हूँ. मैं संयोग को सार्थक कर सकती हूँ. मैं वियोग को रचनात्मक कर सकती हूँ. मैं क्या-क्या नहीं कर सकती?

पर हे पुरुष, तुम्हारे प्यार के बिना मैं फिर भी अधूरी हूँ. मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस एक आलिंगन के सिवा, ताकि मैं तुम्हारी धड़कनों में खुद को सुन सकूँ और तुम मेरी धड़कनों में खुद को सुन सको. मैं एक आलिंगन की तड़प लिए मरना नहीं चाहती।


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