Monday, 24 November 2014

3. एक भावचित्र : आत्मसखा

3. एक भावचित्र : आत्मसखा

पूरा जीवन हम सहस्रों लोगों से मिलते रहते हैं और हमें लगता रहता है कि वही लोग हमारा गंतव्य हैं. कि अचानक कोई ऐसे मिल जाता है कि हम चौंक जाते हैं कि अरे, हम तो आजतक जिन लोगों से मिलते रहे, वे तो हमारे लिए थे ही नहीं, हमारा असली आत्मसखा तो यह है. सच है, हमने पूरी उम्र उसी आत्मसखा की तलाश में गुज़ारी होती है लेकिन हमें पता भी नहीं चलता कि हम किसी की तलाश में हैं. हमें हमारा आत्मसखा मिलता ज़रूर है, देर-सवेर, चाहे उसका आना कुछ देर के लिए ही हो, पर वह आता ज़रूर है. वह किस कोने से आएगा, दबे पाँव, हमें पता नहीं चलता। आकर कितनी देर हमारे पास रुकेगा, हमें यह भी पता नहीं होता लेकिन उसके मिलने से हम जान जाते हैं कि यही तो है हमारा गंतव्य। उसका अल्प समय का साथ हममें सदियों का सुख भर जाता है. किसी के साथ हम पूरी उम्र रहते हैं, तब भी अधूरे रह सकते हैं. और किसी का थोड़े समय का साथ भी पूर्णता प्रदान कर देता है. सुख समय की लम्बाई के साथ नहीं मापा जाता, सुख समय के आधार पर नहीं मापा जा सकता, कि हम ज़्यादा से ज़्यादा किसी के साथ रहेंगे, तभी तृप्त होंगे। नहीं, हमें पल भर का साथ भी उम्र भर की तृप्ति प्रदान कर देता है कि उस पाने के बाद अन्य कुछ पाने की आकांक्षा नहीं रहती, अन्य कुछ पाने को शेष नहीं रहता। हमें लगता है, बस, बस, यही था. जो हमारे आदर्शवाद से मेल खाता था. यही था वह, जिसके साथ मिलने पर और मिल कर चले जाने पर अब किसी और से मिलन की चाह नहीं रही. यही तो था वह, जिसके लिए हमारे मन का खाली कोना सुरक्षित था. यही था, जो हमारे शून्य को भरने आया था. यही था, जिसके आने से हमारा तन-मन तरंगित हो कर नृत्य की विभिन्न मुद्राओं में परिभाषित होने लगा था. हमारे जीवन में उसका आना महत्वपूर्ण होता है, जाना नहीं। वह जाते हुए हमारा सर्वस्व लेकर जाता है तो आते हुए हमें सर्वस्व देने के लिए भी आता है.

ऐ मेरे आत्मसखा ! तुम्हारी स्मृतियाँ मेरे एकांत की अमूल्य निधि हैं. मेरा मन जंगल में मंगल है. मैंने तुम्हें खोकर जो खोया, उससे ज़्यादा तुम्हे पाकर पाया था. तुम मेरे जीवन में आए, मैं धन्य हुई.


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