Friday, 28 November 2014

एक थी सीता

एक थी सीता

समय-समय पर मेरी दुकान पर काम करने वाली लड़कियों में कई सच में बहुत समझदार, सलीकापसंद और सुचारूरूप से घर-गृहस्थी चलाने वाली थीं, लेकिन उनके माता-पिता की दयनीय पारिवारिक स्थिति, कमज़ोर आर्थिक बैकग्राउंड के कारण उनके विवाह ऐसी जगह हुए कि उन्हें उम्र भर खपना पड़ा.

उम्र भर तो खैर हम भी खप रहे हैं लेकिन अपनी इच्छा से किए गए काम और मजबूरी के किए गए काम के तनाव और तसल्ली में अंतर होता है.
सीता मेरे घर में सारा घरेलु काम करती है. कल मैं रसोई में गई तो उसे भिन्डी का ढेर काटते हुए देख कर मैंने कहा, 'यार, इतनी सारी भिन्डी क्यों काट रही हो?' वह तुरंत बोली, 'यार, भिन्डी आए कई दिन हो गए, फ्रिज में पड़े-पड़े खराब हो जाएगी।' मैं कुछ सोच पाती, कह पाती, इससे पहले ही वह बोली, 'सॉरी मैम, सॉरी।' 'सुधर जा, सीता,' मैंने कहा, साथ ही यह कहने वाली थी कि 'अपनी औकात में रह' कि तभी मुझे कुछ दिन पूर्व फेसबुक पर हुई 'औकात' शब्द की छीछालेदर याद आ गई.

लगभग एक साल पहले सीता (नकली नाम) मेरे बुटीक में नौकरी के लिए आई थी. मेरे यहाँ स्टाफ़ पूरा था. मुझे ज़रूरत नहीं थी. मैंने मना कर दिया। दो दिन बाद फिर आई, बोली, 'प्लीज़, मुझे नौकरी की बहुत ज़रूरत है.' कुछ उसके सितारे मुझसे टकराए। वह कहते हैं ना, कई लोगों को देखते ही लगता है कि वे हमसे जुड़ने लायक हैं, मैंने सोचा, मुझे बहुत इधर-उधर जाना पड़ता है, इसे अपने साथ ले जाया करूँगी। एक सहारा रहेगा। मैंने कहा, 'ठीक है, तुम्हारा काम सिर्फ मेरे साथ कार में घूमना होगा। समय सुबह दस बजे से शाम सात बजे तक. हर रविवार छुट्टी। तनख्वाह पाँच हज़ार, वह भी समझो, फ़ालतू खर्च करूँगी क्योंकि मुझे जरूरत नहीं है.' और उसकी नौकरी शुरू हो गई.
मैं दूसरे दिन उसे साथ लेकर चाँदनी चौक गई. बीच रास्ते में घबरा कर बोली, 'रोकिए, रोकिए, जल्दी।' मैंने कार रोकी, कार को अनलॉक किया। उसने अपनी तरफ का दरवाज़ा खोल कर बाहर सड़क पर औक औक उलटी कर दी. किसी तरह रुकते-रुकाते हम वापस नॉएडा पहुँचे।
अगले दिन फिर मैंने उसे कार में बैठने के लिए कहा, मुझे लाजपत नगर जाना था. वह बोली, 'मैम, क्यों ना हम बस में चलें? मुझे कार में उलटी आती है.' मुझे यह कहावत याद आई, नरक का कीड़ा नरक में खुश. मैंने कहा, 'सीता, मैंने ज़रूरत न होते हुए भी तुम्हें काम पर रखा. तुम्हें काम करना है तो अपनी कोई तो उपयोगिता सिद्ध करो.' बोली, 'मैम मैं आपके बुटीक में तुरपाई का काम कर सकती हूँ, साड़ी में फॉल लगा सकती हूँ.' 'पर उसके लिए तो लोग हैं,' मैंने कहा और उसे लेकर दुकान से घर आ गई. घर आकर मैंने उससे पूछा, 'चाय बनानी आती है?' उसने खुश हो कर चाय बनाई, ढाबा टाइप, कम पत्ती को कढ़ा-कढ़ा कर ज़्यादा दूध की. हमें लाइट चाय पीने की आदत थी, फिर भी अच्छी लगी. अगले दिन बोली, 'मैम, मैं आपके घर खाना बनाने का काम कर सकती हूँ.' हमारी खाना बनाने वाली उन्हीं दिनों गाँव गई थी. घर का अन्य पूरा काम करने के लिए एक काम वाली थी जो संयोग से उस दिन छुट्टी पर थी. सीता ने खाना बनाया, बेहद स्वाद। बरखा और बच्चों को भी वह पसंद आई क्योंकि वह गुड लुकिंग, अच्छे कपड़े, साफ़-सुथरी, बोलने में ठीक-ठाक थी. गाँव की है पर लगती नहीं, शान से कहती है, 'मैं दसवीं पास हूँ.'
फिर कुछ दिन बाद बोली, 'मैम, पाँच हज़ार में मेरा पूरा नहीं पड़ता। मैं आपके घर का सारा काम करूँ तो? आप दूसरी कामवाली को हटा कर उसकी तनख्वाह मुझे दे दें.' वैसे उसका पति ठीक-ठाक कमा लेता था, तीन बच्चे थे. सीता की उम्र इतनी अधिक नहीं थी, उसने बताया था, अट्ठाइस साल. सीता अच्छे घर की थी, अच्छे कपड़े पहनती थी, अपने हिसाब से सज कर रहती थी, दसवीं पास थी, और उसने गुरूर के साथ बताया था कि 'मैं ब्राह्मण हूँ, सीता शर्मा।' मैंने पूछा, 'तुम बर्तन माँजना, झाड़ू पोछा, कपड़े धोना, ये सब कैसे करोगी?' वह बोली, 'अपने घर में नहीं करती क्या? यह भी तो मेरे घर जैसा है. और फिर तनख्वाह भी तो बढ़ेगी।' मैंने दूसरी कामवाली से पूछा, उसे काम छोड़ने में कोई ऐतराज़ नहीं था. और सीता ने हमारा पूरा घर सँभाल लिया। हमारे घर में सब आलसी। कोई हिलना न चाहे। खाने की थालियाँ सब के पलँग पर पहुँचने लगीं। डायनिंग टेबल बच्चों की किताबों से भरी रहने लगी. घर का हर सदस्य सीधा उसी से कहने लगा, कब क्या चाहिए। वह सबके लिए तैयार। यहाँ तक कि हमारी अलमारियाँ, कबर्ड में कपड़े सलीके से रखने की ज़िम्मेदारी भी उसी की. भई, बहुत काबिल लड़की है. हम सबने एक सुर में कहा और चैन की साँस ली.

कुछ-कुछ दिन बाद याद दिलाती रहती थी, 'मैम, मैं ज़रूरत की वजह से नौकरी कर रही हूँ, मेरे घर का कभी कोई आ जाए तो कहना नहीं कि मैं यह काम कर रही हूँ, कहना कि मैं आपकी दुकान में नौकरी करती हूँ.' साथ ही यह कहना भी ज़रूरी समझती है, 'मैं दसवीं पास हूँ, मैम, मैं ब्राह्मण हूँ. मेरा पूरा नाम सीता शर्मा है.' मैं उसकी इस बात का जवाब देती, 'ठीक है, तुम ऊँची जात की हो, तुम ब्राह्मण हो. पर बार-बार यह बात क्यों बताती हो? हमारे साथ हमारे पलंग पर बैठती हो, कुर्सी पर बैठती हो, डाइनिंग टेबल पर खाना खाती हो. सबसे बड़ी बात यह कि हम सब अब तुम्हारे काम के मोहताज हैं.'
तीन महीने काम करने के बाद बोली, 'मैम, मेरी तनख्वाह कम है.'
मैंने पूछा, 'कितनी होनी चाहिए?'
'कम से कम पंद्रह हज़ार तो हो.'
'सपनों में मत जी लड़की, काम करेगी बर्तन माँजने का और तनख्वाह चाहिए दफ्तरों वाली? कहीं यह न हो कि ज़्यादा पाने की ख्वाहिश में जो मिल रहा है, वह भी छिन जाए? कहीं और इससे ज़्यादा तनख्वाह मिले तो चली जाना।'
बीच-बीच में नखरा दिखाएगी, 'बस, मैं छोड़ दूँगी।' मैं कहूँगी, 'देख, न तूने हमें छोड़ना, न हमने तुझे छोड़ना, इसलिए अपना बोलने का शौक यूँ न पूरा किया कर.'
लाड़ भी कम नहीं करती. मेरी माँ की तरह आकर मुझसे बोलेगी, 'चाय पड़ी-पड़ी ठंडी हो जाती है और आपको पीना ध्यान ही नहीं रहता। इस मरे कम्प्यूटर को फ़ेंक दूँगी एक दिन.'
एक दिन बोली, 'मैम, मैं यहाँ बहुत खुश हूँ.'
खुश क्यों न होगी बेटा, हमारे साथ हमारे बराबर सोफे पर बैठती है, मेज़ पर खाना खाती है, अकेला बाथरूम मिला हुआ है, नीचे वाले खन पर (मंज़िल पर) तेरा एकछत्र राज्य है, कोई कुछ कहने-पूछने वाला नहीं, मज़े कर. मैंने सोचा।
वह बोली, 'यहाँ आकर समझो, मुझे अपने आदमी से छुटकारा मिल गया.'
'वह कैसे?' मैंने पूछा।
'उसकी रात की ड्यूटी होती है, दिन में घर में रहता है. हर समय आदमी सामने रहे, मुझे अच्छा नहीं लगता.'
मैंने आगे कुछ नहीं कहा. हमें अपने काम से काम, क्या करना है किसी में घुस कर.
उसे सिरदर्द की अक्सर शिकायत रहती। माथे पर कपड़ा बाँध कर काम में लगी रहती। रोज़ हमसे सिरदर्द की गोली माँग कर खा लेती। मैं कहती, 'ऐसा कैसे चलेगा, सीता?' वह कहती, 'मैंने गाँव में डॉक्टरों को दिखाया पर ठीक ही नहीं होता। मैं अपने घर में भी ऐसे ही काम करती हूँ, आप मुझे इस वजह से हटा न देना।'
मैंने बॉबी से कहा, इसे किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा दो. बरखा ने डॉक्टर से अगले दिन मिलने का समय लिया। उसके घर जाने के बाद हमें याद आया कि पहले वाले डॉक्टरों के यदि कोई पर्चे हों तो कल आते हुए ले आए. मैंने उसे फ़ोन किया। पहले एक लड़के ने उठाया, बात के अंदाज़ से बड़ा उजड्ड लगा. उसे मेरी बात समझ नहीं आई. उसने फोन एक अन्य लड़के को दिया, वह पढ़ा-लिखा लगा, सभ्य तरीके से बोला, 'आपके यहाँ आने के लिए तैयार हो रही हैं.' मैंने उसे सन्देश दिया कि डॉक्टर के पर्चे, यदि कोई हों तो. ले आए.
उसके आने पर मैंने पूछा, 'यह जो पहले बोला, बड़ा उजड्ड सा था और दूसरा पढ़ा लिखा लगा, इनमे तेरा पति कौन सा है?'
'मैम, जो उजड्ड लगा, वह मेरा पति था. दूसरा पढ़ा-लिखा मेरा देवर था, जिसके बारे में मैंने आपको बताया था ना कि उसने पॉलिटेक्निक से इंजीनियरिंग की है, नौकरी ढूँढने के लिए आया हुआ है. देवरानी भी आई हुई है.'
'अच्छा, अच्छा……'
'मैम, देवर को मेरे काम के बारे में बताया तो नहीं? मैंने सबसे कहा हुआ है कि दुकान में नौकरी करती हूँ वरना सब मेरी खिल्ली उड़ाएँगे।
'नहीं।'
'मैम, मेरे नसीब में भगवान ने उजड्ड ही लिखा था. बोलेगा तो हबड़-हबड़, खाएगा तो चपड़-चपड़, चलेगा तो लपड़-लपड़.'
'कमाल है सीता, तू तो कविता करने लगी.'
'आपके साथ रह कर कविता भी सीख जाऊँगी।'
'पति के बारे में ऐसे नहीं कहते।'
'पति जैसा पति तो हो, मैम. आप ही बताओ, कैसे छुटकारा पाऊँ?'
'एक तो तू तीन बच्चे पैदा करके बैठी है. खैर, यह बता, क्या शराब में पैसा उड़ाता है?'
'नहीं, ऐसा कोई ऐब नहीं है उसमें।'
'क्या तुझे मारता-पीटता है?'
'अजी, हाथ तो लगा कर देखे।'
'क्या तुझे नौकरी करने से मना करता है?'
'नहीं, इससे तो वह खुश है कि घर में पैसे आ रहे हैं. बल्कि रात की ड्यूटी होने से अच्छा है कि दिन में बच्चों को देख लेता है.'
'तो तेरी समस्या क्या है? आराम से रहती रह.'
'मैम, मुझे उसका हबड़, चपड़, लपड़ नहीं पसंद आता.'
'ओह्हो सीता, तू हूर की परी है क्या? किसी राजा-महाराजा के खानदान में पैदा हुई है? तेरे इतने नखरे क्यों हैं?'
मैंने उसे डाँट के चुप कर दिया लेकिन जब भी मौका मिलता है, उसका पति-पुराण शुरू हो जाता है. वैसे हँसती बोलती रहती है, सिर का दर्द धीरे-धीरे ठीक हो रहा है, डॉक्टर के कहने से चश्मा लग गया है. और सबसे बड़ी बात, हम सब उसके भरोसे हैं. जिस दिन वह छुट्टी करती है, खाना बाज़ार से आता है. वह कहावत है ना, तू भी रानी, मैं भी रानी, कौन भरे कूए से पानी? कौन जाने, कभी पंद्रह हज़ार पर अड़ ही जाए तो मेरे पुत्र और पुत्रवधु ने यही कहना है, 'मम्मी, दे दो, रुपये तो हम फिर कमा लेंगे, पर ऐसी कामवाली दूसरी नहीं मिलेगी।' मेरे पुत्र का तो, खैर, यह स्लोगन है, 'कीमत काम का नहीं, कम्फर्ट की होती है.' काम करने वाले अगर चोरी भी करें (यह लड़की तो खैर ऐसी नहीं है), तो पुत्र का कहना होता है, 'थोड़ी बहुत चोरियाँ तो इनकी तनख्वाह में शामिल समझो। बर्दाश्त करो.'
जय हो मेरे घर के निकम्मों की.

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