Thursday, 20 November 2014

1. एक भावचित्र : मेरा मरना। और पुनः मरना

1. एक भावचित्र : मेरा मरना। और पुनः मरना

मैं सन्यासी थी. मेरे सन्यास का अर्थ शब्दकोष में नहीं था. मेरा सन्यास दुनिया के भोग में था, दुनिया के त्याग में नहीं। मेरे आसपास लोग थे पर मैं लोगों में नहीं थी. मैं एक कमरे में बंद थी पंच तत्वों के साथ. पर पृथ्वी पर मेरे लिए एक शांत कोना नहीं था, आकाश में फहराने के लिए सपने मेरे पास नहीं थे, जल का आप्लावन मेरे नेत्रों में था, वायु गर्द उड़ा-उड़ा कर लाती और मेरे चारों ओर बिखेर देती, अग्नि भस्मातुर थी हर पल. मेरी इन्द्रियाँ संवेदनाशून्य थीं, मैं गूँगी-बहरी थी, मेरे स्वाद मर चुके थे, घ्राण-शक्ति सुप्त थी, मन स्पर्शित होना भूल गया था. मेरे सामने अनेक प्रकार के व्यंजन थे लेकिन मैं खा नहीं पाई. भूखे रहना मेरी नियति थी. मेरे सामने अनेक प्रलोभन थे लेकिन मन आकर्षित होना भूल चुका था. मेरे पास अनगिनत वस्त्र थे, सबका रंग केवल एक था, जोगिया। आभूषणों का आभूषण था, रुद्राक्ष। एक ही शब्द सुनती थी बार-बार, माँ. एक ही शब्द बोलती थी बार-बार, हाय. हाथ में हर वक़्त गरल, साँस हर वक़्त गले में अटकी। मैं जंगलों में, पहाड़ों में भाग जाना चाहती थी पर मेरे पाँवों में मोह की बेड़ियाँ थीं. बाहर उजाले थे, मन में अँधेरे। मैं नहीं थी वहाँ, जहाँ मैं थी. मैं वस्तुतः कहीं नहीं थी. जहाँ मैं दिखती थी, वहाँ मेरा शरीर दिखता था, मैं नहीं। जहाँ मैं होती थी, वहाँ मेरा शरीर होता था, मैं नहीं। मेरा जीवन भरा-पूरा था पर मैं खाली। मैं भीड़ में थी पर मेरे अंदर सन्नाटा था. मेरे चारों ओर मधुर संगीत था पर भीतर मर्सिया तैर रहा था. मैं दिनों को गिनती थी, दिन मुझे गिनते थे. दिनों की पहचान मेरे चेहरे पर उतरने लगी. मैं धीरे-धीरे खुद को मरता हुआ देख रही थी. मैं खुद अपने सामने मर रही थी. मेरा शव मेरे सामने पड़ा रहता और मैं मुक्ति की सुविधा की तलाश में इधर-उधर भटक रही होती।

कि तभी…… कि तभी…… मेरे हाथों ने अजीब सी छुवन महसूस की, मेरे कानों में कोई नई सी धुन गुनगुनाई, मेरा आसपास खुशबू से महक उठा, मेरे होंठ कुछ कहने के लिए फड़फड़ाने लगे, मेरी आँखों में सपने लहराने लगे. मेरी इन्द्रियों को जागृत होने का वरदान मिला। पृथ्वी ने मुझे अपने में समो लिया, आकाश ने मुझे अपनी बाहों में समेट लिया, जल पछाड़ें मार-मार कर मुझे भिगोने लगा, वायु में चन्दन और गुलाब की खुशबू, अग्नि चाहे तो पूरा जला ले मुझे और मैं उफ़ न करूँ। मैं पंचतत्व में विलीन होती चली गई. मैं सँवरने लगी, मेरा मौन टूटा, ब्रह्माण्ड में ज्यों विस्फोट हुआ, मेरे भाव कविताएँ बन कर बिखरने लगे, मेरे शब्द कहानियाँ बन कर टहलने लगे. मेरे अंग-अंग में चंचलता उग आई, मेरे रोम-रोम से प्रकाश की किरणें फूटने लगीं, मेरे मन के अँधेरे दूर होने लगे, मुझे साफ़ दिखने लगा, मेरी चाल मस्ताने लगी, मैं रंगबिरंगे कपडे सिलवाने लगी, गहने-दर-गहने गढ़वाने लगी. मैं अपने खोल से बाहर आई, दुनिया बहुत रंगीन थी, यह जग बहुत आकर्षक था. मैं जाग गई, मैं ज़िंदा हो गई, मेरा पुनर्जन्म हुआ. ओह ! मैं इतने साल मरी कैसे रही?

और फिर सब थम गया, सब ठहर गया, वहीँ का वहीँ, वैसे का वैसा, मैं वापस अपने खोल में, मैं वापस उसी खोह में, दूसरी मौत मरने के लिए, दूसरा सन्यास भोगने के लिए, पर एक झुरझुरी है उसकी छुवन की, जो जाती नहीं।

(मणिका मोहिनी) फोटो मा जीवन शेफाली के पेज 'नायिका' से साभार


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