Tuesday, 25 November 2014

5. एक भावचित्र : आर्तनाद

5. एक भावचित्र : आर्तनाद

मन प्रश्नाकुल है. प्रश्न अनंत हैं, उत्तर एक नहीं। उत्तर ही प्रश्न की नियति है. प्रश्न निःशब्द हो जाता है उत्तर पाकर, अन्यथा रेंगता रहता है मानसिक शिराओं में, खोखला करता रहता है खुशियों को, दिन प्रति दिन.

वह मुझ तक आया छुप कर, अपने को छुपाता हुआ. मैं उस तक गई छुप कर, अपने को छुपाती हुई. वह राजा नहीं, रंक था, मेरे जीने का एक अलग ही ढंग था. मैंने उसकी बेचारगी को सर-माथे लिया, उसके हर दुःख को अपना बना कर जिया। वह सच नहीं, सपना था. साकार नहीं, निराकार था. वह सपना बन कर बहा मेरी शिराओं में. वह निराकार होकर पल-पल रहा मेरे साथ. कितनी अजीब बात.

न वह मुझसे प्यार करता है, न मुझे अपने से करने देता है. न वह मुझसे मिलना चाहता है, न मुझे अपने से मिलने देना चाहता है. न वह मुझसे कुछ कहना चाहता है, न मेरा कुछ सुनना चाहता है. न वह मुझसे कुछ लेना चाहता है, न मुझे कुछ देना चाहता है. फिर भी न वह मुझे छोड़ना चाहता है, न मुझे अपने को छोड़ने देना चाहता है. रखना चाहता है अपने साथ. कितनी अजीब बात? कहता है, 'मेरे कबीले में जो एक बार आ जाता है, मैं उसे कभी अपने से दूर नहीं जाने देता। तू मेरे कबीले में है, इसलिए रहेगी हमेशा मेरे साथ.' कितनी अजीब बात. यह साथ होना भी कोई साथ होना हुआ?

मैं उसे बुलाती हूँ, वह आता नहीं, आ ही नहीं सकता। मैं उससे कहती हूँ, 'आजा. सारी सलाखें तोड़ कर आजा. बस, एक बार आजा. मैं सूख कर लकड़ी हो गई हूँ, मेरी आँखों की रोशनी कम हो गई है, मेरे बाल झड़ गए हैं, मेरा शरीर मुरझा गया है, मेरे अंगों में काँटे उग आए हैं, मैं मैं नहीं रही, सूखा हुआ वृक्ष हो गई हूँ, जिसमे अब कोई फूल-पत्ता नहीं उगेगा।' पर उसे कुछ नहीं सुनाई देता। जैसे उसकी श्रवण शक्ति क्षीण हो गई हो, जैसे मौन उसकी धमनियों में जम गया हो, जैसे शब्दों से उसका बैर हो गया हो. उस तक मेरी कोई आवाज़ नहीं पहुँचती। चीख रहा है मेरा आर्तनाद। सच, कितनी अजीब बात.

उसकी नादानियों का मैं प्रायश्चित करूँगी। अब मैं कविता को कविता में नहीं, गद्य में लिखूँगी।
(मणिका मोहिनी) चित्र नायिका / शेफाली के सौजन्य से


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