Tuesday, 11 November 2014

Gazal 41

Gazal 41

आए थे तुम ख़ुशी-ख़ुशी, अब ख़ुशी-ख़ुशी प्रस्थान करो.
मैं माँगू सुख-चैन तुम्हारा, तुम मेरा सम्मान करो.

अब कैसा संदेह साथी, अब कैसा है मन में द्वन्द
मन की आँखें खोलो तुम और सच का मत अपमान करो.

जिस दिन तुम मोह दोगे छोड़, जिस दिन तुमको होगा ज्ञान
उस दिन खुल जाएँगे दरवाज़े, इतना संज्ञान करो.

तुमने खुद बिखराए काँटे, अपनी राहों पर जब-तब
क्या चुनना है, क्या गुनना है, चतुराई से ध्यान करो.

जहाँ भी बैठे हो किस्मत से, वहीँ तुम्हें अब रहना है
अलग-अलग नामों को रख कर मत अपनी पहचान करो.

अब इससे भी बड़ी कौन सी और सजा तुम पाओगे?
अच्छे-अच्छे काम करो और पुण्य पर अभिमान करो.

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