Thursday, 13 November 2014

Gazal 42

Gazal 42

याद तुम्हारी जब-जब आई, शाम सुहानी और हो गई.
शब्द तुम्हारे दौड़े आए, अजब रवानी और हो गई.

एक सिलसिलेवार कहानी टूट गई बातों-बातों में
ज्यों ज्यों चोट लगी इस दिल पर, मधुर निशानी और हो गई.

घमासान हर वक़्त छिड़ा है, हाँ और ना के बीच फँसी
पहले भी न मान था कोई, अब बेमानी और हो गई.

दुनियावी चीज़ें न भाएँ, दिल में नहीं दखल बुद्धि का
भीतर है घनघोर ज़लज़ला, बाहर ज्ञानी और हो गई.

छलछल कितना पानी है जो, ढल-ढल जाता है आँखों से
फिर भी निस-दिन सूख-सूख कर, यह मरजानी और हो गई.

दिन भर सोए, जगे रात भर, बोले तो किस से क्या बोले
पहले ही कुछ दीवानी थी, अब दीवानी और हो गई.

No comments:

Post a Comment