Thursday, 6 November 2014

तुम्हारा प्यार Kavita 219

तुम्हारा प्यार

तुम्हारे प्यार की उम्र बहुत लम्बी है
मरने के बाद भी
ज़िन्दा है
रोम-रोम में.

तुम्हारा प्यार अमृत बन कर आया 
गरल बन कर
घूँट-घूँट उतरा
मेरे भीतर।

तुम्हारा प्यार कितना कच्चा था
टूटते-टूटते
आखिर टूट ही गया
किरचें बिखरी हैं.

तुम्हारा प्यार मीठे सपनों सा
पावन रस्मों सा
दुःस्वप्न लिख गया
मेरी हथेली पर.

तुम्हारा प्यार ज्ञान का कोष था
एक ही झटके में
समझा गया
ज़िन्दगी में मायने।

तुम्हारे प्यार की कला अपरम्पार
क्या थे तुम
और कहाँ बैठ कर
किया तुमने वार.

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