Friday, 7 November 2014

कविता में ढल कर Kavita 221

कविता में ढल कर

तुमने प्यार मुझे किया
और मिटटी में मिला दिया।
करिश्मा देखो
वह बीज बन कर प्रस्फुटित हुआ
अनेकों फूलों में
और मेरा जीवन
तुम्हारी खुशबू में गन्धाने लगा.

तुमने पत्र मुझे लिखे
और फाड़ कर हवा में उड़ा दिए.
शान देखो
उनसे बना एक बड़ा हवाई जहाज़
मेरे आसमान में
और मेरे सपनों को
देश-देश घुमाने लगा.

तुमने वादा मुझसे किया
और शीशे सा तोड़ दिया.
गज़ब देखो
उन टुकड़ों से बने कई चित्र
मेरी दीवार पर
और हर टुकड़ा तुम्हारा चेहरा होकर
मुझे लुभाने लगा.

तुम्हारे पास शब्द बहुत थे
जो कह कर तुम भूल गए.
मर्यादा देखो
उन शब्दों ने लाज तुम्हारी रख ली
मेरे कागज़ पर
और कविता में ढल कर
शब्द-शब्द मुस्काने लगा.

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