Wednesday, 24 December 2014

कोई सन्देश आए Kavita 225

कोई सन्देश आए

तुम्हारी बात में कुछ बात ऐसी
सहस्रों मन्त्र उच्चारित हों जैसे
कि ज्यों कानों में कोई गुनगुनाता।

तुम्हारे राजसी अंदाज़ ऐसे
अनेकों भेद अपने में छुपा कर
चला उन्मत्त दरिया छलछलाता।

तुम्हारे शब्द में हैं अर्थ मेरे
कहीं एक छद्म झोंका चाहतों का
मेरे कमज़ोर दिल तक सनसनाता।

हवाओं को पकड़ कर कैद कर लूँ
खुद अपने साथ तो हो लूँ ज़रा सा
कि हरियाला सा सपना लहलहाता।

कि जैसे रोशनी बंधक बनी हो
कि जैसे जीतने की धुन ठनी हो
कोई सन्देश आए खनखनाता।


Tuesday, 23 December 2014

Gazal 44

Gazal 44

आज भी आती है तुम्हारी याद उसी तरह
आज भी पुख्ता है पूरी बुनियाद उसी तरह.

कितनी खाई तुमने खोदी, कितनी खोदी मैंने
चलता आ रहा अब तक यही विवाद उसी तरह.

आओ, सबसे छुप कर हम दूर कहीं बस जाएँ
आज भी दोस्त हैं बने हुए जल्लाद उसी तरह.

मन का यह वीरान खंडहर रोशन ही रोशन
आज तुम्हारी यादों से आबाद उसी तरह.

आओ, प्रेम धरा पर हम घर का सपना बोएँ
दूर-दूर तक बिछी हुई है खाद उसी तरह.

शुरू शुरू में हम दोनों ने जैसे किया संघर्ष
आ, स्थापित करें प्रेम का नया वाद उसी तरह.

रोज़ घृणा का गरलपान कैसे करते हो?
आ, हाथ बढ़ा कर शुरू करें संवाद उसी तरह.

जितना जीवन जो साथ जिया गर अर्थहीन था
आ, हो जाएँ फिर से हम तुम बरबाद उसी तरह.


Monday, 22 December 2014

आज की प्रार्थना Kavita 224

आज की प्रार्थना

जीने की कोई चाह नहीं
मरने की कोई राह नहीं।

सूख गया आँखों का पानी
होठों पर कोई आह नहीं।

कोई मोल न सुख का, दुःख का
कोई भी अब परवाह नहीं।

काँटे कभी न जिसे चुभे हों
ऐसा तो कोई शाह नहीं।

जैसे सब कुछ बीत गया हो
बची कोई वाह-वाह नहीं।

Sunday, 21 December 2014

संयोग : बरखा मोहन

संयोग : बरखा मोहन

कई वर्ष पहले की बात है. मेरे पुत्र की नई-नई शादी हुई थी. पुत्रवधु बरखा एक सप्ताह रहने के लिए अपने मायके गई. जिस दिन वह गई, उसके अगले दिन मैं अपनी एक employee वंदना के साथ घर पर थी. हम दोनों अकेली थीं. घर में सुबह से ही बदबू आ रही थी, जैसे कोई चूहा मर गया हो. वंदना ने भी कहा, 'बहुत बदबू है, शायद चूहा मर गया है.' हम दोनों ने सारे घर का कोना-कोना ढूँढ लिया, कहीं ज़िंदा या मरे, कैसे भी चूहे के दर्शन नहीं हुए. बरखा कुछ भी ढूँढने के मामले में तेज़ है, हमें चीज़ नहीं मिलेगी, उसे मिल जाएगी। सो मैंने वंदना से कहा कि बरखा ही इस मरे हुए चूहे को ढूँढ सकती है, उसे ले आते हैं. और मैं वंदना को लेकर बरखा के मायके पहुँच गई. बरखा की माँ ने कहा, 'अभी कल ही तो आई है, कुछ दिन तो रहने दें, आप आज ही उसे लेने आ गईं.' मैंने सारी बात बताई और बरखा को लेकर घर आ गई. बरखा ने भी घर में घुसते ही कहा, 'हाँ मम्मी, बहुत बदबू है.' उसने भी ढूँढा पर उसे भी कुछ नहीं मिला। हमें समझ नहीं आ रहा था, हम क्या करें? 'चलो, चाय पीते हुए सोचते हैं,' मैंने कहा. बरखा चाय बनाने रसोई में गई, वहाँ उसे ज़्यादा बदबू आई. (मुझे तब तक रसोई में जाने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ी थी), उसने गैस जलाने से पहले देखा कि गैस सिलेंडर से चूल्हे तक आने वाली रबड़ की पाइप जगह-जगह से क्रैक हो रही है, जिसमें से छन कर गैस पूरे घर में फैली हुई थी. उसने सिलेंडर की नॉब बंद की (जो हम कभी बंद नहीं करते थे) और उसके थोड़ी देर बाद बदबू आनी बंद हो गई. यह संयोग ही था कि बरखा को फटी हुई पाइप नज़र आ गई और एक हादसा होने से टल गया.

आज भी उस बात को सोचती हूँ तो दहल जाती हूँ कि कहीं बरखा ने गैस जला ली होती और कोई बड़ा हादसा हो जाता, तो बरखा तो जान से जाती ही, मैं भी बच नहीं पाती, आज जेल में होती, बहु को जलाने के आरोप में. एक हफ्ते के लिए मायके में गई बहु को अगले ही दिन ले आना और उसी दिन इस तरह की दुर्घटना हो जाना, आखिर इन सब बातों का यही तो अर्थ निकलता ना? इस संयोग ने भगवान में मेरी आस्था दृढ की.


Saturday, 20 December 2014

16. एक भावचित्र : स्त्री-जीवन

16. एक भावचित्र : स्त्री-जीवन

क्या स्त्री का मूल्य उसके गर्भ-धारण करने की क्षमता के कारण ही है? जब वह गर्भ-धारण के योग्य नहीं रहती तो क्या पुरुष की दृष्टि में उसका मूल्य घट जाता है? माँ बनना स्त्री का भी सौभाग्य है. लेकिन यदि स्त्री अपने यौवन काल में ही माँ बनने की काबलियत न रखे या एक ख़ास उम्र पर पहुँच कर माँ बनने की काबलियत खो दे तो क्या वह पुरुष के प्रेम के योग्य नहीं रहती? क्या स्त्री-पुरुष प्रेम का अर्थ मात्र बच्चे पैदा करना है? क्या स्त्री-पुरुष प्रेम मात्र शारीरिक होता है? क्या केवल स्त्री का शरीर ही पुरुष को आकर्षित करता है? क्या स्त्री-पुरुष के मध्य शारीरिक ऐषणा के सिवा लगाव का अन्य कोई आधार नहीं होता? शरीर है क्या? आज जले, कल राख. आज महके, कल ख़ाक. आज लिखा, कल साफ़. प्रश्न अनेक हैं, अबूझ है, जैसे जीवन अबूझ है, विशेषकर स्त्री का जीवन।


Thursday, 18 December 2014

15. एक भावचित्र : प्रश्नाकुल मन

15. एक भावचित्र : प्रश्नाकुल मन

मन में अनेक प्रश्न उपजते रहते हैं. मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है. मन प्रश्नाकुल न हो तो प्राणी निर्जीव माना जाएगा। ज़िन्दगी में हर 'होना' किसी प्रश्न से जुड़ा है. उत्तर की सार्थकता तभी है जब वह किसी प्रश्न से निकले। यह सम्पूर्ण सृष्टि प्रश्न से निःसृत उत्तर ही तो है. कौन है अपना, कौन पराया? कभी अपना भी पराया लगता है और कभी पराया भी बहुत अपना। यह दुनिया बहुत खूबसूरत है. लोग भले हैं. लेकिन जब तक व्यक्ति 'एक' रहता है, तब तक 'अपना सा' रहता है. वही व्यक्ति जब भीड़ में शामिल हो जाता है तो घिनौना हो जाता है. भीड़ के चरित्र पर विश्वास नहीं किया जा सकता। कहते हैं ना, भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता। और जिसका कोई चेहरा नहीं होता, वह अनुत्तरित प्रश्नों से घिरा होता है. 'एक' को तो अपना लें, भीड़ को गले कैसे लगाएँ? उफ़ उफ़ उफ़ !


14. एक भावचित्र : मैं इंसान हूँ

14. एक भावचित्र : मैं इंसान हूँ

मैं चेतन हूँ, मैं चैतन्य से भरपूर हूँ क्योंकि मैं इंसानियत के क़र्ज़ से दबी हुई इंसान हूँ। न मैं अपने अतीत की यातना को विस्मृत कर सकती हूँ, न ही अपने भविष्य की चिन्ता से मुक्त हो सकती हूँ क्योंकि मैं जीती-जागती इंसान हूँ। इंसानी धर्म छोड़ दूँ तो जानवर कहलाउंगी। भूत-भविष्य याद न आएँ तो पागल ही हुई ना? नहीं, नहीं, मुझे अपनी समस्त यातनाओं और चिन्ताओं के साथ जीना है और इंसान बने रहना है। इंसान हूँ, इसीलिए मुझमें इंसानियत है। इंसानियत है, इसीलिए मैं दूसरों के दुःख भी अपनी आँखों से बहा लेती हूँ, दूसरों के कष्ट समेट कर अपने ह्रदय में रख लेती हूँ। ये सब मेरी अपनी यातना के क्षणों में मुझे दिलासा देते हैं कि देखो, तुम अकेली नहीं हो, हम सब तुम्हारे साथ हैं।


Wednesday, 17 December 2014

13. एक भावचित्र : सखी-संवाद

13. एक भावचित्र : सखी-संवाद

मेरी रहस्यमयी सखी, तुम कल्पना की मूर्ति बन कर जिओ, एक रहस्य बनी रहो, तुम्हें समझने की प्रक्रिया में जो आकर्षण है, उस आकर्षण में बड़ा आनंद है. आज के युग में तुम्हारा लेखन छायावादी युग की याद ताज़ा कर जाता है. रहस्यवाद को फिर से जीवित करने जा रही हो तुम. तुम्हारे लेखन में कोई उपदेश नहीं, कोई सन्देश नहीं, फिर भी न जाने क्यों, सूफी संतों की याद दिला जाता है. तुम जोगिया वस्त्र नहीं पहनतीं, फिर भी जोगन हो. तुम रंगों के साथ सन्यासिन हो. लगता है, किसी तो रंग में डूबी हो. तुम्हारा चेहरा स्वच्छ धवल चाँदनी सा, तुम्हारी आँखों में मातृत्व के सपने, तुम्हारी गोद में बच्चों की तड़प, तुम्हारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व भारतीयता का प्रतिनिधित्व करता सा. बताओ, तुम कौन हो? क्यों इतने गहरे डूब जाती हो तुम, बहुत गहरे कि वहाँ से तुम बचाव के लिए चिल्लाओ भी तो किसी को तुम्हारी आवाज़ न सुनाई दे? कुछ दबा हुआ है तुम्हारे मन में, कुछ उबल रहा है तुम्हारे भीतर, छुपाए नहीं छुप रहा है जो, तुम उछाल देना चाहती हो उसे सबके बीच. क्या दर्द का कोई गोला है, जिसे भीड़ को सौंप कर तुम मुक्त हो जाओगी? या ख़ुशी का कोई उपहार, जिसे सबसे बाँट कर तुम्हारी ख़ुशी दुगनी हो जाएगी? सखी, कौन से मुहूर्त का इंतज़ार है? थोड़ा करीब आओ, खुलो और अपने बारे में बताओ कि तुम कौन हो? किस देश से आई हो? तुम्हारे मौन ने मुझे आकर्षित किया है, अब तुम्हारी बातों के जादू में से तुम्हें ढूँढ कर लाना चाहती हूँ. शायद तुम्हारी कहानी में कुछ ऐसा हो जो मुझे एक नई कहानी लिखने की प्रेरणा दे.


Tuesday, 16 December 2014

Gazal 43

Gazal 43

शाख से फूल झर रहा है कोई.
यूँ दिल से उतर रहा है कोई.

चैन को ढूँढ रहे थे तो लगा
तकलीफ बन गुज़र रहा है कोई.

सुर और ताल में चतुराई से 
शोक-संगीत भर रहा है कोई।

प्रेम का किस्सा चूर-चूर हुआ
काँच बन कर बिखर रहा है कोई.

जिन यादों में ज़िन्दा रहता था
उन यादों में मर रहा है कोई.

Monday, 15 December 2014

आलोक मिश्र

आलोक मिश्र

फेसबुक से मुझे एक मित्र मिला, आलोक मिश्र। मुझसे लगभग आधी उम्र का है लेकिन उसका मुझसे बातों में इतना दिल मिलता है कि पूरा दिन बतियाता रहे तो न ऊबे, यह उसी ने मुझे बताया। (मैं इतनी बातें किसी से नहीं कर सकती, बीच-बीच में विरक्ति आ घेरती है और बाद में अफ़सोस करती हूँ कि मैं क्यों इतना बोली?) कहता है, उसे दो मित्र बहुत पसंद हैं, "मैम आप और ध्रुव गुप्त सर." वह दो बार मेरे घर ध्रुव गुप्त सर के साथ ही आया और बाद में कुछेक बार अकेला। व्हाट्सऐप पर बहुत बातें करता है. उर्दू शायरी का शौक़ीन है, अपने लिखे और दूसरों के लिखे शेर सुनाता है, बहुत भावुक है, कहीं जैसे डूबा रहता है. अपने परिवार के किस्से सुनाता है, जिनमे से कुछ पर कहानी लिखने का मैंने उससे वादा किया है. कोई एक लड़की कभी अच्छी लगी थी, उसका दुःख भी गाता है. अस्थायी रूप से दिल्ली में कहीं रहता है. आजकल अपना फेसबुक अकाउंट बंद किए हुए है, कहता है, हर तरफ से मन ऊब गया. असल में जब स्वास्थ्य ठीक न हो तो कहाँ कैसे मन लगे?

आलोक कई महीनों से बहुत बीमार चल रहा है, अपने गाँव में इलाज के लिए गया हुआ है. फोन पर और व्हाट्सऐप पर नियमित सम्पर्क बनाए हुए है. उसकी बातचीत में हर बार ध्रुव जी का ज़िक्र भी ज़रूर होता है, जैसे मेरी, उसकी और ध्रुव जी की एक टीम हो.

"ध्रुव सर कैसे हैं? आपकी कभी बात हुई?"

मैं उसे हर बार बताती हूँ, "आलोक, मेरी और ध्रुव जी की कभी बात नहीं होती। बस, एक बार ध्रुव जी ने तुम्हारा हाल पूछा था."

मुद्दे की बात यह कि इन दिनों वह बहुत बीमार है. एक बार बोला, "मैम, मैं बचूँगा नहीं।"

मैंने कहा, "आलोक, जब मैं कैंसर से बच गई, तो तुम इस छोटी-मोटी बीमारी से क्यों नहीं बचोगे? चिन्ता न करो."

(मैंने आज उससे कहा है, अपना फेसबुक खोल लो। शायद खोल ले. आज बताया, उसका स्वास्थ्य बेहतर है.)

बोला, "एक ज्योतिषी ने बताया है कि 2018 में मेरी मृत्यु होगी। वैसे मैं ज्योतिषियों पर ज़्यादा विश्वास नहीं करता।"

"अरे, अभी चार साल पड़े हैं, यह चार साल मज़े में जिओ. मुझे भी ज्योतिषी ने बताया है कि मेरी मृत्यु 2017 में होगी।" मैंने कहा.

तपाक से बोला, "मैम, बस आप अपनी मृत्यु को एक साल और रोक लेना, फिर 2018 में हम दोनों साथ मरेंगे।"

हे भगवान ! मेरा इतना दुलार करने वाला बच्चा-दोस्त मुझे फेसबुक से मिला।

Friday, 12 December 2014

12. एक भावचित्र : एक पैग़ाम, प्रेमी के नाम

12. एक भावचित्र : एक पैग़ाम, प्रेमी के नाम

मेरे प्रेमी ! तुम मेरे जीवन में मुझसे प्रेम करने नहीं आए थे. तुमने प्रेम किया ज़रूर था लेकिन वह तुम्हारा ध्येय नहीं था. तुम्हें खुद नहीं मालूम था कि तुम्हारा ध्येय क्या था. बस, जैसे तुम आँख मूँद कर चल रहे थे, और मैं आँख मूँद कर तुम्हें स्वीकार रही थी. सच तो यह है कि तुम प्रेम के बहाने मुझे इस संसार की रीत समझाने आए थे, मुझे मुझसे जुड़े अन्य रिश्तों की असलियत बताने आए थे, मुझे दुनियादारी का भान कराने आए थे. तुमसे मिलने के बाद यानि तुमसे मिल कर बिछड़ जाने के बाद मैं तुमसे पुनः-पुनः मिलने के लिए तो तड़पी ही, लेकिन उससे भी ज़्यादा तड़पी कुछ सत्यों के उन रहस्योद्घाटन पर जो तुम्हारे आने के कारण खुले। मेरे प्रेमी ! मेरे जीवन में तुम्हारा प्रवेश बिना किसी मकसद के नहीं था. मकसद भी सिर्फ इतना मकसद नहीं था कि तुम्हारी प्रेरणा से मैं सृष्टि को रच लूँ या मेरी प्रेरणा से तुम किसी सृष्टि की रचना कर लो. नियति ने एक बड़े मकसद से तुम्हें मेरे पास भेजा था. मैं अँधेरों में जी रही थी, अँधेरों को प्रकाश समझती थी, स्वाभिमान में चूर रहती थी, अहम् ब्रह्मोsस्मि का मन्त्र मेरी रग-रग में बसा हुआ था, मुझे कोई हरा नहीं सकता, मुझे कोई मार नहीं सकता, मैं अजेय हूँ, मैं प्रश्नातीत हूँ, मैं सुंदर हूँ, मैं श्लील हूँ, मैं 'मैं' हूँ, क्योंकि मेरे समस्त अपने मेरे साथ हैं. मुझे अपने से ज़्यादा अभिमान था मेरे अपनों पर. लेकिन तुम आए तो मेरे सारे अपनों के चेहरों से मुखौटे उतर गए. जब तुम मेरे जीवन से गए तो तुम भी एक मुखौटा मेरे पास छोड़ गए. लेकिन यह भी सच है कि यदि तुम मेरे जीवन में नहीं आते तो मैं बहुत कुछ जानने से वंचित रह जाती। मैं नहीं जान पाती कि ह्रदय के कितने तल-अतल होते हैं, जिनमे छिप कर रहते हैं कोमल भाव, अतृप्त इच्छाएँ, फुंकारती हुई वासनाएँ, जिन्हें हम उम्र के साथ मरा समझ लेते हैं. मैं नहीं जान पाती कि रिश्तों में कितने छल-छद्म होते हैं. मेरे प्रेमी ! तुम धन्य हो, तुम जीवन में मेरे सबसे बड़े शिक्षक रहे.


Monday, 8 December 2014

मोहातीत

मोहातीत

वैरागी होना आसान है क्या? वैराग की राह में राग ही रोड़े नहीं अटकाता, जीवन के कड़वे यथार्थ भी अकेलेपन में खरोंचते रहते हैं. राग से मुक्ति संभव है, लेकिन जीवन की कड़वी सचाइयों को बर्दाश्त करने के लिए खुद को भीड़ में झोंक देना ही एकमात्र उपाय हो सकता है. काश, अपने आप में जीना फिर से सीख पाती, जैसे पहले तेरह साल एकांतमना रही? लेकिन वह एकान्तवास भी वर्षों के मानसिक ऊहापोह के बाद आया था, जिसमें भीतर कितना कुछ खंडित हुआ था, जो चाहे बाद में असीम तृप्ति में बदल गया था, लेकिन एक त्रासदी से गुजरने के बाद. वह बीच के खंडन का समय, उफ़, उस तकलीफ से दोबारा कैसे गुज़रूँ? कहीं और से घटने के लिए, फिर से जोड़ रही हूँ खुद को आप सबसे, आप सबके बहाने खुद खुश रहने के लिए. दो दिन के अथाह मंथन के दौरान मैंने पाया कि फेसबुक जैसा आश्रय अन्य कोई नहीं। दो दिन का अकेलापन सहा नहीं गया? नहीं, यह बात नहीं, अभिव्यक्ति का भी शौक नही, बस, खुद को व्यस्त रखने के लिए अभिव्यक्त होना है. ज़िंदा रहने से बड़ा अन्य कोई स्वार्थ नहीं। लीजिए, मैं फिर हाज़िर हूँ, अपनी गर्मागर्म प्रस्तुतियों के साथ।

ऐसा बदनसीब कौन होगा जिसे अपनापन नहीं चाहिए? ऐसी बदनसीब मैं हूँ। हर बार अपनापन मिल-मिल कर छिटकता रहा, इसलिए एकांत में जीने की आदत हो गई है। मित्रों, यह अच्छा है कि यह आभासी दुनिया है, यहाँ रिश्ते निभाने की कोई मजबूरी नहीं है. मेरे लिए यह बात सुविधाजनक है क्योंकि मैं निरन्तरता में कोई भी मित्रता निभाने में नाकाबिल हूँ. बहुत अधिक चिपका-चिपकी मुझमें उदासीनता भर देती है। मैं फेसबुक से ऊबी ही इसलिए थी कि कई मित्र (स्त्री हो या पुरुष) मुझसे मित्रता में नैरन्तर्य चाहते थे, यानि मैसेज में जो बात हमने कल जहाँ छोड़ी थी, आज वहीँ से शुरू करें तथा रोज़ नमस्ते, कैसी हैं, खाना खाया? हमने आज यह किया, वह किया, मैंने यह प्यार किया, वह लड़ाई की, रोज़ एक बार बात ज़रूर कर लिया करें मैम, हमें शक्ति मिलती है, आदि आदि. दोस्तों, मैं कितनों से बात करूँ? मेरी क्षमता का भी तो ख्याल करो. आप मुझे इस मामले में बदनसीब कह सकते हैं कि मुझे यहाँ किसी के अत्यधिक अपनेपन की चाह नहीं है. मेरे तईं अपनेपन की बस यह परिभाषा है कि हम एक-दूसरे के प्रति ईमानदार रहें, आप मेरी इज़्ज़त करें, मैं आपकी इज़्ज़त करूँ, न आप मेरी बुराई करें, न मैं आपकी बुराई करूँ और हम सब विचारों में कहीं थोड़ा तो मेल खाते हों. हम यहाँ इसीलिए मित्र हैं कि हम एक-दूसरे के लेखन में, पाठन में रुचि रखते हैं, बस. मित्रों, कमी आप में नहीं, कमी मुझ में है कि बहुत ज़्यादा मीठे से मुझे उबकाई आ जाती है. इस कमी के बावजूद मैं लिहाज-लिहाज में बहुत दूर तक, ऊबने की हद तक निभाए चली जाती हूँ और इस कारण के कारण मुश्किल से अमित्र कर पाती हूँ। इसका अर्थ यह नहीं कि मुझे मित्रों की ज़रूरत नहीं है. आखिर मैं भी इंसान हूँ, मुझे भी सबसे हँसना-बोलना अच्छा लगता है, मैं मैसेज में बात भी करती हूँ, लेकिन जिसे कहते हैं ना स्पेस, यानि निजता, वह बरकरार रहनी चाहिए, उसे कोई न छेड़े। जिन्हें प्यार की जरूरत है, उन्हें प्यार दो, जो प्यार नहीं चाहता, उसे उसके हाल पर छोड़ दो. दोस्ती की रस्सी को बहुत ज़्यादा कसोगे तो टूट जाएगी।

Saturday, 6 December 2014

11. एक भावचित्र : प्रभु की माया

11. एक भावचित्र : प्रभु की माया

कई बार जब लगने लगता है कि बहुत सुखी हूँ, बहुत खुश हूँ, तो भगवान फिर से रोने के इंतज़ाम कर देता है. पता नहीं, उसे अपने ही बनाए हुए बन्दों के रोते हुए चेहरे क्यों अच्छे लगते हैं? वैसे यह सही है कि यह दुनिया ज़्यादातर रोते हुए लोगों की है. प्रभु की माया, उसे इंसान का हँसता हुआ चेहरा कभी रास नहीं आया. उसके पास बारिशों की कमी थी क्या जो उसने लोगों की आँखों से आँसुओं की झड़ी लगा दी? फूलों कर साथ काँटे बना कर उसे तसल्ली नहीं हुई जो उसने इंसान के जीवन में भी काँटे उगा दिए? 'जंगल में मंगल' की कहावत हमने गढ़ी, लेकिन वह दिलों की बसी-बसाई दुनियाओं को जंगल में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। क्या वह इतना बेअकल है कि उसने अपनी ही बनाई दुनिया को दुखों की आग में झोंक दिया? कुछ तो है, कुछ तो है, वह कुछ तो फ़ितूरी है, जिसके सारे किए-धरे को हम अपने कर्मों का फल मान कर उसे माफ़ करते आए हैं. और कोई चारा भी तो नहीं। वह दिखे तो उसे उसके किए की कोई सजा दें. पर वह दिखता ही तो नहीं।

वह भी एक समय था, जब मैं सुखी थी, बहुत सुखी। खुश थी, बहुत खुश. तब तक के सारे ग़म झेले जा चुके थे, बुरे दिन भूले जा चुके थे, सारे आँसू सोखे जा चुके थे. और मैं अपने भाग्य पर इतरा रही थी कि ओह, ऐसा सुन्दर भाग्य भी होता होगा क्या किसी का, जैसा मेरा है? नहीं, किसी का नहीं, सिर्फ मेरा। कि भगवान से देखा नहीं गया. उसने मेरे रोने के लिए इतना अनोखा बहाना ऊपर से टपकाया कि मैं दंग रह गई. रेशम में लपेट कर पत्थर मारा, इतने ज़ोर से कि मैं लहू-लुहान हो गई. चोट सहलाने वाला कोई नहीं और रो-रो कर मेरा बुरा हाल. इन आँसुओं की ज़ुबान किसी ने नहीं समझी। उसकी व्यवस्था तो देखो, दुखों को चीर कर ख़ुशी देता है और खुशियों को चीर कर दुःख।

अब फिर से सुखी हूँ, खुश हूँ. आँसुओं में धुल कर, दुखों की आग में तप कर निखर गई हूँ. पर डर रही हूँ, एक तरह से प्रतीक्षा कर रही हूँ कि अब प्रभु कौन सा कहर ढाने वाले हैं? अब कौन सी ख़ुशी को ऊपर से टपकाने वाले हैं, जो अंततः आँसुओं का सबब बनेगी?


Tuesday, 2 December 2014

10. एक भावचित्र : माँ

10. एक भावचित्र : माँ

माँ, तू उदास मत हो. तेरे अपने बच्चों ने तुझे तेरा देय नहीं दिया, कोई बात नहीं। चारों तरफ देख, बच्चे ही बच्चे हैं. अनेक बच्चे, जिनके माँ-पिता ने उनका देय नहीं दिया। कहीं का बदला कहीं निकलता है. सारी दुनिया एक है, यह विश्व एक कुटुंब के समान है, वसुधैव कुटुम्बकम। कई बार करता कोई और है, भोगता कोई और है. सब भोगने वाले एक हो जाएँगे तो सब करने वालों को निष्क्रिय कर देंगे। माँ, देख, कितने बच्चे एक गोद के लिए तरस रहे हैं, आ और उन्हें अपना, खुद भी पूर्ण हो और उन्हें भी पूर्ण कर.


Monday, 1 December 2014

9. एक भावचित्र : शुद्ध आत्मा

9. एक भावचित्र : शुद्ध आत्मा

आज वह बीते हुए कल के शव पर खड़ा है. एक विचित्र दुर्योग के चक्रव्यूह में फँसा है. मर्सिया की धुन में अगीत बज रहे हैं. मन पर ग्रंथियों का पहरा है. देह पर सन्देह का दबाव है. खुशियों की राह रोके हुए है भ्रम-सम्भ्रम. शक का फ़ितूर साँसों में घुला है. पाप से अधिक सन्ताप का बोझ है. उसने अपने जीने के रास्ते खुद बंद कर दिए हैं.

मैं खुद व्यामोह की स्थिति में हूँ. मुझसे डरो नहीं, मेरे पास आओ. मैं एक शुद्ध आत्मा हूँ. मुझे छूकर तुम भी शुद्ध हो जाओगे। मुझमें से निकलने वाली तरंगें तुम तक पहुँचनी चाहिए।

अब न किसी से कहिएगा, दावाए इश्क है गलत.
हमने तुम्हारे इश्क में मर के तुम्हें दिखा दिया।