Saturday, 6 December 2014

11. एक भावचित्र : प्रभु की माया

11. एक भावचित्र : प्रभु की माया

कई बार जब लगने लगता है कि बहुत सुखी हूँ, बहुत खुश हूँ, तो भगवान फिर से रोने के इंतज़ाम कर देता है. पता नहीं, उसे अपने ही बनाए हुए बन्दों के रोते हुए चेहरे क्यों अच्छे लगते हैं? वैसे यह सही है कि यह दुनिया ज़्यादातर रोते हुए लोगों की है. प्रभु की माया, उसे इंसान का हँसता हुआ चेहरा कभी रास नहीं आया. उसके पास बारिशों की कमी थी क्या जो उसने लोगों की आँखों से आँसुओं की झड़ी लगा दी? फूलों कर साथ काँटे बना कर उसे तसल्ली नहीं हुई जो उसने इंसान के जीवन में भी काँटे उगा दिए? 'जंगल में मंगल' की कहावत हमने गढ़ी, लेकिन वह दिलों की बसी-बसाई दुनियाओं को जंगल में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। क्या वह इतना बेअकल है कि उसने अपनी ही बनाई दुनिया को दुखों की आग में झोंक दिया? कुछ तो है, कुछ तो है, वह कुछ तो फ़ितूरी है, जिसके सारे किए-धरे को हम अपने कर्मों का फल मान कर उसे माफ़ करते आए हैं. और कोई चारा भी तो नहीं। वह दिखे तो उसे उसके किए की कोई सजा दें. पर वह दिखता ही तो नहीं।

वह भी एक समय था, जब मैं सुखी थी, बहुत सुखी। खुश थी, बहुत खुश. तब तक के सारे ग़म झेले जा चुके थे, बुरे दिन भूले जा चुके थे, सारे आँसू सोखे जा चुके थे. और मैं अपने भाग्य पर इतरा रही थी कि ओह, ऐसा सुन्दर भाग्य भी होता होगा क्या किसी का, जैसा मेरा है? नहीं, किसी का नहीं, सिर्फ मेरा। कि भगवान से देखा नहीं गया. उसने मेरे रोने के लिए इतना अनोखा बहाना ऊपर से टपकाया कि मैं दंग रह गई. रेशम में लपेट कर पत्थर मारा, इतने ज़ोर से कि मैं लहू-लुहान हो गई. चोट सहलाने वाला कोई नहीं और रो-रो कर मेरा बुरा हाल. इन आँसुओं की ज़ुबान किसी ने नहीं समझी। उसकी व्यवस्था तो देखो, दुखों को चीर कर ख़ुशी देता है और खुशियों को चीर कर दुःख।

अब फिर से सुखी हूँ, खुश हूँ. आँसुओं में धुल कर, दुखों की आग में तप कर निखर गई हूँ. पर डर रही हूँ, एक तरह से प्रतीक्षा कर रही हूँ कि अब प्रभु कौन सा कहर ढाने वाले हैं? अब कौन सी ख़ुशी को ऊपर से टपकाने वाले हैं, जो अंततः आँसुओं का सबब बनेगी?


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