Friday, 12 December 2014

12. एक भावचित्र : एक पैग़ाम, प्रेमी के नाम

12. एक भावचित्र : एक पैग़ाम, प्रेमी के नाम

मेरे प्रेमी ! तुम मेरे जीवन में मुझसे प्रेम करने नहीं आए थे. तुमने प्रेम किया ज़रूर था लेकिन वह तुम्हारा ध्येय नहीं था. तुम्हें खुद नहीं मालूम था कि तुम्हारा ध्येय क्या था. बस, जैसे तुम आँख मूँद कर चल रहे थे, और मैं आँख मूँद कर तुम्हें स्वीकार रही थी. सच तो यह है कि तुम प्रेम के बहाने मुझे इस संसार की रीत समझाने आए थे, मुझे मुझसे जुड़े अन्य रिश्तों की असलियत बताने आए थे, मुझे दुनियादारी का भान कराने आए थे. तुमसे मिलने के बाद यानि तुमसे मिल कर बिछड़ जाने के बाद मैं तुमसे पुनः-पुनः मिलने के लिए तो तड़पी ही, लेकिन उससे भी ज़्यादा तड़पी कुछ सत्यों के उन रहस्योद्घाटन पर जो तुम्हारे आने के कारण खुले। मेरे प्रेमी ! मेरे जीवन में तुम्हारा प्रवेश बिना किसी मकसद के नहीं था. मकसद भी सिर्फ इतना मकसद नहीं था कि तुम्हारी प्रेरणा से मैं सृष्टि को रच लूँ या मेरी प्रेरणा से तुम किसी सृष्टि की रचना कर लो. नियति ने एक बड़े मकसद से तुम्हें मेरे पास भेजा था. मैं अँधेरों में जी रही थी, अँधेरों को प्रकाश समझती थी, स्वाभिमान में चूर रहती थी, अहम् ब्रह्मोsस्मि का मन्त्र मेरी रग-रग में बसा हुआ था, मुझे कोई हरा नहीं सकता, मुझे कोई मार नहीं सकता, मैं अजेय हूँ, मैं प्रश्नातीत हूँ, मैं सुंदर हूँ, मैं श्लील हूँ, मैं 'मैं' हूँ, क्योंकि मेरे समस्त अपने मेरे साथ हैं. मुझे अपने से ज़्यादा अभिमान था मेरे अपनों पर. लेकिन तुम आए तो मेरे सारे अपनों के चेहरों से मुखौटे उतर गए. जब तुम मेरे जीवन से गए तो तुम भी एक मुखौटा मेरे पास छोड़ गए. लेकिन यह भी सच है कि यदि तुम मेरे जीवन में नहीं आते तो मैं बहुत कुछ जानने से वंचित रह जाती। मैं नहीं जान पाती कि ह्रदय के कितने तल-अतल होते हैं, जिनमे छिप कर रहते हैं कोमल भाव, अतृप्त इच्छाएँ, फुंकारती हुई वासनाएँ, जिन्हें हम उम्र के साथ मरा समझ लेते हैं. मैं नहीं जान पाती कि रिश्तों में कितने छल-छद्म होते हैं. मेरे प्रेमी ! तुम धन्य हो, तुम जीवन में मेरे सबसे बड़े शिक्षक रहे.


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