Wednesday, 17 December 2014

13. एक भावचित्र : सखी-संवाद

13. एक भावचित्र : सखी-संवाद

मेरी रहस्यमयी सखी, तुम कल्पना की मूर्ति बन कर जिओ, एक रहस्य बनी रहो, तुम्हें समझने की प्रक्रिया में जो आकर्षण है, उस आकर्षण में बड़ा आनंद है. आज के युग में तुम्हारा लेखन छायावादी युग की याद ताज़ा कर जाता है. रहस्यवाद को फिर से जीवित करने जा रही हो तुम. तुम्हारे लेखन में कोई उपदेश नहीं, कोई सन्देश नहीं, फिर भी न जाने क्यों, सूफी संतों की याद दिला जाता है. तुम जोगिया वस्त्र नहीं पहनतीं, फिर भी जोगन हो. तुम रंगों के साथ सन्यासिन हो. लगता है, किसी तो रंग में डूबी हो. तुम्हारा चेहरा स्वच्छ धवल चाँदनी सा, तुम्हारी आँखों में मातृत्व के सपने, तुम्हारी गोद में बच्चों की तड़प, तुम्हारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व भारतीयता का प्रतिनिधित्व करता सा. बताओ, तुम कौन हो? क्यों इतने गहरे डूब जाती हो तुम, बहुत गहरे कि वहाँ से तुम बचाव के लिए चिल्लाओ भी तो किसी को तुम्हारी आवाज़ न सुनाई दे? कुछ दबा हुआ है तुम्हारे मन में, कुछ उबल रहा है तुम्हारे भीतर, छुपाए नहीं छुप रहा है जो, तुम उछाल देना चाहती हो उसे सबके बीच. क्या दर्द का कोई गोला है, जिसे भीड़ को सौंप कर तुम मुक्त हो जाओगी? या ख़ुशी का कोई उपहार, जिसे सबसे बाँट कर तुम्हारी ख़ुशी दुगनी हो जाएगी? सखी, कौन से मुहूर्त का इंतज़ार है? थोड़ा करीब आओ, खुलो और अपने बारे में बताओ कि तुम कौन हो? किस देश से आई हो? तुम्हारे मौन ने मुझे आकर्षित किया है, अब तुम्हारी बातों के जादू में से तुम्हें ढूँढ कर लाना चाहती हूँ. शायद तुम्हारी कहानी में कुछ ऐसा हो जो मुझे एक नई कहानी लिखने की प्रेरणा दे.


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