Thursday, 18 December 2014

14. एक भावचित्र : मैं इंसान हूँ

14. एक भावचित्र : मैं इंसान हूँ

मैं चेतन हूँ, मैं चैतन्य से भरपूर हूँ क्योंकि मैं इंसानियत के क़र्ज़ से दबी हुई इंसान हूँ। न मैं अपने अतीत की यातना को विस्मृत कर सकती हूँ, न ही अपने भविष्य की चिन्ता से मुक्त हो सकती हूँ क्योंकि मैं जीती-जागती इंसान हूँ। इंसानी धर्म छोड़ दूँ तो जानवर कहलाउंगी। भूत-भविष्य याद न आएँ तो पागल ही हुई ना? नहीं, नहीं, मुझे अपनी समस्त यातनाओं और चिन्ताओं के साथ जीना है और इंसान बने रहना है। इंसान हूँ, इसीलिए मुझमें इंसानियत है। इंसानियत है, इसीलिए मैं दूसरों के दुःख भी अपनी आँखों से बहा लेती हूँ, दूसरों के कष्ट समेट कर अपने ह्रदय में रख लेती हूँ। ये सब मेरी अपनी यातना के क्षणों में मुझे दिलासा देते हैं कि देखो, तुम अकेली नहीं हो, हम सब तुम्हारे साथ हैं।


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