Thursday, 18 December 2014

15. एक भावचित्र : प्रश्नाकुल मन

15. एक भावचित्र : प्रश्नाकुल मन

मन में अनेक प्रश्न उपजते रहते हैं. मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है. मन प्रश्नाकुल न हो तो प्राणी निर्जीव माना जाएगा। ज़िन्दगी में हर 'होना' किसी प्रश्न से जुड़ा है. उत्तर की सार्थकता तभी है जब वह किसी प्रश्न से निकले। यह सम्पूर्ण सृष्टि प्रश्न से निःसृत उत्तर ही तो है. कौन है अपना, कौन पराया? कभी अपना भी पराया लगता है और कभी पराया भी बहुत अपना। यह दुनिया बहुत खूबसूरत है. लोग भले हैं. लेकिन जब तक व्यक्ति 'एक' रहता है, तब तक 'अपना सा' रहता है. वही व्यक्ति जब भीड़ में शामिल हो जाता है तो घिनौना हो जाता है. भीड़ के चरित्र पर विश्वास नहीं किया जा सकता। कहते हैं ना, भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता। और जिसका कोई चेहरा नहीं होता, वह अनुत्तरित प्रश्नों से घिरा होता है. 'एक' को तो अपना लें, भीड़ को गले कैसे लगाएँ? उफ़ उफ़ उफ़ !


No comments:

Post a Comment