Monday, 1 December 2014

9. एक भावचित्र : शुद्ध आत्मा

9. एक भावचित्र : शुद्ध आत्मा

आज वह बीते हुए कल के शव पर खड़ा है. एक विचित्र दुर्योग के चक्रव्यूह में फँसा है. मर्सिया की धुन में अगीत बज रहे हैं. मन पर ग्रंथियों का पहरा है. देह पर सन्देह का दबाव है. खुशियों की राह रोके हुए है भ्रम-सम्भ्रम. शक का फ़ितूर साँसों में घुला है. पाप से अधिक सन्ताप का बोझ है. उसने अपने जीने के रास्ते खुद बंद कर दिए हैं.

मैं खुद व्यामोह की स्थिति में हूँ. मुझसे डरो नहीं, मेरे पास आओ. मैं एक शुद्ध आत्मा हूँ. मुझे छूकर तुम भी शुद्ध हो जाओगे। मुझमें से निकलने वाली तरंगें तुम तक पहुँचनी चाहिए।

अब न किसी से कहिएगा, दावाए इश्क है गलत.
हमने तुम्हारे इश्क में मर के तुम्हें दिखा दिया।


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