Monday, 8 December 2014

मोहातीत

मोहातीत

वैरागी होना आसान है क्या? वैराग की राह में राग ही रोड़े नहीं अटकाता, जीवन के कड़वे यथार्थ भी अकेलेपन में खरोंचते रहते हैं. राग से मुक्ति संभव है, लेकिन जीवन की कड़वी सचाइयों को बर्दाश्त करने के लिए खुद को भीड़ में झोंक देना ही एकमात्र उपाय हो सकता है. काश, अपने आप में जीना फिर से सीख पाती, जैसे पहले तेरह साल एकांतमना रही? लेकिन वह एकान्तवास भी वर्षों के मानसिक ऊहापोह के बाद आया था, जिसमें भीतर कितना कुछ खंडित हुआ था, जो चाहे बाद में असीम तृप्ति में बदल गया था, लेकिन एक त्रासदी से गुजरने के बाद. वह बीच के खंडन का समय, उफ़, उस तकलीफ से दोबारा कैसे गुज़रूँ? कहीं और से घटने के लिए, फिर से जोड़ रही हूँ खुद को आप सबसे, आप सबके बहाने खुद खुश रहने के लिए. दो दिन के अथाह मंथन के दौरान मैंने पाया कि फेसबुक जैसा आश्रय अन्य कोई नहीं। दो दिन का अकेलापन सहा नहीं गया? नहीं, यह बात नहीं, अभिव्यक्ति का भी शौक नही, बस, खुद को व्यस्त रखने के लिए अभिव्यक्त होना है. ज़िंदा रहने से बड़ा अन्य कोई स्वार्थ नहीं। लीजिए, मैं फिर हाज़िर हूँ, अपनी गर्मागर्म प्रस्तुतियों के साथ।

ऐसा बदनसीब कौन होगा जिसे अपनापन नहीं चाहिए? ऐसी बदनसीब मैं हूँ। हर बार अपनापन मिल-मिल कर छिटकता रहा, इसलिए एकांत में जीने की आदत हो गई है। मित्रों, यह अच्छा है कि यह आभासी दुनिया है, यहाँ रिश्ते निभाने की कोई मजबूरी नहीं है. मेरे लिए यह बात सुविधाजनक है क्योंकि मैं निरन्तरता में कोई भी मित्रता निभाने में नाकाबिल हूँ. बहुत अधिक चिपका-चिपकी मुझमें उदासीनता भर देती है। मैं फेसबुक से ऊबी ही इसलिए थी कि कई मित्र (स्त्री हो या पुरुष) मुझसे मित्रता में नैरन्तर्य चाहते थे, यानि मैसेज में जो बात हमने कल जहाँ छोड़ी थी, आज वहीँ से शुरू करें तथा रोज़ नमस्ते, कैसी हैं, खाना खाया? हमने आज यह किया, वह किया, मैंने यह प्यार किया, वह लड़ाई की, रोज़ एक बार बात ज़रूर कर लिया करें मैम, हमें शक्ति मिलती है, आदि आदि. दोस्तों, मैं कितनों से बात करूँ? मेरी क्षमता का भी तो ख्याल करो. आप मुझे इस मामले में बदनसीब कह सकते हैं कि मुझे यहाँ किसी के अत्यधिक अपनेपन की चाह नहीं है. मेरे तईं अपनेपन की बस यह परिभाषा है कि हम एक-दूसरे के प्रति ईमानदार रहें, आप मेरी इज़्ज़त करें, मैं आपकी इज़्ज़त करूँ, न आप मेरी बुराई करें, न मैं आपकी बुराई करूँ और हम सब विचारों में कहीं थोड़ा तो मेल खाते हों. हम यहाँ इसीलिए मित्र हैं कि हम एक-दूसरे के लेखन में, पाठन में रुचि रखते हैं, बस. मित्रों, कमी आप में नहीं, कमी मुझ में है कि बहुत ज़्यादा मीठे से मुझे उबकाई आ जाती है. इस कमी के बावजूद मैं लिहाज-लिहाज में बहुत दूर तक, ऊबने की हद तक निभाए चली जाती हूँ और इस कारण के कारण मुश्किल से अमित्र कर पाती हूँ। इसका अर्थ यह नहीं कि मुझे मित्रों की ज़रूरत नहीं है. आखिर मैं भी इंसान हूँ, मुझे भी सबसे हँसना-बोलना अच्छा लगता है, मैं मैसेज में बात भी करती हूँ, लेकिन जिसे कहते हैं ना स्पेस, यानि निजता, वह बरकरार रहनी चाहिए, उसे कोई न छेड़े। जिन्हें प्यार की जरूरत है, उन्हें प्यार दो, जो प्यार नहीं चाहता, उसे उसके हाल पर छोड़ दो. दोस्ती की रस्सी को बहुत ज़्यादा कसोगे तो टूट जाएगी।

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