Sunday, 21 December 2014

संयोग : बरखा मोहन

संयोग : बरखा मोहन

कई वर्ष पहले की बात है. मेरे पुत्र की नई-नई शादी हुई थी. पुत्रवधु बरखा एक सप्ताह रहने के लिए अपने मायके गई. जिस दिन वह गई, उसके अगले दिन मैं अपनी एक employee वंदना के साथ घर पर थी. हम दोनों अकेली थीं. घर में सुबह से ही बदबू आ रही थी, जैसे कोई चूहा मर गया हो. वंदना ने भी कहा, 'बहुत बदबू है, शायद चूहा मर गया है.' हम दोनों ने सारे घर का कोना-कोना ढूँढ लिया, कहीं ज़िंदा या मरे, कैसे भी चूहे के दर्शन नहीं हुए. बरखा कुछ भी ढूँढने के मामले में तेज़ है, हमें चीज़ नहीं मिलेगी, उसे मिल जाएगी। सो मैंने वंदना से कहा कि बरखा ही इस मरे हुए चूहे को ढूँढ सकती है, उसे ले आते हैं. और मैं वंदना को लेकर बरखा के मायके पहुँच गई. बरखा की माँ ने कहा, 'अभी कल ही तो आई है, कुछ दिन तो रहने दें, आप आज ही उसे लेने आ गईं.' मैंने सारी बात बताई और बरखा को लेकर घर आ गई. बरखा ने भी घर में घुसते ही कहा, 'हाँ मम्मी, बहुत बदबू है.' उसने भी ढूँढा पर उसे भी कुछ नहीं मिला। हमें समझ नहीं आ रहा था, हम क्या करें? 'चलो, चाय पीते हुए सोचते हैं,' मैंने कहा. बरखा चाय बनाने रसोई में गई, वहाँ उसे ज़्यादा बदबू आई. (मुझे तब तक रसोई में जाने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ी थी), उसने गैस जलाने से पहले देखा कि गैस सिलेंडर से चूल्हे तक आने वाली रबड़ की पाइप जगह-जगह से क्रैक हो रही है, जिसमें से छन कर गैस पूरे घर में फैली हुई थी. उसने सिलेंडर की नॉब बंद की (जो हम कभी बंद नहीं करते थे) और उसके थोड़ी देर बाद बदबू आनी बंद हो गई. यह संयोग ही था कि बरखा को फटी हुई पाइप नज़र आ गई और एक हादसा होने से टल गया.

आज भी उस बात को सोचती हूँ तो दहल जाती हूँ कि कहीं बरखा ने गैस जला ली होती और कोई बड़ा हादसा हो जाता, तो बरखा तो जान से जाती ही, मैं भी बच नहीं पाती, आज जेल में होती, बहु को जलाने के आरोप में. एक हफ्ते के लिए मायके में गई बहु को अगले ही दिन ले आना और उसी दिन इस तरह की दुर्घटना हो जाना, आखिर इन सब बातों का यही तो अर्थ निकलता ना? इस संयोग ने भगवान में मेरी आस्था दृढ की.


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