Tuesday, 16 December 2014

Gazal 43

Gazal 43

शाख से फूल झर रहा है कोई.
यूँ दिल से उतर रहा है कोई.

चैन को ढूँढ रहे थे तो लगा
तकलीफ बन गुज़र रहा है कोई.

सुर और ताल में चतुराई से 
शोक-संगीत भर रहा है कोई।

प्रेम का किस्सा चूर-चूर हुआ
काँच बन कर बिखर रहा है कोई.

जिन यादों में ज़िन्दा रहता था
उन यादों में मर रहा है कोई.

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