Tuesday, 23 December 2014

Gazal 44

Gazal 44

आज भी आती है तुम्हारी याद उसी तरह
आज भी पुख्ता है पूरी बुनियाद उसी तरह.

कितनी खाई तुमने खोदी, कितनी खोदी मैंने
चलता आ रहा अब तक यही विवाद उसी तरह.

आओ, सबसे छुप कर हम दूर कहीं बस जाएँ
आज भी दोस्त हैं बने हुए जल्लाद उसी तरह.

मन का यह वीरान खंडहर रोशन ही रोशन
आज तुम्हारी यादों से आबाद उसी तरह.

आओ, प्रेम धरा पर हम घर का सपना बोएँ
दूर-दूर तक बिछी हुई है खाद उसी तरह.

शुरू शुरू में हम दोनों ने जैसे किया संघर्ष
आ, स्थापित करें प्रेम का नया वाद उसी तरह.

रोज़ घृणा का गरलपान कैसे करते हो?
आ, हाथ बढ़ा कर शुरू करें संवाद उसी तरह.

जितना जीवन जो साथ जिया गर अर्थहीन था
आ, हो जाएँ फिर से हम तुम बरबाद उसी तरह.


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