Wednesday, 24 December 2014

कोई सन्देश आए Kavita 225

कोई सन्देश आए

तुम्हारी बात में कुछ बात ऐसी
सहस्रों मन्त्र उच्चारित हों जैसे
कि ज्यों कानों में कोई गुनगुनाता।

तुम्हारे राजसी अंदाज़ ऐसे
अनेकों भेद अपने में छुपा कर
चला उन्मत्त दरिया छलछलाता।

तुम्हारे शब्द में हैं अर्थ मेरे
कहीं एक छद्म झोंका चाहतों का
मेरे कमज़ोर दिल तक सनसनाता।

हवाओं को पकड़ कर कैद कर लूँ
खुद अपने साथ तो हो लूँ ज़रा सा
कि हरियाला सा सपना लहलहाता।

कि जैसे रोशनी बंधक बनी हो
कि जैसे जीतने की धुन ठनी हो
कोई सन्देश आए खनखनाता।


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