Monday, 22 December 2014

आज की प्रार्थना Kavita 224

आज की प्रार्थना

जीने की कोई चाह नहीं
मरने की कोई राह नहीं।

सूख गया आँखों का पानी
होठों पर कोई आह नहीं।

कोई मोल न सुख का, दुःख का
कोई भी अब परवाह नहीं।

काँटे कभी न जिसे चुभे हों
ऐसा तो कोई शाह नहीं।

जैसे सब कुछ बीत गया हो
बची कोई वाह-वाह नहीं।

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