Saturday, 26 December 2015

एक पागल मिला था Kavita 248

एक पागल मिला था

एक पागल मिला था
जीवन के मायने समझा गया
मुझे सयाना बना गया।

आँख में सपने नहीं थे
अपनों में अपने नहीं थे
भ्रमजाल बिछा गया।

सत्य का बोलबाला नहीं
असत्य का मुँह काला नहीं
नए मुहावरे सुना गया।

एक अकेला वही ज्ञानी
उस्तादी में न कोई सानी
रोने की कला सिखा गया।

मैं उसकी दीवानी हुई
मस्त मस्त मस्तानी हुई
क्या से क्या बना गया।

Thursday, 24 December 2015

या कोई प्रीत है? Kavita 247

या कोई प्रीत है?


मैंने कुछ कहा नहीं पर उसने सुन लिया
उसने कुछ कहा नहीं और मैंने सुन लिया
न कोई शब्द हैं, अर्थ का भी पता नहीं
कोई तो बताए हमें यह कैसी रीत है?

जिसका था इंतज़ार, वही नहीं आया था
महफ़िल में रौनकों का वही सरमाया था
पाँव में मेहँदी लगी या हाथों में हथकड़ी?
पता नहीं किससे और क्यों भयभीत है?

कौन बुलाए उसे? और क्यों बुलाए भी?
हवा में बहती हुई धुन न सुन पाए भी
क्या उसे नहीं पता किसको उसका इंतज़ार?
मौसम में घुल रहा निमंत्रण संगीत है.

यूँ मैं जहाँ जाती हूँ, वहीँ आ जाता है
गुपचुप-गुपचुप कुछ तो बतियाता है
मुझसे ही बात करे, और किसी से भी नहीं
पता नहीं यूँ ही है या कोई प्रीत है?

Saturday, 21 November 2015

लिखूँगी अब Kavita 246

लिखूँगी अब

उसने मुझे मेरे अकेलेपन से निकाला
और फिर से भीड़ में फेंक गया।
उससे शुरू, उस पर ख़त्म
यह आधी-अधूरी कहानी
लिखूँगी अब।

मैंने अपने आँसू
मुस्कुराहटों से ढक कर रखे हैं
उसका प्यार था या वक़्त की मार
अपनी नाकामयाबी पर
हँसूँगी अब।

उसका होना तो होना था ही
उसका न होना भी होने जैसा
चुभती है जो हर पल
इस कसक को संभाल कर
रखूँगी अब।

कभी लगता है, सब कुछ था
कभी कुछ भी नहीं
असमंजस में घिरी हुई
अपनी ही बद्दुआओं में
मरूँगी अब।

Thursday, 12 November 2015

29. एक भावचित्र : जीवन का सुखद सांध्यकाल

29. एक भावचित्र : जीवन का सुखद सांध्यकाल
(जीवन के सांध्यकाल में सुखी व्यक्ति का प्रलाप)

जीवन के सांध्यकाल में सबसे बड़ी मुश्किल यह होती है कि हम अपनी मर्ज़ी का जीवन नहीं जी पाते। न, न, ऐसा नहीं कि सांध्यकाल में इतना अँधेरा छा चुका होता है कि हममें सामर्थ्य नहीं होती। बल्कि इसलिए कि हमारे अपने हमें बहुत प्यार करते हैं, हमारा बहुत ख्याल रखते हैं। वास्तविकता यह होती है कि उनके विचार में हम शक्तिहीन हो चुके होते हैं। ऐसा वे सोचते हैं जबकि यह सत्य नहीं भी हो सकता। उनका प्यार हमारे लिए कभी-कभी बेड़ियाँ बन जाता है। हम उड़ना चाहते हैं, हमारे अपनों को लगता है, हमारे पंख कमज़ोर हो चुके हैं या हो रहे हैं। वे हमें अपनी बाहों में समेट कर उड़ते हैं ताकि हम उड़ने का आनंद ले सकें। वे हर वक़्त बुढ़ापे की लाठी बन कर हमारा हाथ थामे रहते हैं कि कहीं हम लड़खड़ा न जाएँ। हम अपने को गौरवशाली तो महसूस करते हैं पर सोने के पिंजरे में कैद पंछी जैसा भी। किराये के मददगारों की मदद संगत लगती है लेकिन अपनों का हर पल हमारी मदद को आगे आना हमें इस अहसास के बीच छोड़ जाता है कि अब हम ख़त्म हो रहे हैं, या यह हमारे ख़त्म होने की शुरुआत है। हमारे अपने हमें सुनते हैं यानि हमारी हर बात ध्यान से सुनते हैं। जब हम बोलते हैं तो हमें लगता है, अपने को सारा उँड़ेल दें। कितना कुछ भरा है भीतर, जो खाली ही नहीं होता। पर अचानक अहसास होता है, हमारे अपनों में लिहाजदारी है हमें सुनने की। वर्ना उनके किस मतलब की हैं हमारी बातें? अब हमारे होने का भी क्या मतलब रहा उनके लिए?  यह सोच कर हमारे भीतर कहीं गहरी चुप्पी उतर जाती है। हमें खुद लगने लगता है, यह हमारे ख़त्म होने की शुरुआत है। हम खुद को कोसते हुए एक आत्महंता दौर से गुज़रने लगते हैं.


सिलसिला Kavita 245

सिलसिला

एक-दूसरे की लांछना का सिलसिला राजनीति है.
एक-दूसरे पर मर-मिटने का सिलसिला प्रेम-प्रीति है.
एक-दूसरे से जलने का सिलसिला रिश्तेदारी है.
एक-दूसरे से उम्मीदों का सिलसिला दुनियादारी है.
एक-दूसरे से बेहतरी का सिलसिला विकास है.
एक-दूसरे को मात देने का सिलसिला विनाश है.
एक-दूसरे से माँगने का सिलसिला अंधभक्ति है.
एक-दूसरे से कोई नहीं सिलसिला आत्मशक्ति है.

Wednesday, 4 November 2015

वीरानी है Kavita 244

वीरानी है

कल जिनका नाम गर्व से लेते थे
आज उनका नाम लेते शर्म आती है।

वक़्त हटा देता है आवरण
नज़र आने लगता है
संबंधों का ओछापन और खोखलापन।

अँधेरे में जो पल भर को चमका था
काँच का टुकड़ा था
चुभ रहा है।

जितना ऊँचा चढ़े
उतनी ऊँचाई से ही तो गिरना था
तब न गिरने का पता था, न चोट का।

आँख जब खुलती है
तलाशती है चुल्लू भर पानी
डूब मरने के लिए।

कल जो महल की शानो शौकत थी
आज खंडहर की सायं सायं वीरानी है।

Saturday, 17 October 2015

इब्तिदा-ए-इश्क़ Kavita 243

इब्तिदा-ए-इश्क़

अभी तो इब्तिदा-ए-इश्क़ है, हँसता है क्या?
आगे-आगे देखिए फँसता है क्या?

तमाशे हो चुके पहले बहुत, अब फिर से होएँगे
ज़माना फिर से हँसेगा, ये किस्से फिर से रोएँगे।

दिनों को रौंद कर आगे बढ़े तो क्या बढ़े यारा
करेले नीम पर चढ़े तो चढ़े क्या चढ़े यारा।

कि अहसासों को रखो बन्द डिब्बे में हिफाज़त से
यह सरेआम नंगा न कभी होना शराफ़त से।

ये दिल का मामला यूँ राहे-सर बोला नहीं जाता
खुले चौराहे पर जज़्बात को खोला नहीं जाता।

ज़रा सी देर ठहरो बस अभी सब पर्दे उठेंगे
तमाशा तुम भी देखोगे, तमाशा हम भी देखेंगे।

Wednesday, 14 October 2015

मैं तेरे सदके Kavita 242

मैं तेरे सदके

कि जीतने का हुनर सच में हुनर होता है
कि हारने की कला कोई कम कमाल नहीं
बेईमानियाँ भी सब के बस की बात नहीं
मैं तेरे हुनर के सदके, मैं तेरी कला के सदके
मेरी इस बात पर अब तू भी फ़रमा दे बज़ा।

कभी तो तू मेरी तकलीफ को महसूस कर
कभी तो हो तुझे मलाल, तूने क्यों जगाए
वही ख्वाब जो आँखों में मेरी थे ही नहीं
कभी तो तू यूँ पछताए कि जैसे पाप किया
मेरे मासूम दिल को तोड़ने की पाए सज़ा।

दिल में उठती है कसक अब भी इसी बात की
तूने क्यों झूठ को सच कह-कह कर पेश किया
वो सारे शब्द मेरे इर्द-गिर्द ठहर गए
सनातन प्रश्न का कोई कहीं जवाब नहीं
क्यों आता है जज़्बातों से खेलने में मज़ा?

कभी तो कर भरोसा मेरी इस दीवानगी पर
कभी तो रख मुझे अपनी ग़ज़ल के मायनों में
कि तेरा नाम मेरे हाथ में लिखा तो नहीं
पर ज़रा देर को सुस्ता लूँ तेरे साए में
क्या पता छीन कर ले जाए कब मुझको कज़ा।

Wednesday, 7 October 2015

त्राहि माम त्राहि माम Kavita 241

त्राहि माम त्राहि माम
मैं अपने आप में जकड़ गई हूँ
खुद के भी खोलने से नहीं खुल रही हूँ
अनेक ताले लगे हैं मेरी चेतना के द्वार पर
अनेक ग्रंथियों में कसा है मेरा अन्तस्तल
हीनता, ग्लानि, अपराधबोध
धीमे ज़हर की तरह फैल रहे हैं मेरी रगों में.

मैं अपनी वसीयत लिख रही हूँ
पर अपने ही लिखे को समझ नहीं रही हूँ.

मैं अपनी कुंठाओं की विरासत
किसके नाम लिखूँ?
मैं अपनी उम्र भर की आँसुओं की कमाई
किसे सौंपूँ?
टूटे हुए सपनों की किरचों के ख़ज़ाने
किसके हवाले करूँ?

मुझे क्यों नहीं आ रहा समझ
वह सब जो मुझे समझना चाहिए?

मेरे सामने हर वक़्त आईना क्यों रहता है?
क्यों मैं अपनी सूरत देख कर घबरा जाती हूँ?
मैं हर घड़ी किससे छुप रही हूँ?
अरे ! यह तो मैं खुद से ही छुप रही हूँ.
क्या कोई खुद से भी डरता है?
कौन है मेरे भीतर जो मुझे डरा रहा है?
कौन है मेरे भीतर जो मेरा शत्रु है?
मैं खुद अपनी भी नहीं हुई
तो और किसकी होऊँगी?

रक्षाम देहि रक्षाम देहि।
त्राहि माम त्राहि माम.

Monday, 28 September 2015

काश ! Kavita 240

काश !

जिनके साथ लगाते हैं महफ़िलें
जिनकी जिजीविषा लुभाती है हमें
जिनकी बातों का रस आप्लावित कर देता है
क्यों वे छूट जाते हैं हमसे?

क्या सिर्फ बहती गंगा में नहाते हैं हम?
क्यों नहीं दूर तक जाते हैं हम?

संभाल कर रखना समझदारी होती है
चाहे चीज़ें हों या रिश्ते
खो देने पर ढूँढते रहते हैं हम
उन उन उन्हीं को.

क्यों नहीं अपनी पसंद को संभाल पाते हैं हम?
क्यों बाद में आँसू बहाते हैं हम?

रंगीनियाँ कभी चकाचौंध करती हैं
सपनों में बुनी जाती है ज़िन्दगी
चारों ओर बिखरी रहती है सुगंध
उत्सव-गान बजते हैं कानों में.

क्यों नहीं खुशबुओं को सहेज पाते हैं हम?
क्यों अपने जीवन में खुद आग लगाते हैं हम?

काश हम समझदार पैदा हुआ करते !
काश जीने के रास्ते साफ़ हुआ करते !

Thursday, 17 September 2015

जगदीश चतुर्वेदी

जगदीश चतुर्वेदी

दोस्तों के दोस्त, अपनों के अपने, गैरों के भी अपने, घोर आशावादी, निराशावाद का कहीं नाम नहीं, असंगतियों में जीवन जीने वाले, विवादों को जन्म देते रहने वाले, विद्रोही तेवर से सजे, हिन्दी साहित्य की हर विधा से जुड़े, 1970 के दशक में अकविता आन्दोलन के प्रवर्तक, श्री जगदीश चतुर्वेदी के दो दिन पूर्व हुए निधन का समाचार मुझ तक आज पहुँचा। इस सम्बन्ध में प्रताप सहगल जी ने परसों ही फेसबुक पर सूचना दी लेकिन उनकी पोस्ट मेरी नज़रों से नहीं गुज़री। सोमवार का जनसत्ता भी मैंने नहीं देखा। कितनी अजीब बात कि मुझे सूचित किया मेरी तीस साल पुरानी सखी, एडवोकेट और कवयित्री, अमेरिका में जा बसी मोना गुलाटी ने, जो आजकल दिल्ली आई हुई है. मोना अकविता आन्दोलन में भी सक्रीय रही. जगदीश चतुर्वेदी जी की प्रमुख कृतियों में कनाट प्लेस, सूर्यपुत्र, पूर्वराग, इतिहासहंता, नए मसीहा का जन्म, अंधेरे का आदमी, अंतराल के दो छोर, कपास के फूल और पीली दोपहर शामिल हैं।

मुझे दो-तीन साल पहले पता चला था कि चतुर्वेदी जी अल्ज़ाइमर रोग (भूलने की बीमारी) से ग्रस्त हैं. तभी मैंने उन्हें फोन किया था तो उनकी पत्नी, भाभी जी से बात हुई थी. भाभी जी ने उन्हें फोन देते हुए कहा था, 'मणिका मोहिनी का फोन है. इन्हें जानते हो?' मुझे उनकी आवाज़ सुनाई दी थी, 'हाँ, हाँ, मणिका को क्यों नहीं जानता?' फिर उन्होंने मुझसे बात की थी तो मुझे ठीक ही लगे थे. भाभी जी ने बताया था कि कभी-कभी ठीक बात कर लेते हैं. पता चला कि भाभी जी भी दो साल पहले गुज़र गईं. स्थान की दूरियों के कारण सालों से मिलना नहीं हो पाया, वर्ना एक समय वह था कि जब हम बहुत सारे लेखक-मित्र पश्चिमी दिल्ली में आसपास रहते थे और रोज़ जमावड़े होते थे. धीरे-धीरे हम सबकी उम्र भी ढलने लगी और दिल के जोश भी. बस, स्मृति में हैं, सहस्रों मीठे-खट्टे लम्हे। चाह कर भी कल शाम उनके अंतिम संस्कार में नहीं जा पाऊँगी। चतुर्वेदी जी, यहीं से मेरा नमन और श्रद्धांजलि स्वीकार करें।

अंत में जगदीश चतुर्वेदी जी के कविता संग्रह 'नए मसीहा का जन्म' से एक छोटी कविता प्रस्तुत है..... 

मृत्यु

जिन वादियों से आया हूँ
उनमें थे फूल
बसंत
स्मृतियाँ
और बार-बार जीने की ज़िद.

अब जिस वादी में जाऊँगा
वहाँ होगा एक नीला विस्तार
अनत शान्ति
और तृष्णाओं का
मधुर अंत.




श्री गणेशाय नमः

श्री गणेशाय नमः 

गणेश जी के जन्म की कथा आप सबको मालूम होगी। शायद यह भी मालूम हो कि हर शुभकार्य से पहले गणेश जी की पूजा क्यों की जाती है? आइए देखें, यह भी कि उसका आज के सन्दर्भ में कोई अर्थ निकलता है क्या?

पार्वती जी ने स्नान करने के लिए जाते समय मिट्टी का एक पुतला बनाया और स्नानागार के द्वार पर बैठा दिया, यह कह कर कि तू मेरा पुत्र है, ध्यान रखना, कोई भीतर न आए. (यदि आप मिट्टी के पुतले पर भी विश्वास करें, तो उससे भी अपनी बात मनवा सकते हैं.) तभी वहाँ शिव जी आ गए. उन्हें इस पुतले के बारे में कुछ मालूम नहीं था. पार्वती के स्नानगृह के द्वार पर किसी अजनबी को बैठा देख कर उन्हें अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने आवेश में गणेश जी का सिर काट दिया। (क्रोध में उत्तेजित होकर कोई कार्य करने की बजाय स्थिति की पूरी जानकारी अवश्य लें.) जब पार्वती जी ने यह देखा तो वे बिलख उठीं और रो-रो कर शिव जी से बोलीं कि उनके पुत्र को जीवित करो. (संतान चाहे जैसी भी हो, मिट्टी की ही क्यों न बनी हो, माता का प्रेम उसके लिए अक्षुण्य होता है.) शिव जी गणेश का सिर काट कर दूर फ़ेंक चुके थे, कहाँ से लाते? उन्होंने अपने सेवकों को आज्ञा दी कि किसी भी बच्चे का सिर काट कर ले आओ. (शिव जी को यह नहीं सूझा कि यह आज्ञा दें कि गणेश जी का ही सिर ढूँढ कर लाओ. मुसीबत के समय बड़ों-बड़ों के होश उड़ जाते हैं.) सेवकों ने बहुत खोजा पर सफल नहीं हुए. अंत में उन्होंने देखा कि एक हथिनी अपने बच्चे की ओर पीठ कर के सोई हुई थी. उन्होंने उस बच्चे हाथी का सिर काटा और शिव जी के पास ले आए. (माँ हमेशा बच्चे को अपने कलेजे से चिपटा कर सुलाती है. बच्चे की तरफ पीठ करके न सोएँ, बच्चे को कोई भी नुकसान हो सकता है.) शिव जी ने उस बच्चे हाथी का सिर उस पुतले की धड़ पर जोड़ दिया। इस तरह गणेश जी का चेहरा हाथी की तरह सूँड वाला हो गया. यह थी गणेश जी के जन्म की कथा.

अब गणेश जी को सर्वप्रथम पूजे जाने की कथा. गणेश जी ने जब आईने में अपनी सूरत देखी तो रोने लगे कि वे इस अजीब सूरत के साथ कैसे जीएँगे? बहुत मनाने पर भी जब वे न माने तो शिव जी ने उन्हें वरदान दिया, 'इस दुनिया में तुम सबसे पहले पूजे जाओगे, मुझसे भी पहले।' (महत्व सूरत का नहीं होता। यदि आप सम्मानित हैं, पूज्य हैं तो आपकी शक्ल-सूरत चाहे जैसी भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ता।)

इति संपन्न गणेश जी की कथा. (नीचे दी गई गणेश जी की मूर्ति मेरे घर की शोभा बढ़ा रही है.)


Friday, 11 September 2015

28. एक भावचित्र : मन मूरख

28. एक भावचित्र : मन मूरख

मन को कैसे मारते हैं? कोई मन को मारने का तरीका बताए। मुझे अपने मन को मारना है। यह हर पल स्वयं को सुखी समझ कर उछलता-फुदकता रहता है।

इस मूरख को यही नहीं पता कि सुख होता क्या है?

यह समझता है कि सुख वह होता है जो 'अपने' होते हैं।

ओफ़ ! इस मूरख को यही नहीं पता कि अपना तो कोई होता ही नहीं।

अपना कोई होता नहीं, तो जो हमारे साथ रहते हैं, रोज़ मिलते-जुलते हैं, कहते हैं, हम तुम्हारे हैं, वो कौन?

अरे मूरख, वो सिर्फ संयोग से साथ हैं. कहने का क्या है? कुछ भी कह लो, कहने में झूठ, सच एक ही अंदाज़ से बोला जाता है.

यह झूठ क्या होता है? मुझे लगता है, जो होता है, सब सच होता है.

अरे मूरख, तुझे यदि सब सच लगता है तो तू वाकई अपने मन को मार 

पर मन को मारते कैसे हैं? कोई मन को मारने का तरीका तो बताए।

मूरख, तू सबसे मुँह फेर कर चल. आगे बढ़. पीछे मुड़ कर मत देखना। आगे बढ़. और बढ़.

पर आगे भी लोग हैं जो कहते हैं, मेरे अपने हैं.

आँखें बंद कर, कान बंद कर. मूरख, किसी की न सुन कुछ, किसी से न कह कुछ.

फिर भी, मन है कि मर ही नहीं रहा. क्या करूँ? क्या करूँ?

धड़ाम।


Tuesday, 8 September 2015

दहेज़

दहेज़

एक गंभीर बात की शुरुआत एक चुटकुले से......
एक बार सड़क पर कुछ लड़कियाँ जा रही थीं. लड़कों का भी एक समूह उन्हें परेशान करता हुआ, उनका रास्ता रोकता हुआ चल रहा था. लड़कियों को गुस्सा आया, एक लड़की ने कड़क कर कहा, 'ठीक से क्यों नहीं चलते? यह सड़क क्या आपके बाप की है?' एक हाजिरजवाब लड़के ने तुरंत उत्तर दिया, 'जी नहीं, सड़क तो आपके ही बाप की है, हमें तो सिर्फ दहेज में मिली है.'
इससे आप समझ सकते हैं कि दहेज लेना लड़कों के दिमाग में कितनी सहजता से और गहनता से घुसा बैठा है, जैसे वह उनका अधिकार हो.
आज के जागरूक माहौल में भी दहेज़-लोभी देखे जा सकते हैं. मैं कुछ अरसा पहले एक रिश्तेदार के यहाँ लड़की की शादी में गई थी. बहुत धूमधाम से संपन्न की जा रही उस शादी में जब बरात दरवाज़े पर आई तो दूल्हे की माँ ने कुछ असंगत सी मांग रखी, जिसे सुन कर ख़ुशी का माहौल एकदम गम में बदल गया. मैंने कहा, शादी यहीं ख़त्म कर दो लेकिन लड़की वालों ने कहा, 'नहीं, हम अपनी लड़की की ख़ुशी के लिए सब कुछ करेंगे।' कितना गलत था उनका वह सोचना कि लड़की की ख़ुशी के लिए …… खैर, मांग पूरी की गई, बाद में पता चला कि इन्हीं मांगों के कारण लड़की की ज़िन्दगी घिसट भर रही है.
ऐसी बात नहीं कि गलत लोगों के गलत होने का पता अचानक चलता है. शुरू से ही इस बात के संकेत मिलते रहते हैं कि किन्हीं लोगों की असलियत क्या है. बस हम उस ओर ध्यान नहीं देते। दहेज़ नाम की कुरीति आज भी फलफूल रही है. लड़कियों को ही मज़बूत होना पड़ेगा। याद है ना दिल्ली की वह निशा शर्मा, जिसने दहेज़ के लोभी वर और बरात को सिर्फ लौटाया ही नहीं था, मेहँदी रचे हाथों से पुलिस को फोन कर उन्हें जेल भी भिजवाया था?

Monday, 7 September 2015

Aurangzeb Road is now Dr. A P J Abdul Kalam Road

Aurangzeb Road is now Dr. A P J Abdul Kalam Road


दिल्ली अब वह पहले जैसी दिल्ली नहीं रही, उससे बेहतर और आकार में बड़ी हो गई है. ज़मीन के नीचे पार्किंग स्थल, बाजार, मेट्रो-प्लेटफॉर्म के रूप में तीन-चार लेयर्स, ज़मीन के ऊपर फ्लाईओवर्स और मेट्रो-मार्ग के रूप में एक-दो लेयर्स। क्षेत्रफल उतना ही है और जनसंख्या बढ़ती जा रही है तो बढ़ती आबादी के हिसाब से जगह का तो इंतज़ाम करना ही हुआ. इतनी सारी नई जगहों के लिए नए नाम रखने होंगे और नए नामों का चुनाव करना होगा। ये नाम हमारे वर्तमान समय से जुड़े हो सकते हैं.
अभी दिल्ली की एक पॉश कॉलोनी (रोड) का नाम औरंगज़ेब रोड से बदल कर हमारे पूर्व राष्ट्रपति के नाम पर Dr. A P J Abdul kalam Road रखा गया है. आदरणीय अब्दुल कलाम जी के नाम पर रोड का नाम रखे जाने से किसे ख़ुशी नहीं होगी? प्रसिद्धि और लोकप्रियता के मामले में अब्दुल कलाम साहब का कोई सानी नहीं है.
वैसे मुग़ल बादशाह हमारे देश का स्वर्णिम इतिहास हैं. उनकी बनाई हुई इमारतें तथा उनके किसी भी अन्य योगदान को नकारा नहीं जा सकता। सारे ही मुग़ल बादशाह अपनी-अपनी जगह नेकनामी से जुड़े रहे, सिवाय औरंगज़ेब के. औरंगज़ेब, जिसने अपनी क्रूरता के झंडे गाड़े, मन्दिरों को तहस-नहस किया, हिन्दू और गुरू तेगबहादुर सहित सिखों का कत्लेआम किया, गैर-मुसलिम वर्ग पर जाज़िया (कर, टैक्स) लगाया, संगीत समेत हर प्रकार की कला का बहिष्कार किया, यहाँ तक कि अपने पिता शहंशाह को उनकी वृद्धावस्था में कारावास का दंड दिया और अपने भाई को मौत के घाट उतरा। औरंगज़ेब के कार्यकलापों को किसी का समर्थन नहीं मिल सकता। यह उसका अपना ही नकारवादी दमखम था कि नफरतों के बीच उसने अपना साम्राज्य खड़ा किया। हम औरंगज़ेब को इतिहास से तो खारिज नहीं कर सकते लेकिन उनके नाम को यादगार बनाने को समाप्त करने के इस कार्य की प्रशंसा ज़रूर कर सकते हैं.




Saturday, 15 August 2015

सौरभ द्विवेदी

सौरभ द्विवेदी

हमारे इर्द-गिर्द कितनी कहानियाँ बिखरी हुई हैं, इस बात को जितनी खूबी से सौरभ द्विवेदी रोज़ अपनी पोस्ट में उतारते हैं, शायद कोई नहीं। जो कुछ सौरभ के आसपास घटता है, वह तुरन्त शब्दों का जामा पहन कर पोस्ट पर हाज़िर हो जाता है. उनकी देखी हुई घटना का विवरण मात्र नहीं, बल्कि उनके विचार, भाव, सुझाव, सब मिल कर उसे एक कहानी का रूप दे देते हैं. वे किसी दुकान पर खड़े हो कर चाय पीते हैं, तो उन्हें कोई कहानी मिल जाती है. किसी से कुछ बात करते हैं तो वहाँ भी उन्हें कोई कहानी मिल जाती है. बच्चे, बूढ़े, जवान, किसी को भी देखें / मिलें, तो उनमें कोई न कोई कहानी ढूँढ लेते हैं. कहीं पत्थर या फूल दिख जाए तो वह भी उनकी कहानी का विषय बन कर शब्दों में पिरोया जाता है. सच तो यह है कि हमारे आसपास, कण-कण में कहानियाँ बिखरी हुई हैं, बस नज़र चाहिए, पारखी नज़र, जो उस कण को उठा कर हीरे में बदल दे. यह पारखी नज़र सौरभ में है. कितना कुछ भरा पड़ा है सौरभ के भीतर ! जैसे युगों से जमा किया हुआ लावा हो, जो हर पल उछल-उछल कर बाहर निकलने के लिए मचल रहा हो. इतना ज़्यादा लिखने से उनकी लेखनी मँज रही है, सँवर रही है. वे लिखते-लिखते थकते नहीं, ऊबते नहीं, जैसे वे हाथ में विजय पताका उठा कर चले हैं कि उन्हें हर वस्तु के पीछे छुपा सच दुनिया को दिखाना ही है. वे भोले हैं, जैसे अनुभव की आँखें अभी-अभी खुली हैं. ज़र्रे-ज़र्रे को अपने भीतर समेटने का जज़्बा लिए वे देश के अप्रतिम युवा हैं, भविष्य की उम्मीद हैं, पूरी तरह भारतीय हैं. विजयी भवः, सौरभ !


मैं जैसी भी हूँ Kavita 239

मैं जैसी भी हूँ

मुझे गर्व है कि मैं वह हूँ जो मैं हूँ.
मुझे अपनी जड़ों पर नाज़ है.
मुझे नाज़ है अपने वह होने पर जो मैं हूँ.
मैं जैसी भी हूँ, बस वैसी ही रहूँ।
आज़ाद रहूँ पर अनुशासित रहूँ।
खुश रहूँ पर संयमित रहूँ।
नृत्य करते समय ध्यान रखूँ
कि आँगन टेढ़ा न हो.
उम्मीदों को बोते समय देख लूँ
कि बीज विषैला न हो.
मेरे दिल में एक हवाई जहाज है
जो हर समय उड़ता रहता है.
कोई गंतव्य चुनूँ
ताकि रोज़ उड़ूँ।
खतरों से खेलूँ तो बस खेलूँ।
मैं ऐसी ही हूँ, बस ऐसी ही रहूँ।

Saturday, 1 August 2015

Kiran Bedi

Kiran Bedi

यह पुस्तक है, किरन बेदी द्वारा सम्पादित Fateh : Triumph over Tragedy (जीत : त्रासदी पर विजय). 2014 में किरन बेदी की संस्था India Vision Foundation (I V F) द्वारा प्रकाशित (मूल्य 195 रुपये पेपरबैक) इस पुस्तक में, पहली बार जेल में बंद कैदियों के बच्चों ने अपने कष्टों की कहानी को अपने शब्दों में बयान किया है. बच्चों द्वारा लिखे गए बयान उन्हीं की लिखाई में छपे हैं, उसके बाद उसका अंग्रेजी या हिन्दी अनुवाद छपा है, बच्चों का नाम और परिचय है, अंत में हर बच्चे के आलेख पर उसके counsellor की टिप्पणी है. इन बच्चों को I V F की मदद से पढ़ने के लिए मिशनरी हॉस्टल्स में भेजा गया. इनके जीवन को सही दिशा दिखाने में I V F का योगदान अमूल्य है. ये वे बच्चे हैं जिन्होंने अपने जीवन की त्रासदी पर विजय पाने का दृढ निश्चय किया और उसे करके दिखाया। Fateh में कैदियों के उन किशोर उम्र के बच्चों के वास्तविक जीवन की उन घटनाओं का उल्लेख है, जो उन्होंने अपने जीवन में आए बेहद बुरे समय में झेलीं और उन पर विजय पाई, वे जीवन की कठिनाइयों से भागे नहीं, उन्होंने अपने माता या पिता द्वारा जिए जा रहे शर्मनाक जीवन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ने का निश्चय किया। ये बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने अपने गैर-ज़िम्मेदार माँ-बाप से भी प्यार किया और शिक्षा प्राप्त करके उनका जीवन सुखी बनाने की भावना ज़ाहिर की. इन्होने शिक्षा की महत्ता को माना और अपना भविष्य सुधारने का प्रण किया। 

किरन बेदी द्वारा जेलों और कैदियों के सुधार के लिए किए गए कामों की जानकारी पहले से थी, सभी को होगी, लेकिन इस पुस्तक को साक्षात सामने देख-पढ़ कर, कैदियों के बच्चों के बारे के किए गए कार्यों को जान कर, उनके लिए मन आदर से भर उठा. यह किरन बेदी की बरसों की कोशिश और तपस्या का फल है कि ये बच्चे अपना भविष्य सँवार सकेंगे। एक सच्ची भावना से वे आगे आईं तो उनकी सहायता के लिए बहुत लोग जुड़ते गए. ज़ाहिर है, परोपकार में पैसे की भी दरकार होती है. किरन बेदी के इस सद्कार्य के लिए डोनेशन्स की क्या कमी? पुस्तक में I V F की आर्थिक मदद करने के इच्छुक व्यक्तियों के लिए I V F के बैंक डिटेल्स दिए गए हैं. I wish all the best for Kiran Bedi, as well as for her mission.




Sunday, 26 July 2015

मस्ती में Kavita 238

मस्ती में

बहुत व्यस्त हूँ
फिर भी मस्त हूँ.

भीतर से त्रस्त हूँ
फिर भी मस्त हूँ.

अँधेरों की अभ्यस्त हूँ
फिर भी मस्त हूँ.

आलसपरस्त हूँ
फिर भी मस्त हूँ.

दुविधाग्रस्त हूँ
फिर भी मस्त हूँ.

जीने को अभिशप्त हूँ
फिर भी मस्त हूँ.

किसने कहा, पस्त हूँ?
मैं तो मस्त हूँ.

Monday, 13 July 2015

Harnaam Kaur : Facial Hair

Harnaam Kaur : Facial Hair

This is 24 year old Harnaam Kaur, an Indian-origin British girl,  with moustache and full fledged beard, posing for a Bridal shoot for a British magazine. हरनाम कौर हार्मोन्स की बीमारी से ग्रस्त है जिसके कारण उसकी 16 वर्ष की उम्र में उसके चेहरे पर लड़कों की तरह मूछें और दाढ़ी उग आई. वह सप्ताह में दो-तीन बार अपने चेहरे पर वैक्सिंग कराती थी लेकिन उसमें बाहर दर्द होने के कारण कभी-कभी शेव भी कर लेती थी. एक बार चेहरे के इन बालों के कारण उसे जीवन से इतनी निराशा हुई कि उसने आत्महत्या करने का फैसला तक कर लिया। लेकिन मरना इतना आसान है क्या? धीरे-धीरे हरनाम कौर में आत्मविश्वास बढ़ा और उसने अपने इस रूप-विकार को सकारात्मक तरीके से लेना शुरू किया।

उसने H T को दिए एक साक्षात्कार में बताया कि "One day, I hit my lowest point in life due to suicidal thoughts and self-harming incidents, but I decided to become a happier person. I fought back against society definition of what woman should look like. We need to realize that each one of us is different. We are all imperfectly perfect. I wanted to show the society that we can all celebrate our individuality. I love my lady beard and I'll forever cherish it." (मैंने अपनी आत्मघाती मनस्थिति पर विजय पाई और खुश रहने का फैसला किया। मैंने समाज की इस धारणा को बदलना चाहा कि स्त्री को एक ख़ास तरह से सुन्दर दिखना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि हर व्यक्ति दूसरे से भिन्न है. हम अपनी अनगढ़ता में पूर्ण हैं. मैं समाज को यह दिखाना चाहती थी कि हम सब अपनी निजता का उत्सव मन सकते हैं.)

उस पर एक ब्रिटिश मैगज़ीन की नज़र पड़ी और उसने उसे Bridal shoot के लिए तैयार किया।

यह कुछ उसी तरह है जैसे हार्मोन्स की गड़बड़ी के कारण कई पुरुष-शरीर स्त्री-मन रखते हैं और स्त्री-शरीर पुरुष-मन. जिस भी हाल में पैदा हो, इंसान को जाना ही है क्योंकि जीवन में रास भी बहुत है और मरना इतना आसान भी नहीं। इंसान इस दुनिया में ज़िंदा रहने के लिए किस-किस तरह दिल को समझाता है. इस लड़की के जज़्बे को सलाम।



Sunday, 12 July 2015

तिरिया चरित्तर : कहानी ; शिवमूर्ति

तिरिया चरित्तर : कहानी : शिवमूर्ति

एक श्रेष्ठ लेकिन मेरे हिसाब से अधूरी कहानी

शिवमूर्ति प्रबुद्ध लेखक हैं, जिन्होंने स्त्री के उत्पीड़न को, उसके प्रति होने वाले अन्याय को महसूस करके लिखा। उन्होंने नब्बे के दशक में औरत की ज़बरदस्त वकालत करते हुए एक बहुत ही खूबसूरत कहानी लिखी : तिरिया चरित्तर। इसमें मुख्य पात्रा विमली के साथ व्यभिचार करने की मंशा लिए उसका श्वसुर जब अपने कुत्सित उद्देश्य में सफल नहीं होता तो वह समाज के सम्मुख उसे कलंकित घोषित कर देता है. विमली के सच्चरित्र होने पर भी दुश्चरित्र पुरुष-प्रधान समाज द्वारा उसे अंगारों से दाग दिया जाता है. लेखक ने इस कुशलता से विमली जैसे सामर्थ्यवान, सच्चरित्र, उसूलों के पक्के चरित्र को गढ़ा है कि वह पाठ को बहुत दूर तक अपने साथ बहाए चलने की क्षमता रखता है. लेकिन शिवमूर्ति भाय, आपने इस कहानी को अधूरा क्यों छोड़ दिया? विमली जैसे सबल पात्र की कहानी दाग दिए जाने पर समाप्त नहीं होती। सच पूछिए तो असली कहानी वहीँ से शुरू होती है. क्योंकि उसके अपने चरित्र की छुपी हुई सम्भावनाएँ दागे जाने के क्लाइमेक्स के बाद ही उभरेंगी। और तब जो हश्र होगा, उसका क्लाइमेक्स इस क्लाइमेक्स से भी बड़ा होगा। 


Wednesday, 8 July 2015

मैं उसकी दीवानी Kavita 237

मैं उसकी दीवानी

कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को.
नहीं नहीं 
वह मेरा दीवाना नहीं
मैं उसकी दीवानी,
नियति ने पगला कर लिखी
एक अजब कहानी.

रोज़ नई चीख
खामोशी में से उठती है
रोज़ नया राग
टूटे वाद्य से निकलता है
कहानी एक ही है
रोज़ नए अंदाज़ में लिखी जाती है.

कुछ कहानियों के
उपसंहार नहीं होते
वे चलती हैं
धारावाहिक
जन्म-दर-जन्म.


Sunday, 28 June 2015

मेरे साथ Kavita 236

मेरे साथ

मेरी बहुत सारी कविताएँ वक़्त के साये में गुम हो गईं. मेरी बहुत सी ऐसी कविताएँ हैं जो न तो मेरे तीन कविता संग्रहों में संकलित हैं, न ही कहीं और लिखी हुई मेरे पास हैं. मेरी एक प्रिय कविता की कुछ पंक्तियाँ मुझे याद हैं, शब्दों से बचो, ख़ामोशी की कविता रचो, यह छापी थी, कन्हैया लाल नंदन जी ने उस अखबार में जिसके वे संपादक थे, शायद 1990 के बाद किसी समय. मैं अपने लेखन के प्रति बड़ी ही गैरजिम्मेदार रही और कुछ संभाल कर न रख सकी, क्योंकि मुझे अजीब सा वैराग्य हो गया हो गया था, मेरे दिल में लेखिका के रूप में कोई यश कमाने की अभिलाषा नहीं थी और मैंने सोचा था कि मैंने दुनिया छोड़ दी है. यह ख्याल भी नहीं आया था कि मुर्दे अर्थी से भी ज़िन्दा उठ खड़े होते हैं. सो एक दिन मैं मृत्यु शैया से उठ खड़ी हुई। कुछ दिन पूर्व लेखिका उषा भटनागर, जो मुंबई से मेरी मित्र बनीं और यहाँ फेसबुक पर बरसों बाद मिलीं, ने मुझे मेरी एक कविता भेजी जो, उन्होंने बताया, 'हंस' पत्रिका में बीस साल पहले छपी थी. कविता नीचे दे रही हूँ. मैं हैरान हूँ, आप भी हैरान होंगे कि राजेन्द्र यादव जी जैसे विद्वान संपादक ने इस घटिया कविता को 'हंस' में कैसे स्थान दिया?

मेरे साथ

पुत्र !
तू क्यों नही सीखता
मॉ के बिना जीना?
क्यों बँधा रहता है हर वक़्त
मॉ के पल्लू के साथ?
तूने कर दिया
अपने जीवन का दान
मॉ के नाम।
नही अच्छी लगती तुझे
किसी के भी हाथ की बनाई हुई रोटी
मातृसेवा परमोधर्म
का व्रत तूने अपनाया है।
तू इस मोह से मुक्त नही हो पाता
कि मॉ बोलती रहे
और तू सुनता रहे
मॉ के जीवन की कहानियाँ।
आख़िर मॉ कब तक बोलती रहेगी बेटे !
अपने को मुक्त कर
अपना मोह कहीं और जगा
वरना तू कैसे जी पायेगा?
मेरे मरने के साथ
कैसे कहूँ
भीतर कही तू भी
.......
अशुभ मत बोलो.

Saturday, 20 June 2015

ऋचा विमल कुमार

ऋचा विमल कुमार

वाह, मेरे फेसबुक मित्रों ! यदि इसी तरह से आप मेरी शॉप पर आकर मेरी सेल करवाते रहे तो मेरे वारे न्यारे। या कहूँ, मैं आप पर वारी वारी। कुछ दिन पूर्व रोहित रहस्य आए थे और कुछ गिफ्ट आयटम खरीद कर ले गए थे लेकिन मैं उन्हें मिल नहीं सकी थी क्योंकि मैं नॉएडा से बाहर थी. श्री ध्रुव गुप्त भी मेरी दुकान से खरीद चुके हैं. अनेक मित्रों ने मुझसे Online shopping की. कल सुबोध मित्तल आई ही थीं. आज झारखंड की ऋचा विमल कुमार आई थीं. इन दिनों वे नॉएडा में हैं, इससे पूर्व ये मुझसे Online खरीद चुकी है. आज ये बस जल्दी-जल्दी में आईं, समझो तूफ़ान की तरह आईं और कुछ देर में ही खरीदारी करके तूफ़ान की तरह लौट गईं, फिर आने का वादा करके। ऋचा गज़ब की खूबसूरत और स्मार्ट हैं, फेसबुक पर अपनी पोस्ट्स में जितनी चुलबुली नज़र आती हैं, उससे कहीं ज़्यादा चंचल हैं. माशा अल्लाह ऋचा, तुम्हारी खूबसूरती को मेरी नज़र न लगे. उनकी बेटी ने यह फोटो ली, जिसमें उनकी नॉएडावासी भाभी हमारे साथ खड़ी हैं. ओफ्फो ! मैं ऋचा को अपना हाथ दिखाना तो भूल ही गई. साहब ये प्रोफेशनल ज्योतिषी हैं. मैं आज़मा चुकी हूँ. क्या कमाल का हॉरोस्कोप (जन्मपत्री) पढ़ती हैं. जो अपनी जन्मपत्री इन्हें दिखाना चाहें, दिखा सकते हैं, फीस भी ज़्यादा नहीं है, केवल 1001/- रुपये में आप पूरे जीवन का हाल जान लीजिए. मुझसे सिफारिश की तो मैं थोड़ा कम भी करवा दूँगी। क्यों ऋचा, सही है ना?


Friday, 19 June 2015

सुबोध मित्तल

सुबोध मित्तल

सुबोध मित्तल दो या तीन साल से मेरी फेसबुक मित्र हैं. मैंने उन्हें मित्र बनाते समय पूछा था कि आप पुरुष हैं तो आपने महिला का चित्र अपनी प्रोफाइल पिक्चर के रूप में क्यों लगाया हुआ है? (ऐसे ही मुझे प्रभात समीर, विनय पँवर नाम की महिला मित्रों के प्रति भ्रम हुआ था.) सुबोध ने कहा था, वह महिला ही हैं, नाम चाहे सुबोध है. मैंने फेसबुक पर हमेशा उन्हें ज्ञानवान, बहसीली, तर्कप्रिय और ठहाके लगाते हुए पाया। उनकी टाइमलाइन पर उनके फोटोज़ में हमेशा उन्हें भीड़ में घिरे पाया। कभी उन्होंने फेसबुक मित्रों को इकट्ठा करके पिकनिक मनाईं, कभी get-together किए. पति के रिटायर होने के बाद वे मेरे नॉएडा के नज़दीक इन्दिरापुरम में आकर बस गईं हैं, वहाँ एक contributory get-together में उन्होंने मुझे आमंत्रित किया कि मेरा contribution वे दे देंगी। Contribution की मुझे क्या परवाह लेकिन मैं भीड़-भड़क्कों से घबराती हूँ. मैं नहीं गई. फिर उन्होंने कई बार मिलना चाहा, मैं भी मिल सकती थी लेकिन उनके इर्द-गिर्द की भीड़ को देख कर उनसे मिलने का कभी मन नहीं हुआ. मुझे लगा, उन्हें बहुत हलचल पसंद है और मैं एकांतप्रिय। उनका और मेरा कोई मेल नहीं। अभी कुछ दिन पूर्व मैंने, दिल के दर्द किस मित्र के साथ बाँटे जा सकते हैं, इस विषय पर पोस्ट लिखी थी, जिसमे सुबोध के बारे लिखा था कि Subodh Mittal बड़ी मस्त मौला हैं, उनके साथ मिल कर ठहाके लगाए जा सकते हैं, रोया नहीं जा सकता। उन्होंने कमेंट में लिखा था, 'मनिका जी ! ये मस्तमौलापन आंसुओं की कीमत पहचान लेने के बाद ही आया है |' कई बार क्लिक करने के लिए कोई एक बात काफी होती है. उनकी इस बात ने मुझे कहीं छुआ, और उसके बाद कई बार मेरी बात उनसे मैसेज बॉक्स और फ़ोन पर हुई तो लगा कि उनके घर-गृहस्थन, मिलनसार, हँसमुख महिला होने के पीछे बहुत कुछ ऐसा है जो मुझ जैसी एकाकीमना, किसी से न मिलने की शौक़ीन को उनके प्रति आसक्त बना सकता है. वे आज मेरे घर अपने पति के साथ आईं. जैसी फेसबुक पर नज़र आती हैं, उससे एकदम अलग, पतली, छरहरी, हँसमुख तो खैर हैं ही, उनसे मिल कर दूसरा भी मस्त-मौला हो जाए. मैंने कभी सुबोध से इतनी बात कहने-सुनने की कल्पना नहीं की थी, जितनी आज कह-सुन ली. फिर उन्होंने मेरी दुकान पर जाना चाहा। शाम हो गई थी. मैंने कहा, रहने दें, फिर कभी दुकान पर आ जाइए। बोलीं, 'नहीं, अभी चलना है.' (शरीफ मित्र मेरी दुकान से कुछ न कुछ खरीदते हैं, चाहे आकर खरीदें, चाहे कूरियर से मंगवाएँ। सॉरी।) दुकान से उन्होंने कुछ ड्रेसेज़ खरीदीं. देखिए, सफ़ेद प्लाजो के ऊपर काले टॉप में वे कितनी फिट लग रही हैं.




Monday, 8 June 2015

मन्नो तेरी अँखियाँ सुरमेदानी

मन्नो तेरी अँखियाँ सुरमेदानी

मनु पर लिखी यह कविता गीत 'बन्नो तेरी अंखियाँ सुरमेदानी' की तर्ज़ पर है, जो मनु के बहाने से समस्त किशोरी लड़कियों को सम्बोधित है।

मन्नो तेरा मुखड़ा चाँद सा रे
मन्नो तेरी अँखियाँ सुरमेदानी।

मन्नो तेरा नखरा प्यारा लागे
मन्नो तेरी ज़िद है दिल लुभानी।

मन्नो तेरे सपने बेहिसाबी
मन्नो तेरा उड़ना आसमानी।

मन्नो तेरे दिल का जोश वाह-वाह
मन्नो है यह दुनिया शातिरानी।

मन्नो तेरी बतियाँ रस भरी री
मन्नो तुझ पर मैं मर-मर जानी।

मन्नो तेरा दिल है भोला-भाला
मन्नो ज़रा रखियो सावधानी।

मन्नो यह जिंदड़ी टेढ़ी-मेढ़ी
मन्नो यहाँ हर पल है हैरानी।

मन्नो यह दिल है बड़ा फरेबी
मन्नो मत करियो तू नादानी।

मन्नो तेरी मस्ती छल-छल छलके
मन्नो तेरी अल्हड़ सी रवानी।

मन्नो बस पर्दा लाज का रे
मन्नो तू रखियो आँख में पानी।

मन्नो तुझे हर पल जीतना है
मन्नो तू लिखियो ख़ास कहानी।

मन्नो तेरा सुन के अच्छा-अच्छा
मन्नो तेरे अपने सब गर्वानी।

Thursday, 4 June 2015

बेपेंदी का लोटा

बेपेंदी का लोटा

GIP Mall में, Crazy Noodles रेस्टॉरेंट में पानी पीने के लिए जो शीशे के गिलास मेज़ पर रखे थे, उनका नाम था Crazy Glass. उनके नीचे पेंदे में एक गोल गुम्बद था जिसके कारण वे गिलास खड़े नहीं हो पा रहे थे, कभी इधर झुक रहे थे, कभी उधर, यानि इधर-उधर लुढ़के-लुढ़के जा रहे थे. हमें बड़ी हँसी आई, कहीं इनमे से पानी गिर न पड़े लेकिन पानी नहीं गिरा। गिलास आधा भरा था. रेस्टॉरेंट वाले गिलास बेच भी रहे थे, एक गिलास का मूल्य 200 रुपये और 5 गिलास के साथ एक गिलास फ्री यानि 1000 रुपये में 6 गिलास। हम भी बड़े Crazy Buyer हैं, जहाँ भी कोई ऊटपटाँग सी चीज़ नज़र आती है, खरीद लेते हैं, घर में काम आए तो आए अन्यथा Retail में लाई हुई चीज़ को दुकान में रख कर Retail में बेच लेते हैं, 200 की लाए हैं तो 100 की तो बिक ही जाएगी, हाहा, या किसी को गिफ्ट कर देते हैं. बस खरीदने का शौक है. पर उस दिन नहीं खरीदे। तनु-मनु फिल्म के लिए देर हो रही थी, किसी तरह जल्दी-जल्दी खाना खाया था. सोचा, दोबारा तो यहाँ आना ही है, फिर खरीद लेंगे। पर साहब, उन गिलासों को देख कर कहावत 'बेपेंदी का लोटा' साकार हो गई. अब तक यह नहीं पता था कि बेपेंदी का लोटा होता कैसा है? उस दिन जैसे आँखों के आगे चित्र सा खिंच गया. तो बेपेंदी के लोटे-लुटिया ऐसे होते हैं? इस कहावत से ये शब्द ध्यान में आते थे कि जो इधर-उधर लुढ़कता रहे, वह बेपेंदी का लोटा। उस दिन ये अर्थ भी सामने आए कि जो कभी इधर झुके, कभी उधर झुके, वह बेपेंदी का.होता हैं, सच में कुछ लोग होते हैं, जो बेपेंदी के होते हैं. यहाँ फेसबुक पर भी हैं कई ऐसे लोटे-लुटिया हैं, जो पक्ष के कमेंट को भी लाइक करते हैं और विपक्ष के कमेंट को भी. यहाँ एक सज्जन ऐसे ही थे, जो मेरी पोस्ट की प्रशंसा में आए कमेंट को फटाक से लाइक करते थे तथा उतने ही फटाक से उस पोस्ट की आलोचना में आए कमेंट को लाइक करते थे. मुझे उन्हें अनफ्रेंड करना पड़ा. कारण? मैं भई उसूलों वाली बंदी हूँ. उनका कोई एक मत नहीं, एक दृष्टिकोण नहीं। बंधुवर ! किसी एक जगह तो टिको। यह क्या कि चित भी अपनी, पट भी अपनी। तो जी, ऐसे बेपेंदी के लोटे बड़े खतरनाक होते हैं. आप उनका भरोसा नहीं कर सकते। आप उनसे बस यह अनुरोध कर सकते हैं कि महानुभावों, अपनी पेंदी लगवा लो, ताकि एक जगह जम के खड़े हो सको. इधर-उधर लुढ़कने में क्या रखा है?

Wednesday, 3 June 2015

कथाकार शिवमूर्ति

कथाकार शिवमूर्ति
(अखबार 'अमर उजाला' के 3 जून के अंक के हवाले से)

डा. शकुंतला मिश्रा पुनर्वास विश्विद्यालय में 65 वर्षीय कथाकार शिवमूर्ति ने एम ए हिंदी में प्रवेश के लिए फॉर्म भरा है. इसी यूनिवर्सिटी के एम ए के कोर्स में उंनकी कहानी 'तिरिया चरित्तर' पढ़ाई जाती है, जिस पर नसीरुद्दीन शाह एवं ओम पुरी अभिनीत फिल्म बनाई जा चुकी है. तो अब शिवमूर्ति भाय एम ए में अपनी लिखी कहानी पढ़ेंगे और उस पर प्रश्नोत्तर तैयार करके परीक्षा भी देंगे। शिवमूर्ति जी का कहना है कि उन्होंने बी ए ज़रूर किया है लेकिन यूनिवर्सिटी वह पहली बार जाएँगे। उनके बच्चे बड़े हो चुके हैं, सेटल हो गए हैं, इसलिए उन्हें लगा कि आगे और पढ़ाई पढ़ लेनी चाहिए। बधाई हो, शिवमूर्ति भाय, आप सफल हों, अन्य बंधुगण आपसे प्रेरणा लें. (एक बात इस सन्दर्भ से हट कर कि मैंने 'तिरिया चरित्तर' कहानी की समीक्षा की थी जो कहीं छपी भी थी, और मेरे निबंध संग्रह 'प्रसंगवश' में संकलित है. कभी यहाँ डाल दूँगी। भाय शब्द का प्रयोग शिवमूर्ति ने इस कहानी में किया है, ख़ास मित्र के अर्थ में)


Tuesday, 2 June 2015

Film : Tanu weds Manu Return

Film : Tanu weds Manu Return

सब यह कहते हैं, अंततः अच्छाई और सचाई की जीत होती है, बुराई और झूठ की हार. अच्छाई चरित्र और स्वभाव के साथ नहीं, बल्कि क्या सिर्फ इस सच के साथ जुडी होती है कि दो व्यक्ति पति-पत्नी हैं, इसलिए उनके रिश्ते को जीतना ही जीतना है, चाहे उसने बुराई की कितनी हदें पार कर ली हों? यह घटिया कहानी है, Tanu weds Manu Return की. Absurd & Unacceptable. यह फिल्म बनाने वाले भी आधुनिक बनने के चक्कर में घटिया हो गए हैं. इन्होने नायिका तनु (कंगना रनौत) को एक आधुनिक महिला के रूप में गढ़ना चाहा लेकिन फुस्स होकर रह गए. तनु कानपुर के एक अत्यंत साधारण मोहल्ले में, अत्यंत साधारण परिवार की उपज है, शायद इसीलिए वह स्वच्छंदता की हद तक स्वतंत्र है. छोटे घरों की लड़कियाँ जल्दी बड़ा होना चाहती हैं, शायद यह मानसिकता इस चरित्र को गढ़ने के पीछे रही हो. क्योंकि वे स्पष्ट रूप से गरीब और पिछड़े हुए दकियानूसी परिवार को बिलॉंग करती हैं, और स्त्री की आज़ादी की माँग के चलते उन्हें स्वयं को इस दाग-धब्बे से दूर करना है, इसलिए वे सजग रूप से हर कदम वह उठाती हैं, जो उन्हें आधुनिकता के दायरे में रख सके. मोहल्ले के लड़कों के साथ खुले प्रेम-सम्बन्ध बनाना, शराब पीना, ये लक्षण आज लड़कियों को आधुनिकता में घुसने के सरल तरीके लगते हैं, जबकि उनका जीवन निभता एक शरीफ आदमी के साथ ही है. तनु का विवाह मनु नाम के डॉक्टर (माधवन) से होता है और वे दोनों लंदन में रहने लगते हैं. माधवन सुपर्ब लगे. डॉक्टर पति के व्यस्त रहने और रोमैंटिसिज़्म से दूर रहने के कारण घरेलु पत्नी तनु उसे पागलखाने तक भिजवा देती है, अपने देश यानि अपने पिछड़े मोहल्ले में वापस लौटती है, लौटने के साथ ही उसके पुराने प्रेमी उभर कर सामने आते हैं, जिनमे एक रिक्शावाला भी है. वह विवाह से तुरंत पूर्व के प्रेमी से रिश्ता जोड़ने की उम्मीद में मिलती है लेकिन वह बताता है कि एक अन्य लड़की से शादी करने वाला है और तनु लौट कर अपने पति के पास आना चाहती है जो अब तक लंदन के पागलखाने से छूट कर उसी मोहल्ले के अपने घर में आ चुका होता है. कहीं और बात जमी नहीं तो पति तो है ही बेचारा, जिसे इमोशनली ब्लैकमेल करके फिर से फँसा लिया जाता है. दर्शक इसे पति-पत्नी के बीच का पुनर्मिलन और हैप्पी एंडिंग की कहानी समझ कर खुश है. लानत है ऐसे पुनर्मिलन पर. लेकिन कहानी का अंत वास्तव में दुखद है क्योंकि फिल्म में असली नायिका तनु नहीं, कुसुम (कंगना रनौत का डुप्लीकेट रूप) है जिसकी एंट्री कहानी के बीच में होती है, जो एक सकारात्मक चरित्र है, गाँव की भाषा बोलने वाली एक सीधी-सादी लड़की है, जिसमे नायक अपनी पत्नी तनु की झलक पाकर आकर्षित होता है और उसके साथ विवाह की वेदी तक पहुँच जाता है. पर तनु के वहाँ जमी रहने के कारण वह रिश्ता टूटता है. कुसुम टूटना सहर्ष स्वीकार करती है लेकिन अकेले में उसके दिल का दर्द आँसुओं में बहता है. एक दृश्य में जब तनु उसके गंवारपन पर हँसती है, तब वह गाँव की लड़की कुसुम उसे क्या दो-टूक जवाब देती है कि तुम डॉक्टर के पैसे पर पल रही हो, मैं खुद कमाती हूँ, तुम रिश्तों की अहमियत क्या समझो आदि आदि. मेरे विचार में, न हर पति इस काबिल होता, न हर पत्नी इस काबिल होती कि सिफ हैप्पी एंडिंग की नियत से दोबारा रिश्ता जोड़ा जाए.
 

Monday, 1 June 2015

राघवेन्द्र अवस्थी

राघवेन्द्र अवस्थी

फेसबुक पर  एक मित्र हैं, राघवेन्द्र अवस्थी। अपने लगभग 5000 मित्रों की मंडली में खासे लोकप्रिय हैं. उनका कहना है कि वे मेरा बहुत सम्मान करते हैं और मेरी किसी बात का बुरा नहीं मानते, न मानेंगे। तीन-चार साल से मित्र हैं, जिसमे से अपने बड़बोलेपन के कारण दो बार अनफ्रेंड हो चुके हैं, कुछ म्यूच्यूअल फ्रेंड्स की सिफारिश पर तीसरी बार मित्र बने हैं. शायद अब अनफ्रेंड न करना पड़े. ऐसों को भी निभा लो मणिका, ऐसों को भी निभा लो.

लगभग तीन साल पहले राघवेन्द्र ने अपने डॉगी के साथ अपनी एक फोटो डाली थी और बताया था कि उसका नाम बूज़ो है, तब मैंने उन्हें यह मैसेज किया था : जब आपने अपने डॉगी का नाम बूज़ो लिखा तो मेरा ध्यान इस बात की ओर गया कि मेरे एक परिचित के डॉग का नाम भी बूज़ो है, पत्नी का नाम अर्चना, तथा उनके नाम का पहला अक्षर र है. मेरा ऐसी बातों की तरफ ध्यान जाता है कि इतनी समानताएँ किन्हीं दो व्यक्तियों में हैं तो क्यों हैं? इसीलिए मैंने आपका Year of birth पूछा।' (वह आपसे 8 साल छोटा है। )

मुझे यह साम्य बहुत कमाल का लगा था, मेरे एक अंतरंग मित्र और राघवेन्द्र में. दोनों का नाम R र से शुरू होता है, दोनों की पत्नी का नाम अर्चना (उसकी पत्नी का देहांत हो चुका था, He was a widower), और दोनों के डॉगी का नाम बूज़ो।' इन दिनों जब मेरी पोस्ट पर किसी कारण से राघवेन्द्र एक 'हल्ला बोल' खेल में शामिल हुए तो कुछ और साम्य देखने में आए, कि राघवेन्द्र मेरे मित्र की ही तरह बेहद बातूनी, हाजिरजवाब, कविताओं पर तुरन्त अपनी कविता लिखना, अपने को बहुत चतुर समझना, हर समय कन्याओं से घिरे रहने का शौक, यह अहंकार कि मैं इतना बढ़िया हूँ कि हर कोई मुझे पसंद करेगा ही करेगा (करेगी ही करेगी), कुछ-कुछ पागल सा, दीवाना सा, पर साफ़ दिल, भोला बच्चा जैसे, जो हर वक़्त यह विश्वास दिलाए कि हमसे ज़्यादा बड़ा उसका कोई अपना नहीं, शुभचिंतक नहीं, जो रोज़ गलती करे, जिसकी हर गलती पर माफ़ करने को दिल चाहे।

पर आखिर कोई कब तक माफ़ करे? मैंने अपने अंतरंग मित्र से मुक्ति पाई, जो मेरे लिए बहुत कठिन काम था, पर करना पड़ा. रिश्ते तोडना आसान नहीं, दिल टूटते हैं. लेकिन इन दिनों अनेक बार इस बात पर हैरान हुई कि भगवान ने एक जैसे दो रॉटन पीस Rotten Piece कैसे बनाए? और क्यों बनाए? सॉरी राघव। आय'म वेरी सॉरी।


Sunday, 31 May 2015

Gazal 47

Gazal 47

मैंने जो अपना तुझे समझा हुई मुझसे खता.
करूँ तो क्या करूँ अब आके मुझे तू ही बता.

मैं अपनी चंद सी खुशियों के साथ खुश हूँ बहुत
तू मुझे और भी खुश होने के सपने ना दिखा.

कभी खामोशी की सुभाषा को भी सुन लिया कर
कसमे-वादों की झूठी फ़ालतू झड़ी ना लगा.

क्यों तेरे साथ खड़ा हो के ज़माने को दिखूँ?
तू मुझे मंच पर अब बार-बार यूँ ना बुला.

मुझे बेरंग किया तूने मेरे रंग छीन कर
चिढ़ा-चिढ़ा के मुझे रंगों का उत्सव ना मना.

मैंने छोड़ा है तुझे कि तूने छोड़ा है मुझे
दोनों बातों में कोई फर्क कहाँ, यह तो बता.

कि मेरे पास बहाने बहुत हैं जीने को
तू बता, मेरे बिना कैसे जिएगा भला?


Saturday, 30 May 2015

चट्टान Kavita 235

चट्टान

चट्टान होती हैं न-टूटने के लिए।
चट्टान बनती हैं न-बिगड़ने के लिए।

सर्दी, गर्मी, बरसात
कोई भी मौसम
किसी भी चट्टान का
कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

आओ आँधियों
मुझे हिलाने की कोशिश करो।
आओ समुन्दर
मुझे डुबाने की कोशिश करो।
आओ बाहुबली
मुझे अपने अंक में भरो।
आओ जुझारू
मुझे कीचड़ में लथपथ करो।

तुम किससे जूझ रहे हो द्रोही
चट्टान चट्टान होती है
वह किसी के हिलाए
टस से मस नहीं होती।

उस पर अपना नाम नहीं लिख पाओगे
उसे किसी रंग में नहीं रँग पाओगे
उसे कुछ समझो या न समझो
पत्थर समझोगे तो ठोकर खाओगे।

मैं जब चाहूँगी
इसमें पंख लगा दूँगी
और यह हवा में उड़ने लगेगी।
मैं जब चाहूँगी
इसे पानी में बहा दूँगी
और यह सरलता से तैरने लगेगी।
मैं जब चाहूँगी
इसे फूलों से सजा दूँगी
और यह महकने लगेगी।

इसे पहचान है भावना के हाथों की
यह प्यार की छुवन को पहचानती है
इसीलिए पत्थर की है तो क्या?
कभी किसी मूरत में ढल जाती है
और आशीर्वाद के फूल बरसाती है।

Friday, 29 May 2015

Mahmud Alam

Mahmud Alam

एक सज्जन हैं Mahmud Alam (महमूद आलम). इनका कल एक मेल आया, Added you on Google. (मुझे Google  पर add करना नहीं आता. सच कहूँ तो ईमेल करने और फेसबुक करने के सिवा मुझे कंप्यूटर पर कुछ भी नहीं आता. कुछ लोग Linkedin भेजते हैं. मैं सबको Trash में डाल देती हूँ. मुझसे सिर्फ फेसबुक पर मिलें, और कहीं नहीं।) महमूद आलम ने कल दोपहर 12 बजे से रात 12 बजे तक मेरे ब्लॉग की 12 लम्बी रचनाएँ पढ़ कर बढ़िया और विस्तृत कमेंट दिए. उनके कमेंट मेरी ईमेल पर आए. मैंने 4 का उत्तर दिया, पता नहीं उन तक पहुँचा या नहीं, क्योंकि उसका कोई जवाब नहीं आया. मैं इनके धैर्य की दाद देती हूँ, जो 12 घंटे तक लगातार मेरी लेखनी को ही पढ़ते रहे. दोषरहित रोमन में इन्होने कमेंट लिखे। दिल से कह रही हूँ कि ब्लॉग पर ऐसे सहृदय पाठक मिल जाएँ तो कहीं किसी पत्रिका / पुस्तक में छपास की इच्छा ही नहीं, नेट पर ही सारी ख़ुशी मिल रही है.

Thursday, 28 May 2015

प्रार्थना

प्रार्थना

मेरी एक फास्ट फ्रेंड हुआ करती थी. उसका और मेरा ऑफिस आसपास था. उसकी आर्थिक स्थिति बहुत बढ़िया थी. मुझे ज़रूरत पड़ने पर पैसे उधार दिया करती थी. मैं लंच नहीं ले जाती तो ज़िद करके अपना लंच मुझे खिलाती थी. मैं कई बार भगवान से यह दुआ माँगती थी कि उसे बहुत पैसा दो ताकि वह मुझे ज़रूरत पड़ने पर दे सके. एक दिन अचानक मुझे ख्याल आया था कि मैं भगवान से सीधे अपने लिए क्यों नहीं माँगती? तो मुझे लगता है कि कई बार हम सीधे अपने लिए भगवान से नहीं माँगते बल्कि वह जरिया मज़बूत करने की प्रार्थना करते हैं, जिस ज़रिये से हम सुखी होते हैं. जो लोग हमारा ख्याल रखते हैं, वे हमारी प्रार्थनाओं में होते हैं. इसका अर्थ तो यही हुआ कि अच्छे लोग अवश्य और हमेशा किसी न किसी की प्रार्थनाओं में होते होंगे?



Wednesday, 27 May 2015

स्वीकारोक्ति

स्वीकारोक्ति

आज यूँ ही लगा कि इंसान के पास कितनी तरह के दुःख होते हैं, हर दुःख किसी एक कंधे पर सिर रख कर नहीं रोया जा सकता। हर व्यक्ति की सेंसिबिलिटी अलग होती है जो हमारे अलग-अलग मूड्स के साथ मैच करती है. यूँ ही आज मन है, अपने फेसबुक मित्रों को याद करने का. फेसबुक के अलावा इस वास्तविक संसार में मेरा बस परिवार मेरा मित्र है या मेरे कर्मचारी। परिवार में मैं बॉबी, बरखा और मनु से अपनी बात कह पाती हूँ. मनु के आगे, लगता है, दिल के सारे राज़ खोल कर रख दूँ. कर्मचारि सम्वेदनशील हैं, लेकिन उनके साथ दिल की बातें? कदापि नहीं। अपनी छोटी बहन बेबी से नियमित फ़ोन पर बात करती हूँ लेकिन उनकी सेंसिबिलिटी एकदम टिपिकल गृहस्थिनों वाली है जो मुझे सूट नहीं करती। मन की हर बात तो सम्बन्धियों से शेयर नहीं की जा सकती। मन के दुःख मित्रों से बाँटे जाते हैं. मित्र आप सब हैं लेकिन आप सब में से किसी-किसी से मैंने दुःख का कोई एकाध टुकड़ा बाँटा हो लेकिन पूरा मन किसी के आगे कभी खोल कर नहीं रखा. शायद कभी रख भी न पाऊँ। लेकिन सोच तो सकती हूँ कि किसके आगे खोल सकती हूँ?

एक दुःख मैं सुनीता दमयंती से बाँट सकती हूँ, वह बढ़िया सलाहकार है लेकिन दूसरों के पचड़ों में पड़ने से परहेज़ करती है.

उमा झुनझुनवाला से प्रेम के दर्द में मेरी सेंसिबिलिटी अत्यधिक मैच करती है, उनका ह्रदय बेहद सम्वेदनशील है, लेकिन मेरी कभी उनसे बात नहीं हुई, एक औपचारिक बात को छोड़ कर.

शैफाली मेरी बहुत अच्छी सहेली हैं, लेकिन उनके पास अपनी बातें इतनी हैं, कि वे दूसरे की क्या सुनें?

नादानियों के मामले में मैं खुद को मोनिका भारद्वाज के समकक्ष खड़ी पाती हूँ. मोनिका मेरी इस बात से दुखी हो सकती हैं कि वे तो नादान नहीं, पर मुझसे ऐसा ही सोचा गया.

सुबोध मित्तल बड़ी मस्त मौला हैं, उनके साथ मिल कर ठहाके लगाए जा सकते हैं, रोया नहीं जा सकता।

माँ सामता अपनी उलझनों में व्यस्त हैं.

इंद्रा रानी अपने आप में पूर्ण है या नहीं, लेकिन दिखती हैं.

कभी-कभी ऋचा विमल कुमार के कंधे पर सिर रख कर रोने का मन हुआ है लेकिन फिर लगा, बेचारी सुखी बच्ची को क्यों दुखी किया जाए? मेरे बहुत से दर्द तो उन्हें समझ ही नहीं आएँगे.

जया पांडे, जिनके घोर अपनत्व से मैं शुरू में ऊब-सी गई थी, इसके बावजूद उन्होंने मुझे सम्मान देना नहीं छोड़ा, दुःख-दर्द सुनाने के मामले में जया मुझे अपने सबसे करीब लगती हैं, अगर वे मेरे नज़दीक रह रही होतीं तो हम एक-दूसरे को अपनी कहानियाँ सुना-सुना कर रात-दिन रो रहे होते, क्योंकि उनके पास भी बहुत दर्द हैं, मेरे पास भी.

अन्य सब सखियाँ भी बहुत भली हैं, मुझसे सभी का स्नेह है, सभी मेरा आदर-मान करती हैं.

पुरुष मित्रों से अपने दुःख-दर्द बाँटना मुझे उचित नहीं लगता क्योंकि दुःख-दर्द बँटते ही करीबी आ जाती है, जिसके कारण नए दुःख-दर्द पैदा होने की सम्भावना बन जाती है. फिर भी पुरुष मित्रों के बारे में कहूँ तो……

ध्रुव गुप्त के साथ अपनेपन का एक झीना सा सूत्र महसूस होता है. फेसबुक पर आने के बाद से मित्र हैं, शायद इसलिए।

आलोक मिश्र अत्यंत भावुक है. उसके पास अपनी कहने और मेरी सुनने के लिए ढेर सारा वक़्त है लेकिन मेरी अपनी अक्षमता, ज़्यादा बातों से मैं थक जाती हूँ.

सौरभ द्विवेदी मुझे शुरू में कुछ दीवाना सा, कुछ बदहवास सा लगा था, मैं उनकी बातों से बोर भी हो गई थी लेकिन सौरभ ने अपने को सँभाला। फिर मेरे प्रति उनका आदरभाव कभी कम नहीं हुआ, कभी उन्हें क्रोध नहीं आया. और बाद में जो मैंने उनमें प्रतिभा देखी, मैं चकित रह गई. उनके भीतर शब्दों और विचारों का लावा भरा है, जो फेसबुक पर निरंतर बह रहा है. सौरभ प्रतिभाशाली हैं, उन्हें शुरू में जिस दुःख ने तोडा था, शायद वही दुःख उनके लिए आगे बढ़ने में प्रेरक सिद्ध हुआ. इसीलिए मैं कहती हूँ, दुःख कभी खाली नहीं जाता, हमें बहुत कुछ देकर जाता है.

आलोक शर्मा के आदर भाव से मैं अभिभूत हूँ.

सुभाष ओझा के विनम्र अपनत्व के प्रति कृतज्ञ हूँ.

राघवेन्द्र अवस्थी (चाहे बुरा मानें) मुझे बहुत लाउड लगते हैं, फिर भी उन्होंने माते सुबोध मित्तल की संगति में बहुत तरक्की की है. मेरे और राघव के बीच छेड़छाड़ का सिलसिला बरकरार है.

भगवंत अनमोल घनघोर आत्म मुग्ध बालक है.

सोमेश चन्द्र ककड़ घनघोर आत्ममुग्ध परिपक्व पुरुष हैं.

संजय कुमार शुक्ला में गज़ब की समझ है. उनके अपनेपन के आगे द्रवित हूँ. कई बार सोचती हूँ कि संजय के 'सच' को मैंने क्यों सराहा? कई सच स्वीकार करने योग्य नहीं होते। पर शायद उनके 'सच' से ज़्यादा उनके जीवन के चमत्कार ने मुझे प्रभावित किया।

डा. एस के सिंह, लगता है, खामोशी से काम कर रहे हैं.

अनिल उपाध्याय ने मुझे Mother Dairy के Nutrifit से परिचय कराया, बेक्ड समोसे के बारे में बताया, दोनों के रसास्वादन से मैं लाभान्वित हुई.

अरे हाँ, अरुण मिश्रा, भई मैं आपको कैसे भूल सकती हूँ? मैं फेसबुक पर आपकी एकमात्र दोस्त जो हुई, बाकी सब तो बहनें-माताएँ हैं.

बाकी के बारे में फिर कभी. सच कहूँ तो जितना आदर मुझे फेसबुक पर मिला, उतना कहीं नहीं, कभी नहीं।