Friday, 30 January 2015

22. एक भावचित्र : स्पैस्टिक लड़की

22. एक भावचित्र : स्पैस्टिक लड़की

जब कभी आप कुछ अच्छा काम करते है, कुछ ऐसा जिस अच्छे को करने के पीछे कोई वजह न हो, कोई तर्क न हो, तो लोग आपको पागल समझते हैं. शायद पागल व्यक्ति ही बेवजह अच्छा करता है, सयाना आदमी नहीं। एक बात याद आ रही है. एक परिवार से हमारा मिलना-जुलना होता रहता था, यह बात दूसरी थी कि हम दोनों परिवारों के बीच कोई लगाव नहीं था. बस औपचारिकता थी. उनकी 12-13 वर्ष की एक बेटी थी, जो स्पैस्टिक थी यानि मानसिक रूप से थोड़ी कमज़ोर थी. (स्पैस्टिक बच्चे वे होते हैं जिनमे जन्म के समय से ही कोई शारीरिक या मानसिक कमी रह जाती है. ये किसी के समझाने से नहीं समझते, वही करते हैं जो इन्हें करना होता है. इनका पूर्ण इलाज संभव नहीं होता, फिर भी सजग और पैसे से समर्थ माता-पिता इनका इलाज करवाते हैं और इनमें थोड़ी-बहुत लियाकत आ जाती है.) हम जब भी उनके घर जाते या वे लोग आते, वह लड़की दौड़ कर आती और मुझसे लिपट जाती, बार-बार कहती, 'आंटी, आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं.' उसकी माँ उसे खींच कर मुझसे अलग करती, वह फिर लिपट जाती और वही बात, 'आंटी, आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं. आप हमारे घर रोज़ आया करो.' एक बार उसके पैरेंट्स ने बताया कि ऐसे बच्चों के लिए भी स्कूल हैं, अब वह स्कूल जाती है और घर में भी ट्यूशन लेती है. (यह एक तरह से इन बच्चों के पुनर्वास की कोशिश होती है जो अमीर लोग ही अफोर्ड कर पाते है.) वह लड़की बड़ी होती गई. उसके बारे में उसके माता-पिता से कोई बात नहीं होती थी. हमें इस ओर ध्यान देने की कोई आवश्यकता भी नहीं थी. फिर एक दिन उस लड़की के चौदहवें जन्मदिन का निमंत्रण मिला। हम गए. उस दिन उस लड़की ने पहले की तरह दौड़ कर मुझे आलिंगनबद्ध नहीं किया। एक जगह बैठी रही, शालीन तरीके से. मैंने उसकी माँ से कहा, 'क्या रूप निखरा है आपकी बेटी का.' वह बोलीं, 'हाँ, पर अब इसका बहुत ही ख्याल रखना पड़ेगा। बड़ी हो रही है.' हमारे विदा होने का समय आया, हम उठ खड़े हुए, लेकिन लड़की अब भी पहले की तरह दौड़ कर मुझसे नहीं लिपटी। दूर से हाथ जोड़ दिए. शायद उसके माँ-पिता ने उसे समझाया हो या उसे खुद समझ आ गया हो कि हम परिवारों के बीच मौके-ब-मौके मिलने के बावजूद उतना अपनापन नहीं है. मैंने उनके घर से बाहर निकल कर पहली बात यह सोची कि अरे, यह तो ठीक हो रही है. बढ़िया है.


Wednesday, 21 January 2015

मन बच्चा Kavita 227

मन बच्चा

जब उसने मुझे चाहा
तब मैंने जाना
दिनों को गिनते-गिनते
मन कैसे हो जाता है बच्चा?

कभी-कभी मर जाता है
असमय बचपन
असमय यौवन
किसी को पता नहीं चलता।

अकेले रास्ते पर चलते हुए
जहाँ न कोई आगे है न पीछे
सोचो, कहाँ खो जाते हैं अपने?
किस गर्त में डूब जाते हैं सपने?

ऐसे में कोई बढ़ता हुआ हाथ
पुकारती हुई आहट
कदम रोक ले तो?
हाँ तो वहाँ रुक ही जाएँगे कदम.

उम्र के द्वार तोड़
मजबूरी के पाखण्ड छोड़
उछलेगा मन तब बच्चे की तरह.
सच ना?

Tuesday, 20 January 2015

डा. मीनल शर्मा

डा. मीनल शर्मा

कुछ महीने पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी, Is there any Psychologist / psychiatrist out there on Facebook?...... एक फेसबुक मित्र ने मुझे मैसेज में लिखा कि फेसबुक पर पहले उनकी एक मित्र थीं, जो Psychology Counsellor हैं, मैं उन्हें फेसबुक मित्र बना सकती हूँ. मेरे द्वारा नाम पूछने पर उन्होंने मुझसे बार-बार वादा लिया कि मैं उन्हें उनका नाम न बताऊँ, साथ ही मुझसे कहा, 'देखिए, वह बहुत घमंडी हैं, कुछ खड़ूस टाइप की हैं, अपने सामने किसी को कुछ समझती नहीं, अपने को बहुत अक्लमंद समझती हैं, तो आप उनसे सँभल कर बात कीजिएगा। उनका कोई भरोसा नहीं कि वह आप जैसी बड़ी लेखिका को कुछ उल्टा-सीधा बोल दें.' मैंने कहा, 'मैं आपका नाम नहीं बताऊँगी।' खैर, उन मित्र ने मुझे उन Psychology Counsellor का नाम लिख दिया। मैंने उनकी प्रोफाइल खोल कर देखी, दो-चार और साझे मित्र थे, मैंने फ्रेंड्स रिक्वेस्ट भेज दी, जो दो दिन तक ऐसे ही पड़ी रही. मैंने वापस ले ली. फिर दो दिन बाद भेजी जो उन्होंने स्वीकार कर ली. बस. मैंने उनसे कोई बात नहीं की. फिर मैंने देखा, वह मेरी पोस्ट पर लाइक-कमेंट कर रही हैं, धीरे-धीरे यह हुआ कि उन्होंने मुझे मैसेज में बताया (जैसे अन्य कई महिला मित्र बता चुकी हैं) कि वह मेरी पोस्ट बहुत ज़्यादा अपने करीब पाती हैं, और मुझ से दिल से जुड़ा हुआ महसूस करती हूँ, और ऐसा ही बहुत कुछ. जिसने मुझे आकाश की ऊँचाई पर पहुँचा दिया। मैंने पाया कि यह तो बहुत ज़्यादा विनम्र हैं, ज़रा भी उस तस्वीर जैसी नहीं जैसी उस पुरुष मित्र ने खींची थी.

उन पुरुष मित्र को मैंने एक बार Unfriend करके उनके अनुरोध पर दुबारा फ्रेंड स्वीकार किया था, और दुबारा भी मुझे उन्हें Unfriend करना पड़ा, अब वह ब्लॉक हैं, कारण, उनका किसी न किसी बहाने से बार-बार मैसेज में बात करना, तथा मेरी पोस्ट पर फूहड़ कमेंट करना था. ऐसा ही वह उन Psychology Counsellor के साथ करते होंगे, जिन्होंने भी इसी कारण उन्हें अपनी लिस्ट से बाहर खदेड़ दिया होगा। अजी कौन बर्दाश्त करेगा ऐसों को, जिनका मकसद फेसबुक पर सिर्फ दोस्ती के लिए आना होता है लेकिन उन्हें यह अंदाज़ा नहीं होता कि कौन उनसे बात करना पसंद करेगी, कौन नहीं? हैं ऐसी बहुत सी लड़कियाँ / महिलाएँ भी, जो बात करती हैं, मैं भी हूँ लेकिन अपनी बुद्धि से अन्दाज़ा लगाना होगा कि कौन आप से बात करना पसंद करेगा?

तो मित्रों, मेरी यह मित्र हैं डॉ मीनल शर्मा. हाँ, वादे के मुताबिक़ मैं उन सज्जन का नाम नहीं बताऊँगी। जनाब, हम दुश्मनी भी दोस्ती की तरह निभाते हैं.


Monday, 19 January 2015

21. एक भावचित्र : जीवन के रंग

21. एक भावचित्र : जीवन के रंग

मैंने उस दिन चटख लाल रंग की साडी पहन ली. आईने के सामने जा खड़ी हुई. लगा, आईने में दिख रही वह, जो मैं ही थी, मुझ पर हँस रही थी, ओह्हो ! मैंने सोचा, उससे कहूँ, अब कपड़ों में ही रंग रह गए हैं. ज़िन्दगी के रंग तो फीके पड़ गए.....  रंगों के भी कैसे-कैसे अर्थ हमने बना लिए हैं. क्या लाल रंग में ही शोखी नज़र आती है? मैंने सफ़ेद रंग के पीछे भी कितने चंचल मन देखे हैं. यह भी खूब रही कि मन की चंचल दशा को छुपाना हो तो सफ़ेद पहन लो. चलो, यूँ ही समझ लो कि मैंने मन की उदासी को छुपाने के लिए लाल रंग पहन लिया। क्या मन की उदासी छुप गई ? बाहर शायद नज़र नहीं आ रही, लाल रंग ने उदासी को परदे के पीछे छुपा दिया है. मन भी धीरे-धीरे खिलने लगा है, सच, जीवन में रंगों का कितना महत्व् है. मुझे पहले यह ख्याल क्यों नहीं आया कि मुझे चटख रंगों के कपड़े पहनने चाहिए, मन की उदासी कुछ तो दूर होगी। क्यों अब तक मैं सफ़ेद पर अटकी रही ? दिमाग को चलने में भी तो टाइम लगता है. थक जाता है बेचारा, क्या करे ? दिमाग थका हुआ, मन थका हुआ, तन भी तो थकने जैसा हो रहा है. लाऊँ, कहीं से बहुत सारे रंग लाऊँ, असली नहीं, नकली ही सही, कुछ तो सही दिखूँ, कुछ तो सही महसूस करूँ। फिर भी पूछ रही हूँ, बार-बार खुद से, क्या अब इन ऊपरी रंगों से काम चलाऊँ ?


Saturday, 17 January 2015

यशोदा बेन

यशोदा बेन

बहुत लोग कहते हैं, यशोदा बेन का चरित्र अद्वितीय है. मैं जानना चाहती हूँ कि उनका चरित्र किस तरह अद्वितीय है? क्या आज पता चला कि वे प्रधानमंत्री की पत्नी हैं, इसलिए अद्वितीय हो गईं? हाँ. वैसे अद्वितीय होने का एक कारण तो यह हो सकता है क्योंकि अन्य कोई भी स्त्री प्रधानमन्त्री की पत्नी होने का दावा नहीं कर रही. क्या आप यह कहना चाहते हैं कि वह अद्वितीय इसलिए हैं कि उन्होंने पति के होते हुए, पति के बिना अकेले अपना जीवन बिताया? इसमें क्या ख़ास बात है? बहुत सी स्त्रियाँ बिताती हैं. इस दुनिया में हर स्त्री को पति राशन कार्ड की तरह नसीब नहीं होता। (न ही हर पुरुष को पत्नी।) उन्होंने अपने आप में ऐसा क्या काम किया जो उन्हें अद्वितीय कहा जाए? वह अध्यापिका की नौकरी करती हैं, उन्होंने इस क्षेत्र में ही कौन सा झंडा गाड़ा? कौन सा ऐसा लीक से हट कर काम किया जो उन्हें इस 'दूसरा न कोई' के दर्जे पर बैठाया जाए? सीधी-सादी शरीफ महिला हैं, अपनी रोटी खुद कमा के खा रही हैं, जैसा इस देश की हज़ारों-हज़ार महिलाएँ करती हैं. बल्कि देश की हज़ारों-हज़ार महिलाओं को पति द्वारा छोड़े गए बच्चे भी पालने पड़ते हैं. उनके साथ हमदर्दी का कारण समझ में नहीं आया. मैं उनका आदर कर सकती हूँ लेकिन उन्हें व्यर्थ ही महान आत्मा बनाने का कष्ट मैं नहीं उठाऊँगी।  मैं भी एक औरत हूँ. मैंने भी बहुत बदहाली में दिन गुज़ारे हैं. लेकिन कोई मुझ पर तरस खाए, मुझे 'बेचारी' कहे, मुझे मंज़ूर नहीं।

(मुझे पता है, मेरी इस पोस्ट पर मित्र बहुत उखाड़-पछाड़ करने वाले हैं, पर क्या करूँ, आज भावों का दरिया रुक ही नहीं रहा है.)


नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी का जीवन मुझे गौतम बुद्ध के जीवन से मिलता-जुलता लगता है. बस, कालान्तर में लक्ष्य का अर्थ बदल गया. मैं गौतम बुद्ध पर अभी लिखी अपनी उसी पोस्ट के सारे शब्द यहाँ नरेंद्र मोदी के लिए लिख सकती हूँ. मोदी जी के बारे में भी कहा जाता है कि उन्होंने पति-धर्म नहीं निभाया। यदि सत्रह साल की उम्र में किसी बच्चे की शादी कर दी जाए, (हाँ, लड़का सत्रह साल की उम्र में बच्चा ही होता है, उसमें उस उम्र में विवाह को समझने जैसी प्रौढ़ता नहीं आई होती), और विवाह के बाद उसमे वैराग्य पैदा हो जाए तो आप क्या कर सकते हैं? कल आपके जीवन में क्या होगा, आप आज उसके बारे में क्या कह सकते हैं? क्या सामान्य जीवन के लोभ छोड़ कर दुनिया से, घर गृहस्थी से विलग रहने का निर्णय इतना सरल होता है कि कोई भी ले ले? जो व्यक्ति हँसी-ख़ुशी शादी करता है या उस ज़माने में कम उम्र में कर दी जाती है, जिसमें बच्चों से उनकी राय पूछने को कोई महत्व नहीं दिया जाता, तो ऐसे में, (या कैसे में भी), कल को आपको जीवन से ही विरक्ति हो जाए तो आप क्या करेंगे? भविष्य पर अपना नियंत्रण नहीं होता। मन की बदलती स्थितियों पर भी अपना नियंत्रण नहीं होता। जो अज्ञानी जन मोदी जी को पत्नी के प्रति गैर-ज़िम्मेदार कहते हैं, वे बताएँ कि क्या मोदी जी का उद्देश्य पत्नी को अहाने-बहाने छोड़ कर, अपनी गृहस्थी से मुक्ति पा कर अन्यत्र ऐयाशी करना था? उन्होंने इसलिए तो पत्नी को नहीं छोड़ा था कि उनका मन उनकी पत्नी से ऊब गया था? कि वे कोई दूसरी पत्नी करने जा रहे थे? उन्होंने पत्नी के जीवन में कोई अड़ंगा तो नहीं लगाया। फिर उनका सौभाग्य कि उन्हें अपनी पत्नी का मूक सहयोग मिला। विवाह, पति-पत्नी धर्म जीवन के वृहत्तर धर्म नहीं हैं कि इनसे ऊपर कुछ नहीं है. इनसे ऊपर है, व्यक्ति का अपना मन, सुसंस्कारी मन, जो यदि एक वृहत्तर लक्ष्य के लिए तड़पता है तो उसे उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भटकने में सांसारिक सुखों का परित्याग करना ही होता है, यह बात दूसरी है कि उसके साथ जुड़े अन्य रिश्ते भी प्रभावित होते हैं. नरेंद्र मोदी में मुझे सच्चे साधु-संतों वाली गरिमा नज़र आती है. मैंने कहा था ना कि मैं वही शब्द नरेंद्र मोदी के लिए भी लिख सकती हूँ जो मैंने गौतम बुद्ध के लिए लिखे।


गौतम बुद्ध

गौतम बुद्ध

गौतम बुद्ध के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि उन्होंने अपना पति-धर्म नहीं निभाया और पत्नी को अकेला छोड़ कर चले गए. इस बात को मैंने इस तरह सोचा कि क्या पत्नी धर्म ही एकमात्र धर्म है जिसे व्यक्ति अपनी हर इच्छा की आहुति देकर निभाए? क्या व्यक्ति के जीवन में पत्नी से बड़ा कोई अन्य उद्देश्य नहीं हो सकता?

जब गौतम बुद्ध ने सुख साधनों का परित्याग किया, तब उनका उद्देश्य महात्मा बनना नहीं था. उन्हें तब मालूम भी नहीं था कि उस समय का किशोर-युवा सिद्धार्थ भविष्य में महात्मा की उपाधि से नवाज़ा जाएगा। वह एक आरामपरस्त राजकुमारों वाला जीवन जी रहे थे. कल आपके जीवन में क्या होगा, आप आज उसके बारे में क्या कह सकते हैं? क्या उन्हें अपने राजसी ठाठबाट छोड़ते हुए कोई तकलीफ नहीं हुई होगी? क्या भिक्षा में मिला भोजन उनके शाही भोजन जैसा ही स्वादिष्ट रहा होगा, जिसे खाते हुए उनके मन में घर छोड़ने का कभी कोई मलाल आया होगा? क्या ज़मीन में पत्थरों पर सर्दी, गर्मी, बरसात की मार सहते हुए उन्होंने कभी पछतावा किया होगा कि राजसी आरामयुक्त जीवन का त्याग करके उन्होंने कोई गलती की है? क्या ऐश्वर्ययुक्त जीवन छोड़ कर संन्यास लेने का निर्णय इतना सरल होता है कि कोई भी ले ले?

जो व्यक्ति हँसी-ख़ुशी शादी करता है या उस ज़माने में कम उम्र में कर दी जाती है, जिसमें बच्चों से उनकी राय पूछने को कोई महत्व नहीं दिया जाता, तो ऐसे में, (या कैसे में भी), कल को आपको जीवन से ही विरक्ति हो जाए तो आप क्या करेंगे? भविष्य पर अपना नियंत्रण नहीं होता। मन की बदलती स्थितियों पर भी अपना नियंत्रण नहीं होता। जो अज्ञानी जन गौतम को पत्नी के प्रति गैर-ज़िम्मेदार कहते हैं, वे बताएँ कि क्या गौतम बुद्ध का उद्देश्य पत्नी को अहाने-बहाने छोड़ कर, अपनी गृहस्थी से मुक्ति पा कर अन्यत्र ऐयाशी करना था? गौतम बुद्ध ने इसलिए तो पत्नी को नहीं छोड़ा था कि उनका मन उनकी पत्नी यशोधरा से ऊब गया था? कि वे कोई दूसरी पत्नी करने जा रहे थे? उनकी टूटन का अनुमान लगाइए, उन्होंने एक भिक्षुओं वाला जीवन जिया, जबकि उनकी पत्नी यशोधरा पूरे सम्मान और सुख-सुविधाओं के साथ महल में रहती रही. उन्होंने यशोधरा से यह तो नहीं कहा कि तुम भी महलों के सुख छोड़ कर मेरे साथ सत्य की खोज में चलो. विवाह, पति-पत्नी धर्म जीवन के वृहत्तर धर्म नहीं हैं कि इनसे ऊपर कुछ नहीं है. इनसे ऊपर है, व्यक्ति का अपना मन, सुसंस्कारी मन, जो यदि एक वृहत्तर लक्ष्य के लिए तड़पता है तो उसे उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भटकने में सांसारिक सुखों का परित्याग करना ही होता है, यह बात दूसरी है कि उसके साथ जुड़े अन्य रिश्ते भी प्रभावित होते हैं.

गौतम बुद्ध की कहानी अद्भुत है. (लेकिन यशोधरा ने भी सिद्धार्थ के मानसिक कष्टों को समझ कर हालात के साथ समझौता किया, सारी शिकायतों के बावजूद अपने पुत्र राहुल को पालपोस कर बड़ा किया और एक दिन पति की भिक्षा में उन्हें उनका पुत्र ही दे दिया, यह कहानी भी अद्भुत है.) मुझे गौतम बुद्ध और यशोधरा, दोनों के सन्दर्भ प्रभावित करते हैं.


Thursday, 15 January 2015

सोनिया गाँधी

सोनिया गाँधी

जब राजीव गाँधी जीवित थे और प्रधान मंत्री थे, तब उनकी पत्नी सोनिया गाँधी राजनीति में न कभी रुचि लेती थीं. न ही वे राजीव जी के कामों में दखलंदाज़ी करती थीं. उनसे पहले, इंदिरा गाँधी के ज़माने में भी वे एक बेहतरीन बहु के रूप में सहयोग करती थीं, जबकि इंदिरा जी की दूसरी बहु मेनका गाँधी अपने पति संजय गाँधी से शायद नाखुश रहने के कारण या अत्यधिक महत्वकांक्षी होने के कारण इंदिरा गाँधी और गाँधी परिवार के प्रति हमेशा गैर-वफादार रहीं। राजीव गाँधी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी सोनिया को राजनीति में लाने के लिए कितनी जोड़-तोड़ करनी पड़ी, यह विपक्षी दल भी जानते हैं. वे तो राजनीती से दूर रहना चाहती थीं, उनके पति और उनके परिवार को उनका मौन सहयोग और समर्थन था. वह एक भारतीय घरेलु महिला की भाँति अपनी ससुराल में प्रसन्न थीं. यह सोनिया जी की नियति थी कि उन्हें राजनीति में आना पड़ा.
चाहे उस समय उन्हें राजनीति का ए बी सी नहीं आता था, लेकिन उनमें ग़ज़ब की सूझबूझ थी इसलिए उन्होंने राजनीति में कदम रखते ही कुछ गज़ब के निर्णय लिए। उनका पहला सूझबूझ भरा निर्णय था, उनकी पार्टी के चाहने, उनकी मान-मनुहार करने के बावजूद उनके द्वारा प्रधानमन्त्री पद को न स्वीकारना। यदि वे ऐसा करतीं तो पद और सत्ता की लालची समझी जातीं। अब इस बात का अहसास उन्हें किसी अन्य ने थोड़े ही कराया, उनमें खुद समझ थी।
दूसरा निर्णय उन्होंने और अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण लिया, वह था, श्री मनमोहन सिंह को प्रधानमन्त्री बनाना। बाद में इसका हश्र चाहे जो रहा हो, उस समय इससे बेहतर कोई निर्णय नहीं हो सकता था। इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद जो सिखों के साथ सुलूक हुआ, उससे सिर्फ देश में ही नहीं, विदेशों में भी समस्त सिख समुदाय कांग्रेस पार्टी के खून का प्यासा हो गया था। उस समय उन्हें शांत करने का एकमात्र यही उपाय हो सकता था कि कांग्रेस द्वारा उनके ही समुदाय के किसी व्यक्ति को सर्वोच्च पद पर आसीन कर दिया जाए। यह उपाय सिर्फ सोनिया गाँधी के मस्तिष्क की उपज थी, जिसका तत्काल लाभ भी मिला।
तीसरा महत्वपूर्ण फैसला जो सोनिया गाँधी ने लिया, वह था, अपने ही पति के हत्यारों की फाँसी की सज़ा को माफ़ कर देना। यह फैसला उन्हें उनके अपने स्वार्थ से ऊपर उठा कर उन्हें एक ऐसे मंच पर स्थापित करता है, जो उनकी न काहू से वैर वाली छवि बन जाती है और उनकी नज़रों में देशहित प्रमुख होता नज़र आता है।
अब अगर कॉंग्रेस सत्ता में नहीं है तो कोई भी कुछ भी बोल दे, लेकिन सच को कहने में शर्म कैसी? जब लोग खोज-खोज कर कमियाँ निकालते हैं, तो उन्हें खोज-खोज कर उन अच्छाइयों की चर्चा भी करनी चाहिए, जिसके कारण किसी पार्टी ने सर्वाधिक समय तक अपना झंडा गाड़े रखा। अब हार गई तो क्या है, फिर उभर कर आ सकती है।
देश में, लोकतंत्र में शासन के लिए पार्टियाँ बदलती रहती हैं और हर पार्टी एक-दूसरे की निन्दा करती ही है, इसमें कोई नई बात नहीं है। बहरहाल, मुझे न राजनीति में रुचि है, और न ही राजनीति का ज्ञान है, यह तो बस ऐसे ही दिल में आया तो लिख दिया।

Wednesday, 14 January 2015

20. एक भावचित्र : आखिरी दुःख

20. एक भावचित्र : आखिरी दुःख

यह एक अंत की शुरुआत है। ख़ुशी को आते देखा मैंने दरवाज़े पर, भाग कर उसका स्वागत किया। सोचा ऐसा क्या बचा रह गया था, जो मैंने अब तक नहीं पाया था? ज़रूर होगा यह कुछ ख़ास, नए अर्थ होंगे इसके, ज़रूर लिखा होगा यह नसीब में, तभी खुद-ब-खुद चल कर आया है. मैंने इसे कब बुलाया है? जीवन की आखिरी सौगात है। इसे अपने आँचल में भर लूँ. मन के भीतर कहीं बंद करके रख दूँ. जब चाहूं खोलूँ, जब चाहूँ देखूँ। किसी की नज़र न लग जाए. मेरी ही नज़र न लग जाए. इतना अमूल्य उपहार, आसमान से सीधा मेरी झोली में आ गिरा। उफ़ ! उफ़ ! मैं कैसे सम्भलूँ? सुख की भी होती एक बर्दाश्त है। यूँ ही पड़े नहीं मिल जाते राह पर. हर किसी के भाग्य में नहीं लिखे होते। अनमोल होते हैं ये. कीमत चुकानी पड़ती है फिर भी. खुद मर कर इन्हें ज़िंदा रखना पड़ता है. अपने उसूल तक बेचने पड़ते हैं मुफ्त। पूर्ण समर्पण माँगता है प्यार। प्यार का दुःख भी प्यार ही होता है. बिन सहा रह गया था यह आखिरी दुःख। जिसे मैंने समझा था जीवन का आखिरी सुख, वह मेरे जीवन का आखिरी दुःख निकला। मैं नहीं जानती थी कि किसी पत्थर से टकरा जाऊँगी और बिना किसी कसूर के लहुलुहान हो जाऊँगी। नहीं जानती थी कि भगवान का प्रसाद जिसे समझा था, वह गरलपान की तरह हलक के नीचे उतर जाएगा और मेरी अँतड़ियों को जला कर राख कर देगा। कहाँ गए वे दिन जब मैंने अपने जीवन के पतझर में बसंत का आना महसूस किया था? क्यों व्यर्थ ही मुस्कुराना शुरू किया था? मुझे आदत ही नहीं थी मुस्कुराने की. बरसों से संगत में जी रही थी वीराने की। यह तो कोई बात नहीं हुई कि हवा का झोंका आए और शीतल करने की बजाय सब कुछ बिखरा के चला जाए। अब समेट रही हूँ तितर-बितर हुए पल. फिर से लिखूँगी विरह का कोई गीत. फिर से लूँगी संकल्प हँसते रहने का।


19. एक भावचित्र : भ्रम

19. एक भावचित्र : भ्रम

उसने आईने में देखा, चेहरे की झुर्रियों के पीछे से एक छोटी सी लड़की झाँक रही थी, नव यौवन के द्वार पर खड़ी, हैरान, परेशान, किसी की प्रतीक्षा में. डब-डब आँखे, एक नाम पुकारने को आतुर, अधखुले होंठ, जैसे बरसों से सोई न हो, बिखरे बाल, बदहवास सी। सालों साल बीत गए इसकी उम्र उतनी की उतनी है, जितनी तब थी, जब वह इसे छोड़ कर गया था। यह बड़ी क्यों नहीं हो रही? इसकी आँखों में वही पुराने सपने हैं, उन सपनों में वही दहशत है कि पूरे होंगे या नहीं? हर उस उम्र का लड़का इसे अपने उस जैसा लगता है। यह आईना देखने से डरती है, इसके सपनों का राजकुमार कहीं खो न जाए। देख लेना, मरते समय इसकी आँखें खुली होंगी। अतृप्त कामनाएँआँखों को मुंदने नहीं देतीं। इसके हिस्से की प्यास अभी बुझी नहीं है. जीर्ण-शीर्ण काया ले कर यह अपने मन के भरोसे बुलंदियों पर है. रोज़ हँसती है, रोज़ रोती है. रात भर जगती है, दिन भर सोती है. सुना है इसने, रात को उतरते हैं आकाश से फ़रिश्ते, जो भी माँग लो उनसे, मुरादें होती हैं पूरी। इसने मुट्ठियों में बंद कर रखे हैं सपने, झोली में भर रखी हैं आकांक्षाएँ, आँखों से टप-टप गिरने को पानी है, होठों पर पसरी है चुप्पी। यह किसी से कुछ नहीं कहेगी। आकाश के फ़रिश्तों से भी नहीं। बस, अपनी धुन में मस्त बढ़ रही है मृत्यु-पथ पर, प्रेम-पथ के भ्रम में. पगली कहीं की. ऐसा भी कहीं होता है? भ्रम को एक साल, दो साल, दस साल........ सारी उम्र कोई ढोता है?


तमिल लेखक पेरामल मुरूगन

तमिल लेखक पेरामल मुरूगन

14 पुस्तकों के 49 वर्षीय चर्चित तमिल लेखक पेरामल मुरूगन के एक उपन्यास से उपजा बवाल, उनके उपन्यास का घोर विरोध हुआ, क्योंकि वह उपन्यास समाज-विरोधी माना गया.और विरोधियों ने उनसे उपन्यास वापस लेने के लिए उन्हें विवश कर दिया। पेरामल मुरूगन ने तंग आकर अपनी फेसबुक वॉल पर एक सुसाइड नोट लिखा है कि "लेखक पेरामल मुरूगन मर गया है. उन्होंने अपनी सारी पुस्तकें वापस ले ली हैं और पाठकों से अपील की है कि वे उनकी समस्त पुस्तकें जला दें तथा प्रकाशक उनकी पुस्तकें न बेचें। उनके अनुसार लेखक पेरामल मुरूगन मर गया है लेकिन अध्यापक पी मुरूगन जीवित रहेगा।"
पेरामल मुरूगन ने यह पोस्ट 12 जनवरी को लिखी, जो तमिल में होने के कारण समझ से परे थी लेकिन इस पोस्ट पर आए निम्नलिखित कमेंट से पता चलता है कि यही पोस्ट होगी।
Mahesh Kannan You want to write what you think and believe ,no one should oppose it you call it freedom. WE TOO HAVE THE SAME FREEDOM TO STOP IT...
विरोधियों के अपने तर्क होते हैं. लेकिन क्या लेखक इतना कमज़ोर होता है कि वह सामाजिक विरोध से घबरा कर लिखना छोड़ने का ही ऐलान कर दे? इससे पूर्व भी सलमान रुश्दी, तसलीमा नसरीन जैसे लेखक हुए हैं जिनके लेखन का उनके समाज, जनता तथा धर्म ने पुरज़ोर विरोध किया, यहाँ तक कि उन्हें मौत के फतवे से भी नवाज़ा, लेकिन किसी ने इस तरह डर कर, घबरा कर लेखन को ही तिलांजलि देने के बारे में नहीं सोचा, उन्होंने देश-निकाला होकर तथा भूमिगत होकर भी इस तरह के विरोधों का सामना किया और अपने लेखन को जारी रखा. लेखक यदि कुछ लिखने का साहस करता है तो उसे उस लेखन पर होने वाली प्रतिक्रियाओं का भी सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह तो नहीं कि सब उसकी हाँ में हाँ मिलाएंगे। इस लिहाज से पेरामल मुरूगन एक दुर्बल व्यक्तित्व के लेखक हैं. या कहीं ऐसा तो नहीं कि सुप्रसिद्ध लेखक अपने विरोध को भी अपनी प्रसिद्धि के लिए भुना रहे हैं? या यह हताशा में दिया गया बयान है? जैसा कि मेरा अनुभव कहता है, लेखक हमेशा लेखक होता है, लेखक कभी मर नहीं सकता, पेरामल मुरूगन का यह सुसाइड नोट क्षणिक आवेश में लिखा गया है, वे फिर लौटेंगे, जल्द ही, अपनी नई रचना के साथ.



Monday, 12 January 2015

18. एक भावचित्र : यौवन राग

18. एक भावचित्र : यौवन राग

उफ़ ! यह जीवन कितना लम्बा है ! और इसमें सबसे लम्बा होता है यौवन, जो लम्बा होने के बावजूद हँसते-रोते सिर्फ इसलिए कट जाता है कि वह यौवन होता है. बचपन गुज़र जाता है बस तेरह-चौदह साल में. किशोरावस्था शुरू होते ही यौवन के सपने शुरू हो जाते हैं, जो प्रौढ़ावस्था से होते हुए कभी-कभी वृद्धावस्था तक चलते हैं. उम्रदराज होने पर भी कई व्यक्ति स्वयं को शारीरिक रूप से एवं भावात्मक धरातल पर इतना चुस्त-दुरुस्त महसूस करते हैं कि उस उम्र तक भी उन्हें यौवन का ही अहसास होता है. फिर आता है बुढ़ापा, जो यदि बीमारियों-कष्टों से भरा हुआ हो और अपनों का अभाव हो तो लम्बा न होने के बावजूद बहुत लम्बा लगता है, काटे नहीं कटता। यौवन जीवन का सबसे सुन्दर एवं सुखद पक्ष है. आप सुन्दर नहीं होते, फिर भी सुन्दर लगते हैं. आकर्षक नहीं होते, फिर भी आकर्षक लगते हैं. आकर्षण और यौवन का सबसे नज़दीकी रिश्ता है. यौवन में हर कोई आपके साथ होना चाहता है, हर कोई आपका साथ देना चाहता है. आप ज़रूरतमंद होते हैं, लोग मदद करने चले आते हैं. आप दुखी होते हैं, लोग पुचकारने चले आते हैं. दर्द शक्ल बदल-बदल कर गिरता है झोली में, फिर भी चेहरे पर ताज़गी रहती है. हर कंधा चाहता है, आप उस पर अपना सिर रख कर रोएँ। और यूँ कट जाता है यह लम्बा सा यौवन कि पता भी नहीं चलता कि कब हम अपने देखते-देखते बूढ़े हो गए. एक दिन जो अपना चेहरा आईने में देखते हैं तो पता चलता है कि अरे, यह मैं हूँ? नहीं नहीं, मैं ऐसा नहीं हो सकता


सार्वकालिक सत्य

सार्वकालिक सत्य

आप यकीन करें या न करें, मुझे लोगों की शक्लें, हावभाव देख कर, उनसे थोड़ी सी बात करके यह नज़र आ जाता है कि उनका जीवन कैसा है और कैसा गुज़रेगा?

दो सच्ची घटनाएँ आपको बता रही हूँ। बात कुछ समय पहले की है। एक लड़की के लिए उसके माता-पिता लड़का ढूँढ रहे थे। मिलने में दिक्कतें आ रही थीं। तभी उस लड़की के एक सहकर्मी ने उसे प्रोपोज़ किया। लड़का अपने माता-पिता का एकलौता बेटा था। किन्हीं कारणों से लड़के के घरवालों को यह रिश्ता पसंद नहीं था लेकिन लड़की वालों के लिए जैसे यह मन-माँगी मुराद थी। लड़का ऑफिस के बाद रात देर तक लड़की के साथ रहता, ज़्यादातर लड़की के घर। वह हर वक़्त लड़की और उसके परिवार से घिरा रहता, जैसे उसकी किस्मत का फैसला हो चुका था। हम लड़की लड़का दोनों को जानते थे। एक दिन किसी काम से वह लड़का हमारे घर आया, 'अरे, यह तो बहुत भोला है, एकदम बच्चा है, इसे लड़की और उसके घरवालों द्वारा घेर-घार कर ऐसे रखा जा रहा है कि जैसे इसे ज़्यादा सोचने-समझने का मौका ही न मिले। न इसे इसके माता-पिता से बात करने का समय दिया जा रहा है। बेचारे ने लड़की के प्रति हलकी सी पसंद क्या दर्शाई कि सारे चिपट गए उसे इनफ्लुएन्स करने में।' मैं उस लड़के को देख कर यह सब सोच गई। मुझे लोगों की शक्लें, हावभाव देख कर, उनसे थोड़ी सी बात करके यह नज़र आ जाता है कि उनका जीवन कैसा है और कैसा गुज़रेगा। मैंने अपने पुत्र से कहा, 'आज यह लड़का जैसे नींद में है। जिस दिन इसकी आँख खुलेगी, जिस दिन इसे ज़रा भी सोचने की फुरसत मिलेगी, यह उस लड़की से अलग हो जाएगा।'

उसी महीने उन दोनों की शादी हो गई। और जैसा मैंने कहा था, लड़के की आँख खुलनी ही थी, छह महीने के भीतर ही उनका तलाक हो गया। ऐसे घेर-घार के शादियाँ होती हैं क्या? शादी से पहले लड़के को सोचने का टाइम तो दो। लड़के को इंफ्लुएंस करने में सारा खानदान लगा है, आखिर कब तक लड़के को समझ नहीं आएगा कि यह सारी साज़िश उसे उसके माता-पिता से अलग करके एक तरह से उसे किडनैप करने की हो रही है। चलो, देर आयद, दुरुस्त आयद।

अब दूसरी घटना। यह बात भी कुछ समय पहले की है। मैं अकेली बस से शिमला जा रही थी। मेरे आगे वाली सीट पर एक नवविवाहित युगल बैठा था। लड़की के हाथ में लाल चूड़ा था। शायद हनीमून मनाने जा रहे थे। सर्दी का मौसम था। ठंड बेशुमार थी। लड़की ने खिड़की खोल रखी थी। मैं ठंडी हवा से परेशान थी। मैंने हाथ बढ़ा कर खिड़की बंद कर दी। लड़की ने गुस्से में खिड़की खटाक से फिर खोल दी। मैंने उससे अनुरोध किया, 'मेरी तबियत ठीक नहीं, अगर आप खिड़की बंद कर दें तो.....' उसने मुझे डाँट कर कहा, 'नहीं, खिड़की बंद नहीं होगी। इतनी ही ठंड लगती है तो शिमला क्यों जा रही हैं?' उसका नया नवेला पति कुछ नहीं बोला। मैंने सोचा, या यूँ कहूँ कि मुझसे उस समय यह सोचा गया, 'अरे कहाँ निभेगी ऐसी तेज़-तर्रार लड़की? मुझे नहीं लगता, यह शादी ज़्यादा देर चलेगी।'

खैर। 12-14 घंटे का सफ़र था। वह लड़का यानि उस तेज़-तर्रार लड़की का पति एक सहयात्री के नाते मुझसे बोल लिया। हो सकता है, उसे मुझसे हमदर्दी रही हो। औपचारिक बातचीत। दिल्ली में कहाँ रहते हो, क्या करते हो आदि। बस। फिर हम अपनी-अपनी राह।

संयोग देखिए, इस घटना के तीनेक महीने बाद ही वह लड़का मुझे 'बिग बाजार' में दिखा। उसने भी मुझे देखा और 'अरे, आप यहाँ?' मैंने उससे उसकी नई नवेली दुल्हन के बारे में पूछा तो बोला, 'क्या बताऊँ? तलाक का केस चल रहा है।' फिर उसने जो कारण बताया, वह यह कि उसकी पत्नी अपने कमरे में दरवाज़ा भेड़ कर बैठी थी कि उसकी सास यानि लड़के की माँ किसी काम से दरवाज़ा खोल कर उसके पास गई। लड़की भन्ना कर बोली, 'How dare you enter my room without knocking? (बिना दरवाज़ा खटकाए आप मेरे कमरे में क्यों आईं?)' बस उसी दिन उस परिवार ने निर्णय ले लिया कि 'इस लड़की में अच्छे संस्कार नहीं हैं, यह हमारे घर के योग्य नहीं।' मैंने कहा, 'थोड़े दिन तो देख लेते।' वह बोला, 'नहीं, जिस लड़की की जड़ समझ में आ जाए, उसे ज़्यादा क्या खींचना? फिर थोड़े दिन और देखने के चक्कर में बच्चे हो जाएँ तो और दिक्कत।' मैंने मन ही मन कहा, 'मुझे तो पहले हो लग गया था कि यह लड़की निभने वाली नहीं है। बहुत अच्छा किया जो तीन महीने के अंदर ही फैसला कर लिया।'

ज़माना कितना ही बदल जाए, हम कितने ही आधुनिक हो जाएँ, हम कितना ही पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति को अपना लें, मूर्खों और बदतमीज़ों को कभी पसंद नहीं किया जाएगा।

Sunday, 11 January 2015

17. एक भावचित्र : चिन्ता चिता समान

17. एक भावचित्र : चिन्ता चिता समान

मैं कोई भी काम करने से पहले बहुत ज़्यादा सोच-विचार नहीं करती, बस चट मँगनी, पट ब्याह की तरह निर्णय करती हूँ और हमेशा सफल रहती हूँ. चाहे बने-बनाए सिस्टम से निकल कर बाहर देश / विदेश में नौकरी करना हो, मकान / दुकान खरीदना हो, पुत्र का विवाह करना हो, मेरे सारे ही फैसले चट-पट लिए गए और बेहद सफल रहे. बहुत ज़्यादा सोच-विचार करके कोई काम करो और उसमें सफलता न मिले तो कितना दुःख हो ? इसलिए, जो होगा, देखा जाएगा, की तर्ज़ पर मैं सारे काम करती हूँ. काम होने से पहले चिन्ता करो, फिर काम सफल न हो तो चिन्ता करो, ऐसे तो सारी उम्र चिन्ता करने में ही गुज़र जाएगी। और सुना है ना, चिन्ता चिता समान। जीते जी चिन्ता की चिता में क्यों जलना है ? इसलिए मस्त रहो प्यारे, आत्मविश्वास अगर साथ है तो कोई फिर हिम्मत क्यों हारे ? चिन्ता-मग्न हो कर सोचना बंद करो और जो करना है, कर डालो। अंत में कहते हैं ना, भगवान भली करेंगे ?


Friday, 9 January 2015

Gazal 45

Gazal 45

मैं लिखूँगी तुमको बार-बार
मैं पढूँगी तुमको बार-बार।
जब बहेगी अनिल सुवासित
मैं रचूँगी तुमको बार-बार।
आँख से टपकेगा जब खून
मैं कहूँगी तुमको बार-बार।
जब कभी गिर-गिर पड़ोगे तुम
मैं रखूँगी तुमको बार-बार।
जन्म लोगे तुम अनेक जन्म
मैं वरूँगी तुमको बार-बार।

Wednesday, 7 January 2015

पर्दाफ़ाश 5 : अखिलेश तिवारी

पर्दाफ़ाश 5 : अखिलेश तिवारी

यहाँ एक हैं श्री अखिलेश तिवारी। देश के चिन्तकों के स्वयंभू निर्णायक। उन्होंने फेसबुक पर देश की चिन्ता करने वालों की तलाश की और उसमे मुझ अकिंचन समेत दस-बारह लोगों के बारे में अच्छी-अच्छी बातें लिख कर पोस्ट कीं. उनकी कृपा सर-माथे पर. (लेकिन मैंने उनकी हर पोस्ट में टैग किया जाना पसंद नहीं किया। साथ ही, विरोध का एकाध मुद्दा और उठा, जिसके लिए इन्होने मुझसे कहा कि ये तो मेरे लिए इतना कर रहे हैं और मैं इनका विरोध कर रही हूँ. तो जी, मैं एक तारीफ़ भरे लेख के आगे बिकी नहीं थी.) अब उन्होंने उस लिस्ट में से कुछ नाम हटा कर एक नई लिस्ट जारी की कि पहले उनसे गलत चुनाव हो गया था. यह भी सही है, आखिर इंसान गलतियों का पुतला है, गलती हो ही जाती है, सुधार लिया, बेहतर किया। लेकिन आदयणीय महोदय, आप एक-पक्षीय, एक व्यक्तीय संस्था में कैसे परिवर्तित हो गए? आप अकेले इस बात का चयन करने वाले कौन कि कौन देश के लिए चिन्ता कर रहा है, कौन नहीं? यह एक-व्यक्ति-महारथी होने की पहल है, यह सब धीरे-धीरे एक व्यक्ति के संस्था में बदल जाने की शुरुआत है, ताकि जैसे ही पाँव मज़बूत हुए, इसे अर्थोपार्जन का साधन बनाया जा सके. मैं इसका सिरे से विरोध करती हूँ. मैं क्या, आप सब भी करेंगे। अरे, कोई तुक भी हो, या बेतुकी चाल चल के मित्रों को खुश करेंगे?

Monday, 5 January 2015

पर्दाफ़ाश 4 : गुड़गाँव जेल

पर्दाफ़ाश  4 : गुड़गाँव जेल 

कुछ विषय ऐसे होते हैं जिनकी सेल वैल्यू होती है यानि जिनकी खबर अच्छी बिकती है. अब मैं अगर समोसे बनाऊँ और अपने घर के बाहर ठेला लगा लूँ, तो यह तो कोई खबर नहीं हुई, बल्कि लोग लानतें देने पहुँच जाएँगे कि आखिर कितना पैसा कमाएगी मणिका? हाँ, तिहाड़ जेल के कैदी समोसे बनाएँ और जेल के गेट पर खोमचा लगा कर बेचें तो अखबार वाले जमघट लगा लेंगे, भई, यह तो खबर है, समोसों से ज़्यादा दाम में बिकेगी। इसी तरह नारी विमर्श से जुडी हुई कोई खबर हो, देश की राजनैतिक दलदल में फँसी हुई कोई खबर हो, किसी भी निचले तबके से जुड़ा हआ कोई कारनामा हो, या उच्च वर्ग से जुड़ा हुआ कोई हादसा हो, तो सच में खबर है. अखबार वाले उस खबर की जड़ तक जाएँगे ही नहीं कि आखिर उस खबर बनने के पीछे राज़ क्या है?

सात महीने पुरानी खबर पर मेरी नज़र अब दोबारा पड़ी तो मैंने नए सिरे से इस खबर पर विचार किया। खबर गुड़गाँव जेल की है, जिसके बारे में 21.05.14 के हिंदुस्तान टाइम्स, गुड़गाँव संस्करण में यह खबर धूमधाम से छपी थी कि जेल के कैदियों ने जेल के रिकॉर्ड के रख-रखाव से सम्बंधित एक सॉफ्टवेयर तैयार किया है  जिसके लिए उन कैदियों की वाहवाही हो रही है. अच्छी बात है, वाहवाही का कोई काम करें तो वाहवाही होनी चाहिए, लेकिन क्या अखबार ने इस रहस्य पर से पर्दा उठाने की कोशिश की कि आखिर इस कार्य को अंजाम दिया कैसे गया? क्या गुड़गाँव जेल का जेलर कंप्यूटर का ज्ञान रखता है? क्या कैदियों के हाथ में कंप्यूटर सौंपने से पहले उन्होंने इस बात के पुख्ता प्रबंध किए थे कि कैदियों को इस तरह का सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराया जाए कि काम करने वालों की पहुँच इंटरनेट तक न हो? कैदी कितने भी सीधे और शरीफ समझे जाएँ, खासकर उम्रकैदी, उनकी गिनती खूँखार कैदियों के रूप में ही होती है, इसीलिए, उन्हें दुनिया-समाज से अलग करके जेल की चाहरदीवारी में रखा जाता है. वैसे भी जेल में सज़ायाफ्ता कैदिओं का बाहर की दुनिया से संपर्क में रहना खतरे से खाली नहीं। ज़ाहिर है, ये कैदी लड़कियों के मामले में भी इतने तरसे-भटके होते हैं कि और कुछ नहीं तो अपनी नीरस ज़िन्दगी में थोड़ा रस पैदा करने के लिए बाहरी दुनिया की लड़कियों से झूठा इश्क ही लड़ाएँगे। ऐसा कोई कैदी किसी बाहरी व्यक्ति से संपर्क करके यह नहीं बताएगा कि वह जेल में है.

फिलहाल तो सॉफ्टवेयर बनाने की कहानी यूँ है कि इस जेल के कुछ उच्च शिक्षित कैदियों ने जेलर के आगे सॉफ्टवेयर बनाने का प्रस्ताव रखा. अब जेलर कोई पढ़े-लिखे तो होते नहीं, ये तो डंडा फटकारने वाले स्कूल का हेडमास्टर की तरह होते हैं, इन्हें क्या पता, सॉफ्टवेयर किस चिड़िया का नाम है? तो कुछ शातिर दिमाग कैदियों ने जेलर महोदय को पटाया कि सर जी, अपनी जेल का कितना नाम होगा? सर जी के सर में यह नहीं बैठा कि भई, चोरों को चाबियाँ पकड़ा रहे हैं, क्या गारंटी है कि ये बाहरी दुनिया में नहीं झाँकेंगे? यदि ये इतने ही चरित्रवान होते तो जेल में मरने आते हो क्यों? मैं हैरान हूँ कि जेलर के बाद अन्य उच्च अधिकारी भी जश्न मना रहे हैं कि गुड़गाँव जेल के कैदियों ने बहुत अच्छा काम किया है, प्रमाण पत्र बाँटे जा रहे हैं, लेकिन किसी गधे अधिकारी के दिमाग में यह बात नहीं आ रही कि यह काम करवा के उन्होंने कितना बड़ा खतरा मोल लिया है? क्या हरयाणा जेल और न्यायपालिका में सारे ही गधे बैठे हैं जो इस तथ्य की तह में जाकर इस जघन्य अपराध की गंभीरता को समझ न सके? और फिर, सरकार के पास कौन सी पैसे की कमी है जो एकसॉफ्टवेयर इंजीनियर को नौकरी पर नहीं रख सकते थे? क्या जेलर महोदय और हरयाणा हाई कोर्ट के अधिकारी यह समझते हैं कि हर साल कोई सॉफ्टवेयर इंजिनियर, हार्डवेयर इंजिनियर या चार्टर्ड अकाउंटेंट अपनी बीवी की हत्या करके आएगा और इनका यह सॉफ्टवेयर का स्कूल चलाएगा? जवाब तो अब RTI के ज़रिए ही मिलेगा।

बहरहाल, यह केस अब RTI में भेजा जाएगा, तब इसकी असलियत खुलेगी, और जेलर महोदय कटघरे के उस पार खड़े होकर जवाब देंगे। बहुत हो गई मस्ती।


पर्दाफ़ाश 3 : दुर्जन के संवाद

पर्दाफ़ाश 3 : दुर्जन के संवाद

आपमें से शायद किसी को याद हो कि दो साल पहले मुझे कुछ गलत किस्म के सन्देश फोन पर आए थे, जिनके बारे में मैंने पुलिस में रिपोर्ट कर दी थी. पुलिस तो खैर क्या पता लगाती, हाँ, खुद ही पता चल गया, जब एक दुर्जन के ये संवाद मुझ तक पहुँचे : पुलिस मुझसे यह पूछेगी तो मैं यह कह दूँगा, पुलिस मुझसे वह पूछेगी तो मैं वह कह दूँगा। वाह वाह, दुर्जन, सब कुछ तुम ही कह दोगे, बाकी सारों के तो दिमाग है ही नहीं ना? (यह व्यक्तिगत किस्म की पोस्ट यहाँ लिखने से सन्देश सही व्यक्ति तक पहुँच जाता है, बस इतना ही मकसद है.)

मुझे तो अपने ऊपर नाज़ होता है कि मेरी इस उम्र में भी मुझे लोग लड़के-लड़की के चक्कर में यूँ उलझाए हुए हैं.

Sunday, 4 January 2015

पर्दाफ़ाश 2 : Viren Kumar

पर्दाफ़ाश 2 : Viren Kumar

ओए, तू कहीं का राजा-महाराजा सै क्या, जो बड़े भाई के जाने के बाद भी अपनी फेसबुक की दुकान यूँ खुलेआम सजाए बैठा है? तन्नै किसी का डर को नी ? काम चोर-लुटेरों वाले, किस्मत का ताला जेल में बंद, और चला है दुनिया में मुँह उठा कर गुरूर से जीने ? बंद कर बावले, वरना पुलिस आई तेरे पीछे। सिर्फ उसे अलाउड है जो लेखक बन कर दिखाए। समझा कुछ ?

THIS POST IS NOT ABOUT MY DEAR FRIEND.

(यह फोटो गूगल से उठाई हुई है, इसका किसी की प्रोफाइल पिक्चर होना, यदि हुई तो, एक संयोग है. फोटो एक अति सुन्दर बच्चे की है. क्या यह बच्चा बड़ा होकर एक शातिर-दिमाग अपराधी बन सकता है? क्यों नहीं बन सकता? आखिर अपराधी भी कभी बच्चे थे.)


Saturday, 3 January 2015

सब कुछ ख़त्म है Kavita 226

सब कुछ ख़त्म है

जब कभी दिल में कुछ
डुप से डूबता है
समझ जाती हूँ
तुमने मेरा एक और अंश काट कर
अपने से अलग किया है।

जब खाली दिल में कभी
खन्न सा बजता है कुछ
जान जाती हूँ
मेरी पीड़ा का उत्सव
मन रहा है तुम्हारी साँसों में।

जब कभी रुनझुन रुनझुन
गिरते हैं आँसू मेरे अनजाने
समझ जाती हूँ
तुम मिटा रहे हो पोंछ-पोंछ कर
अपने तन-मन से मेरा प्यार।

जब कभी भूले-भटके
लिपट जाती हूँ तुमसे ख्यालों में
डर जाती हूँ कि
मेरी गर्दन तक पहुँचे तुम्हारे हाथ
क्या तुम्हारा प्यार ही थे?

सब कुछ गडमड है
दिल में, दिमाग़ में
सोचती हूँ, क्या। समझती हूँ, क्या।
सब कुछ तो ख़त्म है
फिर भी क्यों ज़िंदा है?


Friday, 2 January 2015

पर्दाफ़ाश 1 : दिनकर जी

पर्दाफ़ाश 1 : दिनकर जी

एक हैं हमारे दिनकर भाई. उन्होंने क्रिसमस पर शुभकामना सन्देश भेजा, मैंने उन्हें शुभकामना नहीं भेजी क्योंकि मेरी तबियत 25 से ही ढीली चल रही है  फिर उन्होंने 31 को शुभकामना मेल भेजी। मैं उत्तर नहीं दे पाई. पहली को यानि कल फ़ोन पर मैसेज आया, नया साल मंगलमय हो. मैं जवाब देने के लिए बिस्तर से उठ नहीं पा रही थी. तभी फ़ोन की घंटी बज उठी. उठना ही पड़ा, देखा, वही थे. बातचीत के अंत में मैंने कहा, 'दिनकर जी, कितनी बार आप भी मेरे मैसेज का जवाब नहीं देते, मेरी मिस्ड कॉल के बाद पलट के फ़ोन नहीं करते।' बोले, 'मैं पलट के फ़ोन करूँ या न करूँ, लेकिन आपको ज़रूर करना है.' लो जी, यह अच्छी रही.

मैं अपने जिए विश्वासों की बातें जब लोगों को बताती हूँ, तो कई लोग मुझ पर अटूट विश्वास करने लगते हैं कि मैं उनकी समस्या का समाधान अवश्य कर सकती हूँ. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है, होता तो मेरे जीवन में कभी दुःख आते ही क्यों? मैं तो बस समस्या की बाल की खाल निकाल कर उसकी इतनी जड़ में पहुँच जाती हूँ कि मेरी तर्कबुद्धि समस्या के आरपार देख लेती है. मेरे लिए वही समाधान होता है. सच है, जब चीज़ें अच्छी तरह समझ में आ जाएँ तो वही समाधान।

अब दिनकर जी के विश्वास का क्या करूँ जिन्होंने पिछले महीने फोन पर ऐसा ही विश्वास ज़ाहिर किया। कहने लगे, 'आप ज़रूर कुछ कर सकती हैं, कुछ नहीं, बहुत कुछ कर सकती हैं. मैंने आपको छोटी बहन माना है तो आप इस भाई के लिए कुछ नहीं करेंगी? इस भाई को जीवनदान देने के लिए कोई चमत्कार चलाइए ना.'

'मैं आपके मन की शान्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करूँगी,' मैंने कहा.

'आपको मालूम है, मेरे मन की शान्ति मेरे पुत्र के दुखों से मुक्त होने में है. तो आपकी इस प्रार्थना से मेरे पुत्र के जीवन के कष्ट दूर हो जाएँगे।'

'नहीं, आप और आपका पुत्र एक एंटिटी नहीं हैं. आप दोनों का भाग्य एक नहीं है, आपके पुत्र का कष्ट-मुक्त होना आपके सुख का सबब ज़रूर बनेगा लेकिन भगवान के दरबार में अगर आपके सुखी होने की अर्ज़ी डाली जाए, तो वह आपके पुत्र का भाग्य नहीं बदल सकती। हरेक का भाग्य उसके अपने कर्मों पर टिका है. जिस केस में दो पार्टीज़ जुडी हों, उस केस का फैसला एक पार्टी के भाग्य से नहीं होता।'

'इसका मतलब, मैं तो कभी सुखी हो ही नहीं सकता, मुझे कभी ख़ुशी मिल ही नहीं सकती?'

'नहीं, ऐसा नहीं है. मेरी प्रार्थना से आप सुखी अवश्य होंगे, क्योंकि आपकी नज़रों में सुख और ख़ुशी के मायने बदल जाएँगे।'

'और मेरा पुत्र? आप उसके लिए कोई प्रार्थना नहीं करेंगी? मणिका जी, मैं अपने पुत्र की सारी गलतियों के लिए हाथ जोड़ कर आपसे माफ़ी माँगता हूँ.'

दिनकर भाई को कैसे यह ग़लतफ़हमी हो गई कि जैसे मुझे कोई सिद्धि प्राप्त है, जैसे मेरे किए स्याह हो जाएगा, मेरे किए सफ़ेद। मेरा तो बस मन साफ़ है, वैसे इस दिशा में मुझे कुछ आता-जाता थोड़े ही है?

'दिनकर भाई, फोन बंद करती हूँ और आपके पुत्र के बारे में मैंने जो अपनी ज्ञान की आँखों से देखा है, वह आपको एसएमएस करती हूँ.'

मैंने फोन बंद कर दिया और दिनकर जी को यह एसएमएस किया : अब उसके जीवन में कभी भी कुछ बुरा नहीं होगा। जितना बुरा होना था, अब तक हो चुका। अब वह जहाँ भी रहेगा, पूरे सुख और आराम से रहेगा। उसे भविष्य में कोई तकलीफ नहीं होगी। धीरे-धीरे उसके जीवन में सुख और आराम के मायने बदल जाएँगे। इस दुनिया में बहुत लोग ऐसे हैं, जो उससे भी ज़्यादा कष्ट भोग रहे हैं, जिन्हें मनचाही मुरादें नहीं मिलतीं, लेकिन यदि यह निश्चित हो जाए कि अब उसे कोई दुःख नहीं मिलेगा तो यह भी बहुत बड़ी बात है. और यह निश्चित हो चुका है.…… परपरपरपरपर एक दुर्घटना की सम्भावना नज़र आती है.… वह अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते जंगल से शहर की ओर भागने की कोशिश कर सकता है जिसमे उसकी मदद जंगल का अधिकारी करेगा, क्योंकि जंगल का अधिकारी एक अयोग्य अधिकारी है, अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम नहीं है, इसीलिए जंगल में सही क़तर-ब्यौंत करके खूबसूरती पैदा करने की बजाय लोग जंगल में गलत तरीके से मंगल मना रहे हैं. यदि ऐसा हुआ तो फिर आपके पुत्र को कोई नहीं बचा सकता। भगवान उसे सद्बुद्धि दे. आमीन।

(जिन्हें यह पोस्ट जितनी समझ में आए, उतनी से गुज़ारा करें, न समझ आने पर टिप्पणी करना ज़रूरी नहीं।)