Monday, 12 January 2015

18. एक भावचित्र : यौवन राग

18. एक भावचित्र : यौवन राग

उफ़ ! यह जीवन कितना लम्बा है ! और इसमें सबसे लम्बा होता है यौवन, जो लम्बा होने के बावजूद हँसते-रोते सिर्फ इसलिए कट जाता है कि वह यौवन होता है. बचपन गुज़र जाता है बस तेरह-चौदह साल में. किशोरावस्था शुरू होते ही यौवन के सपने शुरू हो जाते हैं, जो प्रौढ़ावस्था से होते हुए कभी-कभी वृद्धावस्था तक चलते हैं. उम्रदराज होने पर भी कई व्यक्ति स्वयं को शारीरिक रूप से एवं भावात्मक धरातल पर इतना चुस्त-दुरुस्त महसूस करते हैं कि उस उम्र तक भी उन्हें यौवन का ही अहसास होता है. फिर आता है बुढ़ापा, जो यदि बीमारियों-कष्टों से भरा हुआ हो और अपनों का अभाव हो तो लम्बा न होने के बावजूद बहुत लम्बा लगता है, काटे नहीं कटता। यौवन जीवन का सबसे सुन्दर एवं सुखद पक्ष है. आप सुन्दर नहीं होते, फिर भी सुन्दर लगते हैं. आकर्षक नहीं होते, फिर भी आकर्षक लगते हैं. आकर्षण और यौवन का सबसे नज़दीकी रिश्ता है. यौवन में हर कोई आपके साथ होना चाहता है, हर कोई आपका साथ देना चाहता है. आप ज़रूरतमंद होते हैं, लोग मदद करने चले आते हैं. आप दुखी होते हैं, लोग पुचकारने चले आते हैं. दर्द शक्ल बदल-बदल कर गिरता है झोली में, फिर भी चेहरे पर ताज़गी रहती है. हर कंधा चाहता है, आप उस पर अपना सिर रख कर रोएँ। और यूँ कट जाता है यह लम्बा सा यौवन कि पता भी नहीं चलता कि कब हम अपने देखते-देखते बूढ़े हो गए. एक दिन जो अपना चेहरा आईने में देखते हैं तो पता चलता है कि अरे, यह मैं हूँ? नहीं नहीं, मैं ऐसा नहीं हो सकता


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