Wednesday, 14 January 2015

20. एक भावचित्र : आखिरी दुःख

20. एक भावचित्र : आखिरी दुःख

यह एक अंत की शुरुआत है। ख़ुशी को आते देखा मैंने दरवाज़े पर, भाग कर उसका स्वागत किया। सोचा ऐसा क्या बचा रह गया था, जो मैंने अब तक नहीं पाया था? ज़रूर होगा यह कुछ ख़ास, नए अर्थ होंगे इसके, ज़रूर लिखा होगा यह नसीब में, तभी खुद-ब-खुद चल कर आया है. मैंने इसे कब बुलाया है? जीवन की आखिरी सौगात है। इसे अपने आँचल में भर लूँ. मन के भीतर कहीं बंद करके रख दूँ. जब चाहूं खोलूँ, जब चाहूँ देखूँ। किसी की नज़र न लग जाए. मेरी ही नज़र न लग जाए. इतना अमूल्य उपहार, आसमान से सीधा मेरी झोली में आ गिरा। उफ़ ! उफ़ ! मैं कैसे सम्भलूँ? सुख की भी होती एक बर्दाश्त है। यूँ ही पड़े नहीं मिल जाते राह पर. हर किसी के भाग्य में नहीं लिखे होते। अनमोल होते हैं ये. कीमत चुकानी पड़ती है फिर भी. खुद मर कर इन्हें ज़िंदा रखना पड़ता है. अपने उसूल तक बेचने पड़ते हैं मुफ्त। पूर्ण समर्पण माँगता है प्यार। प्यार का दुःख भी प्यार ही होता है. बिन सहा रह गया था यह आखिरी दुःख। जिसे मैंने समझा था जीवन का आखिरी सुख, वह मेरे जीवन का आखिरी दुःख निकला। मैं नहीं जानती थी कि किसी पत्थर से टकरा जाऊँगी और बिना किसी कसूर के लहुलुहान हो जाऊँगी। नहीं जानती थी कि भगवान का प्रसाद जिसे समझा था, वह गरलपान की तरह हलक के नीचे उतर जाएगा और मेरी अँतड़ियों को जला कर राख कर देगा। कहाँ गए वे दिन जब मैंने अपने जीवन के पतझर में बसंत का आना महसूस किया था? क्यों व्यर्थ ही मुस्कुराना शुरू किया था? मुझे आदत ही नहीं थी मुस्कुराने की. बरसों से संगत में जी रही थी वीराने की। यह तो कोई बात नहीं हुई कि हवा का झोंका आए और शीतल करने की बजाय सब कुछ बिखरा के चला जाए। अब समेट रही हूँ तितर-बितर हुए पल. फिर से लिखूँगी विरह का कोई गीत. फिर से लूँगी संकल्प हँसते रहने का।


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