Monday, 19 January 2015

21. एक भावचित्र : जीवन के रंग

21. एक भावचित्र : जीवन के रंग

मैंने उस दिन चटख लाल रंग की साडी पहन ली. आईने के सामने जा खड़ी हुई. लगा, आईने में दिख रही वह, जो मैं ही थी, मुझ पर हँस रही थी, ओह्हो ! मैंने सोचा, उससे कहूँ, अब कपड़ों में ही रंग रह गए हैं. ज़िन्दगी के रंग तो फीके पड़ गए.....  रंगों के भी कैसे-कैसे अर्थ हमने बना लिए हैं. क्या लाल रंग में ही शोखी नज़र आती है? मैंने सफ़ेद रंग के पीछे भी कितने चंचल मन देखे हैं. यह भी खूब रही कि मन की चंचल दशा को छुपाना हो तो सफ़ेद पहन लो. चलो, यूँ ही समझ लो कि मैंने मन की उदासी को छुपाने के लिए लाल रंग पहन लिया। क्या मन की उदासी छुप गई ? बाहर शायद नज़र नहीं आ रही, लाल रंग ने उदासी को परदे के पीछे छुपा दिया है. मन भी धीरे-धीरे खिलने लगा है, सच, जीवन में रंगों का कितना महत्व् है. मुझे पहले यह ख्याल क्यों नहीं आया कि मुझे चटख रंगों के कपड़े पहनने चाहिए, मन की उदासी कुछ तो दूर होगी। क्यों अब तक मैं सफ़ेद पर अटकी रही ? दिमाग को चलने में भी तो टाइम लगता है. थक जाता है बेचारा, क्या करे ? दिमाग थका हुआ, मन थका हुआ, तन भी तो थकने जैसा हो रहा है. लाऊँ, कहीं से बहुत सारे रंग लाऊँ, असली नहीं, नकली ही सही, कुछ तो सही दिखूँ, कुछ तो सही महसूस करूँ। फिर भी पूछ रही हूँ, बार-बार खुद से, क्या अब इन ऊपरी रंगों से काम चलाऊँ ?


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