Friday, 30 January 2015

22. एक भावचित्र : स्पैस्टिक लड़की

22. एक भावचित्र : स्पैस्टिक लड़की

जब कभी आप कुछ अच्छा काम करते है, कुछ ऐसा जिस अच्छे को करने के पीछे कोई वजह न हो, कोई तर्क न हो, तो लोग आपको पागल समझते हैं. शायद पागल व्यक्ति ही बेवजह अच्छा करता है, सयाना आदमी नहीं। एक बात याद आ रही है. एक परिवार से हमारा मिलना-जुलना होता रहता था, यह बात दूसरी थी कि हम दोनों परिवारों के बीच कोई लगाव नहीं था. बस औपचारिकता थी. उनकी 12-13 वर्ष की एक बेटी थी, जो स्पैस्टिक थी यानि मानसिक रूप से थोड़ी कमज़ोर थी. (स्पैस्टिक बच्चे वे होते हैं जिनमे जन्म के समय से ही कोई शारीरिक या मानसिक कमी रह जाती है. ये किसी के समझाने से नहीं समझते, वही करते हैं जो इन्हें करना होता है. इनका पूर्ण इलाज संभव नहीं होता, फिर भी सजग और पैसे से समर्थ माता-पिता इनका इलाज करवाते हैं और इनमें थोड़ी-बहुत लियाकत आ जाती है.) हम जब भी उनके घर जाते या वे लोग आते, वह लड़की दौड़ कर आती और मुझसे लिपट जाती, बार-बार कहती, 'आंटी, आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं.' उसकी माँ उसे खींच कर मुझसे अलग करती, वह फिर लिपट जाती और वही बात, 'आंटी, आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं. आप हमारे घर रोज़ आया करो.' एक बार उसके पैरेंट्स ने बताया कि ऐसे बच्चों के लिए भी स्कूल हैं, अब वह स्कूल जाती है और घर में भी ट्यूशन लेती है. (यह एक तरह से इन बच्चों के पुनर्वास की कोशिश होती है जो अमीर लोग ही अफोर्ड कर पाते है.) वह लड़की बड़ी होती गई. उसके बारे में उसके माता-पिता से कोई बात नहीं होती थी. हमें इस ओर ध्यान देने की कोई आवश्यकता भी नहीं थी. फिर एक दिन उस लड़की के चौदहवें जन्मदिन का निमंत्रण मिला। हम गए. उस दिन उस लड़की ने पहले की तरह दौड़ कर मुझे आलिंगनबद्ध नहीं किया। एक जगह बैठी रही, शालीन तरीके से. मैंने उसकी माँ से कहा, 'क्या रूप निखरा है आपकी बेटी का.' वह बोलीं, 'हाँ, पर अब इसका बहुत ही ख्याल रखना पड़ेगा। बड़ी हो रही है.' हमारे विदा होने का समय आया, हम उठ खड़े हुए, लेकिन लड़की अब भी पहले की तरह दौड़ कर मुझसे नहीं लिपटी। दूर से हाथ जोड़ दिए. शायद उसके माँ-पिता ने उसे समझाया हो या उसे खुद समझ आ गया हो कि हम परिवारों के बीच मौके-ब-मौके मिलने के बावजूद उतना अपनापन नहीं है. मैंने उनके घर से बाहर निकल कर पहली बात यह सोची कि अरे, यह तो ठीक हो रही है. बढ़िया है.


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