Friday, 2 January 2015

पर्दाफ़ाश 1 : दिनकर जी

पर्दाफ़ाश 1 : दिनकर जी

एक हैं हमारे दिनकर भाई. उन्होंने क्रिसमस पर शुभकामना सन्देश भेजा, मैंने उन्हें शुभकामना नहीं भेजी क्योंकि मेरी तबियत 25 से ही ढीली चल रही है  फिर उन्होंने 31 को शुभकामना मेल भेजी। मैं उत्तर नहीं दे पाई. पहली को यानि कल फ़ोन पर मैसेज आया, नया साल मंगलमय हो. मैं जवाब देने के लिए बिस्तर से उठ नहीं पा रही थी. तभी फ़ोन की घंटी बज उठी. उठना ही पड़ा, देखा, वही थे. बातचीत के अंत में मैंने कहा, 'दिनकर जी, कितनी बार आप भी मेरे मैसेज का जवाब नहीं देते, मेरी मिस्ड कॉल के बाद पलट के फ़ोन नहीं करते।' बोले, 'मैं पलट के फ़ोन करूँ या न करूँ, लेकिन आपको ज़रूर करना है.' लो जी, यह अच्छी रही.

मैं अपने जिए विश्वासों की बातें जब लोगों को बताती हूँ, तो कई लोग मुझ पर अटूट विश्वास करने लगते हैं कि मैं उनकी समस्या का समाधान अवश्य कर सकती हूँ. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है, होता तो मेरे जीवन में कभी दुःख आते ही क्यों? मैं तो बस समस्या की बाल की खाल निकाल कर उसकी इतनी जड़ में पहुँच जाती हूँ कि मेरी तर्कबुद्धि समस्या के आरपार देख लेती है. मेरे लिए वही समाधान होता है. सच है, जब चीज़ें अच्छी तरह समझ में आ जाएँ तो वही समाधान।

अब दिनकर जी के विश्वास का क्या करूँ जिन्होंने पिछले महीने फोन पर ऐसा ही विश्वास ज़ाहिर किया। कहने लगे, 'आप ज़रूर कुछ कर सकती हैं, कुछ नहीं, बहुत कुछ कर सकती हैं. मैंने आपको छोटी बहन माना है तो आप इस भाई के लिए कुछ नहीं करेंगी? इस भाई को जीवनदान देने के लिए कोई चमत्कार चलाइए ना.'

'मैं आपके मन की शान्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करूँगी,' मैंने कहा.

'आपको मालूम है, मेरे मन की शान्ति मेरे पुत्र के दुखों से मुक्त होने में है. तो आपकी इस प्रार्थना से मेरे पुत्र के जीवन के कष्ट दूर हो जाएँगे।'

'नहीं, आप और आपका पुत्र एक एंटिटी नहीं हैं. आप दोनों का भाग्य एक नहीं है, आपके पुत्र का कष्ट-मुक्त होना आपके सुख का सबब ज़रूर बनेगा लेकिन भगवान के दरबार में अगर आपके सुखी होने की अर्ज़ी डाली जाए, तो वह आपके पुत्र का भाग्य नहीं बदल सकती। हरेक का भाग्य उसके अपने कर्मों पर टिका है. जिस केस में दो पार्टीज़ जुडी हों, उस केस का फैसला एक पार्टी के भाग्य से नहीं होता।'

'इसका मतलब, मैं तो कभी सुखी हो ही नहीं सकता, मुझे कभी ख़ुशी मिल ही नहीं सकती?'

'नहीं, ऐसा नहीं है. मेरी प्रार्थना से आप सुखी अवश्य होंगे, क्योंकि आपकी नज़रों में सुख और ख़ुशी के मायने बदल जाएँगे।'

'और मेरा पुत्र? आप उसके लिए कोई प्रार्थना नहीं करेंगी? मणिका जी, मैं अपने पुत्र की सारी गलतियों के लिए हाथ जोड़ कर आपसे माफ़ी माँगता हूँ.'

दिनकर भाई को कैसे यह ग़लतफ़हमी हो गई कि जैसे मुझे कोई सिद्धि प्राप्त है, जैसे मेरे किए स्याह हो जाएगा, मेरे किए सफ़ेद। मेरा तो बस मन साफ़ है, वैसे इस दिशा में मुझे कुछ आता-जाता थोड़े ही है?

'दिनकर भाई, फोन बंद करती हूँ और आपके पुत्र के बारे में मैंने जो अपनी ज्ञान की आँखों से देखा है, वह आपको एसएमएस करती हूँ.'

मैंने फोन बंद कर दिया और दिनकर जी को यह एसएमएस किया : अब उसके जीवन में कभी भी कुछ बुरा नहीं होगा। जितना बुरा होना था, अब तक हो चुका। अब वह जहाँ भी रहेगा, पूरे सुख और आराम से रहेगा। उसे भविष्य में कोई तकलीफ नहीं होगी। धीरे-धीरे उसके जीवन में सुख और आराम के मायने बदल जाएँगे। इस दुनिया में बहुत लोग ऐसे हैं, जो उससे भी ज़्यादा कष्ट भोग रहे हैं, जिन्हें मनचाही मुरादें नहीं मिलतीं, लेकिन यदि यह निश्चित हो जाए कि अब उसे कोई दुःख नहीं मिलेगा तो यह भी बहुत बड़ी बात है. और यह निश्चित हो चुका है.…… परपरपरपरपर एक दुर्घटना की सम्भावना नज़र आती है.… वह अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते जंगल से शहर की ओर भागने की कोशिश कर सकता है जिसमे उसकी मदद जंगल का अधिकारी करेगा, क्योंकि जंगल का अधिकारी एक अयोग्य अधिकारी है, अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम नहीं है, इसीलिए जंगल में सही क़तर-ब्यौंत करके खूबसूरती पैदा करने की बजाय लोग जंगल में गलत तरीके से मंगल मना रहे हैं. यदि ऐसा हुआ तो फिर आपके पुत्र को कोई नहीं बचा सकता। भगवान उसे सद्बुद्धि दे. आमीन।

(जिन्हें यह पोस्ट जितनी समझ में आए, उतनी से गुज़ारा करें, न समझ आने पर टिप्पणी करना ज़रूरी नहीं।)

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