Monday, 12 January 2015

सार्वकालिक सत्य

सार्वकालिक सत्य

आप यकीन करें या न करें, मुझे लोगों की शक्लें, हावभाव देख कर, उनसे थोड़ी सी बात करके यह नज़र आ जाता है कि उनका जीवन कैसा है और कैसा गुज़रेगा?

दो सच्ची घटनाएँ आपको बता रही हूँ। बात कुछ समय पहले की है। एक लड़की के लिए उसके माता-पिता लड़का ढूँढ रहे थे। मिलने में दिक्कतें आ रही थीं। तभी उस लड़की के एक सहकर्मी ने उसे प्रोपोज़ किया। लड़का अपने माता-पिता का एकलौता बेटा था। किन्हीं कारणों से लड़के के घरवालों को यह रिश्ता पसंद नहीं था लेकिन लड़की वालों के लिए जैसे यह मन-माँगी मुराद थी। लड़का ऑफिस के बाद रात देर तक लड़की के साथ रहता, ज़्यादातर लड़की के घर। वह हर वक़्त लड़की और उसके परिवार से घिरा रहता, जैसे उसकी किस्मत का फैसला हो चुका था। हम लड़की लड़का दोनों को जानते थे। एक दिन किसी काम से वह लड़का हमारे घर आया, 'अरे, यह तो बहुत भोला है, एकदम बच्चा है, इसे लड़की और उसके घरवालों द्वारा घेर-घार कर ऐसे रखा जा रहा है कि जैसे इसे ज़्यादा सोचने-समझने का मौका ही न मिले। न इसे इसके माता-पिता से बात करने का समय दिया जा रहा है। बेचारे ने लड़की के प्रति हलकी सी पसंद क्या दर्शाई कि सारे चिपट गए उसे इनफ्लुएन्स करने में।' मैं उस लड़के को देख कर यह सब सोच गई। मुझे लोगों की शक्लें, हावभाव देख कर, उनसे थोड़ी सी बात करके यह नज़र आ जाता है कि उनका जीवन कैसा है और कैसा गुज़रेगा। मैंने अपने पुत्र से कहा, 'आज यह लड़का जैसे नींद में है। जिस दिन इसकी आँख खुलेगी, जिस दिन इसे ज़रा भी सोचने की फुरसत मिलेगी, यह उस लड़की से अलग हो जाएगा।'

उसी महीने उन दोनों की शादी हो गई। और जैसा मैंने कहा था, लड़के की आँख खुलनी ही थी, छह महीने के भीतर ही उनका तलाक हो गया। ऐसे घेर-घार के शादियाँ होती हैं क्या? शादी से पहले लड़के को सोचने का टाइम तो दो। लड़के को इंफ्लुएंस करने में सारा खानदान लगा है, आखिर कब तक लड़के को समझ नहीं आएगा कि यह सारी साज़िश उसे उसके माता-पिता से अलग करके एक तरह से उसे किडनैप करने की हो रही है। चलो, देर आयद, दुरुस्त आयद।

अब दूसरी घटना। यह बात भी कुछ समय पहले की है। मैं अकेली बस से शिमला जा रही थी। मेरे आगे वाली सीट पर एक नवविवाहित युगल बैठा था। लड़की के हाथ में लाल चूड़ा था। शायद हनीमून मनाने जा रहे थे। सर्दी का मौसम था। ठंड बेशुमार थी। लड़की ने खिड़की खोल रखी थी। मैं ठंडी हवा से परेशान थी। मैंने हाथ बढ़ा कर खिड़की बंद कर दी। लड़की ने गुस्से में खिड़की खटाक से फिर खोल दी। मैंने उससे अनुरोध किया, 'मेरी तबियत ठीक नहीं, अगर आप खिड़की बंद कर दें तो.....' उसने मुझे डाँट कर कहा, 'नहीं, खिड़की बंद नहीं होगी। इतनी ही ठंड लगती है तो शिमला क्यों जा रही हैं?' उसका नया नवेला पति कुछ नहीं बोला। मैंने सोचा, या यूँ कहूँ कि मुझसे उस समय यह सोचा गया, 'अरे कहाँ निभेगी ऐसी तेज़-तर्रार लड़की? मुझे नहीं लगता, यह शादी ज़्यादा देर चलेगी।'

खैर। 12-14 घंटे का सफ़र था। वह लड़का यानि उस तेज़-तर्रार लड़की का पति एक सहयात्री के नाते मुझसे बोल लिया। हो सकता है, उसे मुझसे हमदर्दी रही हो। औपचारिक बातचीत। दिल्ली में कहाँ रहते हो, क्या करते हो आदि। बस। फिर हम अपनी-अपनी राह।

संयोग देखिए, इस घटना के तीनेक महीने बाद ही वह लड़का मुझे 'बिग बाजार' में दिखा। उसने भी मुझे देखा और 'अरे, आप यहाँ?' मैंने उससे उसकी नई नवेली दुल्हन के बारे में पूछा तो बोला, 'क्या बताऊँ? तलाक का केस चल रहा है।' फिर उसने जो कारण बताया, वह यह कि उसकी पत्नी अपने कमरे में दरवाज़ा भेड़ कर बैठी थी कि उसकी सास यानि लड़के की माँ किसी काम से दरवाज़ा खोल कर उसके पास गई। लड़की भन्ना कर बोली, 'How dare you enter my room without knocking? (बिना दरवाज़ा खटकाए आप मेरे कमरे में क्यों आईं?)' बस उसी दिन उस परिवार ने निर्णय ले लिया कि 'इस लड़की में अच्छे संस्कार नहीं हैं, यह हमारे घर के योग्य नहीं।' मैंने कहा, 'थोड़े दिन तो देख लेते।' वह बोला, 'नहीं, जिस लड़की की जड़ समझ में आ जाए, उसे ज़्यादा क्या खींचना? फिर थोड़े दिन और देखने के चक्कर में बच्चे हो जाएँ तो और दिक्कत।' मैंने मन ही मन कहा, 'मुझे तो पहले हो लग गया था कि यह लड़की निभने वाली नहीं है। बहुत अच्छा किया जो तीन महीने के अंदर ही फैसला कर लिया।'

ज़माना कितना ही बदल जाए, हम कितने ही आधुनिक हो जाएँ, हम कितना ही पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति को अपना लें, मूर्खों और बदतमीज़ों को कभी पसंद नहीं किया जाएगा।

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