Wednesday, 14 January 2015

तमिल लेखक पेरामल मुरूगन

तमिल लेखक पेरामल मुरूगन

14 पुस्तकों के 49 वर्षीय चर्चित तमिल लेखक पेरामल मुरूगन के एक उपन्यास से उपजा बवाल, उनके उपन्यास का घोर विरोध हुआ, क्योंकि वह उपन्यास समाज-विरोधी माना गया.और विरोधियों ने उनसे उपन्यास वापस लेने के लिए उन्हें विवश कर दिया। पेरामल मुरूगन ने तंग आकर अपनी फेसबुक वॉल पर एक सुसाइड नोट लिखा है कि "लेखक पेरामल मुरूगन मर गया है. उन्होंने अपनी सारी पुस्तकें वापस ले ली हैं और पाठकों से अपील की है कि वे उनकी समस्त पुस्तकें जला दें तथा प्रकाशक उनकी पुस्तकें न बेचें। उनके अनुसार लेखक पेरामल मुरूगन मर गया है लेकिन अध्यापक पी मुरूगन जीवित रहेगा।"
पेरामल मुरूगन ने यह पोस्ट 12 जनवरी को लिखी, जो तमिल में होने के कारण समझ से परे थी लेकिन इस पोस्ट पर आए निम्नलिखित कमेंट से पता चलता है कि यही पोस्ट होगी।
Mahesh Kannan You want to write what you think and believe ,no one should oppose it you call it freedom. WE TOO HAVE THE SAME FREEDOM TO STOP IT...
विरोधियों के अपने तर्क होते हैं. लेकिन क्या लेखक इतना कमज़ोर होता है कि वह सामाजिक विरोध से घबरा कर लिखना छोड़ने का ही ऐलान कर दे? इससे पूर्व भी सलमान रुश्दी, तसलीमा नसरीन जैसे लेखक हुए हैं जिनके लेखन का उनके समाज, जनता तथा धर्म ने पुरज़ोर विरोध किया, यहाँ तक कि उन्हें मौत के फतवे से भी नवाज़ा, लेकिन किसी ने इस तरह डर कर, घबरा कर लेखन को ही तिलांजलि देने के बारे में नहीं सोचा, उन्होंने देश-निकाला होकर तथा भूमिगत होकर भी इस तरह के विरोधों का सामना किया और अपने लेखन को जारी रखा. लेखक यदि कुछ लिखने का साहस करता है तो उसे उस लेखन पर होने वाली प्रतिक्रियाओं का भी सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह तो नहीं कि सब उसकी हाँ में हाँ मिलाएंगे। इस लिहाज से पेरामल मुरूगन एक दुर्बल व्यक्तित्व के लेखक हैं. या कहीं ऐसा तो नहीं कि सुप्रसिद्ध लेखक अपने विरोध को भी अपनी प्रसिद्धि के लिए भुना रहे हैं? या यह हताशा में दिया गया बयान है? जैसा कि मेरा अनुभव कहता है, लेखक हमेशा लेखक होता है, लेखक कभी मर नहीं सकता, पेरामल मुरूगन का यह सुसाइड नोट क्षणिक आवेश में लिखा गया है, वे फिर लौटेंगे, जल्द ही, अपनी नई रचना के साथ.



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