Thursday, 15 January 2015

सोनिया गाँधी

सोनिया गाँधी

जब राजीव गाँधी जीवित थे और प्रधान मंत्री थे, तब उनकी पत्नी सोनिया गाँधी राजनीति में न कभी रुचि लेती थीं. न ही वे राजीव जी के कामों में दखलंदाज़ी करती थीं. उनसे पहले, इंदिरा गाँधी के ज़माने में भी वे एक बेहतरीन बहु के रूप में सहयोग करती थीं, जबकि इंदिरा जी की दूसरी बहु मेनका गाँधी अपने पति संजय गाँधी से शायद नाखुश रहने के कारण या अत्यधिक महत्वकांक्षी होने के कारण इंदिरा गाँधी और गाँधी परिवार के प्रति हमेशा गैर-वफादार रहीं। राजीव गाँधी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी सोनिया को राजनीति में लाने के लिए कितनी जोड़-तोड़ करनी पड़ी, यह विपक्षी दल भी जानते हैं. वे तो राजनीती से दूर रहना चाहती थीं, उनके पति और उनके परिवार को उनका मौन सहयोग और समर्थन था. वह एक भारतीय घरेलु महिला की भाँति अपनी ससुराल में प्रसन्न थीं. यह सोनिया जी की नियति थी कि उन्हें राजनीति में आना पड़ा.
चाहे उस समय उन्हें राजनीति का ए बी सी नहीं आता था, लेकिन उनमें ग़ज़ब की सूझबूझ थी इसलिए उन्होंने राजनीति में कदम रखते ही कुछ गज़ब के निर्णय लिए। उनका पहला सूझबूझ भरा निर्णय था, उनकी पार्टी के चाहने, उनकी मान-मनुहार करने के बावजूद उनके द्वारा प्रधानमन्त्री पद को न स्वीकारना। यदि वे ऐसा करतीं तो पद और सत्ता की लालची समझी जातीं। अब इस बात का अहसास उन्हें किसी अन्य ने थोड़े ही कराया, उनमें खुद समझ थी।
दूसरा निर्णय उन्होंने और अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण लिया, वह था, श्री मनमोहन सिंह को प्रधानमन्त्री बनाना। बाद में इसका हश्र चाहे जो रहा हो, उस समय इससे बेहतर कोई निर्णय नहीं हो सकता था। इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद जो सिखों के साथ सुलूक हुआ, उससे सिर्फ देश में ही नहीं, विदेशों में भी समस्त सिख समुदाय कांग्रेस पार्टी के खून का प्यासा हो गया था। उस समय उन्हें शांत करने का एकमात्र यही उपाय हो सकता था कि कांग्रेस द्वारा उनके ही समुदाय के किसी व्यक्ति को सर्वोच्च पद पर आसीन कर दिया जाए। यह उपाय सिर्फ सोनिया गाँधी के मस्तिष्क की उपज थी, जिसका तत्काल लाभ भी मिला।
तीसरा महत्वपूर्ण फैसला जो सोनिया गाँधी ने लिया, वह था, अपने ही पति के हत्यारों की फाँसी की सज़ा को माफ़ कर देना। यह फैसला उन्हें उनके अपने स्वार्थ से ऊपर उठा कर उन्हें एक ऐसे मंच पर स्थापित करता है, जो उनकी न काहू से वैर वाली छवि बन जाती है और उनकी नज़रों में देशहित प्रमुख होता नज़र आता है।
अब अगर कॉंग्रेस सत्ता में नहीं है तो कोई भी कुछ भी बोल दे, लेकिन सच को कहने में शर्म कैसी? जब लोग खोज-खोज कर कमियाँ निकालते हैं, तो उन्हें खोज-खोज कर उन अच्छाइयों की चर्चा भी करनी चाहिए, जिसके कारण किसी पार्टी ने सर्वाधिक समय तक अपना झंडा गाड़े रखा। अब हार गई तो क्या है, फिर उभर कर आ सकती है।
देश में, लोकतंत्र में शासन के लिए पार्टियाँ बदलती रहती हैं और हर पार्टी एक-दूसरे की निन्दा करती ही है, इसमें कोई नई बात नहीं है। बहरहाल, मुझे न राजनीति में रुचि है, और न ही राजनीति का ज्ञान है, यह तो बस ऐसे ही दिल में आया तो लिख दिया।

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