Monday, 5 January 2015

पर्दाफ़ाश 4 : गुड़गाँव जेल

पर्दाफ़ाश  4 : गुड़गाँव जेल 

कुछ विषय ऐसे होते हैं जिनकी सेल वैल्यू होती है यानि जिनकी खबर अच्छी बिकती है. अब मैं अगर समोसे बनाऊँ और अपने घर के बाहर ठेला लगा लूँ, तो यह तो कोई खबर नहीं हुई, बल्कि लोग लानतें देने पहुँच जाएँगे कि आखिर कितना पैसा कमाएगी मणिका? हाँ, तिहाड़ जेल के कैदी समोसे बनाएँ और जेल के गेट पर खोमचा लगा कर बेचें तो अखबार वाले जमघट लगा लेंगे, भई, यह तो खबर है, समोसों से ज़्यादा दाम में बिकेगी। इसी तरह नारी विमर्श से जुडी हुई कोई खबर हो, देश की राजनैतिक दलदल में फँसी हुई कोई खबर हो, किसी भी निचले तबके से जुड़ा हआ कोई कारनामा हो, या उच्च वर्ग से जुड़ा हुआ कोई हादसा हो, तो सच में खबर है. अखबार वाले उस खबर की जड़ तक जाएँगे ही नहीं कि आखिर उस खबर बनने के पीछे राज़ क्या है?

सात महीने पुरानी खबर पर मेरी नज़र अब दोबारा पड़ी तो मैंने नए सिरे से इस खबर पर विचार किया। खबर गुड़गाँव जेल की है, जिसके बारे में 21.05.14 के हिंदुस्तान टाइम्स, गुड़गाँव संस्करण में यह खबर धूमधाम से छपी थी कि जेल के कैदियों ने जेल के रिकॉर्ड के रख-रखाव से सम्बंधित एक सॉफ्टवेयर तैयार किया है  जिसके लिए उन कैदियों की वाहवाही हो रही है. अच्छी बात है, वाहवाही का कोई काम करें तो वाहवाही होनी चाहिए, लेकिन क्या अखबार ने इस रहस्य पर से पर्दा उठाने की कोशिश की कि आखिर इस कार्य को अंजाम दिया कैसे गया? क्या गुड़गाँव जेल का जेलर कंप्यूटर का ज्ञान रखता है? क्या कैदियों के हाथ में कंप्यूटर सौंपने से पहले उन्होंने इस बात के पुख्ता प्रबंध किए थे कि कैदियों को इस तरह का सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराया जाए कि काम करने वालों की पहुँच इंटरनेट तक न हो? कैदी कितने भी सीधे और शरीफ समझे जाएँ, खासकर उम्रकैदी, उनकी गिनती खूँखार कैदियों के रूप में ही होती है, इसीलिए, उन्हें दुनिया-समाज से अलग करके जेल की चाहरदीवारी में रखा जाता है. वैसे भी जेल में सज़ायाफ्ता कैदिओं का बाहर की दुनिया से संपर्क में रहना खतरे से खाली नहीं। ज़ाहिर है, ये कैदी लड़कियों के मामले में भी इतने तरसे-भटके होते हैं कि और कुछ नहीं तो अपनी नीरस ज़िन्दगी में थोड़ा रस पैदा करने के लिए बाहरी दुनिया की लड़कियों से झूठा इश्क ही लड़ाएँगे। ऐसा कोई कैदी किसी बाहरी व्यक्ति से संपर्क करके यह नहीं बताएगा कि वह जेल में है.

फिलहाल तो सॉफ्टवेयर बनाने की कहानी यूँ है कि इस जेल के कुछ उच्च शिक्षित कैदियों ने जेलर के आगे सॉफ्टवेयर बनाने का प्रस्ताव रखा. अब जेलर कोई पढ़े-लिखे तो होते नहीं, ये तो डंडा फटकारने वाले स्कूल का हेडमास्टर की तरह होते हैं, इन्हें क्या पता, सॉफ्टवेयर किस चिड़िया का नाम है? तो कुछ शातिर दिमाग कैदियों ने जेलर महोदय को पटाया कि सर जी, अपनी जेल का कितना नाम होगा? सर जी के सर में यह नहीं बैठा कि भई, चोरों को चाबियाँ पकड़ा रहे हैं, क्या गारंटी है कि ये बाहरी दुनिया में नहीं झाँकेंगे? यदि ये इतने ही चरित्रवान होते तो जेल में मरने आते हो क्यों? मैं हैरान हूँ कि जेलर के बाद अन्य उच्च अधिकारी भी जश्न मना रहे हैं कि गुड़गाँव जेल के कैदियों ने बहुत अच्छा काम किया है, प्रमाण पत्र बाँटे जा रहे हैं, लेकिन किसी गधे अधिकारी के दिमाग में यह बात नहीं आ रही कि यह काम करवा के उन्होंने कितना बड़ा खतरा मोल लिया है? क्या हरयाणा जेल और न्यायपालिका में सारे ही गधे बैठे हैं जो इस तथ्य की तह में जाकर इस जघन्य अपराध की गंभीरता को समझ न सके? और फिर, सरकार के पास कौन सी पैसे की कमी है जो एकसॉफ्टवेयर इंजीनियर को नौकरी पर नहीं रख सकते थे? क्या जेलर महोदय और हरयाणा हाई कोर्ट के अधिकारी यह समझते हैं कि हर साल कोई सॉफ्टवेयर इंजिनियर, हार्डवेयर इंजिनियर या चार्टर्ड अकाउंटेंट अपनी बीवी की हत्या करके आएगा और इनका यह सॉफ्टवेयर का स्कूल चलाएगा? जवाब तो अब RTI के ज़रिए ही मिलेगा।

बहरहाल, यह केस अब RTI में भेजा जाएगा, तब इसकी असलियत खुलेगी, और जेलर महोदय कटघरे के उस पार खड़े होकर जवाब देंगे। बहुत हो गई मस्ती।


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