Friday, 9 January 2015

Gazal 45

Gazal 45

मैं लिखूँगी तुमको बार-बार
मैं पढूँगी तुमको बार-बार।
जब बहेगी अनिल सुवासित
मैं रचूँगी तुमको बार-बार।
आँख से टपकेगा जब खून
मैं कहूँगी तुमको बार-बार।
जब कभी गिर-गिर पड़ोगे तुम
मैं रखूँगी तुमको बार-बार।
जन्म लोगे तुम अनेक जन्म
मैं वरूँगी तुमको बार-बार।

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