Saturday, 3 January 2015

सब कुछ ख़त्म है Kavita 226

सब कुछ ख़त्म है

जब कभी दिल में कुछ
डुप से डूबता है
समझ जाती हूँ
तुमने मेरा एक और अंश काट कर
अपने से अलग किया है।

जब खाली दिल में कभी
खन्न सा बजता है कुछ
जान जाती हूँ
मेरी पीड़ा का उत्सव
मन रहा है तुम्हारी साँसों में।

जब कभी रुनझुन रुनझुन
गिरते हैं आँसू मेरे अनजाने
समझ जाती हूँ
तुम मिटा रहे हो पोंछ-पोंछ कर
अपने तन-मन से मेरा प्यार।

जब कभी भूले-भटके
लिपट जाती हूँ तुमसे ख्यालों में
डर जाती हूँ कि
मेरी गर्दन तक पहुँचे तुम्हारे हाथ
क्या तुम्हारा प्यार ही थे?

सब कुछ गडमड है
दिल में, दिमाग़ में
सोचती हूँ, क्या। समझती हूँ, क्या।
सब कुछ तो ख़त्म है
फिर भी क्यों ज़िंदा है?


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