Wednesday, 21 January 2015

मन बच्चा Kavita 227

मन बच्चा

जब उसने मुझे चाहा
तब मैंने जाना
दिनों को गिनते-गिनते
मन कैसे हो जाता है बच्चा?

कभी-कभी मर जाता है
असमय बचपन
असमय यौवन
किसी को पता नहीं चलता।

अकेले रास्ते पर चलते हुए
जहाँ न कोई आगे है न पीछे
सोचो, कहाँ खो जाते हैं अपने?
किस गर्त में डूब जाते हैं सपने?

ऐसे में कोई बढ़ता हुआ हाथ
पुकारती हुई आहट
कदम रोक ले तो?
हाँ तो वहाँ रुक ही जाएँगे कदम.

उम्र के द्वार तोड़
मजबूरी के पाखण्ड छोड़
उछलेगा मन तब बच्चे की तरह.
सच ना?

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