Sunday, 22 February 2015

जीने की तमन्ना Kavita 229

जीने की तमन्ना

जीने की तमन्ना इतनी कि
हर बार उम्र को पीछे कर
मैं दौड़ गई मेलों में और सुनसानों में।

भागमभाग नहीं अब कोई
छुपाछुपी भी बंद हो गई
है फर्क नहीं खेलों में और बलिदानों में।

जीवन की गाड़ी सर्र सर्र
बिन पंखों के ही फर्र फर्र
है दौड़ रही रेलों में और मैदानों में।

कौन सिरफिरा उछल-उछल कर
बेमतलब की बाजी खेले
ढूँढो उसको जेलों और पागलखानों में।

कुछ अज्ञाती भाव सुनहरे
कुछ आभासी रंग रुपहले
हैं सजे हुए शमियानों और शमशानों में।

Saturday, 21 February 2015

Girdhar Joshi

Some Mistakes Have No Pardon : An English novel by Girdhar Joshi

"This is a story of a monk who was not a monk long back. He was a charming boy who, despite of a deprived childhood, grows to riches and achieves professional excellence by his grit and hard work. But before he realizes the designs of destiny, he finds himself struggling to find love, peace and happiness, and ends up in losing relations after relations, amidst the compelling pressures of profession, pssion and maladjustment of life.

What made him to metamorphose into a life of a monk? And was he happy being one? The story finally unravels the maze and finds answers."

Its title, Some Mistakes Have No Pardon, attracted me so much that I was compelled to buy this novel. Its an interesting reading. It was published by quills Ink Publications in 2014. A 426 pages book is priced at Rs. 395/- The author, Girdhar Joshi is my Facebook friend. Further details can be had from him. He, earlier published some books on management and information technology. But his "urge to write did not stop at the academic books." He also has a poetry collection to his credit. This is his first novel. May God bless him to write more such novels.


Tuesday, 17 February 2015

Car Accident

Car Accident

मुझे लगता है, किसी की बद्दुआएँ और दुआएँ मेरे साथ-साथ चल रही हैं. बुरा वक़्त मुझे मारने आता है लेकिन किसी की दुआएँ मुझे ज़िन्दा रखे रहती हैं. (सच कहूँ मित्रों, मुझे दिल से लगता है कि आप सब की दुआएँ मेरे काम आ रही हैं, क्योंकि आपका मेरे प्रति सख्य भाव निःस्वार्थ है.)

आज शाम मैं शॉप्रिक्स मॉल से घर वापस लौट रही थी थी. एक चौराहे पर एक टैक्सी ने मेरी कार को इतने ज़ोर की टक्कर मारी कि मेरी गाडी एक-दो अन्य वाहनों से रगड़ती हुई, जैसे कूदती हुई आगे जाकर दाहिनी ओर के सिग्नल पर उस बूथ से जा टकराई जिस पर ट्रैफिक कंट्रोल करने के लिए सिपाही खड़ा होता है, बूथ गिर गया. (उस समय वहाँ सिपाही नहीं था.) दाहिनी ओर से तेज़ी से आ रही बस उस गिरे हुए बूथ की वजह से वहीँ रुक गई अन्यथा मेरी कार को मेरी तरफ बस की टक्कर लगती और मेरा काम तमाम था. मैं सचमुच में दहल गई. मैंने उतर कर देखा, मेरी कार का हाल बुरा था, बोनट अंदर घुस गया. पीछे और दोनों तरफ के दरवाज़ों पर भयंकर खरोंचों के साथ बड़े-बड़े डेंट पड़ गए, एक दरवाज़े का हैंडल टूट कर वहीँ लटका हुआ था. पीछे का बम्पर दो टुकड़े हुआ पड़ा था. कार बस चार पहियों पर खड़ी थी और चल सकती थी. सड़क की बेतहाशा तमाशबीन भीड़, पुलिस की गाडी, फिर पुलिस चौकी, इन सबको झेलते हुए मैं घर पहुँची। शायद मेरी शक्ल पर दहशत  थी, इसीलिए बच्चों ने पूछा, "इतनी डरी हुई क्यों हो?" मैंने उन्हें बाहर जाकर कार के दर्शन करने को कहा. बेटा मुझसे नाराज़ कि "इतना सब हो गया, आपने फ़ोन करके मुझे बुलाया तक नहीं, और यह कार को चारों तरफ चोट कैसे लगी?" मुझे सिलसिलेवार कुछ बताना नहीं आया. मैं खुद भी हैरान थी कि आखिर मेरी गाड़ी चारों तरफ से कैसे ठुकी? और मेरे कार चलाने पर पाबन्दी लगा दी गई. संयोग देखिए, जबकि आज ही सुबह कह रहा था, "नई गाड़ी कौन सी लेनी है, मॉम? इसे बदलो, तीन साल हो गए."



Friday, 13 February 2015

संयुक्त परिवार बनाम खदेड़े हुए बुजुर्ग

संयुक्त परिवार बनाम खदेड़े हुए बुजुर्ग

बहुत साल पहले मैंने औरंगाबाद में एक हिन्दी प्रवक्ता प्रौढ़ महिला (उनका नाम भूल रही हूँ) के परिवार में अच्छा तारतम्य देखा था. उन प्रवक्ता ने विवाह नहीं किया था, अपने पिता के घर रहती थीं, उनके भाई-भाभियाँ उनका अत्यंत सम्मान करते थे. अपनी भाभियों से उन्हें पूरा सहयोग प्राप्त था. घर के सारे सदस्य उन्हें सर-आँखों पर रखते थे.

इसी तरह एक अन्य अविवाहित प्रौढ़ महिला लेखिका याद आ रही हैं जो स्पैस्टिक थीं, शरीर अपंग था, मुश्किल से चल पाती थीं, उनके शरीर में सिर्फ उनकी उंगलियाँ सही थीं, जिनमे कलम पकड़ कर वह लिखने में समर्थ थीं. और सही थी उनकी बुलंद आवाज़, जिससे वह धुरंधर बोलने में सक्षम थीं. उनमे जिजीविषा इतनी थी कि हर साहित्यिक सभा-गोष्ठी में जाना पसंद करती थी, दूसरे शहरों में भी. और उनकी इन महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में सहयोग देती थीं उनकी दो युवा भाभियाँ। उन्हें शहर-शहर ले जाकर गोष्ठियाँ अटेंड करवाती थीं.

ज़ाहिर है, ये भाभियाँ अच्छे सुसंस्कृत परिवारों की बेटियां थीं, और सुसंस्कृत परिवारों में ही ब्याही थीं. भाई भी बहनों के प्रति संवेदनशील थे. आजकल कहाँ हैं ऐसे सुसंस्कारित लड़के-लड़कियाँ?

मेरे विचार में संयुक्त परिवार की बहुत उपयोगी होता है. जॉइंट फैमिली में बच्चे अच्छे संस्कार पा सकते हैं. मैं भी सोचती हूँ कि संयुक्त परिवार बहुत मायनों में एकल परिवार की तुलना में बेहतर होता है. सबसे बड़ी बेहतरी तो यही कि युवा नौकरी पर जाएँ तो उनके बच्चों को सँभालने के लिए बुजुर्ग घर पर रहते हैं, नौकरों से काम करवाने के लिए भी. साथ ही एक-दूसरे का सहयोग हर कदम पर बना रहता है. लेकिन संयुक्त परिवारों में ख़ुशी तब ही होती है, जब बहु और ससुरालियों के बीच अच्छा तारतम्य हो.

मैंने अच्छे लोग देखे हैं तो बुरे लोग भी देखे हैं. बल्कि बुरे लोग ज़्यादा देखे हैं. कई परिवारों में मैंने खुद देखा है कि बहुएँ इतने गैरसंस्कारी परिवारों से आती हैं कि वे अपने बच्चों को दादा-दादी से बात नहीं करने देतीं। दादा-दादी अपने पोते-पोती से बोलने को तरसते हैं लेकिन ज़ालिम बहुएँ उन्हें आपस में मिलने तक नहीं देतीं। बुजुर्ग अपने पोता-पोती के लिए केयर टेकर का काम करें तो बहुएँ खुश, अन्यथा बच्चों को संस्कार देने के नाम पर उनकी कुत्सित भावनाएँ आड़े आती हैं. जो बुजुर्ग भले होते हैं, उनके पुत्र भी भले होते हैं, जिनके लिए बुरी पत्नियों को बर्दाश्त करना ही एकमात्र विकल्प होता है. कई बार हालात ऐसे होते हैं कि अलग होना संभव नहीं होता। तो बुजुर्गों को खदेड़ दिया जाता है एक कमरे में. अब ऐसे संयुक्त परिवारों में बच्चे क्या अच्छा सीखेंगे?

Thursday, 12 February 2015

नैतिक प्रशिक्षण

नैतिक प्रशिक्षण

माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूली शिक्षा के अलावा महँगी-महँगी ट्यूशन्स लगाते हैं ताकि बच्चा सर्वोच्च अंक लेकर पास हो. क्या किसी माता-पिता ने कभी यह ध्यान दिया है कि बच्चों को मॉरल ट्रेनिंग (नैतिक प्रशिक्षण) देने के लिए कोई ट्यूटर रखा जाए?
आजकल स्कूलों में भी इस तरह का कोई ज्ञान नहीं दिया जाता। आजकल के माता-पिता भी अपनी मौज-मस्ती के चलते बच्चों के आगे कोई आदर्श नहीं पेश करते। पहले यानि जब हम छोटे थे, स्कूलों में महापुरुषों के वचन, सूक्तियाँ, कहावतें, इन सब के ज़रिये हमें पढ़ाया जाता था कि अपने से बड़ों का, गुरुजनों का आदर करो, हमेशा सत्य बोलो, हमेशा मधुर वचन बोलो। हमारे मन में कभी यह सवाल नहीं उठा था कि हम ऐसा क्यों करें?
हाल ही में जब मैंने कुछ टीनेजर बच्चों से बात की तो यह जान कर दंग रह गई कि आजकल के बच्चों के मन में यह सवाल उठता है कि "हम अपने से बड़ों का आदर क्यों करें? उनका कहना क्यों मानें? यह तो कोई तर्क न हुआ कि वे बड़े हैं, इसलिए हम उनका कहना मानें। बड़े होने से ही कोई अक्लमंद और सही नहीं हो जाता। हमें तर्क से समझाओ कि हम बड़ों का आदर क्यों करें?"
ऐसे प्रश्नों को जन्म देने के पीछे उन बच्चों द्वारा नेट पर निम्नलिखित खबर देख और पढ़ लेना था कि....
युगांडा (अफ्रीका) में वर्षों से सिविल वॉर चल रही है। उनके पास सोल्जर (सिपाही) कम हैं, इसलिए वे छोटे बच्चों का अपहरण करके उनके हाथों में बंदूक थमा देते हैं, इस आदेश के साथ कि जाओ, दुश्मन को ख़त्म कर दो। ऐसे हालात में बच्चे दहशत के दौर से गुज़रते हैं और या तो बिन आई मौत मरते हैं या खूँखार दानव बन जाते हैं।
"बच्चों के खेलने और पढ़ने की उम्र में उनके हाथों में बड़ों के द्वारा बंदूकें थमा देना क्या सही है?" मुझसे बात करने वाले बच्चों का प्रश्न था। मेरा यह तर्क उन्हें समझ में नहीं आया कि "यह उस देश के हालात हैं, उस देश की समस्या है, हमारे देश में ऐसी कोई समस्या नहीं है।" उनके मन पर युगांडा के बच्चों की दहशत हावी थी।
इस बात के लिए यह आधुनिक तकनीक ज़िम्मेदार है कि वह हर उम्र के सामने उस उम्र द्वारा न देखने योग्य चीज़ें भी प्रस्तुत कर रही है। चाहे बच्चे पोर्न वीडियो देखें या इस तरह के दहशतजदा समाचार पढ़ें। अब यह स्कूलों और पैरेंट्स का कर्तव्य हो जाता है कि वे इस नए युग के विकास में छुपी बुराइयों के हिसाब से अपनी शिक्षा की दिशा में परिवर्तन लाएँ और बच्चों को सकारात्मक दृष्टिकोण मुहैया कराएँ। स्कूल के साथ-साथ माता-पिता भी ज़िम्मेदार हैं. बच्चों की नकारात्मक सोच बनने में।
हम बचपन में खेल-खेल में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते थे, "हम देश के भावी रक्षक हैं, हम देश का गौरव बढ़ाएँगे" आदि आदि. यह नई पीढ़ी जब बड़ी होगी, तो देश में क्या-क्या गुल खिलाएगी, कितने अपराधों को जन्म देगी, यह देखने के लिए हमारी पीढ़ी जीवित नहीं होगी लेकिन यह देश का दुर्भाग्य है कि आज की शिक्षा प्रणाली अच्छे इंसान तैयार नहीं कर रही, बल्कि अपराधी प्रवृत्ति की नई पौध तैयार कर रही है.

Monday, 9 February 2015

24. एक भावचित्र : मस्ताना मौसम

24. एक भावचित्र : मस्ताना मौसम

जब दो मौसम मिलते हैं, सर्दी से गर्मी की ओर जाते हुए फरवरी में और गर्मी से सर्दी की ओर जाते हुए अक्टूबर में, तो यहाँ दिल्ली की प्रकृति में ऐसी रौनक होती है कि आकाश की ओर देखो तो हवाओं में उड़ने का जी चाहे, ज़मीन की ओर देखो तो धूल-मिट्टी में से एक नई महक उठे. पानी की ओर देखो तो कहीं भी डुबकी लगाने के लिए मन ललचाए। ख़ुशी कहीं से आती हुई दिखती नहीं लेकिन न जाने किस राह से आकर मन के भीतरी कोनों में उतर जाती है. आहें-कराहें खुद-ब-खुद एक सुकून में बदल जाती हैं. एक अजीब सा ठहराव, एक अजीब सी संतुष्टि। यह मौसम से किसी ने क्या कह दिया कि रह-रह कर हिलोरें ले रहा है? मस्ताने मौसम का मस्ताना देखो तो ज़रा. कुदरत के ज़र्रे-ज़र्रे का इतराना देखो तो ज़रा. कितना भद्र है, ख़ामोशी से आया है, ख़ामोशी से चला जाएगा। लेकिन इसके खामोश कदमों के साथ आई एक नई ऊर्जा, एक नया उत्साह मन में ऐसा अलख जगाते हैं कि तन-मन कीर्तन-कीर्तन हो उठता है.


Saturday, 7 February 2015

कामयाबी के अनमोल रहस्य (भगवंत अनमोल)

कामयाबी के अनमोल रहस्य (भगवंत अनमोल)

भगवंत अनमोल की नई और तीसरी पुस्तक "कामयाबी के अनमोल रहस्य" पढ़ी. पढ़ते-पढ़ते कई जगह लगा कि क्या अनमोल की उम्र सचमुच केवल 24 साल है? ऐसी पुस्तकेँ प्रायः बड़ी उम्र के देशी-विदेशी लेखकों ने लिखी हैं. कोई वरिष्ठ लेखक ही इस प्रकार की पुस्तक लिखने का साहस करेगा ताकि उनके जीवन के अनुभवों का निचोड़ उनकी लेखनी में आ सके. लेकिन अनमोल ने 24 वर्ष की उम्र में यह साहस, जिसे मैं दुस्साहस कहूँगी, किया है तो यह श्लाघनीय है.

जैसा कि मैं इस पुस्तक के नाम से अनुमान लगा रही थी कि इसमें सूक्तियाँ, कहावतें, महापुरुषों के प्रेरणादायी वचन आदि दिए गए होंगे, लेकिन नहीं, इस पुस्तक का ढाँचा कहानी और उपन्यास का ढाँचा है, सूक्तियाँ भी हैं लेकिन उन्हें कथा में पिरो कर पेश किया गया है. कोई उपदेश ऐसे ही दे दो तो उसका उतना प्रभाव नहीं पड़ता, जितना उस समय पड़ता है, जब उसे तर्क सहित, उदाहरण सहित समझा कर बताया जाए. वही इस पुस्तक में किया गया है. इस पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे Paulo Coelho की विश्व विख्यात रचना ALCHEMIST याद आई.

अनमोल एक अत्यंत महत्वाकांक्षी युवा लेखक हैं, इतने महत्वाकांक्षी कि उन्हें अर्जुन की भाँति मछली की केवल आँख नज़र आती है. अच्छा है, अपने लक्ष्य पर स्वयं को केंद्रित करना चाहिए लेकिन यह केंद्रीकरण इतना भी ज़्यादा न हो कि आप समाज से विकेन्द्रित हो जाएँ। अनमोल जल्दी से जल्दी साहित्य के क्षेत्र में "बड़ा आदमी" बनाना चाहते हैं, नाम कमाना चाहते हैं, यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है, न ही ऐतराज़ योग्य कोई बात है. लेकिन यह ध्यान रहे कि जब आप पब्लिक फिगर बन जाते हैं तो आपको पब्लिक के कटाक्षों का भी सामना करना पड़ता है. जब अनमोल कामयाबी के अनमोल रहस्य के बारे में जानते हैं, तो उन्हें अपने लिए भी एक आचार-संहिता तैयार करनी होगी। वे Megalomania से ग्रस्त हैं, यानि अपने को महान समझने की भावना से, जो एक तरह से हीन भावना का ही रूप है. Megalomania is a psychopathological condition, characterized by delusional fantasies of power, relevance, omnipotence, and by inflated self-esteem. अब वे अपनी पुस्तकों का प्रचार बंद करें। इस पुस्तक का नाम ऐसा है कि इसे नेट पर देख कर पाठक स्वयं खरीदेंगे।

अंत में इस पुस्तक से ही एक ब्रह्म वाक्य ---
सफलता की सबसे ऊपरी मंज़िल तक जाने के लिए कोई लिफ्ट नहीं है, वहाँ तो सीढ़ियों से ही जाना पड़ता है.


Friday, 6 February 2015

23. एक भावचित्र : प्यार मर चुका है

23. एक भावचित्र : प्यार मर चुका है

बहुत हुआ प्यार-व्यार। प्यार मर चुका है. फिर भी, न जाने क्यों, हम आमने-सामने खड़े हैं, कंपकंपाती ठंड में, चिलचिलाती गर्मी में, ताबड़तोड़ बारिश में, पतझर के झरते पत्तों में, एक-दूसरे के लिए सूख कर लकड़ी होते हुए? क्या फिर से बसंत के शुरू होने की झूठी उम्मीद में? कि तुम होंगे पास तो दिन होंगे उत्सव से? प्यार मरने के बाद भी मरता क्यों नहीं?


मन की आँखें खोल Kavita 228

मन की आँखें खोल

मन की आँखें खोल बबुआ, मन की आँखें खोल

अनदेखे को देख सकें जो
वे नैना अनमोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

कभी कहे कुछ, कभी कहे कुछ
बातों में है झोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

हर कोई तेरे गुण गाए
ऐसी वाणी बोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

विपदा के पल जब भी आएँ
निज कर्मों को तोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

सहज सरल सीधी चालें चल
झंझट मत ले मोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

पावन है रिश्तों की माया
कहीं ज़हर मत घोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

मुड़-मुड़ कर वापस आना है
यह दुनिया है गोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

दबा-ढका सब ज़ाहिर है अब
और खुलेगी पोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

पिंजरे से जब बाहर आए
खुली हवा में डोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

मुक्ति पर्व की जिज्ञासा में
ढम ढम बाजे ढोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

Tuesday, 3 February 2015

मुझे मरने का बड़ा शौक है

मुझे मरने का बड़ा शौक है

मित्रों, मुझे मरने का बड़ा शौक है. मैं जब से पैदा हुई हूँ, तब से ही मरना चाह रही हूँ लेकिन मुझे मरना नहीं आता, नहीं पता कि कैसे मरा जाता है? बस मर-मर कर जीना आता है, सो जी रही हूँ, और बड़े ठाठ से जी रही हूँ.

बहुत साल पहले, जब मेरा पुत्र छोटा-सा था तो मैं हर वक़्त सोचा करती थी कि यदि मैं मर गई तो इसका क्या होगा? मैं अपने सारे दोस्त-सहेलियों-सम्बन्धियों से कहती, 'अगर मुझे कुछ हो जाए तो तुम इसे सँभाल लोगे?' वे जवाब देते, 'नहीं, नहीं, ऐसा नहीं बोलते, तुम क्यों मरोगी? तुम बहुत साल जिओगी।' उनके तसल्ली देने के बाद भी मेरा उनसे बार-बार यही कहती रही. मैं बार-बार यह पूछती कि अगर मैं मर गई तो? वे बार-बार मुझे समझाते कि ऐसा नहीं बोलते। मेरा कहना बंद नहीं हुआ. आखिर एक दिन वे सब एक सुर में झल्ला उठे, 'यार, तू मर भी. हम तेरे बेटे को सँभाल लेंगे, चिन्ता मत कर.' (निकृष्ट कहीं के, मेरा मरना चाह रहे हैं?)

मेरा पुत्र उस समय बहुत छोटा था, इतना कि मैं घुटनों के बल बैठती तो वह खड़ा हो कर मेरे बराबर आता था और जब मैं खड़ी होती, तब वह पलंग पर खड़ा हो कर मेरे बराबर आता था. मैं उससे भी हर समय एक ही बात, 'बेटा, अगर मुझे कुछ हो गया तो तू अपने को सँभाल लेगा ना? तू मेरे बिना जी लेगा ना?' नन्हा बच्चा नेरे आँसू पोंछता हुआ कहता, 'नहीं मम्मी, आप नहीं मरेंगी।' मेरा उसके आगे भी यह मृत्यु-आलाप बंद नहीं हुआ तो एक दिन वह बच्चा बोला, 'हाँ मम्मी, जी लूँगा।' (निकम्मा कहीं का, मम्मी के बिना जी लेगा?)

बीस-पच्चीस साल पहले की बात है. मैं कहीं जा रही थी. एक बाबा साधू सामने से आए, बोले, 'बच्ची, दस साल और जी ले, फिर चलाचली का मामला है.' मैंने सोचा, बहुत होते हैं, दस साल, फिर भी इंतज़ाम करके रख लूँ. मैंने अपनी एक बड़ी सी फोटो खिंचवाई, बेटे ने पूछा, 'क्यों?' मैंने कहा, 'बाद में फोटो रख कर पूजा की जाती है, तू कहाँ फोटो बड़ी करवाने के लिए भागा-दौड़ी करेगा?' (पर अच्छा है, मैं तब नहीं मरी क्योंकि आज आप मित्र और एकाध बड़ी विचित्र प्रकृति के लोग जो मेरे जीवन में आए, उनके अनुभव से वंचित रह जाती। अब सोचिए, वंचित रह भी जाती तो कौन सा पहाड़ टूट जाता? आखिर मर कर तो सब ख़त्म ही हो जाना है.)

अब मैं घर में काफी कैश रखती हूँ. (कहीं चोर न सुन लें) बेटे ने कहा, 'घर में इतना कैश रखने से क्या फायदा? यह तो चोरों को निमंत्रण देना हुआ. बैंक में रहेगा तो ब्याज भी मिलता रहेगा।' मैंने उसे समझाया, 'नहीं बेटा, कल को मुझे कुछ हो गया तो क्या तू पैसा निकालने तुरंत ATM जाएगा?' मेरा जवाब सुन कर बेटा क्या कहता? 'क्या माँ, आप भी……?'

एक दिन मेरे किशोर पौत्र ने जब यह सुना तो बोला, 'नहीं अम्मा, आप नहीं मरेंगी, मैं आपको मरने ही नहीं दूँगा,' और मुझसे लिपट कर धाड़-धाड़ रोना शुरू कर दिया। मैं बोली, 'पगले, अपने मरने की बात करते रहो तो उम्र बढ़ती है.' लेकिन उसका रोना नहीं थमा, जब तक उसने मुझसे यह प्रॉमिस नहीं लिया कि अब मैं कभी ऐसी बातें नहीं करूँगी। (देखा ना? सबसे गहरा रिश्ता।)

अपनी वो फोटो यहाँ दे रही हूँ. (क्या अपने मरने की बात से मैं दुखी थी जो इतनी उदास फोटो आई है?)


Monday, 2 February 2015

मेरी दादी - मेरी अम्मा

मेरी दादी - मेरी अम्मा

माता तो कुमाता हो सकती है, लेकिन दादी कभी कुदादी नहीं हो सकती।
यह बात मैंने 12-13 वर्ष की उम्र हो जाने के बाद सुनी थी कि जब मैं 2 महीने की थी, तब मेरी माँ बीमार हो गई और मेरे नाना उन्हें इलाज के लिए अपने शहर मेरठ ले गए. मेरे दादा-दादी ने मुझे पाला। मैं दादी को ही अपनी माँ समझती थी और उन्हें अम्मा कहती थी. लेकिन पिता मैं अपने पिता को ही समझती थी. (अम्मा से मुझे इतना प्यार था कि मैंने अपने ग्रैंड किड्स से अपने को अम्मा कहलवाया, हालाँकि मेरी मॉडर्न पुत्रवधु चाहती थी कि ग्रैंड मॉम जैसा कुछ कहा जाए.) खैर.
ये सब बातें मुझे बताई गईं कि मेरी अम्मा मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ती थी. सर्दी, गर्मी, बरसात, कोई भी मौसम हो, अम्मा सुबह चार बजे उठ कर यमुना नदी में नहाने जाती थी, (रिक्शा वाला बाँधा हुआ था), और मुझ 2 महीने की बच्ची को अपने साथ ज़रूर लेकर जाती थी. यमुना नदी के किनारे बनी सीढ़ियों पर वह मुझे लिटा देती थी और जल्दी से यमुना नदी में डुबकी लगा कर मेरे पास आ जाती थी. (उस समय यमुना नदी में पानी रहता होगा?)
मेरे दो वर्ष की होने के बाद मेरी माँ लौटी थी लेकिन मैं दादी के पास ही रही. वैसे घर एक ही था, आमने-सामने कमरे थे, (एक बहुत बड़े हवेलीनुमा मकान में (साथ-साथ दो घर और थे) मेरी दादी, पिता, ताऊ आदि सबके परिवार साथ रहते थे.) लेकिन मैंने कभी माँ नाम की  'उस औरत' को अपनी माँ नहीं समझा। वह अपने कमरे की खिड़की से हाथ से इशारा करके मुझे बुलाया करती थी और मैं उसकी शिकायत अपनी अम्मा से कर देती थी कि वह औरत मुझे बुलाती है, मुझे उसके पास नहीं जाना। अब याद नहीं कि अम्मा क्या जवाब देती थी? (इस पर मैंने एक कहानी लिखी थी, जिसमे 'उस औरत' पर तरस खाया था.)
जब मैं 12-13 साल की हुई तो मुझसे कहा जाने लगा कि 'वह औरत' मेरी सगी माँ है और उसके बच्चे मेरे सगे भाई-बहन. मुझे यकीन ही नहीं आता था. मैं अपने को अपनी अम्मा की अकेली बेटी समझती थी. (मेरी दादी के कोई बेटी नहीं थी.) अम्मा से मुझे जो प्रेम और अपनापन मिला, वह अद्भुत था. यदि मेरे पिता कभी मुझे डाँटते तो अम्मा मेरा सहारा बन कर मेरे साथ खड़ी होती। मेरी कोई इच्छा ऐसी नहीं जो अम्मा ने पूरी न की हो. इसलिए मेरे मन में आज तक माँ का कोई अहसास नहीं है।
मेरी अम्मा ने जो संस्कार मेरे मन में बोए, वे आज तक जीवित हैं. मेरी अम्मा हमेशा कहावतों में बात करती थी. जहाँ नीयत, वहाँ बरकत. भागवान की कमाई में सबका साझा जैसी कहावतें वह खाना खाने से पहले रोटी के टुकड़े तोड़ कर खाने की थाली के बराबर रखते हुए कहती जाती। मेरी दादी बहुत ही दयालु और सहनशील महिला थी. मैं जैसे बरकतों में पल रही थी.
जब से मुझे बताया गया था कि 'वह औरत' मेरी सगी माँ है और उसके बच्चे मेरे सगे भाई-बहन, तब से मैं उनके कमरे में जाने लगी थी. पर मुझे लगता, मैं उन जैसी नहीं हूँ, मैं सबसे अलग हूँ. कई बार मुझे सब चिढ़ाते, कि 'तुझे जब अम्मा जमना नदी ले जाती थी और वहाँ सीढ़ियों पर लिटा कर नहाने चली जाती थी, तब तू किसी और बच्चे से बदल गई थी.' बहुत सालों तक मेरे मन में यह उथल-पुथल रही कि शायद यह सच हो कि मैं बदल गई होऊँ, तभी तो किसी से मेरा दिमाग नहीं मिलता। लेकिन एक तसल्ली की बात थी कि मेरी शक्ल मेरे पिता से डिट्टो मिलती थी. बाद में घर में सबने मुझे अपने से लिपटा-लिपटा कर कहा था, 'अरे, हम तो मज़ाक कर रहे थे, तू सच समझ बैठी? नहीं, नहीं, तू बदली नहीं है, तू हमारी ही है.... मोहिनी।' कुछ दादी ने भी सबको चेतावनी ने दी थी, 'खबरदार, जो मेरी बिटिया से कुछ उल्टा-सीधा कहा तो.'
लोग कहते हैं कि वो बड़े बदनसीब होते हैं, जिनके माँ नहीं होती। मुझे बड़े होने पर पता चल गया था कि मुझे मेरी दादी ने पाला था. मुझे अपनी सगी माँ का कभी कोई अनुभव नहीं रहा. लेकिन मैंने कभी इस संदर्भ में अपने को बदनसीब नहीं समझा। मुझे आज तक लगता है कि मैं बड़ी नसीब वाली हूँ, जो मेरी दादी मेरी अम्मा थी.
मैंने अम्मा की मृत्यु के बाद उन पर कई कहानियाँ और कविताएँ लिखीं. लेकिन अम्मा के अंतिम दिनों में मैं अम्मा के साथ ज़्यादा वक़्त नहीं बिता सकी. उस समय मैं कॉलेज में थी, सखी-सहेलियों के बीच मौज-मस्ती में थी. आज तक इस मलाल को अपने से दूर नहीं कर पाई. काश .... 
और हाँ, एक बात और, मैंने अनेक माँओं को जाने-अनजाने अपने बच्चों को गलत शिक्षा, गलत संस्कार देते देखा है, इसलिए मैं दावे से कह सकती हूँ कि माता तो कुमाता हो सकती है, लेकिन दादी कभी कु-दादी नहीं हो सकती।

Sunday, 1 February 2015

Film एक हसीना थी

Film एक हसीना थी

मुझे आज फिर फ़िल्म 'एक हसीना थी' याद आई। पहले भी याद आती रही है। जब-जब मुझे अपना 'मूर्ख प्रेमिका' वाला रूप और अंततः चण्डी के रूप में दूसरे को मात देकर विजय प्राप्त करने वाला रूप याद आता है, तब-तब यह फ़िल्म मेरी रगों में हलचल मचा देती है। इस फ़िल्म का खासकर वह दृश्य जब नायक सैफ अली खान जेल में कैद नायिका उर्मिला मंतोडकर से मिलने अपने वकील के साथ जाता है, मोहासिक्त नायिका उसकी बातों में आकर उसके गले से लग जाती है और नायक वकील की ओर इस गरूर से देखता है कि देखो, यह फिर मेरे झाँसे में आ गई। बार-बार उसके झाँसे में आ जाने वाली नायिका मोह से मुक्त हो जब असलियत को पहचानती है तो नायक से बदला लेने की और उसे सही पाठ पढ़ाने की उसकी हर चाल अद्भुद होती है। जिस लड़की में सती-सावित्री छुपी होती है, उसी में कहीं चण्डी भी छुपी हुई होती है, जो समय पड़ने पर अपना ऐसा रूप दिखाती है कि .... उफ़ उफ़ उफ़ !!!



दोस्त द्वारा भेंट

दोस्त द्वारा भेंट

नीचे दी गई गणेश जी की पीतल की मूर्ति (जो एक ऐन्टीक पीस है), कुछ साल पूर्व मुझे मेरे एक दोस्त द्वारा भेंट की गई थी. शायद मेरा Handicrafts का काम देख कर उसने यह सोचा हो. लेकिन उसने कहा था, 'वह मुझे कुछ गिफ्ट देना चाहता था, उसके पास पैसे नहीं थे कि कुछ नया ला सके, यह मूर्ति उसके घर में पड़ी थी, जो उसके कथनानुसार उसके किसी काम की नहीं थी, इसलिए उसने मुझे दी ताकि मैं इसे अपने घर में सजा लूँ, बतौर उसकी निशानी।' मूर्ति का वज़न 25-30 किलो अवश्य होगा। मैं चूँकि इस लाइन में काम कर रही हूँ, इसलिए मुझे उसकी कीमत मालूम थी. बेचारे की साफगोई सुन कर मैंने उससे कहा था, 'तुम्हें मालूम है, इसकी क्या कीमत होगी?'

'अब मैं गिफ्ट की कीमत बताऊँ क्या? मुझे खुद नहीं याद, मैंने कितने की खरीदी थी,' उसने कहा.

'मैं इतना महँगा गिफ्ट नहीं लूँगी। मैं इसे अच्छे दाम पर बेच कर रुपये तुम्हें दे दूँगी। कबाड़ी को भी बेचूँ तो दस हज़ार के आसपास मिलेंगे। और अपनी दूकान पर रख कर बेचूँ तो 50-60 हज़ार तक. लेकिन महँगे कस्टमर का इंतज़ार करना पड़ता है,' मैंने कहा.

'मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैंने तुम्हें दे दिया, तुम्हारी मर्ज़ी, इसे रखो या बेचो,' वह बोला।

तो तब से यह मूर्ति मेरे घर की शोभा बढ़ा रही है. हम भी अहसान फरामोश नहीं जी, जो इसका गाना न गाएँ।

कुछ पुरानी चीज़ें कभी बेकार नहीं होतीं। जैसे सोना-चाँदी, जायदाद, और इसी तरह आजकल पीतल भी.

और हाँ, पुराने रिश्ते भी.