Friday, 6 February 2015

23. एक भावचित्र : प्यार मर चुका है

23. एक भावचित्र : प्यार मर चुका है

बहुत हुआ प्यार-व्यार। प्यार मर चुका है. फिर भी, न जाने क्यों, हम आमने-सामने खड़े हैं, कंपकंपाती ठंड में, चिलचिलाती गर्मी में, ताबड़तोड़ बारिश में, पतझर के झरते पत्तों में, एक-दूसरे के लिए सूख कर लकड़ी होते हुए? क्या फिर से बसंत के शुरू होने की झूठी उम्मीद में? कि तुम होंगे पास तो दिन होंगे उत्सव से? प्यार मरने के बाद भी मरता क्यों नहीं?


No comments:

Post a Comment