Monday, 9 February 2015

24. एक भावचित्र : मस्ताना मौसम

24. एक भावचित्र : मस्ताना मौसम

जब दो मौसम मिलते हैं, सर्दी से गर्मी की ओर जाते हुए फरवरी में और गर्मी से सर्दी की ओर जाते हुए अक्टूबर में, तो यहाँ दिल्ली की प्रकृति में ऐसी रौनक होती है कि आकाश की ओर देखो तो हवाओं में उड़ने का जी चाहे, ज़मीन की ओर देखो तो धूल-मिट्टी में से एक नई महक उठे. पानी की ओर देखो तो कहीं भी डुबकी लगाने के लिए मन ललचाए। ख़ुशी कहीं से आती हुई दिखती नहीं लेकिन न जाने किस राह से आकर मन के भीतरी कोनों में उतर जाती है. आहें-कराहें खुद-ब-खुद एक सुकून में बदल जाती हैं. एक अजीब सा ठहराव, एक अजीब सी संतुष्टि। यह मौसम से किसी ने क्या कह दिया कि रह-रह कर हिलोरें ले रहा है? मस्ताने मौसम का मस्ताना देखो तो ज़रा. कुदरत के ज़र्रे-ज़र्रे का इतराना देखो तो ज़रा. कितना भद्र है, ख़ामोशी से आया है, ख़ामोशी से चला जाएगा। लेकिन इसके खामोश कदमों के साथ आई एक नई ऊर्जा, एक नया उत्साह मन में ऐसा अलख जगाते हैं कि तन-मन कीर्तन-कीर्तन हो उठता है.


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